आकाश खाली है। विमान बहुत कम उड़ रहे हैं। दुनिया भर सहित देश का आकाश भी हवाई जहाजों से सूना है। हवाई कंपनियां बहुत कम उड़ानें संचालित रही हैं। नागरिक विमानन क्षेत्र कहीं से भी रफ्तार पकड़ता नहीं दिख रहा। कोरोना के कारण लॉकडाउन के हल्ले में सरकारों ने दुनिया भर के कई देशों में विमान सेवाएं बंद कर दी थीं। अब धीरे धीरे खोल तो दी, पर बहुत कम संख्या में उड़ानें होने के कारण विमान कंपनियों को बहुत घाटा उठाना पड़ रहा है। कोरोना ने विमान कंपनियों को भी बरबाद करने में कोई कमी नहीं रखी है। अनेक एयरलाइंस कंपनियां नौकरियां कम कर रही है, यात्रियों की सुविधाएं समाप्त कर रही हैं और खर्चे समेट रही हैं। क्योंकि कमाई तो है नहीं और घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। अर्थव्यवस्था के जानकार मानते हैं कि हालात सुधरने में कम से कम चार से पांच साल लग सकते हैं। एयकलाइंस कंपनियों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन ‘इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन’ (आईएटीए) ने भी कहा है कि दुनियाभर की एयरलाइंस कंपनियों को कोरोना संकट से पहले के यानी मार्च 2020 के स्तर पर पहुंचने के लिए 2024 तक इंतजार करना पड़ सकता हैं।
मुंबई एयरपोर्ट अपनी क्षमता की केवल 10 फीसदी उड़ानें ही संचालित कर रहा है। देश की आर्थिक राजधानी में, जहां हर तीन मिनट में एक विमान या तो उड़ान भरता था या फिर उतरता था, उस सबसे व्यस्ततम मुंबई एयरपोर्ट पर अब आधे घंटे के अंतराल पर केवल दो विमान ही उड़ते – उतरते हैं। हालांकि मुंबई एयरपोर्ट पर उड़ानों की तादाद अब बढा दी गई है। यहां पर पहले एक दिन में 50 केवल फ्लाइट के ऑपरेशन की मंजूरी थी, उसे बढाकर 15 जून से 100 तक कर दिया गया है। इसमें से भी 50 फ्लाइट आएगी और 50 फ्लाइट जाएंगी। जबकि मुंबई एयरपोर्ट के पास एक दिन में 1000 उड़ानों का ऑपरेशन हैंडल करने की क्षमता है। ऐसे में धंधा नहीं होने से एयर लाइन कंपनियों की आर्थिक हालत लगातार बहुत खराब होती जा रही है।
अब जब पहले के मुकाबले बहुत कम संख्या में विमान सेवाएं चालू हैं, तो विमान कंपनियों के लिए अपने सारे विमानों को खड़ा रखना पड़ रहा है और अपने सामान्य खर्चे भी निकालना बहुत मुश्किल हो गया है। अकेले मुंबई एयरपोर्ट पर ही विभिन्न भारतीय एवं विदेशी एयरलाइंस से कमसे कम 400 के आसपास छोटे बड़े विमान यूं ही खड़े हैं। एयरलाइंस कंपनियों की वैश्विक संस्था आईएटीए ने भी चिंता व्यक्त की है कि अगर यही हाल रहा, तो एयरलाइंस को बड़ी संख्या में अपने स्टाफ में कमी करनी होगी। एयर इंडिया, इंडिगो, गो एयर, स्पाइसजेट जैसी कंपनियां वैसे भी अपने कर्मचारियों को इस बारे में आगाह कर चुकी है। वैसे, विमान खड़े रहे, तो भी खर्चे लगातार जारी पहते हैं। क्योंकि उनको हैंगर का किराया तो एयरपोर्ट को देना ही होता है, साथ ही लंबे समय तक विमान के खड़े रहने से उन पर मेंटेनेंस भी बहुत ज्यादा आता है।
नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी पिछले दिनों कहा था कि एयर इंडिया का निजीकरण जरूरी हो गया है, और सरकार इस दिशा में काम कर रही है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि सभी एयरलाइंस कंपनियां अपने कर्मचारियों को विदाउट पे लीव पर भेज रही हैं। क्योंकि यह उनकी मजबूरी है। आर्थिक हालात भी हर तरफ बहुत खराब हैं, इस कारण सरकार भी इन कंपनियों की कोई बड़ी आर्थिक मदद करने में अक्षम है। गौरतलब है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण भारत ने 23 मार्च से अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानों पर प्रतिबंध लगा रखा है। केवल वंदे भारत योजना की उड़ानें ही विदेश से कभी कभार भारत आ रही है। इसके साथ ही घरेलू विमान सेवाओं को भी बंद कर दिया गया था। लेकिन बीते 25 मई से घरेलू उड़ानें शुरू कर दी गई थीं, जो बहुत ही कम संख्या में है। इन उड़ान सेवाओं के लिए कोरोना से जुड़ी गाइडलाइंस भी इतनी उलझी हुई है कि एयरलाइंस कंपनियों को उनका पालन करने पर बहुत बड़ा खर्च उठाना पड़ रहा है।
अमेरिका, ब्राजील और भारत जैसे देशों में कोरोना संक्रमण की सबसे तेज रफ्तार की वजह से हवाई कारोबार पर खतरा बरकरार है। दुनिया भर में हवाई यातायात बंद होने से एयरलाइंस उद्योग का भट्टा बैठ गया है। सबसे खराब बात यह है कि कोरोना की वजह से आर्थिक हालात सुधरने में किसी भी तरह की गुंजाइश अब बहुत ही मुश्किल लग रही है। दुनिया भर में तो सात महीने हो गए हैं, लेकिन भारत में कोरोना संक्रमण शुरू हुए पांच महीने पूरे हो गए हैं। लेकिन दुनिया भर में कोरोना संकट बढ़ रहा है। ऐसे में, वर्तमान हालात देखते हुए साफ लगता है कि एयरलाइंस उद्योग को अपनी पहले वाली स्थिति में साल 5 साल लगेंगे। वैसे भी, अर्थशास्त्री भी मान रहे हैं कि संसार के किसी भी धंधे के पहले की तरह फिर से धमकने और चमकने की स्थिति फिर लौटने की गुंजाइश बहुत ही कम है।
हर वर्ष की भांति मंगलमूर्ति गणेश एक बार फिर गणेशोत्सव अर्थात् गणेश चतुर्थी के अवसर पर घर-घर पधार रहे हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश का जन्म हुआ था। इसी चतुर्थी से आरंभ होकर गणेशोत्सव पूरे दस दिनों तक चलता है और विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर घरों में छोटी-बड़ी प्रतिमाओं के अलावा कई प्रमुख स्थानों पर भी भगवान गणेश की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, जिनका लगातार नौ दिनों तक पूजन किया जाता है। दस दिन पश्चात् अनंत चतुर्दशी के दिन पूरे जोश के साथ गणेश प्रतिमा को तालाब इत्यादि किसी जलस्रोत में विसर्जित कर दिया जाता है। गणपति विसर्जन को लेकर मान्यता है कि हमारा शरीर पंचतत्व से बना है और एक दिन उसी में विलीन हो जाएगा। इसी आधार पर अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन किया जाता है। इस वर्ष कोरोना के चलते अधिकांश लोग ऐसे पंडालों या सार्वजनिक स्थलों के बजाय अपने-अपने घरों में ही गणपति की पूजा करेंगे और अधिकांश जगहों पर मूर्तियों का जलस्रोतों में विसर्जन भी नहीं होगा।
गणेशोत्सव हालांकि वैसे तो पूरे देश में मनाया जाता है और लोग अपने घरों में गणपति बप्पा की पूजा करते हैं लेकिन महाराष्ट्र में इस पर्व की विशेष धूम दिखाई देती है। जगह-जगह बड़े-बड़े आकर्षक पंडाल सजाए जाते हैं, जहां लोग एकजुट होकर भक्ति रस में सराबोर होकर भगवान गणेश की पूजा करते हैं। महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की परम्परा की शुुरूआत के संबंध में कहा जाता है कि यह शुरूआत पेशवाओं द्वारा की गई थी और तब पुणे के प्रसिद्ध शनिवारवाड़ा नामक राजमहल में भव्य गणेशोत्सव मनाया जाता था। सार्वजनिक रूप से महाराष्ट्र में गणेशोत्सव को बड़े पैमाने पर मनाए जाने की शुरूआत 1893 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बालगंगाधर तिलक द्वारा आजादी की लड़ाई में लोगों को एकजुट करने के उद्देश्य से की गई थी।
गणेश बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता हैं और मान्यता है कि गणेश चतुर्थी पर गणपति बप्पा की पूजा करने से वे भक्तों के सारे कष्ट हर लेते हैं। सच्चे मन से उनकी पूजा करने से शुभ-लाभ की प्राप्ति तथा समृद्धि के साथ धन-धान्य की वृद्धि होती है। श्रीगणेश के अनेक प्रचलित नामों में से गजानन. लम्बोदर, विघ्ननाशक, विनायक, गणाध्यक्ष, एकदन्त, चतुर्बाहु, गजकर्णक, भालचन्द्र, कपिल, विकट, धूम्रकेतु, सुमुख इत्यादि काफी प्रसिद्ध हैं। बुद्धि, विवेक, धन-धान्य और रिद्धि-सिद्धि के कारक भगवान गणेश की पूजा गणेश चतुर्थी के दिन प्रायः दोपहर के समय ही की जाती है। इसके पीछे मान्यता है कि विध्नहर्ता गणेश का जन्म मध्यान्ह के समय हुआ था, इसीलिए गणेश चतुर्थी पर उनकी पूजा के लिए यही समय सर्वोत्तम माना गया है। माना जाता है उनकी पूजा करने से शनि की वक्रदृष्टि तथा ग्रहदोष से भी मुक्ति मिलती है। गणेश जी की कृपा से समस्त कार्य बगैर किसी बाधा के पूर्ण होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा पीतवस्त्रधारी भगवान गणेश की पूजा सभी देवी-देवताओं में सबसे सरल मानी जाती है। वैसे तो देश में 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा की जाती है लेकिन हिन्दू धर्म में गणेश जी को सभी देवों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त है और प्रत्येक पूजा या कोई भी शुभ कार्य करने से पहले उनकी पूजा करने का विधान है। दरअसल उन्हें उनके पिता भगवान शिव ने ही यह विशेष वरदान दिया था कि हर पूजा या शुभ कार्य करने से पहले उनकी पूजा अनिवार्य होगी।
