राष्ट्र की एकता व अखंडता की रक्षार्थ भारत को तोड़ने वाले अनुच्छेदों 35 ए व 370 में आवश्यक संशोधन करके जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम को संसद के दोनों सदनों में पिछ्ले वर्ष बहुमत से पारित किया जा चुका है। उस समय वहां के लगभग सभी विपक्षी व अलगाववादी नेताओं और उनके प्रमुख सहयोगियों को नजरबंद किया गया था। साथ ही आतंकवाद को उकसाने वाले पाक समर्थक नेताओं को भी शासन के आदेशानुसार नजरबंद किया गया। इस आवश्यक परिवर्तन व शासन के कठोर प्रशासकीय कार्यो से दशकों बाद इस क्षेत्र में पुन: शान्ति व विकास का वातावरण बनता हुआ प्रतीत होने लगा है।अत: स्वस्थ राजनैतिक प्रक्रिया को आगे बढाने के लिये केंद्र ने भी प्रतिबंधित नेताओं को छोड़ने का कार्य आरम्भ कर दिया है।
लेकिन यह दु:खद है कि स्वर्ग को नर्क बनाने वाले इन नेताओं पर पाबन्दी हटाने से इनके अलगाववादी तेवर पुन: दिखने लगे है। जम्मू-कश्मीर पर लम्बे समय तक शासन करने वाले अब्दुल्ला व मुफ्ती परिवार सहित वहां के कांग्रेस, माकपा व अन्य दलों के नेताओं ने इन अनुच्छेदों की वापसी की मांग पर एकजुट होने के समाचार आने लगा है।परन्तु इन नेताओं को यह विचार अवश्य कर लेना चाहिये कि कश्मीर घाटी के इन नेताओं की दादागीरी से त्रस्त जम्मू व लद्धाख के नागरिक इनका बिल्कुल साथ नहीं देंगे। साथ ही स्वतंत्रता के पश्चात पाकिस्तान व देश के कुछ अन्य भागों से आये हुए पीड़ित दलित हिन्दुओं व सिखों को अब वहां की नागरिकता मिल जाने से उनको समस्त नागरिक अधिकार मिल गए है। ध्यान रहे ऐसे लाखों लोग पिछ्ले 7 दशक से भी अधिक इन नेताओं की भारत विरोधी षडयंत्रकारी नीतियों के कारण ही अपने अनेक मौलिक व संवैधानिक अधिकारों से वंचित तिरस्कृत जीवन जी रहे थे। इसके अतिरिक्त विशेष महत्व का बिंदू यह भी है कि हमारे केंद्रीय नेताओं की दृढ़ इच्छा-शक्ति व पराक्रमी सुरक्षाबलों के युद्ध कौशल से पाकिस्तानी आतंकियों व उसके स्थानीय नेटवर्क को भी निरंतर धाराशाई करने में सफलता मिल रही है।
केन्द्रीय नेतृत्व को समस्त जम्मू-कश्मीर व लद्धाख की स्थितियों को सामान्य बनाये रखने के लिये पुन: अविलंब अपनी कठोर प्रशासकीय क्षमता का परिचय देना होगा। उसमें चाहे उन्हें उन सभी नेताओं को पुन: प्रतिबंधित ही क्यों न करना पड़े जो पुन: देेेश विरोधी आग को हवा देना चाहते हैं। अन्ततः राष्ट्रीय एकता व अखण्डता का महान संकल्प सर्वोपरि है।
भाजपा नेता अरुण जेटली की जिंदगी से जुड़ा हर पहलू और राजनीतिक करियर बेहतरीन था । यूँ ही उन्हें भाजपा का संकटमोचक नहीं कहा जाता था । जेटली का जन्म 28 दिसंबर 1952 को नई दिल्ली के नारायणा विहार इलाके के मशहूर वकील महाराज किशन जेटली के घर हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नई दिल्ली के सेंट जेवियर स्कूल में हुई । 1973 में जेटली ने दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से कॉमर्स में स्नातक की पढ़ाई पूरी की । इसके बाद उन्होंने यहीं से लॉ की पढ़ाई भी की। छात्र जीवन में ही जेटली राजनीतिक पटल पर छाने लगे। 1974 में वह दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ते गए । 1973 में उन्होंने जयप्रकाश नारायण और राजनारायण द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई वहीं 1974 में अरुण जेटली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए। 1975 में आपातकाल का विरोध करने के बाद उन्हें 19 महीनों तक नजरबंद रखा तो इसी दौर में जेटली की मुलाक़ात जेल में कई नेताओं से हुई । जयप्रकाश नारायण उन्हें काफी पसंद करते थे । आपातकाल की घोषणा के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया।
1990 में अरुण जेटली ने सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील में रूप में अपनी नौकरी शुरू की। अरुण जेटली मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में दूसरे नंबर के सबसे अहम शख्सियत माने जाते थे वहीँ उन्होंने अटल बिहार वाजपेयी की सरकार में भी अहम भूमिका निभाई । अटल सरकार सरकार में उन्हें 13 अक्टूबर 1999 को सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नियुक्त किया गया। उन्हें विनिवेश राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी नियुक्त किया गया। विश्व व्यापार संगठन के शासन के तहत विनिवेश की नीति को प्रभावी करने के लिए पहली बार एक नया मंत्रालय बनाया गया। उन्होंने 23 जुलाई 2000 को कानून, न्याय और कंपनी मामलों के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में राम जेठमलानी के इस्तीफे के बाद कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला। नवम्बर 2000 में एक कैबिनेट मंत्री के रूप में पदोन्नत किया गया और एक साथ कानून, न्याय और कंपनी मामलों और जहाजरानी मंत्री बनाया गया। भूतल परिवहन मंत्रालय के विभाजन के बाद वह नौवहन मंत्री भी रहे । उन्होंने 1 जुलाई 2001 से केंद्रीय मंत्री, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री के रूप में 1 जुलाई 2002 को नौवहन के कार्यालय को भाजपा और उसके राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में शामिल किया। 29 जनवरी 2003 को केंद्रीय मंत्रिमंडल को वाणिज्य और उद्योग और कानून और न्याय मंत्री के रूप में फिर से नियुक्त किया। 13 मई 2004 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के साथ, जेटली एक महासचिव के रूप में भाजपा की सेवा करने के लिए वापस आ गए और अपने कानूनी करियर में वापस आ गए।
2004-2014 तक उन्हें राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में चुना गया। 16 जून 2009 को उन्होंने अपनी पार्टी के वन मैन वन पोस्ट सिद्धांत के अनुसार भाजपा के महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया। वह पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य भी थे । राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक की बातचीत के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जन लोकपाल विधेयक के लिए अन्ना हजारे का समर्थन किया। जेटली ने 2002 में 2026 तक संसदीय सीटों को मुक्त करने के लिए भारत के संविधान में अस्सी-चौथा संशोधन सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया और 2004 में भारत के संविधान में नब्बेवें संशोधन ने दोषों को दंडित किया हालाँकि, 1980 से पार्टी में होने के कारण उन्होंने 2014 तक कभी कोई सीधा चुनाव नहीं लड़ा लेकिन पी एम मोदी के आग्रह पर 2014 के आम चुनाव में वह लोकसभा सीट पर अमृतसर सीट के लिए भाजपा के उम्मीदवार नवजोत सिंह सिद्धू की जगह बने जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार अमरिंदर सिंह से वह हार गए। वह लगातार 18 बरस से गुजरात से राज्यसभा सदस्य थे। उन्हें मार्च 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए फिर से चुना गया। 26 मई 2014 को, जेटली को नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वित्त मंत्री के रूप में चुना गया जिसमें उनके मंत्रिमंडल में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और रक्षा मंत्री शामिल रहे । बिहार विधानसभा चुनाव, 2015 के दौरान, अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात पर सहमति व्यक्त की कि धर्म के आधार पर आरक्षण का विचार खतरे से भरा है और मुस्लिम दलितों और ईसाई दलितों को आरक्षण देने के खिलाफ है क्योंकि यह जनसांख्यिकी को प्रभावित कर सकता है। नवंबर 2015 में जेटली ने कहा कि विवाह और तलाक को नियंत्रित करने वाले व्यक्तिगत कानून मौलिक अधिकारों के अधीन होने चाहिए क्योंकि संवैधानिक रूप से गारंटीकृत अधिकार सर्वोच्च हैं। उन्होंने सितंबर 2016 में आय घोषणा योजना की घोषणा की।
भारत के वित्त मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान, सरकार ने 9 नवंबर, 2016 से भ्रष्टाचार, काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद पर अंकुश लगाने के इरादे से 500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण किया। 20 जून, 2017 को उन्होंने पुष्टि की , जीएसटी रोलआउट अच्छी तरह से और सही मायने में ट्रैक पर है। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) लागू कराने का श्रेय अरुण जेटली को जाता है। जेटली ने ही ध्रुव विरोधी लोगों में इसके लिए सहमति बनायी। जेटली पेशे से वकील थे लेकिन कानून के साथ वित्तीय मामलों पर भी अच्छी पकड़ रखते थे। उनके पास कुछ महीने वित्त के साथ रक्षा जैसे दो अहम मंत्रालय का प्रभार था। लोक सभा चुनावों के दौरान जब राफेल का मुद्दा गरमाया तो वह सरकार के लिए ट्रबलशूटर बनकर उभरे । संसद में विपक्ष के खिलाफ सीधे मोर्चा संभाला। 1990 में अरुण जेटली ने सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील में रूप में नौकरी शुरू की वहीँ वीपी सिंह सरकार में उन्हें 1989 में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया। उन्होंने बोफोर्स घोटाले की जांच में पेपरवर्क भी किया। जेटली की गिनती देश के टॉप वकीलों में यूँ ही नहीं होती थी । 