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गीत-किस्सों के जरिये आदर्श और मूल्यों को बचाने की कोशिश में लगे मास्टर छोटूराम.

  
—-प्रियंका सौरभ

 प्राचीन समय से ही इंसान का विभिन्न कलाओं के प्रति अटूट रिश्ता रहा है.  कभी कलाकारों के फ़न ने तो कभी कलाओं के मुरीद लोगों ने इस ज़माने में नए-नए रंग बिखेरे है. ये माना जाता है कि आत्मा की  तरह कला अजर-अमर है, ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती है और नया रूप लेती है. आज कला के रूप बदरंग हो गए है. कलाकार अपने उद्देश्यों  से भटक गए है और पैसों के पीछे दौड़ पड़े है जो एक तरह कला को बेचने जैसा है. आज कला के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता समाज को लील रही है.

मगर इन सबके बीच आज भी देश में कुछ ऐसे कलाकार है जो भारत की  प्राचीन सभ्यता को नए रंग देकर उन आदर्श और मूल्यों को बचाने की कोशिश में लगे है. जी हां, उनमे से एक है हरियाणा के भिवानी जिले के कस्बे सिवानी के गाँव बड़वा की माटी में जन्मे मास्टर छोटूराम. किसान परिवार में जन्मे मास्टर छोटूराम का जीवन संघर्षों से भरा रहा है. इनके पिता स्वर्गीय रिछपाल गैदर एक किसान थे जिनसे इनको संघर्ष करने और धैर्य रख आगे बढ़ने की सीख मिली.

छोटी उम्र में  पिता का साया उठने के बाद भी ये अपनी पढाई को जारी रखते हुए शिक्षा और कला के क्षेत्र में आगे बढ़ते गए.  पिछले चार-पांच दशकों से मास्टर छोटूराम अपने लिखे गीतों के जरिये समाज को भारत की प्राचीन संस्कृति से जोड़ने का अतुल्य प्रयास कर रहे है. पेशे से सरकारी अध्यापक मास्टर छोटूराम एक आशु कवि और हरियाणवी-हिंदी के जाने माने गायक है.

देश भर में हज़ारों स्टेज कार्यक्रम दे चुके मास्टर छोटूराम हमारे देश के वीर-शहीदों  जैसे शहीद भगतसिंह, सुभाष चद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, शहीद उद्यम सिंह के साथ-साथ अन्य सपूतों की जीवनी को जब अपने गीतों और किस्सों के माध्यम से स्टेज पर प्रस्तुत करते है तो देशभक्ति की रसधार बहने लगती है.  लोगों को आज के अश्लील दौर में एक सभ्य और जीवन मूल्यों से भरे गीतों को सुनंने का सुनहरा अवसर मिलता है.

इन सबके अलावा मास्टर छोटूराम यू ट्यूब एवं सोशल मीडिया के जरिये भारत की प्राचीन संस्कृति से जुड़े किस्सों को वीडियो और ऑडियो रूप में फ्री में शेयर करते है, ताकि प्राचीन संस्कृति को बचाया जा सके. हरियाणवी संस्कृति के विभिन्न रंगों को इन्होने अपनी रागनियों और नाटकों  में बखूबी पिरोया है और लोगों के मनों तक पहुँचाया है. देश भर में आकाशवाणी एवं टीवी पर समय-समय पर इनके ये कार्यक्रम देखे व् सुने जा सकते है.

गायक कवि कलाकार मास्टर छोटूराम अपने सिद्धांतों और कला से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करते. आज जब नग्न संस्कृति गीतों और किस्सों में हावी है तब भी इन्होने अपने मूल्यों को बनाये रखा और हमारे ऐतिहासिक और पौराणिक किस्सों को जेब से पैसे लगाकर रिलीज़ करवाया है. बेशक आज के तड़क भड़क वाले अश्लील वीडियो की तुलना में  उनको कम शेयर किया गया है लेकिन वास्तव में उन्होंने हमारी धरोहर को सहेजने कि दिशा में अपना अमूल्य योगदान दिया है.

पितृभक्त श्रवण कुमार कुमार और फैशन की फटकार इनके पहले दो ऑडियो एल्बम है जिनको लोग आज बीस साल बाद भी सुन रहे है और सोशल मीडिया पर शेयर कर रहें है.  कड़े गए वो नाथू सुरजा हरियाणा की बदलती संस्कृति  पर फिल्माया गया उनका सुपर हिट गीत है जिसको बहुत पसंद और शेयर किया गया है. ऐसतिहासिक नरसी का भात किस्सा दर्शकों को पूरी रात भर सुनने को मजबूर कर देता है.

 वास्तव में अपनी प्राचीन कला को बनाये रखना बहुत बड़ी बात है. आज के दौर में युवा पीढ़ी यू ट्यूब और अन्य सोशल प्लेटफार्म पर घटिया स्तर के वीडियोस और ऑडियो को पसंद  करती नज़र आ रही है. ऐसे में मास्टर छोटूराम के सामाजिक गीतों के प्रयास बड़ी छाप छोड़ रहें है. मीडिया को ऐसे कलाकारों के प्रयासों को जोर-शोर से प्रचारित-प्रसारित करना चाहिए. ताकि हमारे प्राचीन मूल्यों को आज की इस शोषणकारी और अश्लील संस्कृति से दूर रखा जा सके.

जब मास्टर छोटूराम जैसे कलाकर पैसों के लिए अपनी कला से समझौता नहीं करते तो हम क्यों घर बैठे कर रहें है. अश्लील गीतों को समाज से बाहर करने के लिए हमें अच्छे गीतों और अच्छे कलाकरों को उचित मान- सम्मान देना ही होगा, तभी हम कला को वास्तविक रूप देकर एक रहने योग्य समाज आने वाली पीढ़ियों को देकर जा पाएंगे.  लोक कलाएं वास्तव में किसी भी समाज की नब्ज होती है हमें अपने बच्चों को इन कलाओं से अवश्य रूबरू करवाना चाहिए. साथ ही ये भी ध्यान रखना चाहिए कि आज के इस इंटरनेट युग में हमारे बच्चे क्या देख रहें है क्या सुन रहें है.

अच्छे कलाकार और उनकी कलाएं समाज के सच्चे पथ प्रदर्शक  है लेकिन उनको चुनना हमारी जिम्मेवारी है. प्रदेश एवं केंद्र सरकार को आज की बिगड़ती संस्कृति के लिए दोषी तड़क भड़क के गानों को खासकर यू ट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर बैन करना चाहिए. मास्टर छोटूराम जैसे कलाकारों को ढूंढकर उनके लिए लिए एक सरकारी प्लेटफार्म एवं आर्थिक पैकेज की व्यस्था करने की जरूरत है ताकि वो हमारी संस्कृति को बचाने के लिए कर रहें प्रयासों को और आगे गति दे सके.

हमारे वीर सपूतों की जीवनियों को मास्टर छोटूराम की तरह रागिनी. नाटक और किस्सों के जरिये अब बदलते दौर के डिजिटल उपकरणों के माध्यम से घर-घर तक पहुँचाने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ी हमारे वीरों के आदर्शों को अगली पीढ़ी तक सौंप सके और हम एक अच्छे अपने हिंदुस्तान को उनके हाथों में सौंप सके जिसका सपना हमारे शहीदों ने अपनी जान देते वक्त देखा था.  इसलिए जरूरी है की केंद्र सरकार ऐसे जमीन से जुड़े सच्चे कलाकरों के लिए अलग से कानून बनाकर हर राज्य सरकार को अपने क्षेत्र के हिसाब से लागू करवाए, तभी हमारी संस्कृति, संस्कार और धरोहर बच पाएंगे.
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(देश-विदेश में लाखों स्टेज कार्यक्रम दे चुके मास्टर छोटूराम हमारे देश के वीर-शहीदों  जैसे शहीद भगतसिंह, सुभाष चद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, शहीद उद्यम सिंह के साथ-साथ अन्य सपूतों की जीवनी को जब अपने गीतों और किस्सों के माध्यम से स्टेज पर प्रस्तुत करते है तो देशभक्ति की रसधार बहने लगती है. लोगों को आज के अश्लील दौर में एक सभ्य और जीवन मूल्यों से भरे गीतों को सुनंने का सुनहरा अवसर मिलता है.)

प्राचीन समय से ही इंसान का विभिन्न कलाओं के प्रति अटूट रिश्ता रहा है.  कभी कलाकारों के फ़न ने तो कभी कलाओं के मुरीद लोगों ने इस ज़माने में नए-नए रंग बिखेरे है. ये माना जाता है कि आत्मा की  तरह कला अजर-अमर है, ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती है और नया रूप लेती है. आज कला के रूप बदरंग हो गए है. कलाकार अपने उद्देश्यों  से भटक गए है और पैसों के पीछे दौड़ पड़े है जो एक तरह कला को बेचने जैसा है. आज कला के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता समाज को लील रही है.

मगर इन सबके बीच आज भी देश में कुछ ऐसे कलाकार है जो भारत की  प्राचीन सभ्यता को नए रंग देकर उन आदर्श और मूल्यों को बचाने की कोशिश में लगे है. जी हां, उनमे से एक है हरियाणा के भिवानी जिले के कस्बे सिवानी के गाँव बड़वा की माटी में जन्मे मास्टर छोटूराम. किसान परिवार में जन्मे मास्टर छोटूराम का जीवन संघर्षों से भरा रहा है. इनके पिता स्वर्गीय रिछपाल एक किसान थे जिनसे इनको संघर्ष करने और धैर्य रख आगे बढ़ने की सीख मिली.

छोटी उम्र में  पिता का साया उठने के बाद भी ये अपनी पढाई को जारी रखते हुए शिक्षा और कला के क्षेत्र में आगे बढ़ते गए.  पिछले चार-पांच दशकों से मास्टर छोटूराम अपने लिखे गीतों के जरिये समाज को भारत की प्राचीन संस्कृति से जोड़ने का अतुल्य प्रयास कर रहे है. पेशे से सरकारी अध्यापक मास्टर छोटूराम एक आशु कवि और हरियाणवी-हिंदी के जाने माने गायक है.

देश भर में हज़ारों स्टेज कार्यक्रम दे चुके मास्टर छोटूराम हमारे देश के वीर-शहीदों  जैसे शहीद भगतसिंह, सुभाष चद्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, शहीद उद्यम सिंह के साथ-साथ अन्य सपूतों की जीवनी को जब अपने गीतों और किस्सों के माध्यम से स्टेज पर प्रस्तुत करते है तो देशभक्ति की रसधार बहने लगती है.  लोगों को आज के अश्लील दौर में एक सभ्य और जीवन मूल्यों से भरे गीतों को सुनंने का सुनहरा अवसर मिलता है.

इन सबके अलावा मास्टर छोटूराम यू ट्यूब एवं सोशल मीडिया के जरिये भारत की प्राचीन संस्कृति से जुड़े किस्सों को वीडियो और ऑडियो रूप में फ्री में शेयर करते है, ताकि प्राचीन संस्कृति को बचाया जा सके. हरियाणवी संस्कृति के विभिन्न रंगों को इन्होने अपनी रागनियों और नाटकों  में बखूबी पिरोया है और लोगों के मनों तक पहुँचाया है. देश भर में आकाशवाणी एवं टीवी पर समय-समय पर इनके ये कार्यक्रम देखे व् सुने जा सकते है.