शिवपुराण के अनुसार एक बार माता पार्वती ने स्नान से पूर्व अपने मैल से एक बालक उत्पन्न कर उसे अपना द्वारपाल बना दिया। जब पार्वती जी स्नान करने लगी, तब अचानक भगवान शिव वहां आए लेकिन द्वारपाल बने बालक ने उन्हें अंदर प्रवेश करने से रोक दिया। उसके बाद शिवगणों ने बालक से भयंकर युद्ध किया लेकिन कोई भी उसे पराजित नहीं कर सका तो क्रोधित शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब पार्वती को यह पता चला तो आग-बबूला हो उन्होंने प्रलय करने का निश्चय कर लिया। इससे देवलोक भयाक्रांत हो उठा और देवताओं ने उनकी स्तुति कर उन्हें शांत किया। भगवान शिव ने निर्देश दिया कि उत्तर दिशा में सबसे पहले जो भी प्राणी मिले, उसका सिर काटकर ले आएं। विष्णु उत्तर दिशा की ओर गए तो उन्हें सबसे पहले एक हाथी दिखाई दिया। वे उसी का सिर काटकर ले आए और शिव ने उसे बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। पार्वती उसे पुनः जीवित देख बहुत खुश हुई और तब समस्त देवताओं ने बालक गणेश को अनेकानेक आशीर्वाद दिए। भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि कोई भी शुभ कार्य यदि गणेश की पूजा करके शुरू किया जाएगा तो वह निर्विघ्न सफल होगा। उन्होंने गणेश को अपने समस्त गणों का अध्यक्ष घोषित करते हुए आशीर्वाद दिया कि विघ्न नाश करने में गणेश का नाम सर्वोपरि होगा। इसीलिए भगवान गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। एक प्रचलित लोककथा के अनुसार भगवान शिव का एक बार त्रिपुरासुर से भीषण युद्ध हुआ। युद्ध शुरू करने से पहले उन्होंने गणेश को स्मरण नहीं किया, इसलिए वे त्रिपुरासुर से जीत नहीं पा रहे थे। उन्हें जैसे ही इसका अहसास हुआ, उन्होंने गणेश जी को स्मरण किया और उसके बाद आसानी से त्रिपुरासुर का वध करने में सफल हुए।
देवों के देव भगवान गणेश के देशभर में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें सबसे लोकप्रिय मुम्बई के प्रभादेवी में श्री सिद्धिविनायक मंदिर है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। वर्ष 2014 में गुजरात के मेहमदाबाद में छह लाख वर्गफुट में बना सिद्धिविनायक मंदिर भगवान गणेश का सबसे बड़ा मंदिर माना जाता है। जमीन, अचल सम्पति और चढ़ावे के आधार पर इन्दौर स्थित खजराना गणेश मंदिर सबसे धनी गणपति मंदिर है। हालांकि संचित धन के हिसाब से पुणे का दगडुशेठ गणपति मंदिर देश का सबसे धनी गणपति मंदिर है। वैसे प्रतिदिन चढ़ावे के हिसाब से मुम्बई का सिद्धिविनायक मंदिर सबसे आगे है।
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देशभर के शहरों में साफ-सफाई से संबंधित ‘स्वच्छ सर्वेक्षण 2020’ के परिणामों ने एक बार फिर चैकाया है, स्वच्छता की त्रासद एवं चिन्ताजनक स्थितियों का खुलासा किया है। सर्वे में देश के 4,242 शहरों के 1.9 करोड़ लोगों की राय को उजागर किया गया है। दस लाख से अधिक आबादी वाले 47 शहरों की श्रेणी में दस सबसे गंदे शहरों में पूर्वी दिल्ली का तीसरे एवं उत्तरी दिल्ली का पांचवें पायदान पर होना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्वच्छता अभियान की धज्जियां उड़ा रहा है। इस वर्ष के स्वच्छता सर्वेक्षण में शीर्ष स्थान पर इन्दौर तीसरी बार बाजी मारी है। जबकि दूसरे स्थान पर सूरत रहा है। इन शहरों के शासकों और प्रशासकों के साथ वहां के नागरिक भी प्रशंसा के पात्र हैं। स्वच्छता अभियान को सफलता तभी मिलती है जब सभी मिलकर अपने शहर को साफ-सुथरा बनाने में योगदान देने के लियेे संकल्पित होते हैं। इन्दौर एवं सूरत के बारे में सबसे बड़ी बात जो कही जा सकती है, वह यह है कि ”उन्होंनेे अपने शहर के चरित्र पर गन्दगी, प्रदूषण एवं अस्वच्छता की कालिख नहीं लगने दी।“ अपने स्वच्छता दीप को दोनों हाथों से सुरक्षित रखकर प्रज्वलित रखा। दूसरी ओर पूर्वी एवं उत्तरी दिल्ली का प्रदूषण, गन्दगी एवं अस्वच्छता का साम्राज्य ज्यादा चिल्लाकर सबकुछ कह रही है। प्रदूषण, गंदगी एवं अस्वच्छता से ठीक उसी प्रकार लड़ना होगा जैसे एक नन्हा-सा दीपक गहन अंधेरे से लड़ता है। छोटी औकात, पर अंधेरे को पास नहीं आने देता। क्षण-क्षण अग्नि-परीक्षा देता है। पर हां ! अग्नि परीक्षा से कोई अपने शरीर पर फूस लपेट कर नहीं निकल सकता। देश की राजधानी से जुड़े पूर्वी एवं उत्तरी दिल्ली गंदे शहरों में सिरमौर बने रहकर स्वच्छता की अग्नि परीक्षा में सफल नहीं हो सकते। जबकि अगर सफाई की बेहतर कार्ययोजना पर अमल करने की इच्छाशक्ति का परिचय दिया जाए और लोगों को अपने साथ जोड़ा जाए तो उदाहरण पेश किए जा सकते हैं। मुश्किल यह है कि ऐसे उदाहरण अनुकरणीय नहीं बन रहे हैं। इसी कारण यह देखने को मिल रहा है कि जो शहर स्वच्छता सर्वेक्षण की सूची में शीर्ष पर हैं उनके पड़ोसी और कुछ मामलों में तो उनसे सटे शहर कहीं अधिक पीछे दिख रहे हैं। बतौर उदाहरण नई दिल्ली ने स्वच्छ सर्वेक्षण में बेहतर स्थान हासिल किया, लेकिन पड़ोसी शहर उसके आसपास भी नहीं दिखे। आखिर सफाई के मामले में जैसा काम नई दिल्ली ने किया वैसा दक्षिणी, पूर्वी और उत्तरी दिल्ली क्यों नहीं कर सकीं? यही बात नवीं मुंबई से सटे इलाकों पर लागू होती है। यदि नवीं मुंबई खुद को साफ-सुथरा रखने की इच्छाशक्ति दिखा सकती है तो उससे सटे शहर क्यों नहीं? आखिर पूरी दिल्ली और पूरी मुंबई बेहतर साफ-सफाई का उदाहरण कब पेश करेंगी? क्या कारण है कि स्वच्छता के मामले में प्रतिस्पद्र्धा का भाव जोर नहीं पकड़ा रहा है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बडे़ पैमाने पर चलाये गये स्वच्छता अभियान का क्या हश्र हो रहा है, पूर्वी-उत्तरी दिल्ली में स्वच्छता की स्थिति को देखते हुए सहज अनुमान लगाया जा सकता है। बात पूर्वी एवं उत्तरी दिल्ली ही नहीं बल्कि इस श्रेणी के सभी शहरों की हैं जो कूूड़े के ढे़र में तब्दील हो चुके है। गली-मोहल्लों में सड़ांध मार रहा कूड़ा, इन शहरों के लोगों के जीवन पर संकट बनता जा रहा है। कूड़े की वजह से सड़कों पर जाम लगना, सांस लेने में दिक्कत होना, बीमारियों का प्रकोप बढ़ना ऐसी खौफनाक स्थितियां हंै, जिन पर राजनैतिक दल अपने स्वार्थ की रोटियां सेंक रहे हैं। दुखद है लोगों के जीवन से खिलवाड़ करते राजनीतिक मनसूबे। इन गंदे शहरों के हालात न केवल सरकारी एजेंसियों को बल्कि केन्द्र सरकार एवं स्थानीय सरकार के स्वच्छता अभियान के दावों को भी खोखला साबित करते हंै। बात चाहे भाजपा की हो या आप सरकार की या अन्य राजनीतिक दलों की सरकारों की- जब समूचे देश में स्वच्छता अभियान का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उसी दौरान यह भी एक कड़वी सच्चाई ही है कि अनेक शहरों में स्वच्छता की स्थिति त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण बनी हुई है। क्यो हो रहा है यह सब? देश किधर जा रहा है? राजनीतिक मूल्यों की गिरावट गंभीर समस्या बनी हुई है। ज्यादा आबादी वाले शहरों को साफ रखना कठिन काम हो सकता है, लेकिन आबादी से अधिक महत्वपूर्ण है स्वच्छता को लेकर दिखाई जाने वाली संकल्पशक्ति। निसंदेह साफ-सफाई के मामले में संसाधनों की एक बड़ी भूमिका है, लेकिन वे तभी कारगर साबित हो सकते हैं जब इस इरादे का परिचय दिया जाएगा कि हमें अपने शहर को स्वच्छ बनाना है। यह परिचय केवल इसलिए नहीं दिया जाना चाहिए कि स्वच्छता सेहत के साथ पर्यावरण की भी रक्षा करती है, बल्कि इसलिए भी कि उससे देश की छवि निखरती है। स्वच्छता का संकल्प अमिट सौन्दर्य होता है, मौसम उसे छूता नहीं, माहौल उसे नजर नहीं लगाता। स्वच्छता की संस्कृति विकसित करने के लिए व्यापक जन-आन्दोलन की जरूरत है। जिन शहरों पर गंदे होने की कालिख लगी है उन शहरों में स्वच्छता पर राजनीति करने वाले राजनेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने लापरवाही, गैरजिम्मेदारना नजरिया और अपने कर्तव्यों का संकुचित दृष्टिकोण को ही दर्शाया है, जिसका परिणाम यह देखने को मिल रहा है कि प्रधानमंत्री के तमाम प्रयासों एवं प्रोत्साहन के बावजूद अनेक शहर प्रदूषित एवं गंदे हो रहे हैं। यह सही है कि प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद देश में स्वच्छता के लिए जिम्मेदार सरकारी एजेंसियों द्वारा कुछ प्रयास अवश्य किए गए थे। सचाई यह भी है कि गंदगी में शुमार शहरों में कूड़े के सड़ने से स्वास्थ्य के लिये हानिकारक गैंसे निकलती हैं, जो जानलेवा है। यहां से निकलने वाली खतरनाक गैंसे सांस से जुड़ी अनेक बीमारियांे का कारण बनती है। कचरा सड़कों पर फैला होता है। आम जनजीवन के लिये बीमारियों का खुला निमंत्रण है। ‘स्वच्छता ईश्वरत्व के निकट है’ के संदेश को फैलाने वाली सरकारें क्या सोचकर विभिन्न शहरों को सड़ता हुआ देख रही है। आज जरूरी हो गया है कि देश के सामने वे सपने रखे जाये, जो होते हुए दिखे भी। राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण दिल्ली को निश्चित ही विश्वस्तरीय शहर के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, लेकिन यहां विश्वस्तर की स्वच्छता होना भी उतना ही आवश्यक है। यह निराशाजनक