90 के दशक में जैसे-जैसे टीवी की महत्ता बढ़ती गई, वैसे-वैसे जेटली का ग्राफ भी चढ़ता गया। पार्टी के प्रवक्ता होते हुए वह स्टूडियो में इतने लोकप्रिय मेहमान बन गए थे कि जब पत्रकार वीर सांघवी ने उनके मंत्री बनने के तुरंत बाद उनका स्टार टीवी पर इंटरव्यू किया तो उन्होंने मजाक किया कि इस कार्यक्रम में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि मेरा मेहमान मुझसे ज्यादा बार टीवी पर आ चुका हो। राम जेठमलानी के कानून, न्याय और कंपनी अफेयर मंत्रालय छोड़ने के बाद जेटली को इस मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया। 2000 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें कानून, न्याय, कंपनी अफेयर तथा शिपिंग मंत्रालय का मंत्री बनाया गया। प्रखर प्रवक्ता और हिन्दी और अंग्रेजी-भाषाओं में उनके ज्ञान के चलते 1999 के आम चुनाव में बीजेपी ने उन्हें प्रवक्ता बनाया । अटल बिहारी सरकार में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंपा गया। इसके बाद उन्हें विनिवेश का स्वतंत्र राज्यमंत्री बनाया गया । 2002 में गुजरात में दंगे हुए। मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को हटाना चाहते थे। जेटली तब अटल और आडवाणी के काफी करीबी थे । गुजरात के गोधराकांड और दंगों के बाद जेटली उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने पार्टी के अंदर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का बचाव किया था। कहा जाता है कि जेटली ने अटल जी को सलाह दी और निवेदन किया कि मोदी को हटाना सही नहीं होगा। इसके बाद मोदी गुजरात में रम गए । 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के वक्त वे सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस, तुलसी प्रजापति एनकाउंटर केस, इशरत जहां एनकाउंटर केस में मोदी और शाह का बचाव करने वालों में सबसे आगे रहे।
2014 के लोकसभा चुनाव के पहले मोदी को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो यह जेटली की ही बिसात थी जिसने पूरी पार्टी में मोदी के नाम पर सहमति बनायी। वह गोवा अधिवेशन में एक दिन पहले ही पहुंच गए वजह मोदी के नाम पर सहमति बनानी थी । यही नहीं एन डी ए का दायरा बढ़ाने में भी परदे के पीछे जेटली ही आगे रहे। मोदी के नाम पर एन डी ए में सर्वसम्मति बनाने में जेटली का योगदान 2014 में सबसे महत्वपूर्ण था। 2014 में लोकसभा चुनाव के पहले जब मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने पर विचार किया तो यह बहुत आसान काम नहीं था लेकिन जेटली की बिछाई बिसात में कमल दमदार तरीके से पूरे देश में खिला । 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू किया गया तब तब जेटली वित्त मंत्री थे। उस समय तक जीएसटी 150 देशों में लागू हो चुका था। भारत 2002 से इस पर विचार कर रहा था। 2011 में यूपीए सरकार के समय तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी इसे लागू कराने की कोशिश की थी लेकिन यह 2017 में लागू हो सका। 2019 में मोदी है तो मुमकिन है का नारा गढ़कर उन्होने देश भर मे फिर से भाजपा के लिए माहौल बनाया । धारा 370 , धारा 35 ए समाप्त करने से लेकर नोटबंदी , जी एस टी और राफेल से जुड़े हर मसले पर उन्होने एक एक कर विरोधियों को अपने तर्कों से निरुत्तर कर दिया । जेटली एक सफल वकील के साथ ही राजनीति के कुशल रणनीतिकार और ज्ञान के महासागर थे ।
जेटली को भाजपा के सबसे शालीन और मिलनसार नेताओं में से एक माना जाता था। उनके संबंध दूसरे दलों में भी मधुर रहे और वह हमेशा सबको साथ लेकर चलने में यकीन रखते थे । जेटली के बारे में पार्टी में यह जुमला चलता था जिस राज्य का चुनावी प्रभारी उनको बनाया जाता है समझ लें उस राज्य में कमल खिलने से कोई नहीं रोक सकता। दक्षिण में कर्नाटक के दुर्ग को फतह करने में उनकी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। साथ ही बिहार में नीतीश के साथ गठबंधन बनाने में भी वह हमेशा आगे रहे। जेटली एक बेहतर इंसान भी थे । इसका एक नमूना ये था कि उनके निजी स्टाफ के कई कर्मचारियों के बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था उन्होनें विदेश में वहीं की जहां उनके बेटे रोहन जेटली ने पढ़ाई की । यही नहीं राजनीति के साथ ही जेटली खाने पीने और क्रिकेट के बड़े शौकीन रहे। इसके चलते पुरानी दिल्ली के तमाम दुकानदारों को वह व्यक्तिगत रूप से जानते थे । जेटली क्रिकेट के भी शौकीन थे इसी के चलते ही दिल्ली में फिरोजशाह कोटला का जीर्णोद्धार न केवल उनके दौर मे हुआ बल्कि दिल्ली , पंजाब , हरियाणा , यू पी सरीखे राज्यों के छोटे इलाकों से आने वाले लड़कों ने टीम इंडिया में भी अपनी जगह बनाई । वह भी उस दौर में जब महाराष्ट्र के खिलाडियों का बड़ा बोलबाला एक दौर में हुआ करता था। भाजपा में दूसरी पीढ़ी के नेताओं में अरुण जेटली की गिनती यूं ही नहीं होती थी । प्रमोद महाजन के जाने के बाद भाजपा को संवारने में जेटली की परदे के पीछे सबसे बड़ी भूमिका थी जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । जेटली लुटियंस के पत्रकारों के काफी करीब भी थे । जेटली के औद्योगिक घरानों से लेकर मीडिया तक में अच्छे दोस्त थे जिसका उपयोग उन्होंने पार्टी के लिए किया और आजीवन अपने सिद्धांतों और विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया । ऐसे संकटमोचक नेता की कमी भाजपा को हमेशा खलेगी ।
आज भारत की सीमित सीमाओं में रहते हुए, और मैकाले की गई शिक्षा के प्रभाव के कारण हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि कभी सारे विश्व में भारतीय संस्कृति का साम्राज्य रहा है। संसार के सारे असभ्य समाज को सभ्य बनाने वाले भारत के लोग हैं। आसानी से इन बातों पर विश्वास नहीं आ सकता पर विश्व भर के विद्वानों ने इसके बारे में लिखा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि भारत के किसी भी विद्यालय अथवा विश्वविद्यालय में इन अद्भुत तथ्यों की जानकारी नहीं दी जाती। इस पर कोई पाठ्यक्रम अथवा साहित्य भी तैयार नहीं किया गया। कोई और देश होता तो उसके एक-एक बच्चे को इसकी जानकारी होती।
विदेशी आक्रमणकारी अपने साम्राज्य को मजबूत करने के लिए इतिहास को अपने ढंग से लिखते हैं। पर स्वतंत्र होने के बाद विश्व के सभी देशों ने अपना इतिहास अपने दृष्टिकोण से लिखा। केवल मात्र भारत एक ऐसा अपवाद है जिसने अपना इतिहास अभी तक स्वयं नहीं लिखा। विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा, आक्रमणकारियों के हित में लिखा गया, आक्रमणकारियों का इतिहास हम अपना इतिहास मान कर पढ़ते-पढ़ते आ रहे हैं। इस इतिहास में हमारे गौरवशाली अतीत के हर पहलू को छुपा दिया गया है अथवा उसके बारे में झूठ बोला गया है। अनेक दशकों से हमें यह झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है। वास्तव में यह हमारा इतिहास है ही नहीं।
इस्लामी आक्रन्ताओं का 600 साल का, युरोपीय इसाईयों का 200 – 250 साल का; कुल 850 साल का झूठा-सच्चा, पक्षपात पूर्ण इतिहास इन पुस्तकों में है। मुस्लिम आक्रांता ओं के साथ सन 700 से लेकर सन 1100 तक, सन 1100 से सन 1700 तक मुम्लिम आक्रमणकारियों के साथ जो एक हजार साल का लम्बा संघर्ष हमने मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ किया, उसका वर्णन इस इतिहास में नहीं है। सन् 1700 से सन 1947 तक जो संघर्ष युरोपीय इसाईयों के साथ हुआ, उसका वर्णन इसमें नहीं है। जितना है, वह झूठ से भरा है।
जो राष्ट्र लाखों साल प्राचीन हो, उसके इतिहास को केवल 850 साल के आक्रमणकारियों के काल में समेट देना कैसे सही हो सकता है। सन 1100 पूर्व भारत का और विश्व का जो इतिहास रहा है उसको क्यों नहीं बताया जाता? वास्तव में उस इतिहास को सामने लाने के बाद यह बात उभर कर सामने आ जाती है की कभी पूरे विश्व पर भारतीय संस्कृति का राज्य रहा है। यह भी पता चलता है कि ‘सामी सभ्यता’ के कट्टरपंथी व असहिष्णु सांप्रदायों ने विश्वभर की अत्यंत विकसित, समुन्नत सभ्यताओं को बड़ी निर्दयता पूर्वक नष्ट भ्रष्ट कर दिया। ईसापूर्व विश्व के लगभग सभी देशों में भारत की वैदिक, सनातन, हिन्दू संस्कृति का साम्रज्य था। ये सारी सच्चाई सामने न आए, इसके लिए बड़ी चालाकी से ऐतिहासिक तथ्यों को दबाया-छुपाया गया है।
* विश्व में कभी भारतीय संस्कृति का साम्राज्य रहा है और वह संस्कृति अत्यंत उन्नत और विकसित थी, इस बात को बहुत छुपा कर रखना चाहते हैं।
* जिन संप्रदायों और विचारधारा के लोगों ने विश्व की सभ्यता को नष्ट भ्रष्ट किया, उनके अत्याचारों, हिंसा व दुष्कर्मों को छुपाकर रखना चाहते हैं।
* भारत का गौरवपूर्ण इतिहास सामने आए, हम गौरव व आत्मविश्वास का अनुभव करें, विश्व हमारी श्रेष्ठता, महानता को स्वीकार करे, हमारी संस्कृति का साम्राज्य विश्व में पुनः स्थापित हो; विश्व की तामसिक ताकतें नहीं चाहती हैं कि ऐसा हो।
इसलिए इन तथ्यों को छुपा कर रखा गया है। पर वास्तविकता को जानना कोई बहुत मुश्किल नहीं है। विश्व भर के सैकड़ों विद्वानों ने ऐसी पुस्तकें लिखी हैं जिनसे सच को आसानी से जाना जा सकता है।
इससचकोजाननेकीआवश्यकताक्याहै?