गायक कवि कलाकार मास्टर छोटूराम अपने सिद्धांतों और कला से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करते. आज जब नग्न संस्कृति गीतों और किस्सों में हावी है तब भी इन्होने अपने मूल्यों को बनाये रखा और हमारे ऐतिहासिक और पौराणिक किस्सों को जेब से पैसे लगाकर रिलीज़ करवाया है. बेशक आज के तड़क भड़क वाले अश्लील वीडियो की तुलना में  उनको कम शेयर किया गया है लेकिन वास्तव में उन्होंने हमारी धरोहर को सहेजने कि दिशा में अपना अमूल्य योगदान दिया है.

पितृभक्त श्रवण कुमार कुमार और फैशन की फटकार इनके पहले दो ऑडियो एल्बम है जिनको लोग आज बीस साल बाद भी सुन रहे है और सोशल मीडिया पर शेयर कर रहें है.  कड़े गए वो नाथू सुरजा हरियाणा की बदलती संस्कृति  पर फिल्माया गया उनका सुपर हिट गीत है जिसको बहुत पसंद और शेयर किया गया है. ऐसतिहासिक नरसी का भात किस्सा दर्शकों को पूरी रात भर सुनने को मजबूर कर देता है.

 वास्तव में अपनी प्राचीन कला को बनाये रखना बहुत बड़ी बात है. आज के दौर में युवा पीढ़ी यू ट्यूब और अन्य सोशल प्लेटफार्म पर घटिया स्तर के वीडियोस और ऑडियो को पसंद  करती नज़र आ रही है. ऐसे में मास्टर छोटूराम के सामाजिक गीतों के प्रयास बड़ी छाप छोड़ रहें है. मीडिया को ऐसे कलाकारों के प्रयासों को जोर-शोर से प्रचारित-प्रसारित करना चाहिए. ताकि हमारे प्राचीन मूल्यों को आज की इस शोषणकारी और अश्लील संस्कृति से दूर रखा जा सके.

जब मास्टर छोटूराम जैसे कलाकर पैसों के लिए अपनी कला से समझौता नहीं करते तो हम क्यों घर बैठे कर रहें है. अश्लील गीतों को समाज से बाहर करने के लिए हमें अच्छे गीतों और अच्छे कलाकरों को उचित मान- सम्मान देना ही होगा, तभी हम कला को वास्तविक रूप देकर एक रहने योग्य समाज आने वाली पीढ़ियों को देकर जा पाएंगे.  लोक कलाएं वास्तव में किसी भी समाज की नब्ज होती है हमें अपने बच्चों को इन कलाओं से अवश्य रूबरू करवाना चाहिए. साथ ही ये भी ध्यान रखना चाहिए कि आज के इस इंटरनेट युग में हमारे बच्चे क्या देख रहें है क्या सुन रहें है.

अच्छे कलाकार और उनकी कलाएं समाज के सच्चे पथ प्रदर्शक  है लेकिन उनको चुनना हमारी जिम्मेवारी है. प्रदेश एवं केंद्र सरकार को आज की बिगड़ती संस्कृति के लिए दोषी तड़क भड़क के गानों को खासकर यू ट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर बैन करना चाहिए. मास्टर छोटूराम जैसे कलाकारों को ढूंढकर उनके लिए लिए एक सरकारी प्लेटफार्म एवं आर्थिक पैकेज की व्यस्था करने की जरूरत है ताकि वो हमारी संस्कृति को बचाने के लिए कर रहें प्रयासों को और आगे गति दे सके.

हमारे वीर सपूतों की जीवनियों को मास्टर छोटूराम की तरह रागिनी. नाटक और किस्सों के जरिये अब बदलते दौर के डिजिटल उपकरणों के माध्यम से घर-घर तक पहुँचाने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ी हमारे वीरों के आदर्शों को अगली पीढ़ी तक सौंप सके और हम एक अच्छे अपने हिंदुस्तान को उनके हाथों में सौंप सके जिसका सपना हमारे शहीदों ने अपनी जान देते वक्त देखा था.  इसलिए जरूरी है की केंद्र सरकार ऐसे जमीन से जुड़े सच्चे कलाकरों के लिए अलग से कानून बनाकर हर राज्य सरकार को अपने क्षेत्र के हिसाब से लागू करवाए, तभी हमारी संस्कृति, संस्कार और धरोहर बच पाएंगे.
 ——-प्रियंका सौरभ

सोनिया साल भर फिर कांग्रेस की नियती

तय समीकरणों पर और निश्चित गणित पर ही जब पूरी राजनीति चलनी है तो सोनिया गांधी से बढ़िया अध्यक्ष कांग्रेस को नहीं मिल सकता था। कांग्रेस लगातार हारती जा रही है और भाजपा उसका सफाया करती जा रही है। ऐसे में राहुल गांधी अध्यक्ष कैसे बन सकते थे। फिर प्रियंका गांधी भी कुछ राज्यों में आनेवाले चुनावों की आसन्न हार का ताज क्यों पहने। सो, भले ही कामकाज राहुल और प्रियंका देखते रहें, जैसा कि पहले भी संभालते रहे हैं। मगर, साल भर तक तो अब सोनिया गांधी ही फिर कुर्सी पर रहेंगी। इसमें बुरा भी क्या है।

निरंजन परिहार

सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व। आलाकमान भी वे ही और फैसलों की फसल के फलसफे भी यही बताते हैं। किसी और के लिए आलाकमान में कोई जगह नहीं। इसीलिए सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी। फिलहाल एक बार फिर यह फैसला ले लिया गया है। वैसे भी कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पूरे पांच घंटे तो चिट्ठी पर ही विवाद चलता रहा। कांग्रेस के 23 नेताओं द्वारा किसी कार्यक्षम नेता को अध्यक्ष बनाने वाली चिट्ठी को लेकर राहुल गांधी बिफरे, तो प्रियंका गांधी ने भी गुलाम नबी आजाद के प्रति खुलकर नाराजगी जताई। मामला बिगड़ता देख डरे हुए मुकुल वासनिक लगभग माफी की मुद्रा में नतमस्तक नजर आए। बैठक एक बहुत ही सुरक्षित माने जानेवाले वैबएप्प पर चली, लेकिन फिर भी बैठक में विवाद की बातें बाहर की बयार में बहती रहीं। यह कांग्रेस के भविष्य के लिए सुखद संकेत नहीं हैं। राजनीति के जानकारों की राय में जब फिर से सोनिया गांधी को ही अध्यक्ष पद संभालना था, तो इतना सीन क्रिएट करने की जरूरत ही नहीं थी।   

देश जानता है कि कांग्रेस में वैसे भी इन्हीं तीनों गांधियों के अलावा अध्यक्ष अगर कोई और बन भी जाए, तो पार्टी में उसकी कितनी चलेगी, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। फिर भी कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में जंग छिड़ी रही। दिन भर हल्ला मचता रहा। बदलाव को लेकर बातें चलती रहीं। सोनिया गांधी ने कहा कि पार्टी किसी और को अध्यक्ष बनाने के फैसला ले ले। लेकिन मान मनव्वल के बाद राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस के 23 नेताओं की चिट्ठी को बीजेपी से मिलिभगत बताया गया। गुलाम नबी आजाद ने प्रतिरोध दर्ज किया। कपिल सिब्बल ने आपत्ति जताई। कईयों ने कोलाहल मचाया। तो, कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में लगभग पांच घंटे से तक राहुल गांधी के सवाल से मचे बवाल को समेटने की सियासत सांसें फुलाती रहीं। अंततः मामला सुलटाने की कोशिश में पहले सिब्बल और आजाद से कहलवाया गया, फिर पार्टी ने भी अधिकारिक रूप से कहा कि राहुल गांधी ने ऐसा तो कुछ कहा ही नहीं था। जबकि सच्चाई यही है कि संभावित नुकसान की आशंका से यह तात्कालिक लीपापोती थी। फिर, सवाल खड़ा हुआ कि बिना कुछ कहे बात कैसे बाहर निकली। तो जैसा कि खाल बचाने के लिए कहना बहुत आसान था, गुलाम नबी आजाद ने कहा डाला कि मीडिया का एक धड़ा इस तरह की खबरें फैला रहा है। कांग्रेस मानती हैं कि ऐसा कहने से दुनिया भी मान लेगी। क्योंकि मीडिया चा चरित्र भी कोई बहुत ईमानदार नहीं रह गया है। लेकिन कांग्रेस यह बता नहीं पा रही है कि आखिर देश की सबसे पुरानी पार्टी अपनी ऐसी फजीहत होने रोक क्यों नहीं पा रही है। इस सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर देश के एक सबसे बड़े राजनीतिक दल की अंदरूनी राजनीति ऐसी क्यूं है कि अंततः उसी के जूते से उसकी बार बार पिटाई होती रहती है। संकट गंभीर है, इसे सुधारना जरूरी है।

पार्टी की अंदरूनी जानकारियां हवा में तत्काल तैरने के खतरे इतने ज्यादा है कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक भी सोशल मीडिया के जूम ऐप पर न होकर किस्को वैबएप्प पर आयोजित हुई। कारण भले ही सुरक्षा का बताया गया, लेकिन असल बात यह है कि जूम में व्यक्ति सभी की चर्चा का वीडियो रिकॉर्ड कर सकता है, जबकि इस वैबएप्प पर मीटिंग में सहभागी केवल अपना ही रिकॉर्ड कर सकता हैं। लेकिन फिर भी बैठक के शुरू होते ही अंदर की सारी खबरें हवा में तैरने लगीं। ट्वीटर पर ट्रेंड करने लगी। और देश भर में चर्चा का विषय बन गई। पता नहीं, फिर भी कांग्रेस इस तथ्य को स्वीकारती क्यों नहीं कि उसके नेताओं पर उसका नियंत्रण नहीं होना ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। लेकिन उंगली नीयत पर नहीं बल्कि नियती पर उठाई जा रही है।

दरअसल, कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या उसके शीर्ष नेतृत्व के असमंजस में निहित है। पार्टी के शीर्ष के तीनों नेताओं को संगठन के सारे निर्णयों पर नियंत्रण तो अपने हाथ में चाहिए। लेकिन पार्टी में सर्वोच्च नेतृत्व के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी उनको नहीं लेनी। अजब दृश्य है। देश जानता था कि सोनिया गांधी को ही अध्यक्ष पद पर बने रहना होगा, या फिर गांधी परिवार में से किसी को। क्योंकि कांग्रेस के पास ऑप्शन बहुत ज्यादा नहीं है। लोग भले ही बहुत मांग कर रहे थे, लेकिन अपना मानना है कि राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से दूरी बनाकर ठीक किया। बिहार का विधानसभा चुनाव सर पर है। पीछे का पीछे पश्चिम बंगाल का चुनाव भी आ रहा है। दोनों ही चुनावों में कांग्रेस की क्या हालत होनी है, किसी से कुछ भी छिपा नहीं है। राहुल गांधी के खाते में वैसे भी कोई कम हार दर्ज नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी अगर फिर से अध्यक्ष पद पर आते, तो आते ही दोनों असफलताएं उनके माथे का ताज बनती। सो, सोनिया गांधी फिर अंतरिम अध्यक्ष घोषित हो गईं। हालांकि बदला कुछ भी नहीं है। सोनिया गांधी का नया कार्यकाल साल भर बाद खत्म होगा। तो कांग्रेस नेतृत्व के असमंसज का यही नजारा अगले साल भी दिखेगा। यह सत्य है कि कांग्रेस की सफलता का संसार उसके शीर्ष नेतृत्व में नीहित है और यह तथ्य भी कि वही नेतृत्व जिम्मेदारियां दूसरों को सौपना भी चाहता है। मगर ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकती। नेतृत्व फिर भी इसे मानने को तैयार नहीं है, तो उसे अपने पथ का संधान करने के लिए नियती पर छोड़ देना चाहिए। वैसे भी साल भर कोई बहुत लंबा वक्त नहीं होता। मंच ऐसा ही फिर सजेगा, इंतजार कीजिए।   