ही है कि दिल्ली में सफाई के नाम पर बार-बार राजनीति हो रही है। ऐसा भी देखने में आ रहा है कि आम जनजीवन से जुड़ा यह मुद्दा भी राजनीति का शिकार है। दिल्ली सरकार केन्द्र को दोषी मानती है तो केन्द्र दिल्ली सरकार की अक्षमता को उजागर करती है, पिसती है दिल्ली की जनता। लेकिन कब तक? यही वजह है कि दिल्ली हाई कोर्ट को स्वयं इस मामले में कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि स्वच्छता और स्वास्थ्य एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं। ऐसे में न केवल दिल्ली बल्कि अन्य देशवासियों के स्वास्थ्य की चिंता करते हुए भी पूरी इच्छाशक्ति के साथ स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए काम किया जाना चाहिए। फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान की तारीफ की। इसके पहले भी बिल गेट्स समेत कई विश्वस्तर पर सक्रिय कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियां देश में अचानक चर्चा में आए सफाई के मुद्दे पर खुशी से हाथ बंटाने का प्रस्ताव देती आ रही हैं लेकिन सफाई एवं स्वच्छता का यह मुद्दा कितना खोखला है, यह बात उन्हें पता लगे तो क्या स्थिति होगी? नरेन्द्र मोदी ने धूल-मिट्टी को साफ करने के लिए झाडू उठाकर स्वच्छ भारत अभियान को पूरे राष्ट्र के लिए एक जन-आंदोलन का रूप दिया और कहा कि लोगों को न तो स्वयं गंदगी फैलानी चाहिए और न ही किसी और को फैलाने देना चाहिए। उन्होंने “न गंदगी करेंगे, न करने देंगे।” का मंत्र भी दिया। लेकिन ताजा सर्वे में लगातार गंदगी के पहाड़ खड़े वाले शहर क्यों मौन बने रहे हंै? कचरा बने देश के प्रमुख शहरों में लोग टूटती सांसों की गिरफ्त में कब तक जीते रहे हैं? सुधार की, नैतिकता की बात कोई सुनता नहीं है। दूर-दूर तक कहीं रोशनी नहीं दिख रही है। बड़ी अंधेरी रात है। ‘मेरा देश महान्’ के बहुचर्चित नारे को स्वच्छता के सन्दर्भ मंे इस प्रकार पढ़ा जाए ‘मेरा देश परेशान’। जहां लोग गंदगी से परेशान हैं। भारत जैसी पुरानी सभ्यता, समृद्ध संस्कृति और अब तेजी से उभरती आर्थिक ताकत वाला देश अगर आज भी सफाई एवं स्वच्छता के मामले में दूसरे विकासशील देशों से भी पीछे है तो इसका कारण कहीं ना कहीं राजनीतिक दलों का स्वार्थी नजरिया एवं लोगों का ढीला रवैया ही है।
सामान्य तौर पर वित्तीय समावेशन की सफलता का आँकलन इस बात से हो सकता है कि सरकार द्वारा इस सम्बंध में बनायी जा रही नीतियों का फ़ायदा समाज के हर तबके, मुख्य रूप से अंतिम पायदान पर खड़े लोगों तक, पहुँच रहा है। भारत में वर्ष 1947 में 70 प्रतिशत लोग ग़रीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे। जबकि अब वर्ष 2020 में देश की कुल आबादी का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है। 1947 में देश की आबादी 35 करोड़ थी जो आज बढ़कर 136 करोड़ हो गई है। देश में वित्तीय समावेशन को सफलतापूर्वक लागू किए जाने के कारण ही ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी देखने में आई है। केंद्र में वर्तमान मोदी सरकार के कार्यभार ग्रहण करने के बाद से तो वित्तीय समावेशन के कार्यान्वयन में बहुत अधिक सुधार देखने में आया है। उसके पीछे मुख्य कारण देश में विभिन्न वित्तीय योजनाओं को डिजिटल प्लैट्फ़ॉर्म पर ले जाना है। केंद्र सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई जन-धन योजना ने इस संदर्भ में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। जब यह योजना प्रारम्भ की जा रही थी तब कई लोगों द्वारा यह सवाल उठाए गए थे कि देश में पहिले से ही इस तरह की कई योजनाएँ मौजूद हैं, फिर इस एक और नई योजना को शुरू करने की क्या ज़रूरत है। आज समझ में आता है कि जन-धन योजना के अंतर्गत करोड़ों देशवासियों के खाते खोले गए, कुल लगभग 40 करोड़ खाते विभिन्न बैंकों में खोले गए हैं, विशेष रूप से महिलाओं के 22 करोड़ खाते खोले गए हैं, जिनके खातों में आज सीधे ही सब्सिडी का पैसा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा हस्तांतरित किया जा रहा है। मनरेगा योजना की बात हो अथवा केंद्र सरकार की अन्य योजनाओं की बात हो, पहिले ऐसा कहा जाता था कि केंद्र से चले 100 रुपए में से शायद केवल 8 रुपए से 16 रुपए तक ही अंतिम हितग्राही तक पहुँच पाते हैं, परंत आज हितग्राहियों के खातों में सीधे ही राशि के जमा करने के कारण बिचोलियों की भूमिका एकदम समाप्त हो गई है एवं हितग्राहियों को पूरा का पूरा 100 प्रतिशत पैसा उनके खातों में सीधे ही जमा हो रहा है। यह वित्तीय समावेशन की दृष्टि से एक क्रांतिकारी क़दम सिद्ध हुआ है। अभी हाल ही में कोरोना वायरस की महामारी के समय, अप्रैल-मई-जून 2020 के तीन महीनों में महिलाओं के बैंक खातों में करीब-करीब 30,000 करोड़ रुपए सीधे ट्रांसफर किए गए हैं। कुछ अन्य योजनाओं को मिलाकर तो विभिन लाभार्थियों के बैंक खातों में करीब-करीब 90,000 करोड़ रुपए सीधे ट्रांसफर किए गए हैं। इसी प्रकार, 7 करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त गैस सिलेंडर दिए गए हैं, राशनकार्ड हो या न हो, 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त अन्न की व्यवस्था की गई है।
पूर्व में आपको ध्यान होगा कि किसी भी बैंक में खाता खोलने के पहिले एक परिचयकर्ता की आवश्यकता होती थी, उसके हस्ताक्षर के बिना बैंकों में खाता खोलना बहुत ही मुश्किल भरा कार्य हुआ करता था, परंतु सरकार ने इस नियम को हटाकर आधार कार्ड से खातों को जोड़कर इस कार्यविधि को बहुत ही आसान कर दिया। इस प्रकार के कई नियमों का केंद्र सरकार ने सरलीकरण किया है, अतः वित्तीय समावेशन भी आगे बढ़ा है।
इसी प्रकार देश में जब प्रधान मंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना एवं प्रधान मंत्री दुर्घटना बीमा योजना लागू की जा रही थी तब भी यह मुद्दा उठाया गया था कि इस प्रकार की योजनाएँ लोगों तक पहुँचाना आसान नहीं होगा। परंतु आज हम देखते हैं कि वित्तीय समावेशन से जुड़ी इन योजनाओं को देश में सफलता पूर्वक लागू कर लिया गया है एवं आज करोड़ों हितग्राही इन योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। इन योजनाओं को भी हितग्राहियों के बैंक खातों से जोड़ दिया गया है ताकि अधिक से अधिक लोग इन बीमा योजनाओं का लाभ उठा सकें।
भारत में कुल आबादी का लगभग 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा ग्रामीण इलाक़ों में रहता है एवं अपने रोज़गार के लिए मुख्यतः कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर हैं। इस प्रकार भारत में कृषि का क्षेत्र एक सिल्वर लाइनिंग के तौर पर देखा जाता है एवं विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बहुत पैसा किसानों के हाथों में पहुँचाया जा रहा है। मनरेगा योजना के अंतर्गत 60,000 करोड़ रुपए ग्रामीण इलाक़ों में मज़दूरों के खातों में सीधे हस्तांतरित किए गए हैं तो रुपए 2000 प्रति तिमाही की दर से लगभग 9 करोड़ किसानों के खातों में सीधे हस्तांतरित हो रहे हैं जो की पूरे वर्ष भर में रुपए 72,000 करोड़ रुपए होता है। इन समस्त उपायों से भी वित्तीय समावेशन की स्थिति देश में लगातार सुधर रही है। साथ ही, इस वर्ष हमारे देश के लिए, मानसून की स्थिति काफ़ी अच्छी है तो इससे ख़रीफ़ अवधि की फ़सल अच्छी होगी। रबी अवधि की पैदावार भी काफ़ी अच्छी हुई है। यदि हम 2019-20 कृषि वर्ष के आँकड़ों को देंखें तो लगभग 30 करोड़ टन अनाज की पैदावार हुई है। जो इस वर्ष अर्थात 2020-21 में निश्चित ही इस आँकड़े को पार करना चाहिए। साथ ही, 32 करोड़ टन बाग़वानी (हॉर्टिकल्चर) के क्षेत्र में भी पैदावार होने का अनुमान है। साथ ही साथ ये फ़सल सही समय पर सही क़ीमत के साथ किसान बेच भी पाएँगे क्योंकि हॉल ही में केंद्र सरकार ने किसानों को अपनी फ़सल कहीं भी बेचने की छूट प्रदान कर दी है। इससे किसानों को और अधिक फ़ायदा होगा। केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में घोषित की गई नीतियों का असर भी दिखने लगा है। जून 2020 को समाप्त तिमाही में, जब कोरोना वायरस महामारी के चलते पूरे देश में आर्थिक गतिविधियाँ लगभग बंद थी, ऐसे में कृषि क्षेत्र से निर्यात 23.24 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करने में सफल रहे हैं। इन सभी प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ख़रीद की ताक़त आएगी। ग्रामीण इलाक़ों में हाल ही में यह पाया गया है कि दो पहिया वाहनों एवं कम क़ीमत वाले चार पहिया वाहनों की माँग में अच्छी वृद्धि दृष्टिगोचर हो रही है। किसानों की आमदनी दुगनी किए जाने के गम्भीर प्रयास केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। जल जीवन मिशन के अंतर्गत गावों के लोगों तक साफ़ पानी पहुँचाने की व्यवस्था की जा रही है। इन सभी प्रयासों से भी देश के ग्रामीण इलाक़ों में वित्तीय समावेशन की स्थिति में और अधिक सुधार होगा।