यह बात स्थापित हो चुकी है की सैनिक बल के द्वारा आप किसी भी छोटे – बड़े देश, समाज अथवा राष्ट्र को अनन्त काल तक गुलामी में जकड़ कर नहीं रख सकते। पर यदि उसकी मानसिकता को बदल दिया जाए, उनका गौरव, भाषा, संस्कृति, पहरावा, रीति-रिवाज बदल दिए जाएं; उनके इतिहास को बदल दिया जाए; तो वह समाज कभी भी स्वतंत्र होने की इच्छा नहीं करता। स्वतंत्रता और परतंत्रता का बोध ही समाप्त हो जाता है। इसीलिए किसी विद्वान ने कहा है, “यदि तुम किसी राष्ट्र को नष्ट करना चाहते हो तो उसके इतिहास को नष्ट कर दो, वह राष्ट्र स्वयं समाप्त हो जाएगा।”
यही भारत के साथ किया गया है। हमारे इतिहास, हमारे अतीत को हमसे छीना गया और एक विकृत इतिहास को हमें थमा दिया गया है। वास्तव में जो इतिहास आज हम पढ़ते हैं वह हमारा इतिहास नहीं; हम पर आक्रमण करने वालों का, हम पर अत्याचार करने वालों का, हमारी संस्कृति को नष्ट करने वालों का इतिहास है, जिसे हम अपना इतिहास मान कर पढ़ते आ रहे हैं। इस बात को एक जर्मन इतिहासकार विलहैम वोन पोकहैमर ने समझा। उन्होंने भारत पर एक पुस्तक लिखी है, “इंडियाज रोड टू नेशनहुड।” उसकी भूमिका में वे लिखते हैं, “जब मैं भारत का इतिहास पढ़ता हूं तो मुझे नहीं लगता कि यह भारत का इतिहास है। यह तो भारत पर आक्रमण करने वालों का, भारत को लूटने वालों का इतिहास है। जिस दिन भारत के लोग अपने सही इतिहास को जान जाएंगे उस दिन यह दुनिया को बता देंगे कि यह कौन हैं।” पोक हैमर एक बात यह भी कह रहे हैं कि हमारे इतिहास में इतनी ताकत है कि हम उसे जानने के बाद विश्व को अपनी श्रेष्ठता का आभास करा देंगे।
तो अपना वास्तविक इतिहास जानना जरूरी है।
* कभी विश्व भर में भारतीय संस्कृति व्याप्त रही है, इसके अनेक प्रमाण हैं।
चीन :
शायद हम कल्पना भी ना कर पाएं कि कभी चीन भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत रहा है। अमेरिका में चीन के राजदूत रहे विद्वान हू–शिह ने लिखा है,”भारतनेएकभीसैनिकअपनीसीमाओंसेबाहरभेजेबिना 2000 वर्षतकचीनपरअपनासाम्राज्यजमाएरखा।” सुनने में बहुत अजीब लगता है पर यही सच है। यह सत्य और तथ्य भारत की पुस्तकों में बहुत गौरव के साथ लिखा और पढ़ाया जाना चाहिए था। पर आश्चर्य है कि इसके ऊपर एक पंक्ति भी कहीं लिखी नहीं मिलती। इससे समझा जा सकता है कि वास्तव में भारत की सत्ता भारत का हित चाहने वालों के हाथ में नहीं रही है।
जापान के नाकामुरा नामक विद्वान ने “आइडल्स आफ ईस्ट” नामक पुस्तक लिखी है। उसके पृष्ठ क्रमांक 113 पर वे लिखते हैं,” चीन का धर्म और संस्कृति निसंदेह हिंदू स्रोत की है। एक समय था कि जब रॉयल प्रांत में 3000 हिंदू साधु और 10000 भारतीय परिवार बसे हुए थे जो वैदिक धर्म संस्कृति और कला को वहां चला रहे थे।”
इसी प्रकार प्रोफेसरशिप फ्लिप ने लिखा है,”भारत और चीन का सागर मार्ग से संपर्क बहुत प्राचीन है। ईसा पूर्व 680 में (आजसे 2700 सालपहले) चीन में पहुंचे भारतीयों ने वहां बस्ती स्थापित की थी।” (जर्नलआफरॉयलएशियाटिकसोसायटी 1965 868 525)
विश्व प्रसिद्ध विद्वान अकाउंट बिआर्न स्टीर्ना लिखा है, “ निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि चीन का धर्म भारत से उद्भव है। ( पृष्ठ 15)
मार्कोपोलो लिखता है कि चीनी लोग मृतकों का दाह संस्कार करते हैं। (पोलोखंड 2,पृ.191)
निश्चित रूप से यह भारतीय परंपरा है जो चीन पर हिंदू प्रभाव का प्रमाण है।
चीन के राज परिवारों की वेदो पर श्रद्धा होने के प्रमाण मिलते हैं। प्रोफेसर हांजिन सोंग ने लिखा है, “चीन के राजपुरुषों की वेदों पर बड़ी श्रद्धा है। लगभग साभी शासक वेदों का चीनी भाषा में अनुवाद कराते थे।”
योग और आयुर्वेद के संस्कृत ग्रंथों का भी चीनी भाषा में अनुवाद हुआ है लगभग 5000 ऐसे ही प्राचीन संस्कृत ग्रन्थियों का अनुवाद चीनी भाषा में उपलब्ध है।
हिंदू देवी देवताओं की पूजा के प्रमाण के रूप में प्राचीन हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां मिली हैं। चीन के ग्वांगझू नगर के न्यू सिम आफ ओवरसीज में शिव, विष्णु, कृष्ण, हनुमान, लक्ष्मी, गरुड़ आदि की अनेकों मूर्तियां प्रदर्शित हैं जो इसी नगर की खुदाई में मिली थीं।
चीन के अन्य प्रांतों में भी इसी प्रकार की मूर्तियां मिली हैं। सन 1934 में जैन सॉन्ग 71 नरसिंह अवतार की मूर्तियां मिली थथीं। गजेंद्र मोक्ष की पुराण कथाओं पर आधारित चित्र भी अनेकों मिले हैं। वास्तु संग्रहालय के एक अधिकारी इन पंचांग के अनुसार वहां चीन का एक मंदिर भारत के मीनाक्षीपुरम मंदिर की शैली का बना हुआ है। गांव में दीवारों पर उत्कीर्ण कालियादमन करते श्री कृष्ण का चित्र खुदा हुआ है। एक पाषाण पर हनुमान जी उसके रहे वहां कभी राम मंदिर रहा होगा।
इस प्रकार के और भी अनगिनत पुरातात्विक प्रमाण मिलते हैं जिनसे वहां हिंदू संस्कृति का प्रभाव सिद्ध होता है।
* मिस्रकीवैदिकसंस्कृति
आश्चर्य होता है कि मिस्र की प्राचीन संस्कृति भी पूरी तरह से भारतीय मूल की है। प्रसिद्ध विद्वान क्रूटोंस का कहना है कि स्फ़िंक्स का उद्गम भारत से है। नरसिंह अवतार से इसकी समानता है। अब्राहम और प्रह्लाद के व्यक्तित्व में भी बड़ी समानता है। थॉमस मार इसमें लिखा है कि जब मानव जाति तितर-बितर हुई तब जो लोग जल गए हुए लोग इस घ्यावा इतिहास यानी नरसिंह अवतार की स्मृतियां साथ लेते गए
इजिप्ट में आधा नर और आधा सिंह की स्फ़िंक्स की अद्भुत प्रतिमा बनी है, जिसका मूल स्रोत नरसिंह अवतार ही है। मैं यह पूर्ण विश्वास के साथ कहता हूं कि इजिप्ट के शिलालेखों तथा इतिहास में प्रचीन अवतार मत्स्य, वराह, वामन आदि पाए गए हैं। द्वारा लिखितपुस्तक पृ.क्र.26-30.
स्पिंक्स जैसी नरसिंह भगवान की मूर्ति जगन्नाथपुरी में देखकर कर्नल पियरसन आश्चर्यचकित हो गए थे।
इसके अतिरिक्त और भी अनेकों प्रमाण हैं जिनसे साबित होता है कि मिस्र की संस्कृति पूरी तरह से सनातन रही है। थिओगनी आफ़ हिन्दूज़ के पृष्ठ क्रमांक 36 पर ध्यान देना नामक विद्वान लिखते हैं,
“भारतीय पुराणों के कई नाम इजिप्ट की दंत कथाओं में पहचाने जा सकते हैं। इजिप्शियन लोगों के देवता अमन वास्तव में ओम का ही अपभ्रंश रूप है। लेफ्टिनेंट जनरल चार्ज वैलेंसी (पृष्ठ 569) कहते हैं,
“ इजिट एक तरह से भारतीयों की बस्ती का ही देश है, क्योंकि भारतीय ही सर्वप्रथम इजिप्ट में आकर बसे थे।”
निबूहर और इंडिया विन रिंगटोन जुसीफ़र, जूलियस, यूसीबस आदि अनेक विद्वानों ने साफ़ लिखा है कि इजिप्ट की सभ्यता का स्रोत भारत ही है। जान सजना की पुस्तक में स्पष्ट उल्लेख है भारत और चुटकी धर्मों की तुलना करने पर उन्हें बड़ी समानता प्रतीत होती है। त्रिमूर्ति की कल्पना, आत्मा का अस्तित्व, पूर्व जन्म, समाज के चार वर्ण आदि। भारत के गंगा तट पर बसे शिव मंदिरों जैसा शिवलिंग, नील नदी के तट पर बने उन मंदिर में भी है। मुसलमान बनने के बाद भी मिस्र की स्त्रियां संतान प्राप्ति के लिए मंदिर की परिक्रमा आज भी करती हैं। भारतीय लेखक आयंगर के ग्रंथ “लोंग मिसिंग लिंक्स” तथा “एजुकेशन एंड लीजेंड” के पृ. 368 में एक व्यक्ति का चित्र है जिसके माथे भूषण तथा पीठ पर किसी हिंदू ब्राह्मण जैसे तिलक के चित्र नजर आते हैं।
अनेक विद्वानों ने लिखा है कि मिस्र के पिरामिड भारत के ब्राह्मणों ने बनाए थे मिश्रा सर मनाने की प्रथा भारतीय प्रथम काशी एक प्रमाण है विद्वानों के अनुसार अजपति का ही अपभ्रंश इजिप्ट है। वहां के शासक रामेश्वर प्रथम राम शास्त्र की आधी राजाओं का नाम भी श्री राम के नाम पर है गिफ्ट के अतिरिक्त अफ्रीकी देशों में भी हिंदू संस्कृति की प्राचीन चंद मिलते हैं आप ही सम्राट हर्ष राशि को स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने रामायण की प्रति भेंट की सम्राट ने कहा हम अफ्रीकी लोगों के लिए हम राम की जानकारी कोई नई बात नहीं है क्योंकि हम सारे कुशाईट हैं। स्वामी कृष्णानंद जी ने कुशाइट का अर्थ पूछा तो उन्होंने बताया कि वे भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज हैं।
संसार में सभी जीवन पद्धतियों में वैदिक धर्म एवं तदनुकूल जीवन पद्धति श्रेष्ठ व महत्वूपर्ण है। इसे जानकर और इसके अनुसार जीवन व्यतीत करने पर मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याओं से बच जाता है। मनुष्य को अपनी शारीरिक शक्तियों के विकास वा उन्नति पर ध्यान देना चाहिये। इसके लिये उसे समय पर जागना, शौच, भ्रमण, आसन व व्यायाम सहित ईश्वर का ध्यान व वायुशोधक अग्निहोत्र पर भी ध्यान देना चाहिये। इन कार्यों का हमारी जीवन की उन्नति अर्थात् सुखों की वृद्धि से सीधा सम्बन्ध होता है। यह काम अधिक आयु में करने योग्य नहीं अपितु इसका पालन मनुष्य को युवावस्था से ही आरम्भ कर देना चाहिये। इन कार्यों को करते हुए मनुष्य को वेद व वैदिक साहित्य के अध्ययन की रुचि भी उत्पन्न करनी चाहिये और प्रतिदिन नियमित रूप से निर्धारित समय, अथवा जब सुधिवा हो, स्वाध्याय व पढ़े विषयों का मनन अवश्य ही करना चाहिये। स्वाध्याय करते समय हमें ध्यान रखना चाहिये कि हम जो पढ़ रहे हैं वह सत्य है अथवा नहीं। असत्य प्रतीत होने पर योग्य विद्वानों से उनका समाधान करा लेना चाहिये। ऐसा करने से मनुष्य को लाभ होता है। इससे वह अज्ञान व अन्धविश्वासों से बच जाता है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मनुष्य को सदैव श्रेष्ठ मनुष्यों व विद्वानों की ही संगति करनी चाहिये। ऐसे लोगों की संगति वा मित्रता कदापि नहीं करनी चाहिये जो दुव्र्यसनों से ग्रस्त हों। व्यवहार व कार्यों से दुष्ट वा व्यस्नी व्यक्तियों की संगति करने पर वह दुव्र्यस्न मित्रता करने वाले मनुष्य को भी लग सकते हैं और उसका जीवन नष्ट हो सकता है। आज देश व विश्व में सर्वत्र भौतिकवाद छाया हुआ है। पश्चिमी तौर तरीकों से युक्त जीवन श्रेयस्कर नहीं है। इसके बुरे परिणाम अनेक रोगों व व्याधियों तथा अवसाद आदि के रूप में कुछ समय बाद सम्मुख आते हैं। मनुष्य को अपने मन व आत्मा को पवित्र विचारों व भावनाओं से युक्त रखना चाहिये। इस उद्देश्य की पूर्ति स्वाध्याय तथा श्रेष्ठ योग्य व पात्र वैदिक विद्वानों के सत्संग से होती है। अन्धविश्वासों से युक्त साहित्य के अध्ययन व उनके आचार्यों के सत्संग व प्रवचनों से अविद्या जीवन में आ जाती है जो जीवन की उन्नति के स्थान पर अवनति उत्पन्न करती है। अतः मनुष्य को अपना जीवन बहुत ही सोच विचार कर योग्य विद्वानों की संगति, उनके मार्गदर्शन सहित सत्साहित्य के अध्ययन वा स्वाध्याय में व्यतीत करना चाहिये। ऐसा करते हुए पुरुषार्थयुक्त जीवन व्यतीत करने व समकालीन ज्ञान व विज्ञान से युक्त होने से ही मनुष्य का जीवन उन्नत, विकसित व अभीष्ट उद्देश्यों व उत्तम सुखों को प्राप्त करने में सफल होता है।