दहेजः कानून ही नहीं, कारगर सामाजिक प्रयास भी हैं जरूरी

केवल कृष्ण पनगोत्रा

कुछ साल पहले पंजाब के साथ लगते जम्मू-कश्मीर के कठुआ में एक महिला सुनीता (काल्पनिक नाम) ने अपने ही पड़ोस में रहने वाली एक महिला गीता (काल्पनिक नाम) की हत्या कर दी थी। कारण कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं था, जमीन-जायदाद का झगड़ा भी नहीं था। कारण यह था कि सुनीता को अपनी बेटी की शादी में दहेज के लिए गहनों की दरकार थी। सुनीता को मालूम था कि गीता के पास सोने के इतने जेवर हैं जिनसे बेटी के लिए जरूरत के गहने बनाए जा सकते हैं। दोनों पड़ोसी थीं, इसलिए सुनीता गीता के घर की कई चीजों की जानकारी रखती थी। 

दहेज के लिए होने वाली यह एक अजीब घटना थी। न बेटी ससुराल गई, न सास-ससुर, न देवर-ननद और न ही पति से बात-तकरार। फिर भी एक हत्या दहेज के लिए कर दी गई। दहेज विरोधी कानून की कोई भी धारा सीधे तौर पर यहां लागू नहीं होती लेकिन बुनियादी कारण तो दहेज ही था।

दहेज के इतिहास का पहला पन्ना यकीनन उसी समय से खुल जाता है जब मनुष्य ने समाज के रूप में रहना सीखा होगा। दहेज का इतिहास बहुत ही प्राचीन है। जैसे-जैसे मनुष्य का सामाजिक विकास होता गया ,दहेज के साथ कई दूसरे आयाम भी जुड़ते गए। विश्व में कोई भी सामाजिक समूह या धर्म शायद ही दहेज से अछूता हो।

सामाजिक बुराई और विधि-विधानः

प्राचीन भारत में जनता दहेज के प्रति उदार थी। लोभ जैसी दृष्टि शायद ही तब रही होगी। लेकिन कालांतर में जैसे-जैसे दहेज के नकारात्मक परिणाम सामने आने लगे, इस पर समाज में चर्चा भी शुरु हुई। कहीं इसके लाभ तो कहीं हानियों पर भी मंथन होने लगा। मघ्यकालीन भारत तक दहेज का मारक स्वरूप सामने नहीं आया था। आम धारणा यही थी कि बेटे तो मां-बाप की जमीन-जायदाद के सदैव वारिस रहने वाले हैं लेकिन बेटियों का घर से खाली हाथ जाना मां-बाप को अपराध की भांति लगता था। दहेज तब तक ससुराल में दुल्हन की आर्थिक हैसियत का पैमाना नहीं था बल्कि माता-पिता का एक नैतिक कर्त्तव्य माना जाता था। दहेज आर्थिक हैसियत के अनुसार दिया जाता जिसका बेटी के ससुराल में शायद ही कोई ऐसा जिक्र होता जिससे कि लड़की को ससुराल में किसी प्रकार की कमतरीं का आभास होता। 

यहां यह भी माना जा सकता है कि मघ्यकालीन भारत में सामाजिक और नैतिक मूल्यों में उतनी गिरावट नहीं थी जितनी कि आधुनिक दौर में देखी जा रही है। आधुनिक भारत में दहेज के प्रति आम लोगों का नजरिया और मानसिकता बदलने लगी। दहेज के कारण लैंगिक असमानता सामने आने लगी। महिलाओं के परिवारिक और सामाजिक स्वाभिमान में कमी देखी जाने लगी। अर्थव्यवस्था में परिवर्तन से समाज में पूंजी, अर्थलाभ और आम जीवन में लोभ की वृत्ति का समावेश होने लगा। सेवाभाव, नैतिक और सामाजिक मूल्यों और धारणाओं में सतत कमी देखी जाने लगी। देखते ही देखते एक छोटी सी सामाजिक बुराई समूचे देश पर हावी हो गई। 

अग्रेजीं राज ने भी देश पर हावी होती इस बुराई को महसूस किया और भारत में अपराध संबंधी विधान में काफी बदलाव किए। भारतीय दंड संहिता, 1860 में धारा 304-बी जोड़कर दहेज मृत्यु को एक दंडनीय अपराध माना गया। स्वतंत्रा के बाद 1961 में ‘दहेज निषेध अधिनियम’ लाया गया। 1983 में ‘वैवाहिक क्रूरता’ के मद्देनजर दंड संहिता 1860 में संशोधन करके 498-ए को जोड़ा गया।

समाज में गिरते मानवीय मूल्यों की प्रवृत्ति से दंड संहिता की धारा 498-ए का दुरुपयोग भी होने लगा। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो को यदि तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो 498-ए का 98 प्रतिशत मामलों में दुरुपयोग भी किया गया है। 498-ए की सर्वाेच्च न्यायालय तक समीक्षा हो चुकी है और माननीय न्यायालय ने इसके दुरुपयोग को स्वीकार भी किया है। 

बाजारवाद का मारक पहलूः

दहेज की बुराई देश के कई क्षेत्रों में कम तो हुई है मगर समूल खात्मे के लिए फिर्फ कानून ही काफी नहीं हैं। जब समाज बाजार के शिकंजे में है और नैतिक-सामाजिक मूल्यों में सतत गिरावट दर्ज की जा रही हो तो भारतीय संदर्भ में कानूनी शिकंजे भी ढीले पड़ जाते हैं। समाज बाजारवाद की मानसिकता का शिकार है। यही मानसिकता दहेज संबंधी कानूनों के आड़े आ रही है। दिखावे की बाजारू अपसंस्कृति के कारण दहेज की पुरातन रीति आज के दौर में मारक रूप ले चुकी है। समाज के हर वर्ग की आर्थिक लिहाज से एक वर्गीय सीमा होती है। बाजर के आकर्षण के वशीभूत हर कोई अपनी वर्गीय आर्थिक सीमा रेखा को पार करने की दिखावटी होड़ में फंसा है। 

कभी-कभी सरकार तक को बाजार और पूंजी के आगे घुटने टेकने पड़े हैं। फरवरी 2017 में दिल्ली सरकार ने एक गेस्ट कंट्रोल आर्डर जारी किया। इसकी एक मिसाल जम्मू-कश्मीर राज्य में भी मिलती है। राज्य में मुफ्ती मुहम्मद सैयद के शासनकाल के दौरान बारात में मेहमानों की संख्या को रोकने के लिए गेस्ट कंट्रोल आर्डर लाया गया था। मगर सामाजिक हैसियत की मानसिकता और बाजार के आगे सरकार को लाचारी के सिवा कुछ हासिल नहीं हो सका। जब सरकार और कानून बेअसर लगने लगें ऐसे हालात में उस कुर्बानी की जरूरत पड़ती है जो सामाजिक और आर्थिक हैसियत की परवाह न करे। 

क्या किया जाए ?:

जब तक सामाजिक जागरूकता, नैतिक और सामाजिक मूल्यों को आज का मनुष्य ग्रहण नहीं कर लेता। जब तक समाज पर अर्थव्यवस्था और बाजारवाद के दुष्प्रभाव को समझ नहीं लेता, तब तक समाज के हाथ में कानून की ताकत किसी काम की नहीं। यहां यह बता देना भी जरूरी है कि दहेज को लेकर बनाए गए कानूनों और समाज के बीच कहीं आज का गलाकाट अर्थशास्त्र भी शामिल है। अजीब हालत है कि 498-ए को दहेज संबंधी क्रूरता से बचाने हेतु जिन महिलाओं के लिए बनाया गया उनके हाथों ही कानून का दुरुपयोग हुआ। सर्वोच्च न्यायालय तक को नए सिरे से व्यवस्था देनी पड़ी। स्पष्ट लग रहा है कि दहेज की कुरीति से लड़ने के लिए सरकारी प्रयासों के साथ-साथ परिवारिक और सामाजिक प्रयासों पर भी जोर दिया जाए। 

बेशक शिक्षा के विस्तार और जागरूकता के चलते युवा वर्ग समाज में फैली दुर्भाग्यपूर्ण परंपराओं का विरोध कर रहे हैं। लेकिन बाजार की शक्ति ने जो चलन पैदा किए हैं उनसे युवाओं के हौसले पस्त भी हो रहे हैं। ऐसे में समाज, खासकर सामाजिक संगठनों का यह दायित्व बनता है कि दहेज का विरोध करने वाले युवाओं और उनके मां-बाप को सम्मान दिया जाए। परिवार और समाज के ऐसे लोगों को हो सके तो ईनाम व सम्मान पत्र दे कर समाज में उनका मान बढ़ाया जाए। कुरीति का विरोध ही कुरीति को हतोत्साहित करता है। ऐसे लोगों को समाज में शाबासी मिलनी चाहिए जो कुरीतियों से लड़ने का हौसला दिखाएं। जब तक ऐसे क्रांतिकारी लोगों का समाज मिलकर सम्मान नहीं करता, बेटियां दहेज और लोभ की बलि चढ़ती रहेंगी। 