भारत में अब विकास के लिए नए-नए क्षेत्र भी तलाशे जा रहे हैं जैसे तटवर्तीय इलाक़ों में सड़क मार्गों का निर्माण। इससे इन इलाक़ों में आधारभूत सुविधाओं का विकास होगा। साथ ही, इससे सड़क के किनारे एक व्यवस्था विकसित होती है चाहे वह गाँव हो, क़स्बा हो, शहर हो, यह इलाक़ा काफ़ी तेज़ी से विकास करता है। इसी प्रकार, पूरे देश को मल्टी मोडल कनेक्टीविटी इंफ़्रास्ट्रक्चर से जोड़ने की एक बहुत बड़ी योजना तैयार की गई है। इस योजना के अंतर्गत समुद्रीय बंदरगाहों को रेल मार्ग से जोड़ा जाएगा। रेल मार्ग को रोड मार्ग से जोड़ा जा चुका है। इससे देश में यातायात की सुविधा में और अधिक सुधार देखने को मिलेगा। मल्टी मोडल कनेक्टीविटी इंफ़्रास्ट्रक्चर सिस्टम यदि देश में उपलब्ध होगा तो देशी एवं विदेशी निवेशक इन क्षेत्रों में अपना निवेश करने को आकर्षित होंगे। साथ ही, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूहों को भी हांगकांग की तर्ज़ पर विकसित करने के बारे में सोचा जा रहा है। इस प्रकार विदेशों से लौटे कुशल श्रमिकों के लिए रोज़गार के नए अवसर विकसित हो सकेंगे। प्रवासी मज़दूरों को भी रोज़गार के अवसर उपलब्ध करने हेतु एक विशेष योजना, गरीब कल्याण रोज़गार अभियान, चलायी गई है। कुल मिलाकर केंद्र सरकार लगातार यह प्रयास कर रही है कि देश में ग़रीब तबक़ा किस प्रकार आगे बढ़े। यह तबक़ा आगे बढ़ेगा तभी तो देश भी आगे बढ़ेगा। आय में असमानता कम होते ही जाना चाहिए। इसके लिए आधार ये ही होगा की देश का समग्र विकास हो। अधिक से अधिक किसान माध्यम वर्ग में आ जाए ताकि देश में आर्थिक पहिए की रफ़्तार तेज़ हो। उक्त सभी उपायों से भी देश में वित्तीय समावेशन की स्थिति में और अधिक सुधार होगा।
वित्तीय समावेशन में एक दूसरा पहलू भी है। वह यह कि देश के नागरिकों के बीच वित्तीय साक्षरता को कितना ज़्यादा से ज़्यादा फैलाया जा रहा है। वितीय सक्षरता के मामले में अभी हमारा देश बहुत पीछे हैं। देश का आम नागरिक अभी भी बैंक खातों एवं बीमा योजनाओं का सही सही मतलब नहीं समझ पाता है। शेयर बाज़ार के बारे में उनको कोई जानकारी नहीं है। यह ग़लती, दरअसल आम नागरिकों की नहीं है। इसके लिए हम सभी ज़िम्मेदार हैं क्योंकि इस ओर अभी तक हमने बहुत गम्भीरता से ध्यान ही नहीं दिया। वितीय समावेशन का अधिक फ़ायदा तभी हो सकता है जब वित्तीय साक्षरता भी हो। केंद्र में मोदी सरकार के नेत्रत्व में वित्तीय समावेशन का पहिला भाग तो देश में सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है तथा इसे और मज़बूत किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं परंतु अब दूसरे भाग की ओर भी उसी गम्भीरता से हम सभी को मिलकर ध्यान देना होगा। तब जाकर वित्तीय व्यवस्था में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकेगी।
एक समय भादों कृष्ण की चतुर्थी के दिन महादेव जी कहीं गये हुये थे तब पार्वती जी घर पर अकेली थी और उनके स्नान का समय हो रहा था। स्नान के दरम्यान कोई स्नानागार में प्रवेश न करें इस लिये उन्होंने सुरक्षा के लिये किसी गण के न होने पर अपने शरीर से मिट्टी निकालकर एक पुतला बनाकर उसमें प्राणसंचार कर उसे द्वार पर खड़ा कर दिया। कुछ समय बाद शिवजी लौटे और द्वार में प्रवेश करने को हुये तब उस पुतले ने उन्हें भीतर जाने से रोका। शिवजी नाराज हो गये और उसका सिर काटकर भीतर चले गये। शिवजी को भीतर आया देख पार्वती जी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा क्या तुम्हें द्वार पर किसी ने रोका नहीं? शिवजी ने विस्तार से बताया कि मुझे रोका था मैंने उसका सिर काट दिया। पार्वती जी दुखी होने के साथ क्रोधित हो गयी बोली, वह मेरे पुत्र समान था जब तक उसे जीवित न करोंगे मैं शांत नहीं होने वाली। शिवजी बाहर आये तो देखा उनका असली सिर कहीं गायब हो गया है तो उन्हें बड़ी असुविधा हुई। उन्होंने देखा जंगल में एक हाथी का बच्चा है उसका सिर उन्होंने काटकर जोड़़ दिया इस प्रकार गणपति की उत्पत्ति हुई। जिस समय शिवजी ने हाथी के बच्चे का सिर जोड़कर प्राण संचार किये वह दिन भादौ की चैदस के दिन के 12 बजे का था, तभी से उनके जन्म का समय यह तय हो गया।गणेश जी मंगल करने वाले और हर काम को सिद्ध करने वाले देवता के रूप में पूज्य हुये तब से किसी को भी कोई संकट या चोरी का अपवाद से बचने के लिये गणेश चतुर्थी का विधिवत व्रत करने एवं चान्दी, ताम्बे की गणेश प्रतिमा को दान करने का विधान है। स्कन्ध पुराण में उल्लेख किया गया है कि इस दुनिया में इस गणेश चतुर्थी का व्रत सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने किया था इसके बाद युधिष्ठिर ने यह व्रत करके कुरूक्षेत्र के रण में विजय प्राप्त की थी। श्रीकृष्ण द्वारा गणेश चतुर्थी व्रत करने के सम्बन्ध में कहा गया है कि द्वारकापुरी में निवास करने वाले अग्रसेन के पुत्र सत्रजीत के पास स्यमंतक मणि के चोरी हो जाने और उनके दूसरे बेटे प्रसेन की हत्या किये जाने का दोष श्रीकृष्ण पर लगा था तब उन्होंने यह व्रत किया था और इसके करने के बाद स्यमंतक मणि खोजकर सत्रजीत को लौटा दी थी। कथानुसार सत्रजीत ने सूर्यदेवता की कठोर पूजा के बाद स्यमंत मणि वरदान में दी और कहा कि जो पवित्र है वही इस मणि को धारण कर सकता है और कोई अपवित्र व्यक्ति इसे धारण करेगा तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। सत्रजीत सूर्य देवता से मणि प्राप्त करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण से मिला और पूरी बात सुनाई और उन्हें मणि पहनने को दिखाई। तब भगवान ने प्रसन्न होकर कहा कि यह मणि मुझे पहनने को मिलती तो अच्छी लगती यह बात सुनकर सत्रजीत भयभीत हो गया कि कहीं श्रीकृष्ण मुझसे यह मणि जबजस्ती न छीन ले। कृष्ण की बात सुन उनसे मणि वापिस लेकर सत्रजीत अपने घर आ गया और प्रतिदिन सुबह पूजन के बाद मणि के वजन का आठ गुना सोना प्राप्त कर दान देने लगा जिससे आसपास उसकी कीर्ति फैलने लगी। इस बात की जानकारी यादवों को मिलने पर वे महामंत्री अक्रूर के साथ सत्रजीत के पास वह मणि राजकोष के लिये माॅगने गये थे लेकिन सत्रजीत और प्रसेन ने वह मणि देने से इंकार कर दिया। अगले ही दिन सत्रजीत का छोटा भाई प्रसेन जंगल में शिकार के लिये निकला तब उसने अपने बड़े भाई से वह स्यमंतक मणि सुरक्षा की दृष्टि से घर में न रखकर अपने पास रखने की माॅग की जिसे सत्रजीत ने स्वीकार कर वह मणि उसे सौप दी। देर रात तक प्रसेन शिकार से नहीं लौटा तब सत्रजीत को आशंका हुई और उसने अपने पडौसियों को सारा अक्रूर द्वारा मणि माॅगने और उसके न देने का वृतांत सुनाया और कहा इसलिये उन्हें मणि न देने से उनके द्वारा मेरे छोटे भाई से मणि छीन कर उसकी हत्या कर दी गयी है। इसी अनुमान वे भाई को खोजने जंगल में पहुॅचे तब उन्हें उसके अंगवस्त्र मिले तब सबको विश्वास हो गया कि उनके भाई प्रसेन से मणि छीनकर हत्या कर दी है और यह आरोप श्रीकृष्ण के ऊपर लगे। द्वारकापुरी में हर व्यक्ति स्यमंतक मणि को छीनकर प्रसेन की हत्या के लिये कृष्ण को दोषी मानने लगा। तब कृष्ण सत्रजीत और गाॅववालों को लेकर उस स्थान तक पहुॅचे जहाॅ प्रसेन के अंगवस्त्र मिले थें । वे जंगल में आगे बढ़े तो उन्हें प्रसेन का धनुषबाण, मुकुट आदि प्राप्त हुये। कुछ दूर जाने पर उन्हें प्रसेन के शरीर के कुछ भाग मिले जिसे देख लगता था किसी जानवर ने उसके शरीर को अपना भोजन बनाया है। थोड़ी ही दूर बाद एक मृत शेर मिला और वहाॅ शेर और किसी रीछ की लड़ाई के पदचिन्ह दिखे। थोड़ी ही दूरी बार एक गुफा दिखी कृष्ण ने अपने संगी-साथियों को वही छोड़ गुफा में प्रवेश किया। गुफा काफी गहरी और लम्बी थी। गुफा के आखिरी छोर पर एक महलनुमा भवन दिखा जहाॅ एक झूले पर एक सुकुमार युवती झूला झूल रही थी और उसके हाथों में मणि थी जो गाना गाते और झूलते समय नीचे गिर गयी। वह मणि को उठाने बढ़ी कि श्रीकृष्ण ने तत्काल उस मणि को उठा ली। श्रीकृष्ण और उस युवती की नजरें मिली तो दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गये, तब युवती ने कहा कि मेरे पिताजी आये उसके पूर्व आप यह मणि लेकर चले जाये नहीं तो वे आपको जीवित नहीं छोड़ेगे। कृष्ण ने अपना शंख बजाया तब जामवंत जी आये और कृृष्ण और जामबंत में भिडन्त हो गयी जो 21 दिनों तक चली। गुफा के बाहर लोगों ने समझा कृष्ण मारे गये इसलिये वे वापिस लौट गये। 