मनुष्य को संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करने पर ध्यान देना चाहिये। धर्म के दश लक्षणों में प्रथम लक्षण धैर्य है। सम व विषम परिस्थितियों में धैर्य रखना ही मनुष्य के लिए उत्तम है। यदि जीवन में धैर्य न हो तो मनुष्य का जीवन दुःख, चिन्ताओं व कष्टों से युक्त हो जाता है। परमात्मा ने हमें पांच ज्ञानेन्द्रियां एवं पांच कर्मेन्द्रियां दी हैं। हमें अपनी सभी इन्द्रियों को पवित्र रखना चहिये। सन्ध्या करते हुए हम परमात्मा से इनकी पवित्रता, शक्ति व बल से युक्त होने तथा जीवन के अन्तिम समय तक बलवान बने रहने अथवा निर्बल न होने की प्रार्थना करते हैं। परमात्मा ने ही हमें हमारा शरीर दिया है। वही हमारी सभी ज्ञान व कर्मेन्द्रियों का रचयिता, स्वामी व दाता है। जब हम उससे प्रार्थना करने के साथ प्रार्थना के अनुरूप साधन, उपाय व प्रयत्न करते हैं तो हमें उस कार्य में सफलता मिलती है। अतः हमें अपने शरीर की रक्षा के सभी उपायों को जानना चाहिये और उनका पालन भी अवश्य करना चाहिये। प्रायः देखा होता है कि हमें अपने व्यस्त जीवन में शरीर रक्षा के साधनों का अभ्यास करने के लिये समय नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में हमें अपने जीवन में किये जाने वाले अनावश्यक, कम उपयोगी व जीवन उन्नति में बाधक सभी कामों को छोड़ देना चाहिये। ऐसा करने से हमें नित्य कर्मों को करने के लिये समय अवश्य मिलेगा जिससे हमारा वर्तमान, भविष्य व परजन्म सभी सुखी एवं सन्तुष्टि प्रदान करने वाले होंगे। अतः सभी इन्द्रियों को संयम में रखकर उनका जीवन की उन्नति के कार्यों में ही उपयोग करना चाहिये और उनसे भोग व सुख प्राप्ति यथासम्भव कम से कम प्राप्त करनी चाहिये। यही सुखी एवं सफल जीवन का आधार प्रतीत होता है।
सुखी एवं सन्तुष्ट जीवन का एक मन्त्र यह भी है कि अधिक पुरुषार्थ व अधिक धनोपार्जन करने सहित आवश्यक कार्यों में न्यूनतम धन का व्यय करना चाहिये। पहले हमारे पूर्वज सस्ते वस्त्र धारण करते थे। आज महंगे वस्त्र व अन्य सामानों को धारण करने की प्रवृत्ति देखी जाती है। इसने भी लोगों की अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है। इससे सीमित साधनों वाले परिवारों में सदस्यों के जीवन में अवसाद उत्पन्न हो सकता है। यदि हमारे पास आचवश्यकतानुसार धन है तो उसे शुभ कार्यों में दान आदि देकर व्यय करने की मनाही नहीं है। दान व दूसरों की सहायता भी हमें युक्तिसंगत रूप से कुछ व अधिक अपनी सामथ्र्य को ध्यान में रखते हुए अवश्य करनी चाहिये। हमारी आवश्यकतायें कम होंगी तो हमारे पास धन बचेगा जिससे हमें सन्तुष्टि प्राप्त होगी और विपदकाल में यह धन हमारी एक मित्र के रूप में सहायक होगा। ऐसा ही होता भी है। आज की युवा पीढ़ी को देखते हैं तो उन्हें आधुनिक जीवन व्यतीत करने, खर्चीले सामान का उपयोग करने, उनमें दिखावे की प्रवृत्ति होने, ऋण लेकर अपनी महत्वाकांक्षायें पूरी करने और उस ऋण की किश्तों के भुगतान में ही अपने वेतन का अधिकांश भाग भुगतान करने की प्रवृत्ति व स्थिति देखी जा रही है। आजकल कोरोना महामारी के समय में हमारे बहुत से युवाओं के रोजगार चले गये या उनके वेतन बहुत कम कर दिये गये। ऐसे समय में उनको आर्थिक कठिनाईयां आ रही हैं। उन्होंने अपने जीवन को जिन सुख व भोगयुक्त जीवन का पर्याय बना लिया है उसमें अनेक प्रकार की बाधायें आ गई हैं। इससे देश के युवक युवतियां बड़ी संख्या में परेशान है। युवाओं को इस परिस्थिति को भी एक चुनौती के रूप में लेना चाहिये और यदि कुछ अनावश्यक सुखों का त्याग हो सके तो उन्हें करके अपने सभी काम स्वयं करते हुए वैदिक धर्म एवं संस्कृति के अनुसार मितव्ययता व सुख व भोग से रहित त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करने की आदत डालनी व बनानी चाहिये। पुरुषार्थ को भी बढ़ाकर और ईश्वर में विश्वास रखते हुए तथा सच्चे वैदिक विद्वानों से मार्गदर्शन प्राप्त कर अपने जीवन को समयानुकूल व्यतीत करने का अभ्यास करना चाहिये। ऐसा करने से जिन परिवारों में कोरोना के कारण रोजगार आदि का संकट आया हुआ, उससे उबरने में उन्हें सहायता मिलेगी, ऐसा हम समझते हैं। जीवन में शक्ति संचय का होना आवश्यक है। मुख्य शक्ति संचय तो हमारे व हमारे परिवार के सभी सदस्यों का स्वस्थ एवं बलवान होना है। बलवान व्यक्ति से रोग दूर रहते हैं। उसकी कार्यक्षमता भी अधिक होती है। ऐसे ही व्यक्ति दीर्घजीवी होते हैं तथा जीवन में सुखों का अनुभव करते हैं। त्याग पूर्ण स्वस्थ जीवन से मिलने वाला सुख अनापशनाप भोगों, आधुनिक नाना प्रकार के भोजनों तथा सैरसपाटों के सुख से कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है। हम वैदिक जीवन व्यतीत करेंगे तो हमारे पास कुछ मात्रा में धन का संचय भी हो सकता है। पारिवारिक व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं तथा विपरीत व भविष्य में अनायास आने वाले विघ्नों के लिये धन संचय आवश्यक है। धन भी एक शक्ति के समान है। धन से हम अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। सद्कार्यों में दान देने से मनुष्य को सुख मिलता है तथा उसका यश भी बढ़ता है। बहुत सी स्वयंसेवी संस्थायें यथा वैदिक गुरुकुल तथा वैदिक साधन आश्रम आदि लोगों की भलाई का ही काम करते हैं। ऐसी संस्थाओं में दान करने से यह चलेंगी तो इससे हमारे वैदिक धर्म एवं संस्कृति को लाभ होगा। अतः शारीकि शक्ति को बढ़ाने व उसका संचय करने के साथ धन का संचय करने से भी जीवन में सुख तथा हमारा भविष्य सुरक्षित व निश्चिन्त बनता है। हमें इन उपायों पर ध्यान देना चाहिये। हमने आज कुछ समययह चिन्तन किया है जिसे हम अपने विज्ञ मित्रों को प्रस्तुत करते हैं। शायद किसी को अच्छा लगे।
कोरोना वायरस महामारी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप कुछ बदलने की राह पर जाता दिखाई दे रहा है। अभी तक भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान काफ़ी कम रहता है एवं सेवा क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक रहता है। परंतु बदली हुई परिस्थितियों में कृषि का योगदान कुछ बढ़ता नज़र आ रहा है एवं सेवा क्षेत का योगदान कम हो सकता है क्योंकि पर्यटन एवं होटल उद्योग कोरोना वायरस महामारी में सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं और ये दोनों उद्योग सेवा क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।
भारत में कुल आबादी का लगभग 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा ग्रामीण इलाक़ों में रहता है एवं अपने रोज़गार के लिए मुख्यतः कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर हैं। इस प्रकार भारत में कृषि का क्षेत्र एक सिल्वर लाइनिंग के तौर पर देखा जा रहा है। भारत में आम तौर पर हम लोग कृषि क्षेत्र में चावल, दाल, गेहूँ, तेल-वनस्पति, आदि कुछ चीज़ों के उत्पादन पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। परंतु, देश में एक और महतवपूर्ण क्षेत्र है, जो कृषि क्षेत्र के अंतर्गत आता है और जो बड़ी तेज़ी से विकसित हो रहा है। वह क्षेत्र है बाग़वानी (हॉर्टिकल्चर) का। बाग़वानी क्षेत्र पर पहिले तो हमारे किसानों का कम ध्यान रहता था परंतु अब इस ओर देश के किसानों का ध्यान गया है और हाल ही के समय में इसकी पैदावार में काफ़ी इज़ाफ़ा होते देखा जा रहा है। कृषि वर्ष 2019-20, जो जुलाई-जून की अवधि के दौरान रहता है, में यदि अनाजों के पैदावार की बात करें तो लगभग 30 करोड़ टन की उपज का अनुमान लगाया गया है वहीं बाग़वानी के क्षेत्र में 32 करोड़ टन की उपज होने का अनुमान है। अभी हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा अगले पैराग्राफ़ में वर्णित कृषि क्षेत्र से सम्बंधित तीन अति महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। जिसके परिणाम भी परिलक्षित होने लगे हैं। जून 2020 को समाप्त तिमाही में, जब कोरोना वायरस महामारी के चलते पूरे देश में आर्थिक गतिविधियाँ लगभग बंद थी, ऐसे में कृषि क्षेत्र से निर्यात 23.24 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए 25,552.7 करोड़ रुपए पर पहुँच गए हैं। भारत को आत्म निर्भर बनाने में कृषि क्षेत्र का आत्म निर्भर होना भी बहुत ज़रूरी है। दूसरे, कृषि क्षेत्र से निर्यात में वृद्धि का सीधा लाभ किसानों की आय में वृद्धि के रूप में होता है।