मदर टेरेसाः सचमुच वो मां थी

मदर टेरेसा जयन्ती-26 अगस्त 2020 पर विशेष
  -ःललित गर्ग:-

सचमुच वे मां थी। माँ शब्द जुबान पर आते ही सबसे पहले मदर टेरेसा का नाम आता है। कलियुग में वे मां का एक आदर्श प्रतीक थी जो आज भी प्रेम की भांति सभी के दिलों में जीवित हैं। माँ दुनिया का सबसे अनमोल शब्द है। एक ऐसा शब्द जिसमें सिर्फ अपनापन, सेवा, समर्पण, दया, करूणा और प्यार झलकता है। मदर टेरेसा का मानवता के प्रति योगदान पूरी दुनिया जानती है। इसके साथ ही यह आधुनिक संत बीमार और असहाय लोगों के प्रति अपने करूणामयी व्यवहार के लिए भी जानी जाती हैं। लेकिन जब हम उनके बारे में बात करते हैं तो हम उनके सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक कार्य को याद करते हैं, जो थी कुष्ठता के कलंक के खिलाफ उनकी लड़ाई। कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के प्रति हर जगह भेदभाव देखा गया था, लेकिन मदर टेरेसा ने उनके साथ अपनों जैसा व्यवहार किया। इस तरह की उनकी दया और करूणा की भावना ने दुनिया का एक सीख दी है।
‘शांति की शुरुआत मुस्कुराहट से होती है।’ इस विचार में विश्वास रखने वाली मदर टेरेसा यानी एग्नेस गोंझा बोयाजीजू का जन्म यूगोस्लाविया के एक साधारण व्यवसायी निकोला बोयाजीजू के घर 26 अगस्त 1910 में हुआ था। वह 18 वर्ष की आयु में 1928 में भारत के कोलकाता शहर आईं और सिस्टर बनने के लिए लोरेटो कान्वेंट से जुड़ीं और इसके बाद अध्यापन कार्य शुरू किया। उन्होंने 1946 में हुए सांप्रदायिक दंगे के दौरान अपने मन की आवाज पर लोरेटो कान्वेट की सुख सुविधा छोड़ बीमार, दुखियों और असहाय लोगों के बीच रह कर उनकी सेवा का संकल्प लिया। उन्होंने एक दशक तक कोलकाता के झुग्गी में रहने वाले लाखों दीन दुखियों की सेवा करने के बाद वहां के धार्मिक स्थल काली घाट मंदिर में एक आश्रम की शुरुआत की। उस वक्त उनके पास सिर्फ पांच रुपये ही थे लेकिन उनका आत्मबल ही था जिससे उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की शुरुआत की और आज 133 देशों में इस संस्था की 4,501 सिस्टर मदर टेरेसा के बताए मार्ग का अनुसरण कर लोगों को अपनी सेवाएं दे रही हैं।
 मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’ के नाम से आश्रम खोले। ‘निर्मल हृदय’ का ध्येय असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों का सेवा करना था जिन्हें समाज ने तिरस्कृत कर दिया हो। ‘निर्मला शिशु भवन’ की स्थापना अनाथ और बेघर बच्चों की सहायता के लिए हुई। समाज के सबसे दलित और उपेक्षित लोगों के सिर पर अपना हाथ रख कर उन्होंने उन्हें मातृत्व का आभास कराया और न सिर्फ उनकी देखभाल की बल्कि उन्हें समाज में उचित स्थान दिलाने के लिए भी प्रयास शुरू किया। सच्ची लगन और मेहनत से किया गया काम कभी असफल नहीं होता, यह कहावत मदर टेरेसा के साथ सच साबित हुई। उनके आश्रम का दरवाजा हर वर्ग के लोगों के लिए हमेशा खुला रहता था। उन्होंने अपने कार्यक्रम के जरिए गरीब से गरीब और अमीर से अमीर लोगों के बीच भाईचारे और समानता का संदेश दिया था। उन्होंने किसी भी धर्म के लोगों के बीच कोई भेद नहीं किया।
मदर टेरेसा ने भारत में कार्य करते हुए यहां की नागरिकता के साथ सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्राप्त (1980) किया। समाज में दिए गए उनके अद्वितीय योगदान की वजह से उन्हें पद्मश्री (1962), नोबेल शांति पुरस्कार (1979) और मेडल ऑफ फ्रीड़ा (1985) प्रदान किए गए। उन्होंने भारत के साथ-साथ पूरे विश्व में अछूतों, बीमार और गरीबों की सेवा की। मदर ने नोबेल पुरस्कार की धन-राशि को भी गरीबों की सेवा के लिये समर्पित कर दिया।
 युगों से भारत इस बात के लिये धनी रहा है कि उसे लगातार महापुरुषों का साथ मिलता रहा है। इस देश ने अपनी माटी के सपूतों का तो आदर-सत्कार किया ही है लेकिन अन्य देशों के महापुरुषों को न केवल अपने देश में बल्कि अपने दिलों में भी सम्मानजनक स्थान दिया और उनके बताए मार्गों पर चलने की कोशिश की है। हमारे लिए मदर टेरेसा भी एक ईश्वरीय वरदान थीं। भारतीय जनमानस पर अपने जीवन से उदाहरण के तौर पर उन्होंने ऐसे पदचिन्ह छोड़े हंै, जो सदियों तक हमें प्रेरणा एवं पाथेय प्रदत्त करते रहेंगे। क्या जात-पांत, क्या ऊंच-नीच, क्या गरीब-अमीर, क्या शिक्षित-अनपढ़, इन सभी भेदभावों को ताक पर रख कर मदर ने हमें यह सिखाया है कि हम सभी इंसान हैं, ईश्वर की बनाई हुई सुंदर रचना हैं और उनमें कोई भेद नहीं हो सकता। उनका विश्वास था कि अगर हम किसी भी गरीब व्यक्ति को ऊपर उठाने का प्रयत्न करेंगे तो ईश्वर न केवल उस गरीब की बल्कि पूरे समाज की उन्नति के रास्ते खोल देगा। वे अपने सेवा कार्य को समुद्र में सिर्फ बूंद के समान मानती थीं। वह कहती थीं, ‘मगर यह बूंद भी अत्यंत आवश्यक है। अगर मैं यह न करूं तो यह एक बूंद समुद्र में कम पड़ जाएगी।’ सचमुच उनका काम रोशनी से रोशनी पैदा करना था।
मदर टेरेसा ने पटना के होली फॅमिली हॉस्पिटल से आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गई, जहां वह गरीब बुजुर्गों की देखभाल करने वाली संस्था के साथ जुड़ गयी। उन्होंने मरीजों के घावों को धोया, उनकी मरहमपट्टी की और उनको दवाइयां दीं। धीरे-धीरे उन्होंने अपने कार्य से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
मदर टेरेसा ने समय-समय पर भारत एवं दुनिया के ज्वंलत मुद्दों पर असरकारक दखल किया, भ्रूण हत्या के विरोध में भी सारे विश्व में अपना रोष दर्शाया एवं अनाथ-अवैध संतानों को अपनाकर मातृत्व-सुख प्रदान किया। मदर शांति की पैगम्बर एवं शांतिदूत महिला थीं, वे सभी के लिये मातृरूपा एवं मातृहृदया थी। परिवार, समाज, देश और दुनिया में वह सदैव शांति की बात किया करती थीं। विश्व शांति, अहिंसा एवं आपसी सौहार्द की स्थापना के लिए उन्होंने देश-विदेश के शीर्ष नेताओं से मुलाकातें की और आदर्श, शांतिपूर्ण एवं अहिंसक समाज के निर्माण के लिये वातावरण बनाया। कहा जाता है कि जन्म देने वाले से बड़ा पालने वाला होता है। मदर टेरेसा ने भी पालने वाले की ही भूमिका निभाई। अनेक अनाथ बच्चों को पाल-पोसकर उन्होंने उन्हें देश के लिए उत्तम नागरिक बनाया। ऐसा नहीं है कि देश में अब अनाथ बच्चे नहीं हैं। लेकिन क्या मदर टेरेसा के बाद हम उनके आदर्शों को अपना लक्ष्य मानकर उन्हें आगे नहीं बढ़ा सकते?
मदर टरेसा का जीवन एक खुली किताब की तरह था। उन्होंने अपनी शिष्याओं एवं धर्म-बहनों को भी ऐसी ही शिक्षा दी कि प्रेम की खातिर ही सब कुछ किया जायें। उनकी नजर में सारी मानव जाति ईश्वर का ही प्रतिरूप है। उन्होंने कभी भी अपने सेवा कार्य में धर्म पर आधारित भेदभाव को आड़े नहीं आने दिया। उनके तौर तरीके बड़े ही विनम्र हुआ करते थे। उनकी आवाज में सहजता और विनम्रता झलकती थी और उनकी मुस्कुराहट हृदय की गहराइयों से निकला करती थी। सुबह से लेकर शाम तक वे अपनी मिशनरी बहनों के साथ व्यस्त रहा करती थीं। काम समाप्ति के बाद वे पत्र आदि पढ़ा करती थीं जो उनके पास आया करते थे।
मदर टेरेसा वास्तव में प्रेम और शांति की दूत थीं। उनका विश्वास था कि दुनिया में सारी बुराइयाँ व्यक्ति से पैदा होती हैं। अगर व्यक्ति प्रेम से भरा होगा तो घर में प्रेम होगा, तभी समाज में प्रेम एवं शांति का वातावरण होगा और तभी विश्वशांति का सपना साकार होगा। उनका संदेश था हमें एक-दूसरे से इस तरह से प्रेम करना चाहिए जैसे ईश्वर हम सबसे करता है। तभी हम विश्व में, अपने देश में, अपने घर में तथा अपने हृदय में शान्ति ला सकते हैं। उनके जीवन और दर्शन के प्रकाश में हमें अपने आपको परखना है एवं अपने कर्तव्य को समझना है। तभी हम उस महामानव की जन्म जयन्ती मनाने की सच्ची पात्रता हासिल करेंगे एवं तभी उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि समर्पित करने में सफल हो सकेंगे।

सावन और साजन


घोर घटाएं जब घिरने लगती है,
तुम्हारी याद मुझे आने लगती है।
रिम झिम रिम झिम जब बादल बरसे,
मिलन की आस सताने लगती हैं।।

साथ न हो सावन में साजन का,
दिल में घुटन सी होने लगती है।
बिन साजन सावन की भीगी राते,
मुझको दुश्मन सी लगने लगती है।।

दमकती है दामिनी जब नभ में,
मुझको डर लगने लगता है।
कही ये मुझ पर न गिर जाए,
ऐसा आभास होने लगता है।।

होती हवा से आहट द्वार पर,
ऐसा भ्रम मुझे होने लगता है।
आए होगे साजन मेरे द्वार पर,
फिर मन मुस्कराने लगता है।।

बिन साजन के सावन सूखा,
भले ही बादल बरसते हो।
ऐसी बारिश का क्या है लाभ
जब नैन साजन के लिए तरसते हो।।

पड़ती है जब नन्ही नन्ही बूंदे,
तन सिहरने मेरा लगता है।
कैसे समझाऊं मै इस मन को,
मुझको मुझसे डर लगने लगता है।।

आर के रस्तोगी

कश्मीरी नेताओं से सीधा संवाद जरुरी


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

जम्मू-कश्मीर की छह प्रमुख पार्टियों ने एक बैठक में यह मांग की है कि धारा 370 और 35 को वापस लाया जाए और जम्मू-कश्मीर को वापस राज्य का दर्जा दिया जाए। जो नेता अभी तक नजरबंद हैं, उनको भी रिहा किया जाए। मांगे पेश करनेवाली पार्टियों में कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल हैं। नजरबंद और मुक्त हुए नेता ऐसी मांगें रखें, यह स्वाभाविक है। अब फारुक अब्दुल्ला और मेहबूबा मुफ्ती यदि फिर से चुने जाएं तो क्या वे उप-राज्यपाल के मातहत लस्त-पस्त मुख्यमंत्री होकर काम कर सकेंगे ? यों भी गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा था कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा फिर से मिल सकता है। मैं तो समझता हूं कि कश्मीरी नेताओं को राज्य के दर्जे की वापसी के लिए जरुर संघर्ष करना चाहिए लेकिन यह तभी भी संभव होगा जबकि सारे नेताओं की रिहाई के बाद भी कश्मीर की घाटी में शांति बनी रहे। यदि राज्य का दर्जा कश्मीर को वापस मिल जाता है तो वह भी उतना ही शक्तिशाली और खुशहाल बन सकता है, जितने कि देश के दूसरे राज्य हैं। लद्दाख के अलग हो जाने से प्रशासनिक क्षमता भी बढ़ेगी और कश्मीर को मिलनेवाली केंद्रीय सहायता में भी वृद्धि होगी। जहां तक धारा 370 की बात है, वह तो कभी की खोखली हो चुकी थी। जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल जितना ताकतवर होता था, उतना किसी भी राज्य का नहीं होता था। उस धारा का ढोंग बनाए रखने से बेहतर है, अन्य राज्यों की तरह रहना। धारा 35 ए के जैसी धाराओं का पालन नगालैंड और उत्तराखंड- जैसे राज्यों में भी होता है। कश्मीर तो पृथ्वी पर स्वर्ग है। वह वैसा ही बना रहे, यह बेहद जरुरी है। उसे गाजियाबाद या मूसाखेड़ी नहीं बनने देना है। इसीलिए अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि कश्मीर का हल इंसानियत और कश्मीरियत के आधार पर ही होगा। कश्मीर की कश्मीरियत बनी रहे और वह अन्य प्रांतों की तरह पूरी शांति और आजादी में जी सके, यह देखना ही कश्मीरी नेताओं के लिए उचित है। उन्हें पता है कि हिंसक प्रदर्शन और आतंकवाद के जरिए हजार साल में भी कश्मीर को भारत से अलग नहीं किया जा सकता। भारत सरकार को भी चाहिए कि वह सभी कश्मीरी नेताओं को रिहा करे और उनसे स्नेहपूर्ण संवाद कायम करे।

कांग्रेस में नेतृत्व के प्रश्न पर मोह क्यों?