21 दिन बाद जामबंत युद्ध में हार गये तब उन्होंने श्रीकृष्ण को रामरूप में पहचान कर अपनी कन्या जामबंती का विवाह श्रीकृष्ण से कर उक्त मणि दहेज मंें दे दी। कृष्ण ने जामवंत से प्राप्त स्यंमतक मणि सत्रजीत को लौटा दी किन्तु सत्रजीत ने मणि न लेकर भगवान कृष्ण को अपनी पुत्री सत्यभामा का हाथ थमाकर वह मणि उन्हें सप्रेम भेंट कर दी। श्रीकृष्ण पर स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप लगने और उनकी सभी ओर निंदा होने पर स्कंद पुराण में नारद जी द्वारा बताया गया कि यह सब कलंक इसलिये लगा क्योंकि भगवान कृष्ण ने चैथ का चन्द्रमा देखा था। तब भगवान ने नारद जी से पूछा कि भादों की चैथ को चन्द्रमा देख लेने से कलंक क्यों लगता है? नारद जी ने बताया कि एक समय गणेश जी लडडू हाथों में लिये स्वर्ग जा रहे थे कि रास्ते में चन्द्रलोक पड़ा जहाॅ वे ठोकर खाकर गिर गये। उन्हें गिरा देख चन्द्रमा जोरों से हॅसा, गणेश जी को क्रोध आया, उन्होंने श्राप दे दिया तेरा मुॅह देखेगा कलंगी कहलायेगा। चन्द्रमा अपना मुॅह छिपाकर बैठ गया जिससे जगत में हाहाकार मच गया, सभी देवताओं ने ब्रम्हा जी की वस्तुस्थिति बतलाई। ब्रम्हा जी ने कहा कि गणेशजी की स्तुति करने के अलावा चन्द्रमा का श्राप और इस कलक को मिटाने का कोई मार्ग नहीं है। चन्द्रमा ने गणेश जी की विधिवत पूजा की तब गणेश जी प्रसन्न हुये किन्तु उन्होंने अपना पूरा श्राप वापिस नही ंलिया परन्तु उसे सीमित कर दिया कि जो केवल एक रोज गणेश चतुथी को चन्द्रमा को देखेगा वही कलंकित होगा। साथ ही उन्होंने नारद जी और देवताओं की प्रार्थना पर यह कहा कि अगर कोई गणेश चतुर्थी को विधिवत मेरी पूजा अर्चना करेगा वह इस कलंक से मुक्त होगा, जैसे की भगवान श्रीकृष्ण स्यमंतक मणि की चोरी के कलंक से मुक्त हुये थे।
एक जमाने में रांची को पागलों की रांची के नाम से जाना जाता था। शहर में अगर किसी दुकानदार या ग्राहक के बीच खरीदारी को लेकर विवाद छिड़ जाता तो वे एक-दूसरे को कहते-तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। कांके में जाकर इलाज कराओ। रांची का मतलब कांके पागलखाना हुआ करता था। रांची के सबसे बड़े मनोरोग चिकित्सक डा़ आर बी डेविस हुआ करते थे। जो सप्ताह में कई दिन कोलकाता में अपनी क्लिनिक में बैठते थे औरं एक दिन कोलकाता से पागलों को रांची लेकर आया करते थे। तब कहा जाता था कि रांची की रेलवे लाइन कोलकाता तक इसलिए जाती है कि वहां से पागलों को ढोकर रांची लाया जाये। कोलकाता से रांची आने वाली ट्रेन जब रांची रेलवे स्टेशन पर सुबह-सुबह पहुंचती थी तब लोग चिल्लाते थे कि ‘ पगली गाड़ी आ गयी। ‘
सच कहा जाये तो रांची ही वह गंजी खोपड़ी थी जो पूरे देश के दिमाग खराब लोगों के मस्तिक को ठीक करने में सक्षम थी। यहां का पागलखाना अंग्रेजों को भी बहुत पसंद था। यहीं कारण है कि यहां अंग्रेज पागलों के अलावा चीन के कई पागल भी आजादी के बाद तक दिखाई पड़ते थे। अंग्रेज भले ही भारत छोड़कर चले गये लेकिन पागल अंग्रेजों को कांके में भर्ती कराकर चुपचाप निकल भागे। अंग्रेजों को रांची इतनी पसंद थी कि मैक्लुस्कीगंज में मिनी इंग्लैंड बसा ली। यहां तक कि इडियन औरतों के साथ उत्पन्न अपनी संतानों को भी वे यहां छोड़ गये जिन्हें आज लोग एंग्लों इंडियन के नाम से जानते हैं।
पंडित नेहरू के जमाने में रांची फैशन के लिए भी जानी जाती थी। मेन रोड के एक कपड़े की दुकान पर लिखा मिलता था ’-नेहरू लीड्स नेशन, रांची लीड्स फैशन।‘ उसी दौर में मेन रोड के एक दुकानदार के बेटे ने अपने पिता के खिलाफ दुकान के सामने ही धरना दे दिया था।
एक समय रांची में वह दौर भी आया जब झारखंड आंदोलन के वक्त नारे लगते थे ’-इस पार न उस पार चलो बिहारी गंगा पार।‘ अब तो झारखंड बन गया और रांची राजधानी भी बन गयी लेकिन कितने बिहारी गंगा पार गये यह तो रांची के लोग बखूबी जानते हैं। अब तो अधिकांश नारे लगाने वाले रहे नहीं कि वे गंगापार जाकर देख ले कि कितने बिहारी रांची से वहां लौटे हैं। झारखंड आंदोलन के दिनों में गंगापार का नारा लगाने वालों को हर गोरी चमड़ी में बिहारी ही नजर आता था। आंदोलन के दिनों में एक बार मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा रांची के वेलफेयर सेंटर मैदान में आंदोलनकारियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा-हमलोगों को अपने पैरों पर खड़ा होना होगा और आगे बढ़ना होगा। तब वहां जमीन पर बैठे आंदोलनकारी उठ खड़े हुए और आगे बढ़ गये। तब उन्हें जयपाल सिंह को कहना पड़ा ’ मैं ऐसा करने के लिए नहीं कह रहा हॅूं।‘
रांची का अर्थ ही होता है ’ रंगीली ’। श्रीकृष्ण भक्त कवयित्री मीरा ने लिखा है-मैं तो गिरधर के रंग राची। इसका मतलब है वह गिरधर के रंग में रच गयी थी। इसी तरह रांची ने भी किस्म-किस्म के रंग देखे। यहां कल कारखानों के लिए मशीनें बनाने वाली एचईसी कारखाने की स्थापना की गयी। यहां कि धमन भट्ठी हमेशा धधकती रही और बड़े-बड़े लोहे को गलाकर मशीनें बनाती रही। तब लोग रांची को एचईसी के कारण जानते थे। अब रांची भारतीय क्रिकेट संघ के क्रिकेट सम्राट महेन्द्र सिंह धोनी के नाम से जानी जाती है। धोनी हेलीकाप्टर शाट की बल्लेबाजी करने के नाम पर और अपनी बालों की स्टाइल के कारण जाने जाते हैं।
धोनी के रिटायरमेंट की खबर से सबसे ज्यादा वही बिहारी रोये जिन्हें लोग गंगा पार जाने के लिए कहते थे। पटना की सड़कों पर युवाओं ने जार-बेजार आंसू बहाये। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धोनी को युवाओं के लिए प्रेरणा श्रोत बताया। धोनी को चिट्ठी लिखकर कहा कि आपमें नये भारत की आत्मा झलकती है। हालांकि इससे पहले भारत की आत्मा गांवों में बसती थी। यही कारण है कि धोनी रांची शहर को छोड़कर सिमलिया गांव में जाकर बस गये। वहां फार्म हाउस बनाया और खेती करते हुए का फोटो भी लोगों के साथ शेयर की।
अब कोई इससे इनकार नहीं कर सकता कि धोनी की आत्मा भी गांवों में बसती है। क्रिकेट के बाद धोनी कुछ नहीं तो सिमलिया गांव स्थित अपने फार्म हाउस में खेती तो कर ही सकते हैं।
प्रसिद्ध कथाकार करतार सिंह दुग्गल जब आकाशवाणी रांची के सहायक निदेशक हुआ करते थे तब उन्हें एक बार कांके पागलखाना जाने का मौका मिला था। उन्होंने लिखा है कि मैं जब पागलखाने गया तो कुछ पागल मेरे पास आ गये। उनमें से एक पागल ने कहा-मैं महात्मा गांधी हॅूं। तब वहां खड़े दूसरे पागल ने कहा तुम्हें किसने कहा कि तुम महात्मा गांधी हो, तो उसने उत्तर दिया कि मुझे खुद महात्मा गांधी ने कहा है कि मैं महात्मा गांधी हॅूं। तब वहां खड़े तीसरे पागल ने कहा लेकिन मैंने ऐसा तो नहीं कहा था।
नगालैंड की समस्या हल होते-होते फिर उलझ गई है। 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद नगा नेताओं से जो समझौता करवाया था, वह आजकल खटाई में पड़ गया है। नगा विद्रोहियों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल सोश्यलिस्ट कौसिंल आॅफ नगालिम’ के नेता टी. मुइवाह आजकल दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और धमकियां दे रहे हैं कि उन्हें भारत के विरुद्ध फिर हथियार उठाने पड़ेंगे। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि नगालैंड के वर्तमान राज्यपाल आर.एन. रवि और मुइवाह के बीच तलवारें खिंच गई हैं। रवि मूलतः भारत सरकार के अफसर रहे हैं और वे बरसों से नगा-विद्रोहियों से शांति-वार्ता चला रहे हैं। वे सफल वार्ताकार के तौर पर जाने जाते हैं लेकिन पिछले साल जुलाई में उन्हें नगालैंड का राज्यपाल बना दिया गया। जब से वे राज्यपाल बने हैं, उन्हें नगा-सरकार के अंदरुनी सच्चाइयों का पता चलने लगा है। उन्होंने नगा मुख्यमंत्री एन.रियो को भी साफ-साफ कहा और अपने स्वतंत्रता-दिवस भाषण में भी खुले-आम बोल दिया कि नगा-प्रदेश आपाद-मस्तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। केंद्र से आने वाला धन नगा-जनता के कल्याण के लिए खर्च होना चाहिए लेकिन वह उसके पास पहुंचने के पहले ही साफ हो जाता है। उन्होंने नगा-संगठन का नाम लिए बिना यह दो-टूक शब्दों में कह दिया कि नगा-प्रदेश में ‘हथियारबंद गिरोह’ एक समानांतर सरकार चला रहे हैं। उधर राज्यपाल रवि के खिलाफ नगा-संगठन ने कटु अभियान छेड़ दिया है। जब 2015 में उस समझौते पर दस्तखत हुए तो उसे उजागर नहीं किया गया था लेकिन मुइवाह का कहना है कि समझौता तभी लागू होगा, जबकि उन तीन मांगों पर अमल होगा। नगालैंड का अपना संविधान होगा, अपना ध्वज होगा और आस-पास के प्रदेशों में फैले नगा इलाकों को जोड़कर वृहद नगालैंड उन्हें दिया जाएगा। हो सकता है कि वार्ताकार के नाते रवि ने नगा नेताओं को कुछ गोलमाल भरोसा दे दिया हो लेकिन राज्यपाल के नाते पिछले साल भर में इन नेताओं से उनकी अनबन हो गई हो। यों भी वार्ताकार की अनौपचारिक और मैत्रीपूर्ण हैसियत तथा राज्यपाल के औपचारिक रुतबे में काफी फर्क होता है। व्यक्तिगत तालमेल के बिगड़ने से नगा-समझौता भी बट्टेखाते में चला जाए, यह ठीक नहीं है। केंद्र सरकार चाहे तो नगा नेताओं के साथ नए सिरे से वार्ता शुरु कर सकती है और रवि का किसी दूसरे राज्य में तबादला भी कर सकती है।