कृषि क्षेत्र में आज समस्या उत्पादन की नहीं बल्कि विपणन की अधिक है। देश में अभी तक प्रचिलित नियमों के अनुसार किसान अपने कृषि उत्पाद को केवल कृषि उत्पाद विपणन समिति के माध्यम से ही बेच सकता था। शायद कृषि उत्पाद ही देश में एक एसा उत्पाद है जिसे बेचने की क़ीमत उत्पादक तय नहीं कर पाता था बल्कि इस समिति के सदस्य इसकी क़ीमत तय करते थे। इसके कारण कई बार तो किसान अपने उत्पाद की उत्पादन लागत भी वसूल नहीं कर पाता था। परंतु, अब इस क़ानून के नियमों को शिथिल बना दिया गया है जिसके कारण अब किसान अपनी उपज को सीधे ही प्रसंस्करण इकाईयों को, निर्यातकों को एवं इन वस्तुओं में व्यापार कर रही संस्थाओं को बेच पा रहे हैं एवं उस उत्पाद की क़ीमत भी किसान एवं ये संस्थान आपस में मिलकर तय कर रहे हैं। नियमों में किए गए इन बदलावों से कृषि उत्पाद विपणन समितियों को अब प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है एवं ये समितियाँ भी अब कृषि उत्पादों की क़ीमतें बाज़ार की क़ीमतों के आधार पर तय करने को बाध्य हो रही हैं क्योंकि इन समितियों का एकाधिकार अब समाप्त हो गया है एवं इससे अंततः किसानों को ही लाभ हो रहा है। लघु एवं सीमांत किसान भी अब आपस में मिलकर किसान उत्पाद संस्थान का निर्माण कर सकते हैं एवं इस किसान उत्पाद संस्थान के माध्यम से अपने कृषि उत्पादों को सीधे ही उक्त वर्णित संस्थाओं को बेच सकते हैं। अतः इनकी निर्भरता अब कृषि उत्पाद विपणन समितियों पर कम हो रही है। देश में 10,000 किसान उत्पाद संस्थानों का निर्माण, गुजरात में स्थापित की गई अमूल दुग्ध उत्पाद संस्थान की तर्ज़ पर, किया जा सकता है। कृषि उत्पादों के मार्केटिंग के क्षेत्र में किए गए उक्त परिवर्तन के कारण किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम अब बाज़ार में मिलने लगा है एवं अब उनका शोषण नहीं किया जा सकेगा।
इसी प्रकार, देश में लागू आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत सरकारों को यह अधिकार था कि वे किसी भी कृषि उत्पाद के भंडारण की सीमा निर्धारित कर सकती थीं। कोई भी व्यापारी इस निर्धारित सीमा से अधिक भंडारण नहीं कर सकता था। इस नियम के कारण कोल्ड स्टोरेज के निर्माण हेतु निजी निवेशक आगे नहीं आ पा रहे थे। क्योंकि, पता नहीं कब भंडारण की सीमा सम्बंधी नियमों को लागू कर दिया जाय। दरअसल आवश्यक वस्तु अधिनियम क़ानून की जड़ें वर्ष 1943 तक पीछे चली जाती हैं जब देश में अकाल पड़ता था एवं कृषि उत्पादों का उत्पादन सीमित मात्रा में होता था। तब व्यापारियों पर कृषि उत्पादों के भंडारण हेतु सीमा लागू की जाती थी ताकि व्यापारी जमाख़ोरी नहीं कर सकें। परंतु आज तो परिस्थितियाँ ही भिन्न है। देश में अनाज का पर्याप्त भंडार मौजूद है तब आज इस प्रकार के नियमों की आवश्यकता ही क्यों है। अतः अब केंद्र सरकार द्वारा इस आवश्यक वस्तु अधिनियम को हटा दिया गया है।
अभी तक किसान, सामान्यतः अगले वर्ष किस कृषि उत्पाद की फ़सल पैदा करना है सम्बंधी निर्णय, इस वर्ष उस उत्पाद की बाज़ारू क़ीमत को आधार मानकर, लेता था। उदाहरण के तौर पर यदि इस वर्ष प्याज़ के बाज़ार दाम अधिक थे तो अधिक से अधिक किसान प्याज़ की पैदावार करने का प्रयास करते थे। अगले वर्ष फ़सल की मात्रा अधिक होने के कारण बाज़ार में प्याज़ के दाम कम हो जाते थे, जिसके चलते किसानों को भारी मात्रा में नुक़सान झेलना पड़ता था। किसानों की इस परेशानी को दूर करने के उद्देश्य से अब अनुबंध खेती प्रणाली को प्रारम्भ किया गया है। जिसके अंतर्गत किसान, अपनी सोसायटी के माध्यम से, भविष्य में उसके उत्पाद की क़ीमत आज ही तय कर लेता है एवं जिस भी संस्थान को उसे अपनी फ़सल बेचना है उससे अगले वर्ष होने वाली फ़सल की क़ीमत आज ही तय कर उस संस्थान से अनुबंध कर लेता है और उसी उत्पाद की खेती कर सकता है। हाँ, उस उत्पाद की गुणवत्ता का ध्यान ज़रूर उसे रखना होता है। इस प्रकार के नियम से देश में किसानों को उसकी उपज का उचित बाज़ारू मूल्य प्राप्त होने लगेगा।
कोरोना वायरस महामारी में कृषि क्षेत्र के बाद ग्लोबल सप्लाई चैन एक ऐसा दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें भारत आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। क्योंकि अब यह देखा जा रहा है कि एशिया के कुछ दूसरे देशों में विनिर्माण क्षेत्र में गतिविधियाँ बढ़ती दिखाई दे रही हैं एवं इनके बीच में ग्लोबल सप्लाई चैन की गतिविधियाँ आपस में समेकित पाई जा रही हैं। उदाहरण के तौर पर चार पहिया वाहनों के लिए उसके एक अंग का निर्माण एक देश में हो रहा है तो किसी दूसरे अंग का निर्माण किसी अन्य देश में हो रहा है। परंतु आपस में इन्होंने एक समेकित सप्लाई चैन बनाई हुई है। अतः अब भारत द्वारा ग्लोबल सप्लाई चैन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए देश में आधारभूत सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। तटवर्तीय इलाक़ों में सड़क मार्गों का निर्माण किया जा रहा है। पूरे देश को मल्टी मोडल कनेक्टीविटी इंफ़्रास्ट्रक्चर से जोड़ने की एक बहुत बड़ी योजना तैयार की गई है। इस योजना के अंतर्गत समुद्रीय बंदरगाहों को रेल मार्ग से जोड़ा जाएगा। रेल मार्ग को रोड मार्ग से काफ़ी बड़ी हद्द तक जोड़ा जा चुका है। इससे देश में यातायात की सुविधा में और अधिक सुधार देखने को मिलेगा। मल्टी मोडल कनेक्टीविटी इंफ़्रास्ट्रक्चर सिस्टम यदि देश में उपलब्ध होगा तो देशी एवं विदेशी निवेशक इन क्षेत्रों में अपना निवेश करने को आकर्षित होंगे। देश के बंदरगाहों में वस्तुओं के आयात एवं निर्यात के लिए टर्न-अराउंड टाइम कम किए जाने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। अतः ग्लोबल सप्लाई चैन का विकास भी एक नई गतिविधि के तौर पर देखने को मिलेगा। भारतीय उद्योग संघ की सालाना बैठक को सम्बोधित करते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर श्री शक्ति कांत दास ने भी कहा है कि देश में बदलती परिस्थितियां भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में हैं एवं आने वाले समय में भारत को ग्लोबल वैल्यू/सप्लाई चैन का हिस्सा बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
किसी ज़माने में देश में यह सोचा जाता था कि एक राज्य की राजधानी को दूसरे राज्य की राजधानी से जोड़ना है अथवा एक बड़े शहर को दूसरे बड़े शहर से जोड़ना है। यह कार्य चूँकि देश में लगभग सम्पन्न हो चुका है अतः अभी हाल ही में इस सोच में स्पष्ट तौर पर बदलाव आया है। अब सोचा जा रहा है कि किस प्रकार ब्रॉड बैंड की कनेक्टिविटी को गावों तक पहुँचाएँ। इंटर नेट कनेक्टिविटी को गावों तक प्रदान करें ताकि इन गावों की विशेषताओं का उपयोग देश के हित में किया जा सके। ग्रामीण पर्यटन की ओर भी अब फ़ोकस किया जा रहा है। भारत में इस क्षेत्र में विकास की अपार सम्भावनाएँ हैं। इसमें कम पूँजी निवेश से रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर निर्मित होते हैं। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों में अधिक स्किलिंग की भी ज़रूरत नहीं होती है।
मोदी सरकार ने वर्षों से अटके मुद्दों यथा- धारा 370, तीन तलाक़ और राम मंदिर को चुटकियां बजाते ही मानों ख़त्म कर दिया हो। इतना ही नहीं मोदी सरकार की दूरदर्शिता और सामाजिक सरोकार से जुड़े होने का ही यह परिणाम है, कि देश को नई शिक्षा नीति प्राप्त हो सकी। जिसकी दरकार वर्षों से थी। ऐसे में मोदी सरकार के सामाजिक सरोकारों से जुड़े मैराथन भरे कार्यों को देखते हुए सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या अब आने वाले दिनों में मोदी सरकार का अगला कदम जनसंख्या नियंत्रण बिल होगा? कोरोना काल वैसे तो कई चुनौतियों और संघर्षों से भरा हुआ है। कोविड-19 वायरस ने बड़ी-बड़ी महाशक्तियों को अपने आगे नतमस्तक कर दिया है। चीन से आएं इस वायरस का अब तक कोई तोड़ नही मिल सका है। सम्पूर्ण विश्व आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। भारत की ही बात करे तो इस वायरस से न केवल देश में आर्थिक मंदी का दौर शुरू हुआ है, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और यहां तक कि हमारी संस्कृति पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। आज भले ही लॉकडाउन का दौर लगभग समाप्त हो गया हो; लेकिन इस वायरस ने यह साबित कर दिया है कोई देश चाहे कितनी भी बड़ी महाशक्ति क्यों न बन जाए लेकिन असली जीत तभी होती है, जब संघर्ष के दौर में भी सरकार देश हित के लिए उचित निर्णय ले। जो राष्ट्र निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाए। कोरोना काल में भारत सरकार ने ऐसे कई महत्वपूर्ण फैसले लिए है जो आने वाले समय में मील का पत्थर साबित होंगे। वर्षों से चले आ रहे हिन्दू आस्था के प्रतीक भगवान श्री राम जी के मंदिर का भूमिपूजन कर देश के मुखिया ने यह साबित कर दिया है कि राम मंदिर न केवल हमारी आस्था का प्रतीक है; बल्कि हमारी संस्कृति में भी राम जी के आदर्शों का कितना महत्व है। करीब 500 वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद राम मंदिर का सपना साकार हो रहा है। राम मंदिर भूमिपूजन के बाद नई शिक्षा नीति लागू करके मोदी सरकार ने यह भी बता दिया है देश मे संस्कृति का जितना महत्व है। उससे भी कहीं अधिक महत्व तो आधुनिक शिक्षा का भी है। हमारी शिक्षा व्यवस्था पर लंबे समय से बहस जारी थी। देश तो आजाद हो गया था, लेकिन हम अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से ही शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। जो न तो देश को प्रगति के पथ पर ले जाने का साधन बन पा रही थी और न ही सम्पूर्ण मानवीय चरित्र का विकास कर पा रही थी। ऐसे में मोदी सरकार ने शिक्षा पद्धति में परिवर्तन कर देश को आत्मनिर्भर बनाने की राह में एक कदम और आगे बढ़ा दिया है। इन सब जनहितैषी कार्यों को देखते हुए अटकलें लगाई जा रही कि अब मोदी सरकार का अगला महत्वपूर्ण कार्य क्या होगा? ऐसे में लग तो यही रहा कि सरकार का अगला क़दम जनसंख्या नियंत्रण बिल हो सकता है। जिसकी पहल बीजेपी के राज्यसभा सांसद अनिल अग्रवाल ने प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिख कर ही दी है। वैसे भी जनसंख्या विस्फोट आज के समय मे सबसे गम्भीर मुद्दा बना हुआ है, लेकिन कोई भी सरकार इस मुद्दे पर निर्णय नही ले सकी है, और न ही कोई उचित कदम बढ़ाया है। ऐसे में अब मोदी सरकार से अपेक्षा की जा रही कि वह इस विषय पर जल्द कुछ न कुछ अवश्य करती हुई नज़र आएगी। वैसे यह भारत देश की सबसे बड़ी बिडम्बना ही है कि भारत “परिवार नियोजन” अपनाने वाला विश्व का पहला देश था। 