ः ललित गर्गः

कांग्रेस पार्टी में लोकतांत्रिक भावना से उसके नेतृत्व पर लम्बे समय से छाये अनिश्चय एवं अंधेरों को लेकर भीतर-ही-भीतर एक कुरुक्षेत्र बना हुआ है, इस कुरुक्षेत्र में हर अर्जुन के सामने अपने ही लोग हैं जिनसे वह लड़ रहा है, हर अर्जुन की यही नियति है। ऐसी ही नियतियों का उसे बार-बार सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस पार्टी को जीवंत करने वाले युवा, अनुभवी, कांग्रेसी नेताओं एवं गांधी परिवार के बीच खींचतान की एक झलक तब मिली थी जब कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखकर देश के सर्वोच्च राजनीतिक दल के नेतृत्व को सुनिश्चित करने की आवश्यकता व्यक्त की।  इसी पत्र पर सोमवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक पार्टी के हालिया इतिहास का सर्वाधिक गरमा-गरमी वाला घटनाक्रम बन गया। बावजूद इसके, यह सवाल बना ही रहा कि इससे पार्टी को मिला क्या? बैठक के अंत में सोनिया गांधी ‘आहत होने के बावजूद’ थोड़े और समय तक अंतरिम अध्यक्ष बने रहने के लिए मान गईं। इस बैठक में स्वतंत्र सोच रखने वाले कांग्रेसी नेताओं पर नाराजगी जताई गयी, नेतृत्व परिवर्तन की मांग करने वाले 23 नेताओं की मंशा एवं नीयत पर सवाल भी उठाये गये थे, इन अलोकतांत्रिक स्थितियों को लेकर कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आक्रोशित होकर अपने त्याग-पत्र भी प्रस्तुत किये, कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने सोशल मीडिया पर ट्वीट कर अपनी नाराजगी भी व्यक्त कर दी थी, भले ही बाद में अपनी सफाई देते हुए अपना ट्वीट हटा दिया था। लेकिन कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी के बयान के बाद काफी आक्रामक शोर एवं सुर उठे, वे पार्टी की चिन्ताजनक स्थिति की गवाही देते हैं। पार्टी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। उससे पार्टी के भविष्य पर सहज ही अनुमान लगाया जाना गलत नहीं होगा। सवाल यह है कि पार्टी के भीतर ऐसी नौबत क्यों आयी? देश की सबसे पुरानी एवं ताकतवर पार्टी होकर आज इतनी निस्तेज क्यों है? देश की राजनीति की दिशा एवं दशा तय करने वाली पार्टी हाशिये पर क्यों आ गयी है? क्यों उसकी यह दुर्दशा हुई? कांग्रेसी नेताओं के बीच नेतृत्व के प्रश्न पर जैसी उठापटक देखने को मिल रही है वह अभूतपूर्व है, उसने पार्टी के पुनर्जीवन की संभावनाओं को एक बार फिर धुंधला दिया है।
एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर हुई कार्यसमिति की बैठक बिना किसी ठोस निर्णय के सम्पन्न हो गयी। इस बैठक में भी राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने का मान-मनव्वल का कार्यक्रम सफल नहीं हुआ और बात गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को ही अध्यक्ष बनाने की ओर बढ़ी तो पार्टी में दो घडे़ बंटे हुए स्पष्ट दिखे। एक बड़ा प्रश्न उभरा है कि क्या हर राज्य में कम से कम दो गुटों में बंटे इन नेताओं के बीच से पार्टी के शीर्ष पद के लिए कोई एक सर्वमान्य नाम निकालना संभव होगा? क्या नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का व्यक्ति प्रभावी एवं सक्षम तरीके से नेतृत्व संभाल पाएगा? क्योंकि राहुल गांधी बिना अध्यक्ष बने ‘सुपर पावर’ और ‘सुपर बाॅस’ बने रहना चाहते हैं। पार्टी पर वे अपना नियंत्रण चाहते हैं। ऐसी स्थिति में कौन बाहर का प्रभावी एवं स्वामिमानी नेता राहुल की अधीनता स्वीकारने को तैयार होगा? उसके लिये कैसे एवं किस तरह काम करना सहज एवं सुगम होगा?
आखिरकार सोनिया गांधी को ही पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनाकर यह बैठक पार्टी की एक साल पहले वाली स्थिति में ही खड़ी हो गयी है। यह बैठक ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए यथास्थिति कायम रखने के पक्ष में सहमति बना पायी है। इसका यह भी अर्थ है कि राहुल गांधी बिना कोई जिम्मेदारी संभाले पार्टी को पहले की तरह पिछले दरवाजे से संचालित करते रहना चाहते हैं। शायद सोनिया गांधी भी यही चाहती हैं। सोनिया का अपना पद छोड़ने की पेशकश करना महज एक दिखावा था या पार्टी के नाराज नेताओं के बीच पार्टी की पुरानी व्यवस्था कायम रखने पर सहमति बनाना। आखिरकार ऐसा ही हुआ, लेकिन इससे तो कांग्रेस की जगहंसाई ही हुई। आमजनता अब इतनी भी भोली नहीं है, वह सब समझती है, आखिर इससे हास्यास्पद और क्या हो सकता है कि नेतृत्व के मसले को हल करने के लिए बैठक बुलाई जाए और उसमें इस पर कोई निर्णायक स्थिति न बने? यदि नेतृत्व के मसले को हल ही नहीं करना था तो फिर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई ही क्यों गई? क्योंकि देश की जनता को बार-बार गुमराह किया जाता है, दिग्भ्रम की स्थिति में रखा जाता है?
यह साफ-साफ समझ आता है कि कांग्रेस का गांधी परिवार के बगैर गुजारा नहीं हो सकता, लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि परिवार ही यह तय न कर पाए कि पार्टी की कमान किस सदस्य को सौंपी जाए? क्या इस असमंजस का कारण यह है कि पार्टी नेताओं का एक गुट राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं? जो भी हो, यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि सोनिया गांधी उस वक्त का इंतजार कर रही हैं जब पार्टी के सभी प्रमुख नेता एक स्वर से यह मांग करने लगें कि राहुल गांधी के फिर पार्टी अध्यक्ष बने बगैर कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं। इसीलिये लम्बे समय से ये अनिर्णय की स्थितियां बनी हुई रखी जा रही है, लेकिन कब तक? मुश्किल यह भी है कि ऐसा होना आसान नहीं, क्योंकि पार्टी की गुटबाजी सबके सामने आ गई है। कांग्रेस का एक खेमा जिस तरह यह साबित करने में लगा हुआ है कि पार्टी के बड़े नेता राहुल गांधी की हां में हां मिलाने से इन्कार करके भाजपा के मन मुताबिक काम कर रहे हैं उससे यही पता चलता है कि सोनिया और राहुल समर्थक नेताओं के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हो गई है। चूंकि दोनों ओर से तलवारें खिंच गई हैं इसलिए आने वाले दिनों में यह खाई और अधिक गहरी ही होनी है। आखिर इस हालत में कांग्रेस रसातल की ओर नहीं जाएगी तो किस ओर जाएगी?
क्या गांधी परिवार के बाहर नेता के नाम पर सहमति बनी तो एक बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी उसकी छत्रछाया में फल-फूल पाएगी? पिछली आधी सदी से कांग्रेस का जो हाल बना हुआ है उसे देखते हुए नेहरू-गांधी परिवार के बगैर कांग्रेस की कल्पना करना बहुत कठिन है। कांग्रेस को भाजपा के सामने जिंदा रहना है तो उसे पार्टी मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त और चैबीसों घंटे, बारहों मास सक्रिय रखने वाला नेतृत्व अपनाना होगा। अन्यथा कांग्रेस पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट और गहराता जायेगा। इन जटिल होती परिस्थितियों के बीच पार्टी फिर से मूल्यों पर लौटकर अपने आपको एक नए दौर की पार्टी के तौर पर पुनर्जीवित कैसे कर पाएंगी? गांधी परिवार पर निराशाजनक निर्भरता पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है, दूसरी बड़ी चुनौती केन्द्रिय नेतृत्व की है। लेकिन किसी वजह से पार्टी अब भी आगे की दिशा में बड़ा कदम उठाने से कतरा रही है, जिससे पार्टी की टूटती सांसों को नया जीवन मिलने की संभावनाओं पर लगातार विराम लगता जा रहा है।
गांधी परिवार के प्रति निष्ठाशील एवं स्वतंत्र सोच के नेताओं के बीच लम्बे अरसे से खींचतान चल रही है। जिससे पार्टी उभरने के बजाय रसातल की ओर बढ़ती जा रही है। इसका मन्तव्य क्या यह निकाला जा सकता है कि गांधी परिवार के नेतृत्व में परिपक्वता एवं राजनीतिक जिजीविषा का अभाव है। जबकि पार्टी के पास लम्बा राजनीतिक अनुभव भी है और विरासत भी। उसे तो ऐसा होना चाहिए जो पचास वर्ष आगे की सोच रखती हो पर वह पांच दिन आगे की भी नहीं सोच पा रही हैं। केवल खुद की ही न सोचें, परिवार की ही न सोचें, जाति की ही न सोचें, पार्टी की ही न सोचंे, राष्ट्र की भी सोचें। जब पार्टी राष्ट्र की सोचने लगेगी तो पार्टी की मजबूती की दिशाएं स्वयं प्रकट होने लगेगी। लेकिन ऐसा न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस दुर्भाग्य के दंश को मिटाने के लिये पार्टी में स्वतंत्र सोच एवं कार्यशैली को प्राथमिकता देनी ही होगी। कांग्रेस को असमंजस, अन्दरूनी कलह एवं उठापटक से उबरना होगा। वास्तव में पार्टी का भला तब तक नहीं हो सकता जब तक वह केन्द्रीय नेतृत्व के सवाल को ईमानदारी से हल नहीं करती। पार्टी को सोच के कितने ही हाशिये छोड़ने होंगे। कितनी लक्ष्मण रेखाएं बनानी होंगी। सुधार एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। महान् अतीत महान् भविष्य की गारण्टी नहीं होता। पार्टी के सुधार के प्रति संकल्प को सामूहिक तड़प बनाना होगा। पार्टी के चरित्र पर उसकी सौगन्धों से ज्यादा विश्वास करना होगा। कौन समझाये कि जमाना बदल चुका है अब पारिवारिक मोह, सत्ता की लालसा और उसी दौड़ में शामिल होकर जनता के दिलों को नहीं जीता जा सकता। सोच बदलनी होगी, जनता पर विश्वास कायम करना होगा, वरना पार्टी के पुनर्जीवन की संभावनाएं धुंधलाती रहेगी।

हिंदी में बोलने पर सजा ?