कोविड के चलते आधा दर्जन गैर भाजपा सूबों की सरकारों और देशभर के अलग-अलग संस्थानों के अंतिम वर्ष के 31 छात्रों का उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी संवैधानिक बॉडी- यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जबर्दस्त टकराव जारी है। दरअसल फाइनल ईयर एग्जाम के विरोधी चाहते हैं, कोरोना महामारी के कारण अंतिम वर्ष की परीक्षा न कराकर प्रमोट पॉलिसी अपनाई जाए। इन सभी छात्रों को पिछले सेमेस्टर या परीक्षाफल के आधार पर डिग्री दे दी जाए, लेकिन शिक्षा और यूजीसी इससे कतई सहमत नहीं हैं। शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक कहते हैं, ‘कोरोना डिग्री’ नहीं देंगे। वैश्विक बाजार में इससे न केवल देश की शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठेंगे बल्कि छात्रों को भी शोध से लेकर जॉब तक में तमाम दुश्वारियां आएंगी। यूजीसी चाहती है, अंतिम वर्ष के स्टुडेंट्स के पास काबिलियत की डिग्री होनी चाहिए। यूजीसी की नई गाइडलाइन्स के मुताबिक ऑनलाइन/ऑफलाइन या ऑफ और ऑनलाइन ये परीक्षाएं सितम्बर अंत तक हो जानी चाहिए, लेकिन यूजीसी का यह फरमान न तो देश की गैर भाजपाई सरकारों-दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा आदि को रास आ रहा है और न ही चुनिंदा छात्रों के गले उतर रहा है। इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग याचिकाओं के जरिए इंसाफ के लिए दस्तक दी है। इस बड़ी अदालत में यूजीसी ने भी हल्फनामा दायर कर दिया है-लिखित परीक्षा यानी काबिलियत की डिग्री क्यों जरुरी है। उच्चतम न्यायालय करीब के माह से इस पर सुनवाई कर रहा है। प्रस्तावित एग्जाम की मुखालफत में पैरवी कर रहे चुनिंदा वकीलों में नामचीन अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी भी हैं। दोनों पक्षों को सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने अंतिम फैसला सुरक्षित कर लिया है। सभी पक्षों को अपनी दलीलें लिखित में पेश करने का आदेश दिया है। उम्मीद की जा रही है, बड़ी अदालत जल्द ही अपना फैसला सुना देगी- अंतिम वर्ष के यूजी और पीजी के ये लाखों स्टुडेंट्स परीक्षा देंगे या उन्हें इंटरनल असेसमेंट और पूर्व सेमेस्टर के प्रदर्शन पर प्रमोट करके डिग्री दे दी जाए।
शिक्षण के बिना परीक्षा कैसे
वरिष्ठ वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की बेंच के सामने कहा, अनुच्छेद 14 को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। परीक्षा अपने आप में एक अंत नहीं है। परीक्षा शिक्षण के बाद होनी चाहिए। उन्होंने कहा, यह मुद्दा- छात्रों के जीवन और सेहत से जुड़ा है। डॉ. सिंघवी याचिकाकर्ता यश दुबे की ओर से दायर याचिका पर बहस में हिस्सा ले रहे थे। यश दुबे ने यूजीसी के 30 सितम्बर तक फाइनल ईयर के एग्जाम कराने को चुनौती दी है। सीनियर वकील डॉ. सिंघवी ने पूछा, शिक्षण और परीक्षा लेने के बीच एक सीधा सम्बन्ध है, शिक्षण के बिना परीक्षा कैसे हो सकती है। गृह मंत्रालय ने भी अब तक शैक्षिणक संस्थानों को खोलने की अनुमति ही दी है, लेकिन परीक्षा आयोजित करने की मंजूरी दे दी है। यहां परीक्षा विशेष नहीं है। यहां महामारी विशेष है। महामारी हर किसी पर और हर चीज पर लागू होती है। परीक्षा के आयोजन को लेकर यूजीसी के पास कोई सुसंगत रुख नहीं है, क्योंकि यूजीसी पहले के परिपत्र में बढ़ते कोविड-19 को लेकर आशंका जता चुका है।
यूजीसी की गाइडलाइन्स संघवाद पर हमला
डॉ. सिंघवी ने कहा, यूजीसी का यह दिशा निर्देश संघवाद पर हमला है। राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर फैसला लेने की स्वायत्तता होनी चाहिए। कोई भी सामान्य समय में परीक्षा के खिलाफ नहीं है। हम महामारी के दौरान परीक्षा के खिलाफ हैं। सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए सीनियर वकील श्री श्याम दीवान ने शीर्ष अदालत से कहा, फाइनल ईयर के स्टुडेंट्स की हेल्थ भी उतनी ही अहमियत रखती है, जितनी अन्य बैच के स्टुडेंट्स की रखती है। इन दिनों स्टुडेंट्स को ट्रांस्पोर्टेशन और कम्युनिकेशन से जुड़ी काफी दिक्कतें आ रही हैं। महाराष्ट्र के कई कॉलेज क्वारंटाइन के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ओडिशा जनरल एडवोकेट अरविन्द दातार कहते हैं, अगर आईआईटी जैसे केंद्रीय संस्थान एग्जाम रद्द कर सकते है तो विवि एग्जाम रद्द क्यों नहीं कर सकते? दिल्ली, पश्चिम बंगाल, पंजाब और तमिलनाडु के तो मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इन गाइडलाइन्स को वापस लेने की मांग की है। इसके अलावा यूजीसी के पूर्व चेयरमैन प्रो.सुखदेव थोराट 27 और शिक्षाविदों के साथ पहले ही यूजीसी को पत्र लिखकर यह परीक्षाएं रद्द कराने की मांग कर चुके हैं। इन शिक्षाविदों ने पत्र में पूछा है, जो लोग यह तर्क दे रहे हैं कि परीक्षा रद्द होने से डिग्रियों का मूल्य कम हो जाएगा, उन्हें यह भी बताना चाहिए कैसे एक वर्चुअल एग्जाम से डिग्री की वैल्यू बढ़ जाएगी।
छात्रों का छलका दर्द, संवेदनशील नहीं यूजीसी
छात्रों का कहना है, यूजीसी स्टुडेंट्स को जीवन और करियर में किसी एक को चुनने पर विवश कर रही है, जिसे लेकर वे बहुत तनाव में हैं। छात्रों के सामने इंटरनेट कनेक्टिविटी से लेकर पाठ्यक्रम पूरा न होने जैसी कई समस्याएं सामने हैं। छात्रों की मुश्किलें हैं कि देशभर के कॉलेज होली की छुट्टियों के समय से ही बंद हैं। छात्रों की स्टडी मेटेरियल हॉस्टल के कमरों में बंद हैं। 20 से 30 प्रतिशत सिलेबस भी पूरा नहीं हुआ है। ऐसे में परीक्षा कैसे दे सकते हैं? छात्रों का कहना है कि महामारी के दौर में हमें सरकार से मदद की उम्मीद थी, जबकि सरकार हमें मौत के मुंह में धकेल रही है। यदि हम ऑफलाइन परीक्षा देते हैं। परीक्षा देने के लिए हॉस्टल में रुकते हैं, तो यहां सोशल डिस्टेंसिंग संभव नहीं है। छात्र एक ही कमरा, बाथरूम और मेस शेयर करते हैं। मकान मालिक हमें किराये पर कमरा देने के लिए तैयार नहीं हैं।
राज्यों को परीक्षा रद्द करने का अधिकार नहीं
यूजीसी ने दिल्ली और महाराष्ट्र में राज्य के विश्वविद्यालयों में फाइनल ईयर की परीक्षाएं रद्द करने के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा, ये नियमों के खिलाफ है। राज्यों को परीक्षाएं रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से जानना चाहा कि क्या राज्य आपदा प्रबंधन कानून के तहत यूजीसी की अधिसूचना और दिशानिर्देश रद्द किये जा सकते हैं? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत से कहा कि राज्य सरकारें आयोग के नियमों को नहीं बदल सकती हैं, क्योंकि यूजीसी ही डिग्री देने के नियम तय करने के लिए अधिकृत है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह छात्रों के हित में नहीं है कि वे परीक्षा आयोजित न करें। उन्होंने तर्क दिया कि यूजीसी एकमात्र निकाय है जो एक डिग्री प्रदान करने के लिए नियमों को बना सकता है और राज्य सरकारें नियमों को बदल नहीं सकती हैं। मेहता ने न्यायालय को बताया कि करीब 800 विश्वविद्यालयों में से 290 विवि में परीक्षाएं हो चुकी हैं। इनमें यूपी की तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी दीगर प्राइवेट विवि में इस मायने में अव्वल रही, मेडिकल और डेंटल कॉलेजों को छोड़कर न केवल वह फाइनल ईयर के एग्जाम करा चुकी है बल्कि 31 जुलाई तक सभी रिजल्ट भी घोषित कर चुकी है। श्री मेहता ने कहा, 390 विवि परीक्षा कराने की प्रक्रिया में हैं। यूजीसी के अनुसार, स्टुडेंट्स के एकेडमिक सत्र को बचाने के लिए फाइनल ईयर एग्जाम कराए जाने जरूरी हैं और चूंकि डिग्री यूजीसी की ओर से दी जाएगी, ऐसे में परीक्षाएं कराने या न कराने का अधिकार भी उसी का होना चाहिए।
फाइनल ईयर के एग्जाम नहीं कराए तो डिग्री अमान्य
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील डॉ. सिंघवी ने कोर्ट से कहा कि अप्रैल के महीने में जारी हुई गाइडलाइन्स को यूजीसी ने जुलाई के महीने में बदल दिया है। इस पर कोर्ट ने कहा कि यूजीसी को ऐसा करने का अधिकार है और वे ऐसा कर सकते हैं। इस पर डॉ. सिंघवी ने कहा कि जुलाई में जारी हुई गाइडलाइन्स अप्रैल वाली गाइडलाइन्स से भी ज्यादा सख्त हैं। उन्होंने कोर्ट में यह भी कहा कि देश में कई सारे ऐसे विश्विद्यालय हैं, जहां ऑनलाइन परीक्षाओं के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। डॉ. सिंघवी की इस दलील पर कोर्ट ने कहा कि यूजीसी की गाइडलाइन्स में परीक्षाएं ऑफलाइन देने का भी विकल्प है। इस पर डॉ. सिंघवी ने कहा कि लेकिन बहुत से लोग स्थानीय हालात या बीमारी के चलते ऑफलाइन परीक्षा नहीं दे पाएंगे। उन्हें बाद में परीक्षा देने का विकल्प देने से और भ्रम फैलेगा। डॉ. सिंघवी की इस दलील पर कोर्ट ने कहा कि ये फैसला तो छात्रों के हित में ही दिखाई दे रहा है। सुनवाई में यूजीसी ने यह भी कहा है कि यदि यूनिवर्सिटी फाइनल ईयर एग्जाम आयोजित नहीं करती है तो डिग्री को मान्यता नहीं दी जाएगी।