1949 में परिवार नियोयन कार्यक्रम का गठन हुआ था तथा 1952 में पहले परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत हो गई थी बावजूद इसके आज भारत विश्व जनसंख्या में दूसरे स्थान पर है। इतना ही नहीं वह दिन दूर नही जब चीन को पीछे छोड़ते हुए हमारा देश जनसंख्या वृद्धि के मामले में पहले स्थान पर पहुँच जाएगा। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक सामाजिक विभाग के अनुमान के अनुसार भारत की जनसंख्या 2030 तक 1.5 बिलियन होने का अनुमान है तो वही 2050 तक जनसंख्या 1.64 बिलियन तक पहुंच जाएगी। आज देश की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती हुई जनसंख्या है। 1947 में हमारे देश की कुल आबादी 34.20 करोड़ थी, जो अब 131 करोड़ को पार कर चुकी है। हमारे देश में जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण लैंगिक असमानता है। 2019 के ग्लोबल जेंडर इक्वलिटी इंडेक्स के मुताविक 129 देशों के सर्वे में भारत 95 वें स्थान पर रहा है। जो यह बताता है कि भले हम 21वीं सदी में जी रहे है, लेकिन हमारी मानसिकता आज भी पुरूषवादी सोच से ग्रस्त है। आज भी हम बेटी से ज्यादा बेटों को ही महत्व देते है और बेटों की चाह में कहीं न कहीं अनजाने में जनसंख्या वृद्धि के वाहक बनते जाते हैं। देखिए न अर्थ ओवर शूट डे 2018 में 1 अगस्त को ही मानना पड़ा। यही अर्थ ओवर शूट डे 2017 में 2 अगस्त तो तो वहीं 1993 में यह 21 अक्टूबर को आया था। इन सब के बीच 2019 में अर्थ ओवर शूट डे 29 जुलाई को ही आ गया। मतलब हर वर्ष यह अपने पूर्ववर्ती समय से पहले ही घटित हो रहा। यहां इस डे का मतलब यह है कि पृथ्वी जितना संसाधन साल भर के लिए पैदा करती। उसे हम तय मियाद से पूर्व ही ख़त्म कर देते। ऐसे में सोचिए आने वाले समय में इसी कदर बेतहाशा जनसंख्या में वृद्धि होती रही फिर किस हद तक लोग दाना और पानी के लिए तराशने लगेंगे! वैसे दाना और पानी तो अभी भी सिर्फ़ भारत में करोड़ो लोगों को मयस्सर नहीं होता। यहां एक अन्य आंकड़े की बात करें तो भारत में परिवार नियोजन के तमाम कार्यक्रम चलाएं जाने के बाद भी प्रजनन क्षमता चीन और अमेरिका से अधिक है। विश्व बैंक के 2016 के आंकड़े के मुताबिक भारत में प्रति महिला प्रजनन क्षमता 2.33 फ़ीसदी है। जबकि अमेरिका में 1.80 और चीन में 1.62 फ़ीसदी है। विदित हो 2.1 को वैश्विक परिदृश्य पर ‘रिप्लेसमेंट रेट’ माना जा रहा। यानी जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए एक महिला के औसतन 2.1 बच्चे ही होने चाहिए। ऐसे में सारी बातें इसी तरफ़ इशारा करती हैं कि अब समय आ गया है कि जनसंख्या नियंत्रण पर सरकार जल्द ही कोई कड़ा कदम उठाए जिससे न केवल प्रकृति का संरक्षण हो पाएगा, साथ ही साथ भारत भूमि पर रहने वाले लोगों के हिस्से में पर्याप्त संसाधन भी आ सकेंगा। सोनम लववंशी
कोविद-19 महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बदल दिया है और भारत में भी इसके गहरे प्रभाव पड़े है। राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की वजह से घरेलू मांग में कमी ने अर्थव्यवस्था को 2020-21 की पहली तिमाही में संकुचित कर दिया है और इसके प्रभाव भविष्य में दिखने की संभावना है। फिर भी श्री नरेंद्र मोदी ने वायरस के प्रकोप को कम करने के लिए स्वास्थ्य और आर्थिक दोनों दृष्टिकोण से निर्णायक और सराहनीय कार्रवाई की है। मगर दुनियाभर में कोरोनावायरस इलाज के अभाव ने लोगों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। भारत में लोगों में इस तरह की चिंता की भावना जबरदस्त उथल-पुथल पैदा कर सकती है। नतीजतन ये हमारी आजीविका और बड़ी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा।
12 मई, 2020 को हमारे माननीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ के कुल मूल्य के एक महामहिम कोरोनोवायरस प्रोत्साहन पैकेज का अनावरण किया, जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 10%है, यह दुनिया की सबसे बड़ी राहत योजनाओं में से एक है। ये प्रोत्साहन पैकेज व्यवसायों को पुनर्जीवित करने में मदद कर सकता है, जो कि पैसों के अभाव में मुश्किल हो रहा है। भारत के 60,000-विषम स्टार्ट-अप एक तीव्र तरलता की कमी का सामना कर रहे हैं। वर्तमान स्थिति निवेश को बढ़ावा देने, मौजूदा नौकरियों की रक्षा करने और नई नौकरियां पैदा करने के लिए साहसिक कदम उठाने का अवसर प्रस्तुत करती है।
आज बड़े व्यावसायिक घरानों को सरकार द्वारा प्रोत्साहन के माध्यम से फिर से खोलने या कच्चे माल या अन्य वस्तुओं और सेवाओं की खरीद में आसानी के लिए प्रयास किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उपभोक्ता मांग में वृद्धि होगी और विक्रेता या सहायक उद्योग के कामकाज को बढ़ावा मिलेगा। (जिसमें रोजगार सृजन की बड़ी संभावनाएं हैं)। आरबीआई को सभी बैंकों द्वारा आवश्यकतानुसार, व्यापार ऋण के पुनर्गठन के लिए सिंगल वन टाइम विंडो पर विचार करना चाहिए। बैंकों को आश्वस्त करने की तत्काल आवश्यकता है, कि उनके व्यापारिक निर्णयों पर सवाल नहीं उठाया जाएगा, जिससे ऋण प्रवाह को प्रोत्साहित किया जा सके।
चीन से विनिर्माण को भारत में स्थानांतरित करने के इच्छुक, केंद्र उन कंपनियों का कम से कम 60 प्रतिशत प्राप्त करने पर एक पंचवर्षीय योजना तैयार कर सकता है। भारत को एक वैश्विक व्यापारिक केंद्र बनाने हेतु भारत को वैश्विक व्यापार संचालन स्थापित करने वाली कंपनियों के लिए एक प्रोत्साहन शासन तैयार करना होगा। राज्यों को स्व-निहित “औद्योगिक शहरों” को स्थापित करने के बारे में सोचना चाहिए जो विनिर्माण, वाणिज्यिक, शैक्षिक, आवासीय और सामाजिक बुनियादी ढांचे के लिए स्थान निर्धारित करते हैं। सरकार द्वारा पहचाने गए 10 क्षेत्र – इलेक्ट्रिकल, फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरण, मोटर वाहन, खनन, इलेक्ट्रॉनिक्स, भारी इंजीनियरिंग, नवीकरणीय ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण, रसायन और वस्त्र मेक इन इंडिया अभियान में फिट होते हैं। इनमे जापान, अमेरिका और दक्षिण कोरिया पहले ही रुचि दिखा चुके हैं।
बैटरी विनिर्माण (भंडारण प्रणाली) / सौर पैनल निर्माण की फिर से कल्पना के हिस्से के रूप में प्रोत्साहित करना चाहिए। सरकार “डीप टेक” -लवरेज व्यवसायों – ब्लॉकचैन, रोबोटिक्स, एआई, मशीन लर्निंग, संवर्धित वास्तविकता, बड़े डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा, आदि को प्रोत्साहन देने पर भी विचार कर सकती है। भारत वैश्विक स्तर पर शीर्ष स्टार्ट-अप इकोसिस्टम में शामिल है। स्टार्ट-अप न केवल नवाचार को चलाने में मदद करते हैं, बल्कि रोजगार भी पैदा करते हैं, जो आगे जाकर बहुत महत्वपूर्ण होगा। सरकार को स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है।
ऑटो उद्योग जो जीडीपी (लगभग 9%) में महत्वपूर्ण योगदान देता है, इसलिए ये विशेष उपचार का हकदार है। जीएसटी दर को कम करने के अलावा, नए वाहनों की मांग बनाने के लिए कर प्रोत्साहन के साथ पुरानी वाहन स्क्रैप नीति तैयार की जा सकती है। ऑटो सेल्स इंडस्ट्री चैनल भागीदारों को एमएसएमई के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता है और उनमे भारतीय प्रवासी के प्रत्यक्ष निवेश को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, विदेशी सहायक कंपनियों से लाभांश पर सकल आधार पर 15% की मौजूदा दर को घटाकर 5% करने की जरूरत है। इससे धन की अधिक आमद होगी और इससे स्थानीय परियोजनाओं को समर्थन मिलने की उम्मीद जागेगी। घरेलू संस्थानों के साथ विदेशी कानूनी फर्मों और बैंकों को ऑफ-शोर केंद्र में उपस्थिति के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।
किसी भी देश के विकास इंजन को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत कुछ किया जाना चाहिए। आज के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर, भारत को वर्तमान संकट को सफलतापूर्वक नेविगेट करने और उसके बाद दृढ़ता से उबरने के लिए दोतरफा रणनीति की आवश्यकता है। पहला, कोविद के कारण होने वाले नुकसान को कम करना और दूसरा तुरंत नए अवसरों का फायदा उठाकर पुनर्प्राप्ति के लिए एक रास्ता साफ करना। इस रणनीति पर तुरंत काम होना चाहिए।