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

आयुष मंत्रालय के सचिव राजेश कोटेचा ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। द्रमुक की नेता कनिमोझी ने मांग की है कि सरकार उन्हें तुरंत मुअत्तिल करे, क्योंकि उन्होंने कहा था कि जो उनका भाषण हिंदी में नहीं सुनना चाहे, वह बाहर चला जाए। वे देश के आयुर्वेदिक वैद्यों और प्राकृतिक चिकित्सकों को संबोधित कर रहे थे। इस सरकारी कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों के 300 लोग भाग ले रहे थे। उनमें 40 तमिलनाडु से थे। जाहिर है कि तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी आंदोलन इतने लंबे अर्से से चला आ रहा है कि तमिल लोग दूसरे प्रांतों के लोगों के मुकाबले हिंदी कम समझते हैं। यदि वे समझते हैं तो भी वे नहीं समझने का दिखावा करते हैं। ऐसे में क्या करना चाहिए ? कोटेचा को चाहिए था कि वे वहां किसी अनुवादक को अपने पास बिठा लेते। वह तमिल में अनुवाद करता चलता, जैसा कि संसद में होता है। दूसरा रास्ता यह था कि वे संक्षेप में अपनी बात अंग्रेजी में भी कह देते लेकिन उनका यह कहना कि जो उनका हिंदी भाषण नहीं सुनना चाहे, वह बाहर चला जाए, उचित नहीं है। यह सरकारी नीति के तो विरुद्ध है ही, मानवीय दृष्टि से भी यह ठीक नहीं है। महात्मा गांधी और डाॅ. राममनोहर लोहिया अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के प्रणेता थे लेकिन गांधीजी और लोहियाजी क्रमशः ‘यंग इंडिया’ और ‘मेनकांइड’ पत्रिका अंग्रेजी में निकालते थे। उनके बाद इस आंदोलन को देश में मैंने चलाया लेकिन मैं जवाहरलाल नेहरु विवि और दिल्ली में विवि में जब व्याख्यान देता था तो मेरे कई विदेशी और तमिल छात्रों के लिए मुझे अंग्रेजी ही नहीं, रुसी और फारसी भाषा में भी बोलना पड़ता था। हमें अंग्रेजी भाषा का नहीं, उसके वर्चस्व का विरोध करना है। राजेश कोटेचा का हिंदी में बोलना इसलिए ठीक मालूम पड़ता है कि देश के ज्यादातर वैद्य हिंदी और संस्कृत भाषा समझते हैं लेकिन तमिलभाषियों के प्रति उनका रवैया थोड़ा व्यावहारिक होता तो बेहतर रहता। उनका यह कहना भी सही हो सकता है कि कुछ हुड़दंगियों ने फिजूल ही माहौल बिगाड़ने का काम किया लेकिन सरकारी अफसरों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी मर्यादा का ध्यान रखें। यों भी कनिमोझी और तमिल वैद्यों को यह तो पता होगा कि कोटेचा हिंदीभाषी नहीं हैं। उन्हीं की तरह वे अहिंदीभाषी गुजराती हैं। उनको मुअत्तिल करने की मांग बिल्कुल बेतुकी है। यदि उनकी इस मांग को मान लिया जाए तो देश में पता नहीं किस-किस को मुअत्तिल होना पड़ेगा। कोटेचा ने कहा था कि मैं अंग्रेजी बढ़िया नहीं बोल पाता हूं, इसलिए मैं हिंदी में बोलूंगा। जब तक देश में अंग्रेजी की गुलामी जारी रहेगी, मुट्ठीभर भद्रलोक भारतीय भाषा-भाषियों को इसी तरह तंग करते रहेंगे। कनिमोझी जैसी महिला नेताओं को चाहिए कि वे रामास्वामी नाइकर, अन्नादुराई और करुणानिधि से थोड़ा आगे का रास्ता पकड़ें। तमिल को जरुर आगे बढ़ाएं लेकिन अंग्रेजी के मायामोह से मुक्त हो जाएं।

महिलाओं के साथ भेदभाव करता है समाज


नरेन्द्र सिंह बिष्ट

नैनीताल, उत्तराखंड


भारत में हिंसा के सबसे अधिक केस महिलाओं से ही जुड़े होते हैं। जिनका रूप कुछ भी हो सकता है। हालांकि पुरूष प्रधान इस देश में हमेशा महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता रहा है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कमतर आंका जाता है। उसे कमज़ोर, असहाय और अबला समझ कर उसके साथ कभी दोयम दर्जे का तो कभी जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। पुरुषवादी समाज उसे बेटी के रूप में पैतृक संपत्ति से भी वंचित रखना चाहता है। जबकि परिवार में बेटी एक दायित्व के रूप में होती है। इसके बावजूद घर के लड़कों से उसे कमतर समझा जाता है। उसका मुकाम पुरूषों से नीचे और अधीनस्थ ही माना जाता है। इसीलिए लड़कियों को शिक्षा के साथ उसके निर्णय क्षमता का समाज में कोई स्थान नहीं था। उसका सम्मान किसी के लिए कोई अहमियत नहीं रखता है। सवाल यह उठता है कि महिलाओं के प्रति समाज की सोच नकारात्मक क्यों है? कचरे के ढ़ेर में फेंके जाने वाले नवजातों में 97 प्रतिशत लड़कियां ही क्यों होती हैं?

भारत में जन्म से ही महिला हिंसा के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं। शहर हो या गांव, शिक्षित वर्ग हो या अशिक्षित, उच्च वर्ग हो या निम्न आर्थिक वर्ग, पैसे वाले हों अथवा दो वक्त की रोटी का मुश्किल से जुगाड़ करने वाला परिवार, संगठित हो या असंगठित क्षेत्र सभी जगह महिला हिंसा की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष स्वरूप देखने को मिल जाता है। सभ्य और विकसित समाज में जहाँ आज महिलाएं अपने अस्तित्व की जंग लड़ने में सक्षम हो रही हैं, वहीं इस समाज में उन पर सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य व आर्थिक हिंसा के प्रत्यक्ष उदाहरण प्रतिदिन देखने या सुनने को मिल ही जाते हैं। सच तो यह है कि यदि महिला अपराधों की जानकारी अखबारों में छपनी बंद हो जाये तो देश के सभी प्रमुख अख़बार 3-4 पन्नों में ही सिमट कर रह जायेंगे।

नारी सुरक्षा की दृष्टि से देखें तो देश की राजधानी दिल्ली महिलाओं के लिए सर्वाधिक असुरक्षित राज्यों की श्रेणी में है जबकि उत्तराखण्ड उन चंद राज्यों में एक है, जिसे महिलाओं के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित राज्य माना जाता है। हालांकि सत्य का एक दूसरा पहलू यह भी है कि महिलाओं को रोज़गार उपलब्ध कराने में उत्तराखंड काफी पीछे है जबकि इस श्रेणी में दिल्ली काफी आगे है। रोज़गार देने के मामले में दिल्ली में जहां महिला और पुरुष में कोई अंतर नहीं देखा जाता है वहीं उत्तराखंड में यह प्रवृति काफी प्रभावी है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिर्पोट के अनुसार 29 राज्यों की सूची में महिला सुरक्षा में उत्तराखण्ड देश में 13वें पायदान पर है, जबकि शिक्षा एवं स्वास्थ के मुद्दे पर देश भर में यह 10वें पायदान पर है। इस आधार पर यदि हम आंकलन करें तो स्पष्ट है कि भले ही उत्तराखंड में महिलाओं को पुरुषों से कमतर आंका जाता है, लेकिन समाज में उसके शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता की जाती है और उसकी देखभाल करने का प्रयास किया जाता है। ऐसे में यदि उत्तराखंड समाज की महिलाएं पहल करें तो समाज में उन्हें बराबरी का हक़ मिल सकता है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से भारत मातृ मृत्यु दर में दुनिया में दूसरे नम्बर पर है। जो इस बात को दर्शाता है कि आज भी भारतीय समाज में महिलाओं को परिवार के भीतर पोषण संबंधी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। गर्भ धारण से लेकर प्रसव के अंतिम अवस्था तक उसे घर के सारे काम करने होते हैं जबकि इस तुलना में उसे बहुत कम पौष्टिक आहार प्राप्त होता है। जिससे न केवल उसके अंदर खून की कमी होती है बल्कि माँ और बच्चे दोनों की जान को खतरा बना रहता है। गर्भावस्था में एक महिला को सबसे अधिक मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहने की आवश्यकता होती है। लेकिन अफ़सोस कि बात यह है कि ज़्यादातर महिलाएं बेटी के जन्म का सोच सोच कर तनाव में रहती है क्योंकि जो महिलाएं अधिक से अधिक बेटे को जन्म देती हैं उन्हें बेटी जन्म देने वाली माताओं से अधिक सम्मान प्राप्त होता है। जो हमारे समाज में बेटे और बेटी के प्रति संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। 

महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव ज़्यादातर कम साक्षरता दर वाले राज्यों में अधिक देखने को मिलते हैं। जिन राज्यों में साक्षरता दर अधिक है वहां  भेदभाव और हिंसा के मामले कम दर्ज हुए हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण केरल और लक्षद्वीप है जहां महिलाओं की बेहतर सामाजिक और आर्थिक स्थिति के पीछे प्रमुख कारक साक्षरता है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में महिला शिक्षा के लिए मुख्य बाधा स्कूलों में लड़कियों के लिए पर्याप्त सुविधाओं की कमी का होना है। देश के कई छोटे शहरों में माहवारी के समय लड़कियाँ स्कूल नहीं जाती हैं। धीरे धीरे यही प्रवृति उसे स्कूल से दूर करती चली जाती है। हालांकि इस संबंध में कई राज्य सरकारों द्वारा सकारात्मक कदम उठाते हुए स्कूलों में सेनेट्री नैपकिन उपलब्ध कराने की योजना चलाई जा रही है, जो लड़कियों के ड्राप आउट के आंकड़ा को कम करने में कारगर सिद्ध हो रहा है। 