क्या मूस्लिम समाज वास्तव में भयभीत है या फिर सवा करोड़ के मुस्लिम युवाओं के क्लब के गठन द्वारा आक्रांताओं की जड़ों को गहरा करके अपने पूर्वाग्रहों के कारण इस्लामिक चक्रव्यूह में घेरने के लिये भारत को एक और चुनौती दे रहा है ? समाचारों से ज्ञात हुआ है कि इस्लामिक संस्था : दारुल-उलूम, देवबंद में पिछले दिनों 24 जुलाई को जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना सैय्यद महमूद मदनी सहित अनेक उलेमाओं और मौलानाओं के समक्ष एक सौ मुस्लिम युवकों द्वारा शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन किया गया है। लेकिन उसकी तुलना देश की किसी सैनिक अकादमी में हुई “पास आउट परेड” के प्रशिक्षित सैन्य अधिकारियों से की जाय तो संभवतः कुछ अतिशयोक्ति हो सकती है ? वैसे पूर्व राज्यसभा सांसद मौलाना मदनी ने 100 मुस्लिम युवाओं का विश्व के एक प्रमुख इस्लामी केंद्र देवबंद (भारत) में तथाकथित कला का प्रदर्शन कराकर अपनी अराष्ट्रीय मानसिकता का परिचय कराया है। देश के पांच राज्यों के ‘मेवात’ सहित 16 जनपदों से आये हुए इन प्रशिक्षित युवकों के कला प्रदर्शन के माध्यम से ‘जमीयत उलेमा-ए-हिन्द’ ने “जमीयत यूथ क्लब” के गठन व उसकी भावी योजनाओं को संभवतः पहली बार उजागर किया है। जमीयत की इस योजनानुसार प्रति वर्ष साढ़े बारह (12.5) लाख मुसलमान नवयुवकों को “विशेष प्रशिक्षण” देकर तैयार किया जा रहा है। मौलाना मदनी का मानना है कि ऐसा प्रशिक्षण पाने से कोई भी बाहरी शक्तियां इन मुस्लिम युवकों का कुछ भी नहीं बिगाड़ पायेगी। इस प्रकार आगामी दस वर्षों में अर्थात सन 2028 तक देश के एक सौ जनपदों के सवा करोड़ (1.25 करोड़) मुस्लिम नवयुवकों को विशेष प्रशिक्षित किया जायेगा।समाचारों के अनुसार जमीयत की इस योजना में मान्यता प्राप्त ‘भारत स्काउट व गाइड’ का भी सहयोग लिया जा रहा है। इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द, जमीयत युथ क्लब व भारत स्काउट व गाइड मिलकर देश की सेवा करेंगे। इन योजनाओं पर होने वाला सारा व्यय केवल जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ही वहन करेगी। ऊपरोक्त परिप्रेक्ष्य में ऐसा प्रतीत होता है कि जमीयत देश की वर्तमान शासकीय व प्रशासकीय व्यवस्थाओं को अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में बाधक मानकर मुस्लिम समुदाय को भ्रमित करके देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बिगाड़ना चाहती है। धर्म या सम्प्रदाय विशेष को ऐसा सशक्त बल या समूह या क्लब बनाने को क्या हमारा संविधान अनुमति देगा ? क्या इस प्रकार ‘भारत स्काउट व गाइड’ के नाम का सहारा लेकर व सुरक्षा के बहाने देश को भ्रमित किया जा सकता है ? जबकि वर्षों से यह स्पष्ट है कि भारतीय मुसलमानों को आम नागरिकों से अधिक अधिकार मिले हुए हैं। उनको लाभान्वित करने के लिये अल्पसंख्यक आयोग व मंत्रालय सहित अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं, फिर भी उनको अपनी सुरक्षा के प्रति “भय” क्यों ? क्या यह “भय” मुस्लिम समाज को भयभीत करके देश में साम्प्रदायिक वातावरण बिगाड़ने के लिये तो नहीं ? यदि मुस्लिम समाज अपनी इस्लामिक विचारधारा को ही सत्य मानेगा और विश्व के अन्य समाजों की विचारधाराओं और संस्कृति को अपने अनुरूप बनाने की अंतहीन जिहादी सोच में परिवर्तन नहीं करेगा तो उनमें अन्यों के साथ जियो और जीने दो की सुखद भावना का विकास कैसे होगा? मानवीय सिद्धान्तों और नैतिक मूल्यों को इस्लामी जगत को स्वीकार्य होना ही चाहिये। आज सभ्य समाज को यह स्वीकार नहीं है कि कोई आतंकियों की तरह उन्हें भयभीत करें और उनको क्षति पहुंचाता रहे। यह सर्वथा अनुचित है कि सहिष्णुता के नाम पर विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों के प्रति भारतीय समाज सहनशील बना रहे ? कुछ षड्यंत्रकारी जमीयत यूथ क्लब की तुलना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से करके इसे उचित ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि संघ दशकों से भारतीय मूल्यों की रक्षा के साथ- साथ सम्पूर्ण भारतीय समाज, उसमें हिन्दू-मुस्लिम- सिख-ईसाई आदि सभी की अनेक प्रकल्पों द्वारा सेवा करता आ रहा है। इसके अतिरिक्त ‘मॉब लिंचिंग’ का भी भय दिखा कर इस प्रकार के संगठन के गठन को उचित बताने वाले भी हिन्दू विरोध की अवधारणाओं से ग्रस्त है। जबकि ‘मॉब लिंचिंग’ या ‘भीड़ हत्या’ या “सामूहिक अत्याचारों” से भरे मुगलकालीन इतिहास व वर्तमान को भुला कर चालबाज बुद्धिजीवियों ने “लव जिहाद व गौहत्या” आदि के विवादों में हिंदुओं को ही दोषी मानकर भ्रमित प्रचार करने का माध्यम बना दिया है। क्या यह सर्वविदित नहीं है कि हिन्दू समाज उदार व अहिंसक होने के कारण मुस्लिम कट्टरपंथियों व आतंकवादियों की हिंसात्मक गतिविधियों का वर्षो से शिकार होता आ रहा है ? ऐसे में हैदराबाद के अकबरुद्दीन ओवैसी की विषैली फुफकार को भी भुलाया नहीं जा सकता जब उसने आदिलाबाद में 24 दिसम्बर 2012 को एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि पंद्रह मिनट को पुलिस हटा लो हम मुसलमान करोडों हिंदुओं पर भारी पड़ेंगे।फिर भी मुस्लिम समाज अपनी तथाकथित सुरक्षा के नाम पर सशक्त सेना के समान एक विशाल संगठन खड़ा कर रहा है, क्यों ? क्या यह भारत के इस्लामीकरण करने की जिहादी सोच के मिशन का भाग तो नहीं ? आपको स्मरण रखना होगा कि काग्रेसी नेता और भारत सरकार के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की सोच थी कि “भारत जैसे देश को जो एक बार मुसलमानों के शासन में रह चुका है, कभी भी त्यागा नहीं जा सकता और प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है कि उस खोयी हुई मुस्लिम सत्ता को फिर प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करे”। जमायते इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी ने पाकिस्तान बनने का विरोध तो नहीं किया परंतु थोड़ा दुख व्यक्त करते हुए कहा था कि “हम तो पूरे भारत को ही इस्लामी देश बनाना चाहते थे”। विभिन्न मुस्लिम नेताओं के अनेक ऐसे ऐतिहासिक कथन अभी तक मुसलमानों के अन्तःस्थल में छलकते रहते हैं। क्योंकि इस्लाम का संकल्प है जिहाद और अंतिम लक्ष्य भी परंतु यह अन्तहीन संघर्ष मानवता विरोधी है। अतः जब संसार को दारुल-हरब और दारुल-इस्लाम में विभाजित करके देखने वालों की देशभक्ति स्वाभाविक रूप से संदेहात्मक हो तो उसका दोषी कौन होगा ? निःसंदेह कट्टरपंथी मौलानाओं ने जमीयत यूथ क्लब के नाम से सवा करोड़ की एक प्रशिक्षित इस्लामिक फौज की तैयारी का अपना गुप्त एजेंडा उजागर करने से पहले विचार-विमर्श अवश्य किया होगा। क्या ऐसे में यह सोचना अनुचित होगा कि इस क्लब को देशव्यापी विभिन्न आतंकवादी संगठनों व उनके स्लीपिंग सेलों तथा ओवर ग्राउंड वर्करों का जो पहले से ही प्रशिक्षित हैं, सहयोग मिलेगा ? इसके अतिरिक्त यह भी संभावना हो सकती है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान व इस्लामिक स्टेट आदि के आतंकी और पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई.एस.आई. आदि जिहाद के लिये इस यूथ क्लब से जुड़ कर देश के अनेक भागों में आतंकवादी घटनाओं द्वारा राष्ट्रीय वातावरण को दूषित करने में सफल हो सकेंगे ? यह कितना विचित्र व दुखदायी है कि इस्लाम में धर्मांतरित होने वाले भारतीय नागरिक अपने पूर्वजों व अपनी मूल संस्कृति एवं इतिहास में कोई आस्था नहीं रखते बल्कि अपने ही गैर मुस्लिम देशवासियों के प्रति घृणा करने के साथ साथ लूटमार व मारकाट आदि अत्याचारों से उनको भयभीत करने से भी नहीं चूकते। ऐसा कहा जाता है कि इस प्रकार के अत्याचारों के लिये आक्रामक बने रहने वालों को ही सच्चा मुसलमान माना जाता है। अतः कोई इस धोखे में न रहे कि इस्लाम शांति व प्रेम का संदेश देने वाला धर्म/मज़हब है। ये तथाकथित शांतिदूत अपनी अपरिवर्तनीय कट्टरपंथी विद्याओं से यही सीखते और सिखाते है कि दुनिया में गैर ईमानवालों और अविश्वासियों को जीने का अधिकार ही नहीं। देवबंद में स्थित इस्लाम जगत की प्रमुख संस्था दारुल-उलूम व अन्य इस्लामिक संस्थाओं से प्रेरित होकर देश-विदेश के विभिन्न भागों में लाखों मकतब, मदरसे व मस्जिदें स्थापित हो चुकी हैं जिनका मुख्य उद्देश्य जिहाद के लिये जीना और जिहाद के लिये ही मरना माना जाता है। क्या ऐसे में जमीयत उलेमा-ए-हिन्द द्वारा पोषित यूथ क्लब से सैकड़ों-हज़ारों मौलानाओं को यह आशा बंधी होगी कि ऐसे प्रशिक्षित युवक इस्लामिक चक्रव्यूह में भारत को घेरने में उनका सहयोग करेंगे और भारत को दारुल-इस्लाम बनाने का उनका सदियों पुराना सपना सच हो सकेगा ? क्या भारत सरकार देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बिगाड़ने वाले ऐसे षड्यंत्रकारियों के प्रति कोई वैधानिक कार्यवाही कर