भारत दुनिया का सबसे बडा युवा जनशक्ति वाला देश हैं, जहाँ युवाओं में अपार संभावनाएं अंतर्निहित हैं। जैसा की स्वामी विवेकानंद कहते थे युवाओं में अंतर्निहित संभावनाओं का प्रकटीकरण ही शिक्षा का मूल उद्देश्य होना चाहिए। इस दृष्टि से नई शिक्षा नीति मील का पत्थर साबित होती दिख रही है। पिछली शिक्षा नीतियों में जहाँ सभी तक शिक्षा को पहुंचाने पर जोर दिया गया था, वहीं नई शिक्षा नीति में एक ऐसी शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने की बात की गई है जो व्यवहारिक, हुनर आधारित, रोजगारपरक एवं व्यक्तित्व विकास में सहायक हो। चूंकि बच्चों के मस्तिष्क के 85 प्रतिशत हिस्से का विकास 6 वर्ष की अवस्था से पहले ही हो जाता है, अतः नई शिक्षा नीति में बच्चों के पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए 3 वर्ष की उम्र से ही स्कूली शिक्षा प्रदान किये जाने का प्रावधान रखा गया है । कक्षा 6 से प्रत्येक छात्र को व्यवसायिक शिक्षा प्रदान की जाएगी। प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के 10 दिन बिना बैग के स्कूल दिन होंगे जिस दौरान छात्र विशेषज्ञों से बिजली का काम, बढईगीरी, कुम्हारी, धातु का काम, राजमिस्त्री, बागबानी, सिलाई-कढाई, कुकिंग-कैटरिंग आदि जैसे कौशल विकास से संबंधित व्यवसायों का प्रशिक्षण लेंगे। इसमें इंटर्नशिप भी शामिल होगी जिससे कि छात्र किसी औद्योगिक संस्था में जाकर प्रशिक्षण ले सकें। कोशिश यह होगी कि जब छात्र 12 वीं पास करके निकले तो उसके पास एक स्किल हो जो उसकी आजीविका का आधार बने। नई शिक्षा नीति छात्रों को सिखने, जानने और पढने के ज्यादा अवसर प्रदान करती है। परम्परागत शिक्षा प्रणाली की भांति यह शिक्षा को केवल कुछ विषयों एवं तथ्यों तक सीमित नहीं रखती। नई शिक्षा नीति में स्कूलों के पाठ्यक्रम में विज्ञान और गणित के अलावा बुनियादी कला, शिल्प, मानविकी, खेल और फिटनेस, भाषा और साहित्य का भी समावेश किया जाएगा। कोई भी छात्र दशवीं- बारहवीं बोर्ड और ग्रेजुएशन में विज्ञान के साथ-साथ कला, संगीत तथा सामाजिक विज्ञान के विषयों को भी चुन सकता है। 2040 तक सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को सभी विषय पढाने होंगे। शिक्षण का तरीका भी चाक, डस्टर और ब्लैक बोर्ड तक सीमित नहीं होगा बल्कि प्रयोगात्मक, खोजपरक, एक्टिविटी बेस्ड और इंटरेक्टिव लर्निंग आधारित होगा। यदि किसी छात्र का मन किसी कोर्स में नहीं लगता तो वह कोर्स को बीच में ही छोड़ सकता है लेकिन उसकी मेहनत बेकार नहीं होगी उसे सार्टिफिकेट या डिप्लोमा आवश्य मिलेगा जिसका लाभ अन्य कोर्स में एडमिशन लेने पर उसे क्रेडिट के रूप में मिलेगा। इसके लिए एकेडमी बैंक आफ क्रेडिट का निर्माण किया जाएगा जिसमें छात्रों के परफॉर्मेंस का डिजिटल रिकार्ड रखा जाएगा। भारत में ग्रामीण प्रतिभा के समक्ष एक बडी बाधा भाषा से संबंधित होती है। नई शिक्षा नीति में कक्षा पांचवी तक मातृभाषा या क्षेत्रिय भाषा में पढाई होगी चाहे स्कूल सरकारी हो या प्राइवेट। आॅनलाइन कोर्स कन्नड़, उडिया, बंगाली जैसे क्षेत्रिय भाषाओं में भी उपलब्ध होंगे। वर्तमान में अधिकतर आॅनलाइन कोर्स मुख्यतः अंग्रेजी या हिन्दी भाषा में ही उपलब्ध हैं। निष्कर्षतः नई शिक्षा नीति शिक्षा को केवल डिग्री और किताबों तक सीमित नहीं रखती बल्कि शिक्षा को एक अवसर के रूप में प्रस्तुत करती है जिससे छात्र अपनी प्रतिभा और रूचि के अनुसार जीवन मे अपना रास्ता चुन सकें। लेकिन हमेशा कि तरह सवाल नीति का नहीं बल्कि नियत का है, सवाल एक्ट का नहीं बल्कि एक्शन का है। शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। ऐसे में नई शिक्षा नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा नागरिक समाज तीनों को मजबूत इच्छा शक्ति दिखानी होगी। नई शिक्षा नीति में शिक्षा पर व्यय को वर्तमान जी0डी0पी0 के 3 प्रतिशत से बढाकर 6 प्रतिशत करने की बात कही गई है। लेकिन इससे ज्यादा जरूरी यह है कि शिक्षा के लिए आवंटित धन का प्रयोग कुशलतापूर्वक एवं मितव्ययितापूर्वक किया जाय। इसके लिए आवश्यक है कि प्रशासनिक मशीनरी को चुस्त-दुरूस्त बनाया जाय साथ ही बिना वजह की अफसरशाही पर भी लगाम लगाया जाय।
राजधानी के नेहरू मेमोरियल में विगत 20 अगस्त को हुई रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़ी भवन निर्माण समिति की बैठक में निर्णय लिया गया है कि 2024 की जनवरी तक राम मंदिर निर्माण का कार्य संपन्न कर लिया जाएगा । यह बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि देश जिस राम मंदिर के लिए पिछले लगभग 500 वर्ष से संघर्ष करता आ रहा था , उसके बनने की घड़ी आई है और प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भारी विरोध के उपरांत भी स्वयं अयोध्या पहुंचकर श्री राम के भव्य मंदिर का भूमि पूजन किया। भगवान श्री राम जी के मंदिर के लिए आहूत की गई इस बैठक में सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्ट्टियूट (सीबीआरआई), आईआईटी चेन्नई, और लार्सन एंड टर्बो कंपनी के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र की अगुआई में हुई इस बैठक में राम मंदिर ट्रस्ट के उपाध्यक्ष चंपत राय, सदस्य अनिल मिश्र, गोविंद गिरी के साथ विहिप के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। जिस जमीन पर यह मंदिर निर्माण होने जा रहा है उसका रखवा 70 एकड़ बताया गया है । इस प्रकार यह मंदिर दिल्ली स्थितअक्षरधाम जैसे मंदिर से भी भव्य बनाए जाने की सम्भावना है । जिसकी प्रतीक्षा सारा देश बड़ी उत्सुकता से कर रहा है। फैजाबाद विकास प्राधिकरण से आवश्यक स्वीकृति प्राप्त कर यह कार्य बहुत शीघ्र पूर्ण होगा , ऐसा संकल्प उपरोक्त बैठक में उपस्थित अधिकारियों ने लिए । बैठक में उपस्थित ट्रस्ट के एक सदस्य के अनुसार एजेंडा समय पर मंदिर निर्माण के साथ मंदिर की मजबूती भी थी। मंदिर निर्माण के लिए 60 मीटर खुदाई की गई है। इससे निकली मिट्टी की मजबूती को जांचने का काम सीबीआरआई करेगी। मंदिर निर्माण के लिए निर्धारित की गई 36 से 40 माह की अवधि के बीच ही यह कार्य संपन्न कर लिया जाएगा , ऐसा निर्णय भी इस बैठक में ले लिया गया। जिसका स्वागत किया जाना चाहिए । मंदिर निर्माण का कार्य जैसे-जैसे गति पकड़ेगा वैसे वैसे ही भारत की राजनीति में भी नए-नए उतार-चढ़ाव देखने को मिलेंगे । आगामी 40 माह में राम मंदिर के निर्माण का विरोध करने वाले संगठन जहां कुछ ऐसी तिकड़में भिड़ाएंगे , जिनसे देश में सांप्रदायिक उपद्रव हों , वहीं जो राजनीतिक दल राम के अस्तित्व को ही नकारते रहे थे , वह भी कुछ न कुछ ऐसा करने का प्रयास करेंगे जिससे मंदिर कार्य में अड़ंगा पैदा हो । इसके अतिरिक्त भाजपा जैसे राजनीतिक दल हर स्थिति में यह चाहेंगे कि राम मंदिर निर्माण का कार्य समय पर पूर्ण हो , जिससे कि 2024 में आयोजित होने वाले चुनावों में पार्टी उसका राजनीतिक लाभ उठा सके। अपने राजनीतिक बौद्धिक चातुर्य के लिए जाने जाने वाले प्रधानमंत्री श्री मोदी कोई भी काम बिना सोचे समझे नहीं करते । उनके प्रत्येक कार्य में दूरदर्शिता होती है । यदि राम मंदिर का निर्माण 2024 की जनवरी में जाकर पूर्ण हो रहा है तो यह भी महज संयोग नहीं है , अपितु इसके पीछे निश्चित ही प्रधानमंत्री श्री मोदी का दिमाग काम कर रहा है। क्योंकि 2024 की जनवरी ही वह महीना होगा जब 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए सारा देश मन बना रहा होगा । उसके कुछ समय पश्चात ही देश में लोकसभा चुनावों का डंका बज जाएगा। स्पष्ट है कि जब देश में चुनावी मौसम अपने उफान पर होगा , तभी राम मंदिर निर्माण भी पूरा होगा । जिसे प्रधानमंत्री मोदी के लिए भाजपा यह कहकर भुनाएगी कि ‘मोदी है तो मुमकिन है।’ जनवरी 2024 तक ही कई चीजें साफ हो जाएंगी। पीओके भारत में होगा या पाकिस्तान में – यह भी तय हो जाएगा और समान नागरिक संहिता व जनसंख्या नियंत्रण के संबंध में भी मोदी सरकार की नीतियों साफ हो जाएंगी । यदि केंद्र की मोदी सरकार पीओके को तब तक ले लेती है और समान नागरिक संहिता को लागू करवा कर देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए भी कठोर कानून ले आती है तो माहौल निश्चित रूप से उस समय भाजपा के पक्ष में होगा । यदि उसी समय राम मंदिर निर्माण भी संपन्न होगा तो निश्चय ही भाजपा के लिए यह सोने पर सुहागा वाली बात होगी। तब ऐसा भी संभव है कि भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों में 1984 के कांग्रेस के बनाए इतिहास के कीर्तिमान को ध्वस्त कर दे और लोकसभा में विपक्ष का सफाया करते हुए प्रचंड बहुमत के साथ लौट आए । उस समय क्या होगा क्या नहीं ? – यह कहना तो अभी जल्दबाजी होगी , परंतु कांग्रेस के राहुल गांधी के लिए 2024 निश्चय ही कष्टकर होगा। क्योंकि उन्होंने अपनी नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं किया है और ना ही वह 2024 की अभी तैयारी कर रहे हैं। उनके घर में इस समय कलह चल रहा है और उनकी कार्यशैली से लगता है कि वह अभी 2024 को दूर मानते हैं । जबकि मोदी प्रधानमंत्री के रूप में जहां देश के कार्यों में लगे हुए हैं , वही उनकी कार्यशैली यह भी बता रही है कि वह 2024 को भी बहुत निकट मान रहे हैं । दोनों नेताओं की कार्यशैली का यह अंतर ही 2024 की हार जीत को तय कर देगा।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास ऐसे वीर वीरांगनाओं की कहानियों से भरा पड़ा है जिनके योगदान को कोई मान्यता नहीं मिली है। ऐसे ही हमारे अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी हैं जिनका योगदान भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहा है। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा है कि अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी को इतिहासकारों ने पूरी तरह से उपेक्षित रखा है।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीर वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध खुला विद्रोह किया और स्वतंत्रता की खातिर शहीद हो गये। इन्हीं शहीदों में क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी का नाम भी शामिल है। जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी भारत माँ को आजादी दिलाने के लिए लगा दी। उनका जन्म एक किसान परिवार में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के ग्राम चन्दीकाखेड़ा (फतेहपुर चौरासी) के लोधी परिवार में सन् 1903 में श्रीराम रतनसिंह लोधी के यहां हुआ था।
लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में झण्डा सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने उन्नाव जिले के कई सत्याग्रही जत्थे गये थे, परन्तु सिपाहियों ने उन्हें खदेड़ दिया और ये जत्थे तिरंगा झंडा फहराने में कामयाब नहीं हो सके। इन्हीं सत्याग्रही जत्थों में शामिल वीर गुलाब सिंह लोधी किसी तरह फौजी सिपाहियों की टुकड़ियों के घेरे की नजर से बचकर आमीनाबाद पार्क में घुस गये और चुपचाप वहां खड़े एक पेड़ पर चढ़ने में सफल हो गये। क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी के हाथ में डंडा जैसा बैलों को हांकने वाला पैना था। उसी पैना में तिरंगा झंडा लगा लिया, जिसे उन्होंने अपने कपड़ों में छिपाकर रख लिया था। क्रांतिवीर गुलाब सिंह ने तिरंगा फहराया और जोर-जोर से नारे लगाने लगे- तिरंगे झंडे की जय, महात्मा गांधी की जय, भारत माता की जय। अमीनाबाद पार्क के अन्दर पर तिरंगे झंडे को फहरते देखकर पार्क के चारों ओर एकत्र हजारों लोग एक साथ गरज उठे और तिरंगे झंडे की जय, महात्मा गांधी की जय, भारत माता की जय।
झंडा सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान देश की हर गली और गांव शहर में सत्याग्रहियों के जत्थे आजादी का अलख जगाते हुए घूम रहे थे। झंडा गीत गाकर, झंडा ऊंचा रहे हमारा, विजय विश्व तिरंगा प्यारा, इसकी शान न जाने पावे, चाहे जान भले ही जाये, देश के कोटि कोटि लोग तिरंगे झंडे की शान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए दीवाने हो उठे थे।
समय का चक्र देखिए कि क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी के झंडा फहराते ही सिपाहियों की आंख फिरी और अंग्रेजी साहब का हुकुम हुआ, गोली चलाओ, कई बन्दूकें एक साथ ऊपर उठीं और धांय-धांय कर फायर होने लगे, गोलियां क्रांतिवीर सत्याग्रही गुलाबसिंह लोधी को जा लगीं। जिसके फलस्वरूप वह घायल होकर पेड़ से जमीन पर गिर पड़े। रक्त रंजित वह वीर धरती पर ऐसे पड़े थे, मानो वह भारत माता की गोद में सो गये हों। इस प्रकार वह आजादी की बलिवेदी पर अपने प्राणों को न्यौछावर कर 23 अगस्त 1935 को शहीद हो गये।
क्रांतिवीर गुलाबसिंह लोधी के तिरंगा फहराने की इस क्रांतिकारी घटना के बाद ही अमीनाबाद पार्क को लोग झंडा वाला पार्क के नाम से पुकारने लगे और वह आजादी के आन्दोलन के दौरान राष्ट्रीय नेताओं की सभाओं का प्रमुख केन्द्र बन गया, जो आज शहीद गुलाब सिंह लोधी के बलिदान के स्मारक के रूप में हमारे सामने है। मानो वह आजादी के आन्दोलन की रोमांचकारी कहानी कह रहा है। क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी ने जिस प्रकार अदम्य साहस का परिचय दिया और अंग्रेज सिपाहियों की आँख में धूल झोंककर बड़ी चतुराई तथा दूरदर्शिता के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त किया, ऐसे उदाहरण इतिहास में बिरले ही मिलते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय अग्रणी भूमिका निभाने के लिए उनकी याद में केंद्र सरकार द्वारा जनपद उन्नाव में 23 दिसंबर 2013 को डाक टिकट जारी किया गया।
एक सच्चा वीर ही देश और तिरंगे के लिये अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है। ऐसे ही अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी एक सच्चे वीर थे जिन्होंने अपने देश और तिरंगे की खातिर अपना बलिदान दे दिया और तिरंगे को झुकने नहीं दिया। अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी का बलिदान देशवासियों को देशभक्ति और परमार्थ के लिये जीने की प्रेरणा देता रहेगा। आज हम वीर शहीद गुलाब सिंह लोधी को उनके 85वें बलिदान दिवस पर नमन करते हुए यही कह सकते हैं कि-
हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षा आयोजित करने के लिए एक स्वतंत्र निकाय, की स्थापना को मंजूरी दी है। प्रारंभ में, यह ग्रुप बी और सी (गैर-तकनीकी) पदों के लिए स्क्रीन / शॉर्टलिस्ट उम्मीदवारों का आयोजन करेगा, जो अब कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी), रेलवे भर्ती बोर्ड (आरआरबी) और (आईबीपीएस) बैंकिंग कार्मिक संस्थान द्वारा आयोजित किए जा रहे हैं। बाद में, इसके अंतर्गत और परीक्षाएँ लाई जा सकती हैं।
फरवरी में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा केंद्रीय बजट में एक सामान्य पात्रता परीक्षा (सीईटी) आयोजित करने के लिए ऐसी एजेंसी की स्थापना की घोषणा की गई थी। इसकी अध्यक्षता भारत सरकार के सचिव के रैंक के अध्यक्ष करेंगे। इसमें रेल मंत्रालय, वित्त मंत्रालय / वित्तीय सेवा विभाग, एसएससी, आरआरबी और आईबीपीएस के प्रतिनिधि होंगे। यह केंद्र सरकार में विभिन्न भर्तियों के लिए एक सामान्य प्रारंभिक परीक्षा आयोजित करेगा।
सामान्य पात्रता परीक्षा (सीईटी) स्कोर के आधार पर एक उम्मीदवार संबंधित एजेंसी के साथ रिक्ति के लिए आवेदन कर सकता है। कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट साल में दो बार आयोजित किया जाएगा। परीक्षा तीन स्तरों के लिए आयोजित की जाएगी: स्नातक, उच्च माध्यमिक (12 वीं पास) और मैट्रिक (10 वीं पास) उम्मीदवार।
हालांकि, वर्तमान भर्ती एजेंसियां- आईबीपीएस, आरआरबी और एससीसी – यथावत रहेंगी। सीईटी स्कोर स्तर पर की गई स्क्रीनिंग के आधार पर, भर्ती के लिए अंतिम चयन परीक्षा के अलग-अलग विशेष टियर (II, III, आदि) के माध्यम से किया जाएगा जो संबंधित भर्ती एजेंसियों द्वारा आयोजित किया जाएगा।
एक उम्मीदवार का सीईटी स्कोर परिणाम की घोषणा की तारीख से तीन साल की अवधि के लिए वैध होगा। उम्मीदवारों के लिए इसे आसान बनाने के लिए, देश के प्रत्येक जिले में परीक्षा केंद्र बनाए जाएंगे। जबकि CET में उपस्थित होने के लिए उम्मीदवार द्वारा किए जाने वाले प्रयासों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा, यह ऊपरी आयु सीमा के अधीन होगा। परीक्षाएं 12 भाषाओं में आयोजित की जाएंगी।
एनआरए की आवश्यकता क्यों है? छात्रों और एजेंसियों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? अब तक, उम्मीदवारों को विभिन्न परीक्षाएं लेनी होती हैं जो केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए विभिन्न एजेंसियों द्वारा आयोजित की जाती हैं। उम्मीदवारों को कई भर्ती एजेंसियों को शुल्क देना पड़ता है और विभिन्न परीक्षाओं में उपस्थित होने के लिए लंबी दूरी की यात्रा भी करनी पड़ती है केंद्र सरकार में हर साल औसतन 2.5 करोड़ से 3 करोड़ उम्मीदवार लगभग 1.25 लाख रिक्तियों के लिए उपस्थित होते हैं।
मुझे गर्व है कि इंदौर को लगातार चौथी बार भारत का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया है। मुझे दिल्ली में बसे 55 साल हो गए लेकिन इंदौर में जन्म के बाद जो 21 साल कटे, वे अद्भुत थे। लगभग 50 साल पहले जब मैं अपनी पीएच.डी. के शोध के लिए लंदन और वाशिंगटन जा रहा था तो एक मित्र के आग्रह पर आस्ट्रिया की राजधानी वियना में भी एक सप्ताह रुका। वहां एक सड़क पर एक सरदारजी ने मुझे देखा और पूछा कि ‘‘तुम इंदौर में ही रहते हो, न ?’’ मैंने कहा, ‘‘मैं आजकल दिल्ली में रहता हूं। मैं इंदौर में नहीं रहता हूं लेकिन इंदौर मुझमें रहता है।’’ हम इंदौरियों की राय यह है कि जो आदमी एक बार इंदौर में रह गया, वह कभी इंदौर को भूल नहीं पाता। यों भी इंदौर को ‘छोटा मुंबई’ कहा जाता है लेकिन सफाई में वह मुंबई क्या, दिल्ली से भी आगे निकल गया है। उस समय इंदौर की जनसंख्या मुश्किल से 3-4 लाख थी लेकिन अब 30 लाख के ऊपर है। इसके बावजूद वह साफ-सफाई में अव्वल है। ‘स्वच्छ सर्वेक्षण 2020’ की रपट में 4000 शहरों के 28 दिन तक बारीकी से किए गए निरीक्षण का ब्यौरा है। लगभग पौने दो करोड़ लोगों से पूछताछ के बाद यह रपट तैयार की गई है। इंदौर चौथी बार भी सारे भारत में सर्वप्रथम इसलिए रहा है कि वहां की जनता अत्यंत जागरुक और सक्रिय है। इंदौर के लोग स्वच्छताप्रिय तो हैं ही उनके-जैसे भोजनप्रेमी लोग शायद पूरे दक्षिण एशिया में कहीं नहीं होंगे। इंदौर के नमकीन और मिठाइयों ने सारी दुनिया के प्रवासी भारतीयों को सम्मोहित कर रखा है। भारत के मध्य क्षेत्र में इंदौर-जैसा मालदार शहर कोई और नहीं है। इंदौर की खूबियां इतनी हैं कि उनका जिक्र इस छोटे-से लेख में नहीं हो सकता। इंदौर के मालवी लोगों को ‘घर-घुस्सू’ कहा जाता है याने वे मालवा छोड़कर कहीं जाना ही नहीं चाहते। मालवा में न ज्यादा ठंड पड़ती है और न ही ज्यादा गर्मी! इस मौसम ने मालवी लोगों के मन को भी अपने रंग में रंग दिया है। इसीलिए मालवा-क्षेत्र में सांप्रदायिक और जातीय दंगे बहुत कम होते हैं। वहां एक-दूसरे की लिहाज़दारी गज़ब की होती है। परस्पर विरोधी नेता भी एक-दूसरे का बड़ा ख्याल रखते हैं। इंदौर में आंदोलन करते हुए मुझे कई बार जेलों में भी रहना पड़ा लेकिन वहां भी किसी ने कोई दुर्व्यवहार किया हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। इंदौर के आस-पास की पहाड़ियों, नदियों, तालाबों और बगीचों से ऐसा खुशनुमा माहौल बना रहता है कि जैसे कोई ईश्वरीय महफिल सजी हुई है। भारत तथा हमारे पड़ौसी देशों के शहर भी इंदौर-जैसे या उससे भी बढ़िया बन जाएं, क्या यह आप नहीं चाहेंगे ?