उत्तराखण्ड शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भले ही 10वें पायदान पर क्यों न हो, लेकिन आज भी पर्वतीय महिलाएं सरकार की अधिकांश योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाती हैं। कई महिलाएं जानकारियां होने के बावजूद लाभ पाने की प्रक्रिया से अभिनज्ञ होने के कारण इससे वंचित रह जाती हैं। वहीं शिक्षा प्राप्त करने के मामले में लड़कियाँ इंटर तक ही पहुँच पाती हैं। इसके आगे पारिवारिक ज़िम्मेदारी के कारण उन्हें उच्च शिक्षा छोड़नी पड़ती है। इंटर के बाद स्नातक और उससे आगे की शिक्षा तक बहुत कम लड़कियों को अवसर प्राप्त हो पाता है। ज़्यादातर लड़कियों को शादी के बाद अपनी इच्छा के विरुद्ध पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। हालांकि उन्हें अवसर मिले तो वह भी अपना हुनर और कौशल का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकती हैं। ऐसी कई लड़कियों की मिसाल है जिन्होंने अवसर मिलने पर सेना, विज्ञान, अर्थशास्त्र, डॉक्टर और संघ लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा पास कर अपनी क्षमता का लोहा मनवाया है।

बहरहाल महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के लिए केवल समाज को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। भेदभाव की शुरुआत माँ बाप से बेटा और बेटी के बीच अंतर से शुरू होती है। बेटी को कमज़ोर ठहरा कर उसे चहारदीवारी में कैद करने और बेटे को मनमर्ज़ी की आज़ादी देने से होती है। जिसे समाप्त करना स्वयं मां बाप की ज़िम्मेदारी है। भला यह कैसे संभव है कि बेटा अभिमान और बेटी बोझ बन जाये? ज़रूरत है इस संकीर्ण सोच को बदलने की। ज़रूरत है बेटा की तरह ही बेटी को भी सभी अवसर उपलब्ध करवाने की। उसे भी खुले आसमान में उड़ने और अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर देने की। वक्त आ गया है कि अब महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को पूरी तरह से समाप्त किया जाये। 

नगर सेठ की गाड़ी

    दो बैल जुते इस गाड़ी में,

    यह नगर सेठ की गाड़ी है |

    लोगों  का पीछा करती है,

    न उनसे कभी पिछड़ती है|

    कितना भी तेज चले जनता,

    यह साथ साथ में चलती है|

    है बिना रुके ही चढ़ जाती ,

    यह ऊंची बड़ी पहाड़ी है|

    यह नगर सेठ की गाड़ी है|

    गर्दन में घुंघरू बंधे हुए,

    खन खन का शोर मचाते हैं|

    सब नगर सेठ की गाड़ी को ,

    जग में बेजोड़ बताते हैं|

    है बैलों की पहचान अलग,

    लम्बी मूंछें हैं दाढ़ी है|

    यह नगर सेठ की गाड़ी है|

    यह नगर सेठ की गाड़ी जब ,

    चलती ,तो चलती जाती है|

    पड़ते हैं पाँव जहां इसके ,

    पग चिन्ह छोड़ यह आती है|

   यह सीधी नहीं चली अब तक,

   यह चलती तिरछी आड़ी है|

     यह नगर सेठ की गाड़ी है|

       यह सेठ बड़ा व्यापारी है,

       बच्चों से इसकी यारी है|

       बच्चों को आगे ले जाना,

       इस गाड़ी की तैयारी है|

       दम लेगी मंज़िल तक जाकर,

       यह गाडी अभी दहाड़ी है| 

       यह नगर सेठ की गाड़ी है|
  

      बच्चे होते प्रतिभा शाली ,

      बच्चे ही देश बनाते  हैं|

      बच्चों के ओंठों पर आकर,

      ही भाग्य देव मुस्काते हैं |

      मारा जिसने मैदान वही तो,

      होता बड़ा खिलाडी है|

      यह नगर सेठ की गाड़ी है|

मोदी के मंत्रिमंडल से कुछ जाएंगे, तो कुछ नए आएंगे!

कई मंत्रियों के विभाग बदलने और बीजेपी संगठन में भी बड़े बदलाव की तैयारी

निरंजन परिहार

नई दिल्ली। अब वह वक्त आ गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार की टीम में फेरबदल और विस्तार हो जाना चाहिए। वैसे, लोग जो सोचते हैं, प्रधानमंत्री मोदी उसके अनुरूप कम ही करते हैं। फिर भी हालात भी बता रहे हैं कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार का यह महत्वपूर्ण काम अब वे किसी भी वक्त कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए की दूसरी बार सरकार को बने सवा साल से ज्यादा वक्त बीत गया है। जैसा कि माना जा रहा है कि देश में नीतिगत रूप से कई सारे बदलाव किए जाने है, व्यापक पैमाने पर स्वीकृतियां लेनी हैं, जिनके लिए मंत्रिमंडल में कुछ खास जगहों पर खास लोगों की तैनाती जरूरी है। सो, लग रहा है कि मंत्रिमंडल में विस्तार व फेरबदल इसी महीने या अगले महीने की शुरूआत में हो सकता है। सुन रहे हैं कि नीतिन गडकरी को वित्त मंत्रालय दिया जा सकता है और अर्जुन मेघवाल, अनुराग ठाकुर व श्रीपद नाइक जैसे कुछ राज्यमंत्रियों को केबिनेट मंत्री भी बनाया जा सकता है। बीजेपी संगठन से भी कुछ लोगों को सरकार में शामिल किए जाने की खबर है। वहां पर भी खाली पदों को भरे जाने की तैयारी करने को कह दिया गया है।  

दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में सवा साल से भी ज्यादा वक्त के बाद यह पहला फेरबदल और विस्तार होना है। यह काम इसी महीने या अगले महीने की शुरूआत में होने की ज्यादा संभावना लग रही है। क्योंकि प्रधानमंत्री ने अपने स्तर पर कुछ विभागों के कामकाज की समीक्षा रिपोर्ट मंगवाई थी, जिसका उनके स्तर पर आंकलन होने की सूचना है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अलावा प्रशासनिक स्तर पर भी बड़े अधिकारियों ने भी विभिन्न मंत्रालयों में हुए कामकाज की एक प्रशासनिक समीक्षा रिपोर्ट अलग से तैयार की थी। इन अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को उससे भी अवगत करा दिया है। इसीलिए माना जा रहा है कि फेरबदल शीघ्र हो सकता है। वैसे बी बिहार और बंगाल का चुनाव सर पर है। बीजेपी की राजनीति के जानकार बताते हैं कि मंत्रिमंडल के साथ साथ बीजेपी संगठन में भी फेरबदल होगा। लेकिन जब भी होगा, तो दो चार दिनों के अंतराल में ही दोनों में होगा। सूत्र बताते हैं कि या तो मंत्रिमंडल पहले में बदलाव होगा, या बीजेपी की कार्यकारिणी का गठन पहले होगा। दोनों जगहों से लोगों को इधर उधर करना है, उसी के हिसाब से समायोजन किया जाएगा। कुछ नए पदाधिकारी बनेंगे, तो कुछ नए मंत्री। कुछ पदाधिकारी मंत्री बनेंगे, तो कुछ मंत्री पदाधिकारी बनकर अपने अनुभवों से पार्टी को मजबूत करेंगे।

राजस्थान से बीजेपी संगठन के पदाधिकारियों में भूपेंद्र यादव के मंत्री बनने की संभावना बन रही है। अगर यादव मंत्री बने, तो केबिनेट मंत्री ही होंगे। ऐसे में माना जा रहा है कि राजस्थान से किसी एक मंत्री को घर बिठाया जाएगा, क्योंकि फिलहाल राजस्थान में ऐसी कोई बहुत बड़ी राजनीतिक जरूरत नहीं है। तो, जिसकी विदाई होगी, उसमें जोधपुर के गजेंद्र सिंह शेखावत या बाड़मेर को कैलाथ चौधरी हो सकते हैं। कैलाथ चौधरी के बारे में खबर है कि विभागों के कामकाज की प्रशासनिक रिपोर्ट और प्रधानमंत्री की समीक्षा, दोनों में कैलाश चौधरी के कामकाज को प्रभावी नहीं माना गया है। उधर, गजेंद्र सिंह शेखावत को राजस्थान में हाल ही फेल हो चुके ऑपरेशन कमल से जोड़कर देखा जा रहा है। सचिन पायलट की कांग्रेस में बगावत के दौर में शेखावत की टेप में सुनाई दी, संजीवनी क्रेडिट कॉपरेटिव में 900 करोड़ रुपए के घोटाले के आरोप भी लगे और वसुंधरा राजे भी उनके खिलाफ बहुत मुखर होकर पार्टी में खड़ी दिखीं। फिर अर्जुन मेघवाल को राज्यमंत्री से केबिनेट बनाकर बीजेपी अनुसूचित जातियों में उनकी पैरोकार साबित होना चाहती है। इसलिए भी किसी एक को हटाया जाएगा, ऐसा माना जा रहा है। 

बीजेपी के जानकार बताते हैं कि वित्त मंत्रालय में भी फेरबदल की चर्चा है। खबर है कि वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी को वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। मोदी सरकार में जो वरिष्ठ मंत्री हैं, उनमें गडकरी ही ऐसे हैं, जो मंत्रिमंडल के सुरक्षा मामलों की कमेटी के सदस्य नहीं हैं। कांग्रेस से भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया, बीजेपी महासचिव अनिल जैन, पश्चिम बंगाल से सांसद एसएस अहलूवालिया या अर्जुनसिंह में से किन्ही दो को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। लेकिन इनमें से किसी को भी केबिनेट मंत्री बनाए जाने की संभावना कम है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में ग्रामीण विकास, रेल, शहरी विकास आदि मंत्रालयों में फेरबदल की संभावना है। एक से अधिक महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल रहे पीयूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर जैसे कुछ मंत्रियों का कार्यभार हल्का करने के लिए करीब 10 से ज्यादा मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं और कम से कम पांच वर्तमान राज्यमंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार या केबिनेट मंत्री के रूप में प्रमोशन दिया जा सकता है। इसी तरह चुनावी राज्यों बिहार, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारतीय राज्यों से करीब चार या पांच नए मंत्री बनाए जाने की भी चर्चा हैं।

मंत्रिमंडल के साथ साथ बीजेपी में बदलाव की बयार बहती दिखेगी। बीजेपी के जानकार कहते हैं कि कि बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा को अध्यक्ष बने साल भरह होने जा रहा है। लेकिन उनकी टीम नहीं बनी है। वे अमित शाह वाली टीम से ही काम चला रहे हैं। इसलिए बीजेपी की टीम में बड़ा फेरबदल होना है। माना जा रहा है कि सरकार के जिन मौजूदा मंत्रियों की छुट्टी होगी, उन में से कईयों को संगठन में जगह मिल सकती है।  पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक और निर्णय करने वाली बॉड़ी संसदीय बोर्ड में एक महिला सहित चार लोगों को शामिल किया जाना है। जिसमें देवेंद्र फडणवीस का नाम हो सकता हैं।  