सकती है ? जब सामान्यतः विवादित मठों और मंदिरों का सरकार अधिग्रहण कर लेती है तो फिर देश की मुख्य धारा से दूर करके देशवासियों में अलगाववादी भावना भरने वाले मदरसों व मस्जिदों का अधिग्रहण राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से और भी आवश्यक हो जाता है। आज सम्पूर्ण राष्ट्रवादी समाज देश के इस्लामीकरण या दारुल-इस्लाम बनाये जाने के विरुद्ध है परंतु ऐसे सशक्त इस्लामिक चक्रव्यूह की बढ़ती एक और चुनौती का सामना कैसे किया जायेगा, इसका चिंतन आवश्यक व अनिवार्य है ? अतः आज यह सोचना अति महत्वपूर्ण है कि क्या भारतीय मुस्लिम समाज अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति व नैतिक मानवीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा देकर उनमें गैर मुस्लिमों के प्रति घृणा की भावना को समाप्त करने के आवश्यक उपाय करेगा ? क्या जमीयत उलेमा हिन्द व अन्य मुस्लिम संस्थायें कभी ऐसे प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना करेंगी जिसमें ऐसा मुस्लिम युवा तैयार हो जो “अरब व पाकिस्तान” के स्थान पर “भारत” को अपना आदर्श मान कर अपने पूर्वजों की संस्कृति को अपनाये। क्यों नहीं कोई मुस्लिम सुधारवादी व बुद्धिजीवी नेता मदरसों को केवल राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति के अनुरूप बना कर इस्लामिक आतंकवाद पर अंकुश लगाने का साहस करता ? इस्लामिक चक्रव्यूह में भारत को घेरने की बार-बार चुनौती देने वाले कट्टरपंथी मुस्लिम समाज को अपने धर्म ग्रंथ कुरान की उन आपत्तिजनक आयतों में संशोधन करना होगा जो अविश्वासियों के प्रति जिहाद करने को उकसाती हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द को राष्ट्र की मुख्य धारा में जोड़ने के लिये मुस्लिम समाज को ऐसा प्रशिक्षण देना चाहिये जिससे वे देश के संविधान का सम्मान करे और भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की संस्कृति को अपनाते हुए “सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय” में विश्वास करना सीखे। अतः वर्तमान आधुनिक युग में परिवर्तित परिस्थितियों के अनुकूल स्वयं को ढालना ही जीवन को भयमुक्त करके सुरक्षित रखने व सेवा करने का सर्वोत्तम उपाय है।
अब तक सड़क पर पडे़ जिस गोबर के पांव में लगने भर से हम आक्रोशित हो जाते हैं, वही गोबर अब छत्तीसगढ़ के लाखों किसानों और पशुपालकों के लिए आय का माध्यम बन रहा है। राज्य सरकार ने गोधन न्याय योजना के तहत प्रदेश भर में किसानों और पशुपालकों से गोबर खरीदने की नई योजना शुरू की है। जिससे कम लागत पर वर्मी कंपोस्ट (जैविक खाद) बना कर पुनः किसानों को जैविक खाद के रूप में सस्ते दामों पर बेचीं जाएगी। ताकि किसान रासायनिक खेती को छोड़कर जैविक खेती की ओर प्रोत्साहित हो सकें। योजना का क्रियान्वयन राज्य के कृषि एवं पंचायत विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में इस वर्ष 20 जुलाई (हरेली पर्व) से शुरू हुई गोधन न्याय योजना के अंतर्गत सरकार द्वारा ग्रामीणों से दो रूपए प्रति किलो की दर से गोबर खरीदी जा रही है। यह कार्य प्रत्येक गांवों में स्थित गौठान (पशुओं को एक साथ रखने का स्थान) समिति और स्वसहायता समूह के सहयोग से किया जा रहा है। खरीदी केन्द्र में गोबर बेचने के लिए सभी हितग्राहियों को पंजीकृत करके गोबर क्रय पत्रक दिया गया है। क्रय पत्रक में रोजाना गोबर खरीदी की मात्रा, राशि दर्ज की जा रही है। जिसका भुगतान प्रत्येक 15 दिनों में हितग्राही के बैंक खाते में सीधे हो रहा है। योजना की शुरूआत यानि 20 जुलाई से 1 अगस्त तक राज्य में कुल 4140 गौठानों में 46 हजार 964 हितग्राहियों द्वारा 82 हजार 711 क्विंटल गोबर का विक्रय किया गया है। जिसकी कुल राशि 2 रूपए प्रति किलो की दर से 1 करोड़ 65 लाख रूपए पशुपालकों को भुगतान किया जा चुका है।
खरीदे हुए गोबर से वर्मी कंपोस्ट (जैविक खाद) बनाने का कार्य स्व-सहायता समूहों द्वारा ही किया जा रहा है। जिसके लिए कृषि विभाग से उन्हें प्रशिक्षण भी मिला है। खाद बनाने के सभी गौठानों में 1000 किलो की क्षमता वाले बडे़-बडे़ वर्मी टांके बनाए जा रहे हैं। जहां 1000 किलो गोबर से 700 किलो वर्मी कंपोस्ट का निर्माण किया जा रहा है। खाद तैयार होने में 45 दिनों का समय लगेगा। इस तरह 45-45 दिनों के चक्र में गोबर की खरीदी और खाद बनाने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। जिसके बाद तैयार खाद का विशेषज्ञों द्वारा गुणवत्ता परीक्षण करके दो, पांच और तीस किलो के बैग में पैकिंग की जाएगी। इसे पुनः प्रदेश के किसानों और बागवानी में दिलचस्पी रखने वालों को 8 रूपए प्रति किलो की दर से बेचा जाएगा। इससे प्रदेश के किसान जो वर्तमान में रासायनिक खाद को महंगे दामों में खरीदकर खेतों में उपयोग कर रहे हैं, वह गौठानों में तैयार इन जैविक खादों का उपयोग कर सकेंगे। इससे न केवल उनके ज़मीन की उर्वरक क्षमता बढ़ेगी बल्कि लोगों को भी सेहतमंद और पौष्टिक अनाज उपलब्ध हो सकेगा।
पशुओं का गोबर आय का जरिया बन जाने से प्रदेश के किसान और पशुपालक खुश हैं। वह पशुपालन को लेकर उत्साहित हैं तथा बड़ी संख्या में ग्रामीण गोबर खरीदी केन्द्र में गोबर बेचने जा रहे हैं। कांकेर जिले के भी 2 हजार 221 पशुपालकों ने योजना की शुरूआत के पहले 15 दिनों में 2,500 क्विंटल से ज्यादा गोबर बेचा है। दुर्गकोंदल ब्लाॅक के ग्राम हाटकोंदल की महिला किसान यशोदा भुआर्य, शमिता उयके, नंदनी, प्रमीला और सुमति पटेल सहित अन्य महिलाओं ने बताया कि वह पहले अधिकतर गोबर को फेंक दिया करती थीं, लेकिन अब वही गोबर के दो रूपए प्रति किलो पैसा मिलने से उसे इकठ्ठा करके रोज बेच रही हैं। इसी तरह भानुप्रतापपुर विकासखण्ड के ग्राम मुंगवाल के रति राम कुमेटी के पास एक भी पालतू मवेशी नहीं है, उसके बाद भी वह 70 से 80 किलो गोबर का विक्रय प्रतिदिन गौठान में कर रहे हैं। पूछने पर बताया कि खेती किसानी से फुर्सत के क्षणों में सुबह-शाम घूम-घूमकर गोबर इकट्ठा करते हैं और उसे गौठान समिति को बेच देते हैं। इस अतिरिक्त आय से उनके घर की आर्थिक स्थिति भी सुधर रही है।
दूर्गूकोंदल ब्लाक स्थित ग्राम पंचायत सिवनी के आश्रित ग्राम गोवंदा के गौठान समिति के अध्यक्ष महेश मंडावी इस पूरी योजना के बारे में कहते कि इसने गांव की क़िस्मत बदल दी है। इससे पहले तक पशुपालक केवल गाय का दूध बेचकर ही आय प्राप्त करते थे, लेकिन गोधन न्याय योजना से अब गोबर बेचकर भी उन्हें अतिरिक्त आय की प्राप्ति होगी। गांव के किसान रूपसिंह कोमरे, जागेश्वर और राजेश उसेंडी कहते हैं कि कुछ गोबर को खाद के रूप में खेतों में प्रयोग किया करते थे परंतु अधिकांश को बेकार समझ कर फेंक दिया करते थे वही गोबर अब अतिरिक्त आय का माध्यम बन गया है। इस संबंध में कांकेर जिला के कृषि उप-संचालक नरेन्द्र कुमार नागेश बताते हैं कि वर्तमान में हमारे जिले में 197 गांवों के गौठानों में किसानों से गोबर खरीदी का कार्य किया जा रहा है। इसे खरीदने और खाद बनाने के पीछे सबसे बढ़ा उद्देश्य राज्य में जैविक खेती को बढ़ावा देना है। जिसका एक लाभ पशुपालकों को आर्थिक रूप में भी होगा और जो मवेशी खुले में इधर-उधर घुमते पाए जाते हैं उन्हें पशुपालक व्यवस्थित रखेंगे।
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों गोधन न्याय योजना की काफी चर्चा है। एक तरफ जहां किसान व पशुपालकों की हर महीने 1500 से 2000 रूपए की अतिरिक्त कमाई सुनिश्चित हो गई है तो वहीं दूसरी ओर किसानों को पहले गोबर से खाद बनाने में तीन महीने लग जाते थे, जिससे उसका उपयोग बेहतर तरीके से नहीं हो पाता था। अब गौठानों में गोबर बेचने से प्रशिक्षित स्व-सहायता समूहों के द्वारा 45 दिनो में ही वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जाएगा और किसान अपनी सुविधाजनक समय में इसका उपयोग कर सकेंगे। साथ ही गोधन न्याय योजना से स्व-सहायता समूह की महिलाओं को भी आर्थिक लाभ होगा। शहरी क्षेत्रों में तो एकत्रित गोबर से धूपबत्ती, गमले, दीया, मूर्ति आदि उत्पाद बनाने की भी तैयारी की जा रही है।
बहरहाल, पशुगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ में डेढ़ करोड़ मवेशी हैं, इनमें से 98 लाख गौवंश हैं, जिनमें 48 लाख नर और 50 लाख मादा हैं। प्रदेश में इतने बडे़ गौवंश से गोबर खरीदने की यह देश में अपने तरह की पहली गोधन न्याय योजना है जिसके दूरगामी परिणाम पशुपालन को बढ़ावा देने के साथ-साथ कृषि लागत में कमी और जैविक कृषि से जमीन की उर्वरा शक्ति में वृद्धि के रूप में होगी। इस योजना से न केवल पर्यावरण में सुधार होगा बल्कि गोबर बेचने से होने वाली अतिरिक्त आय से ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति भी सुधरेगी। जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक बडे़ बदलाव का संकेत है।