राहत इन्दौरी : विवादों के साथ विदाई

उर्दू शायरी के चर्चित शायर डॉ.राहत इन्दौरी की असयम मृत्यु से उनके लाखों चाहने वालों को गहरा धक्का लगा है | कोरोना संक्रमण और हार्टअटैक दोनों एक साथ काल बन कर आये और हिन्दी-उर्दू मंचों  की वाचिक परंपरा के एक बड़े शायर को हमसे असमय छीन ले गए | डॉ.राहत उन विरले शायरों में गिने जा सकते हैं जिन्हें उर्दू मुशायरों और हिन्दी कविसम्मेलनों में समान रूप से पूरी धूम-धाम के साथ   सुना जाता था | इतना ही नहीं इस पीढ़ी के वे एकमात्र ऐसे शायर थे  जिनकी शायरी का मजा प्रत्येक उम्र के लोग एक साथ ले सकते थे, यही कारण है कि लगभग सभी संयोजक राहत साहब को बुलाने के लिए अन्य शायरों की तुलना में बहुत अधिक मानदेय देने को तत्पर रहते थे | वे अपने समय के सबसे मँहगे शायरों में भी गिने जा सकते हैं | आप चाहें तो इन्दौरी जी  से असहमत हो सकते पर उन्हें ख़ारिज नहीं कर सकते | जैसा उन्होंने सोचा वैसा ही लिखा और जैसा लिखा उसे वैसा का वैसा  ही पढ़ा आप कह सकते हैं – बिना एडिट किये हुए |  इस कारण उन्हें कई कवि सम्मेलनों से हाथ भी धोने पड़े, क्यों कि भारतीय जनमानस आज भी यह सोचता और मानता है कि कवि, शायर, साहित्यकारों अर्थात कलाकारों का कोई धर्म, जाति संप्रदाय नहीं होता | वे  इन बंधनों से मुक्त होकर सोच सकते हैं ,समाज को नई दिशा दे सकते हैं सौहार्द, समन्वय का  का मार्ग दिखा सकते हैं | पर राहत जैसे थे वैसे ही थे उन्होंने इस स्थापित धारणा को अस्वीकार किया | वे उन व्यक्तित्वों में से थे जो अपने लिए किसी भी लेकिन, किन्तु, परन्तु के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ते | वे एक विचारधारा या धर्म विशेष के पक्ष में थे और जीवन भर रहे | उन्होंने स्वयं मंच से कई बार स्पष्ट  घोषणा की “मैं जितना कट्टर हिदुस्तानी हूँ उतना ही कट्टर मुसलमान भी हूँ |”

गोधरा में कारसेवकों को जिन्दा जलाए जाने की घटना पर उन्होंने अपने मजहवी -भाइयों का खुलकर बचाव किया उनके पक्ष में यह शेर पढ़ा-

जिनका मसलक़ है रोशनी का सफर वह चरागों को क्यों जलाएंगे,

 वह जो अपने मुर्दों को भी नहीं जलाते वो जिंदो को क्या जलाएंगे ।

ये बात अलग है कि बाद में न्यायालय ने गोधरा में ट्रेन में लोगों को जिन्दा जलाने वालों को सजाएँ दीं कुछ को तो आजीवन कारावास भी हुआ |

उनके चाहने वालों को इस बात का भी दुःख रहेगा कि वे अपनी प्रतिभा से मानवता का पथ प्रदर्शित करने वाली महान रचनाओं को या तो रच नहीं सके या रची भीं तो उन्हें जनता तक पहुँचा नहीं पाए | वे एक धर्म,एक पक्ष के होकर ही जिए | उनकी रचनाओं में जहाँ-जहाँ  दिन्दुस्तान पर गर्व किया गया है,”मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना” वह महात्मा गाँधी का हिंदुस्तान न होकर मुग़ल कालीन हिंदुस्तान है जिसके सुलतान/शासक  मुसलमान हैं और वे स्वयं को प्राचीन भारतीय पूर्वजों के स्थान पर मुगलों से जोड़ कर रचानाएँ लिखते थे | “हमारे ताज अजायब घरों में रक्खे हैं |” पर उनका प्रस्तुतीकरण इतना मोहक और प्रभावी  था कि जिन पंक्तियों में  में हिन्दुओं के लिए अप्रिय और धमकी भरी बातें (अबके जो फ़ैसला होगा वो यहीं पर होगा) होती थीं हिन्दू नौजवान उनका अर्थ समझे बिना ही उनपर तालियाँ बजाते रहते थे | 

अटल बिहारी बाजपेयी जी जैसे सर्वमान्य प्रधान मंत्री पर भी वे अपने स्वभाव के अनुरूप हल्के शेर और टिप्पणियाँ पढ़ते रहे |

आईना गर्द-गर्द कैसा है रंग चेहरे का ज़र्द कैसा है,

 काम घुटनों से जब लिया ही नहीं फिर ये घुटनों में दर्द कैसा है |

देश के एक महान राजनेता के लिए ये शेर और वह भी तब जब वे अस्पताल में उपचार करा रहे थे | राहत  भाजपा की राजनीतिक सफलता को इस्लाम और मुसलमानों के हितों से जोड़कर देखते रहे और धीरे-धीरे उनका लेखन उसी दिशा में रूढ़ हो गया | भाजपा वाले स्वयं को धर्म निरपेक्ष दिखाने के लिए तो विरोधी मजे लेने के लिए  उन्हें मंच देते गए और राहत अधिक  तीखे एवं  लोकप्रिय होते गए,किन्तु  इस लोकप्रियता के लिए उन्होंने क्या खोया ? इसका विवेचन  तो इतिसाहकार ही करेंगे  |

उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत होने पर, सरकार बनने से पहले ही उन्होंने एक शेर ट्वीट किया-

लहू में भीगी हुई, आस्तीन जीत गई ।
चुनाव हार गए सब, मशीन जीत गई ।।
 इस शेर  के कारण कितने ही कवि सम्मेलनों के संयोजकों को अपमान का जहर पीना पड़ा | कितने ही उनके चाहने वाले जो भाजपा को वोट देकर आये थे उनमें मुसलमान भी थे इस शेर से बहुत दुखी हुए | वे चाहते तो अन्य शब्दों और प्रतीकों से भी अपनी बात कह सकते थे पर मैं पहले भी लिख चुका हूँ वे अपने बारे में किसी भी भ्रम के लिए कोई अवकाश नहीं छोड़ते थे |

कारण कुछ भी रहे हों किन्तु उनकी शायरी धीरे-धीरे मानवता की चिंता से सिमट कर मुसलमानों की चिंता तक आगई | इसके लिए हमारे देश के मुशायरों का विषाक्त वातावरण भी कम दोषी नहीं है कोई भी नवोदित राहत पहुँचे उसे भारत से बाहर इस्लामिक देशों की रागात्मत्कता में प्रवृत्त किया ही जाता है | वहाँ भारत को लेकर,हिन्दुओं को लेकर और भारतीय धर्म-संस्कृति  को लेकर जिस प्रकार का विष वमन होता है उससे बचकर निकल पाना बड़ा कठिन है|  रही-सही कसर पकिस्तान में होने वाले मुशायरे पूरी कर देते हैं | जो पकिस्तान के विरुद्ध शायरी लिखेगा उसे दुबई, पाकिस्तान में होने वाले मुशायरों में भला कौन बुलाएगा | सच तो यह है कि उसे भारत के मुशायरों में बुलाए जाने के भी लाले पड़ जाएँगें | राहत भाई भी इन्ही मुशायरों के हीरो थे और यहीं से वे हिन्दी मंचों पर लोक प्रिय हुए अतः वैसी बातें उनकी शायरी में आ जाना स्वाभाविक ही था  | इसीलिये भारत पाकिस्तान के मध्य कश्मीर विवाद पर,पीओके और कारगिल तक के युद्ध पर कभी भी वे पाकिस्तान के विरूद्ध खुल कर नहीं बोल पाए | वे सदैव इसे चुनाव के लिए लड़ा जाने वाला युद्द कहकर मजे लेते रहे और दोनों देशों के नेताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाकर मध्यम मार्गी बने रहे –

सरहदों पर बहुत तनाव है क्या,
कुछ पता तो करो चुनाव है क्या |

दो वर्ष पूर्व डाल्टन गंज (पलामू ) के कविसम्मेलन में जब मैंने पाकिस्तान पर कविता पढ़ी तब उन्होंने मुझे बड़े प्यार से  संबोधित करते हुए- ऐ भाई, उपाध्याय सुनो, और यही शेर पढ़ा | मंच के कवियों से उनेक संबंध उत्साह पूर्ण एवं  मैत्री-भाव वाले ही रहे | हिन्दी मंचों  और कवियों ने भी उन्हें भरपूर सम्मान दिया पर हिन्दी भाषा को लेकर भी वे बड़े कठोर थे अंत तक कठोर ही बने रहे | “ ये आदरणीय फादरणीय क्या होता है यहाँ लोग हिन्दी सुनने नहीं आते “ वाले डायलोग को लेकर भी कुछ लोग उनकी आलोचना करते हैं | पर हिन्दी के किसी भी कवि ने उनका हिन्दी मंच पर इस बात के लिए कभी विरोध नहीं किया यह एक बड़ी बात है | आज उनके असमय निधन से उनसे प्रीति रखने वाले लाखों मन दुखी हैं | किन्तु खिन्नता इस बात की भी है कि पिछले दिनों एक और मुस्लिम कलाकार (अभिनेता) इरफान खान साहब की मृत्यु हुई तब  मुसलमानों से अधिक शोक हिन्दुओं ने प्रकट किया ! राहत भाई भी एक कलाकार थे,पर उतनी गरिमा, सम्मान और प्यार उन्हें नहीं मिल पा रहा | इस से भी अधिक खेद इस बात का है कि सोशल मीडया पर  प्रतिक्रियावादी नई पीढ़ी उनके शेर – “किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है | “ को लेकर बहुत ही उत्तेजना पूर्ण प्रतिक्रियाएँ दे रही है  | कोई लिख रहा है – जो कौम  को मुल्क से बड़ा समझे अच्छा इन्सान थोड़ी है | कोई लिख रहा है- …. रोने लायक इंसान थोड़ी है | इसी प्रकार- “एक नए खौफ का जंगल है मेरे चारों तरफ, अब मुझे शेर नहीं गाय से डर लगता है |” को लेकर भी बहुत तीखी प्रतिक्रियाएँ लिखी जा रही हैं | यद्यपि ये  टिप्पणियाँ नई नहीं है अधिकांश सभी राहत भाई के सामने ही उनके ट्विटर पर लम्बे समय  से रिप्लाई में लिखी जा रहीं हैं | किन्तु फिर भी  हमें  यह समझना चाहिए कि किसी भी दिवंगत आत्मा को लेकर इस प्रकार की त्वरित टिप्पणियाँ भारतीय परंपरा और  संस्कारो के अनुरूप नहीं हैं | भले ही राहत साहब का झुकाव धर्म विशेष की ओर ही रहा किन्तु सोशल मीडिया पर एक दिवंगत कलाकार  के प्रति इस प्रकार की टिप्पणियों से कम-से-कम अभी तो बचा जाना चाहिए | इसमें कोई संदेह नहीं राहत भाई एक वर्ग विशेष में अपने युग के बहुत ही लोक प्रिय शायर थे उनके द्वारा लिखी गई कविताएँ एवं फ़िल्मी गीत सदैव उनकी याद दिलाते रहेंगे और उद्धृत भी किये जाते रहेंगे |

डॉ. रामकिशोर उपाध्याय