आपातकाल की वो पहली सुबह

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आपातकाल की घोषणा २५/२६ जून १९७५ के बीच की रात्रि में हुई थी! इसकी शुरुआत १२ जून १९७५ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा दिए गए उस निर्णय से हुई थी जिसमे १९७१ के लोकसभा चुनाव में इंदिरा जी से हारने वाले समाजवादी नेता राजनारायण की चुनाव याचिका को स्वीकार करते… Read more »

आपातकाल के समय उत्तराखण्ड में पत्रकारिता

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गढवाल टाईम्स नाम से  पाक्षिक पत्रिका प्रकाशित करते थे। वे बताते हैं कि ठभ्म्स् रानीपुर हरिद्वार में अस्सिटैंट इंजीनियर ए.के.सूरी के घर बैठक होती थी, समाचारों का संकलन किया जाता था। उनमें छपने लायक समाचार तय किये जाते कहां कितने लोग पकड़े गये, संघ, जनसंघ व अन्य कितने लोगों ने सत्याग्रह किया, क्या-क्या अत्याचार हुये। ए.के.सूरी अपने आॅफिस से साइक्लोस्टाइल मशीन मंगाकर घर पर ही पत्रिका छापते। एक-एक प्रति डाक द्वारा जिलाधिकारी, एस.पी. एवं शासन के लिये भेजी जाती, शेष थैले में भरकर क्षेत्र में अपने कार्यकर्ताओं को वितरित कर दी जाती। कार्यकर्ताओं द्वारा समाज में विचार प्रेषित किये जाते।

आपातकाल को याद रखने के निहितार्थ?

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तनवीर जाफ़री जून 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में लगाए गए आपातकाल को हालांकि 40 वर्षों से अधिक समय बीत चुका है। परंतु गांधी परिवार व कांग्रेस का विरोध करने वाले कुछ खास लोग इन यादों को समय-समय पर अलग-अलग तरीकों से ताज़ा रखने की कोशिश करते रहते हैं। चाहे वह आपातकाल… Read more »

आपातकाल आज भी अनौपचारिक रूप से देश में मौजूद है

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शैलेन्द्र चौहान आपातकाल की चालीसवीं वर्ष गांठ के अवसर पर राजनीतिक विमर्श का एक दौर चल पड़ा है। लालकृष्‍ण आडवाणी के बाद अब पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी आपातकाल की संभावना से इंकार नहीं किया है। पीटीआई को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ‘आज राजनीति में द्वेष और बदले की भावना बढ़… Read more »

आपातकाल और लोकतंत्र

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-विजय कुमार- -आपातकाल (26 जून) की 39वीं वर्षगांठ पर- जून महीना आते ही आपातकाल की यादें जोर मारने लगती हैं। 39 साल पहले का घटनाक्रम मन-मस्तिष्क में सजीव हो उठता है। छह दिसम्बर, 1975 को बड़ौत (वर्तमान जिला बागपत) में किया गया सत्याग्रह और फिर मेरठ जेल में बीते चार महीने जीवन की अमूल्य निधि… Read more »

इतिहास को दबाना नहीं चाहिए

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लालकृष्ण आडवाणी मेरे पूर्व प्रकाशित ब्लॉग में से एक का शीर्षक है: 25 जून, 1975: भारत के लिए एक न भूलने वाला दिन। एक अन्य ब्लॉग का शीर्षक था: 1975 का आपातकाल नाजी शासन जैसा। मेरे संस्मरणों को प्रकाशित करने वाली ‘रूपा एण्ड कम्पनी‘ ने अस्सी से अधिक मेरे ब्लॉगों को संग्रहित कर ‘एज़ आय… Read more »

वर्तमान राजनीतिक तंत्र आपातकाल से भी ज्यादा खौफनाक है

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लालकृष्ण आडवाणी पिछले साठ वर्षों से भारत स्वतंत्र है। नागरिक आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दमन के संदर्भ में, मैं आपातकाल की अवधि 1975-77 को सर्वाधिक खराब मानता हूं। लेकिन राजनीतिक व्यंग्यकार और भ्रष्टाचार विरोधी संघर्षकर्ता असीम त्रिवेदी के साथ जो कुछ हुआ उससे मुझे आश्चर्य होने लगा: क्या आज का राजनीतिक तंत्र आपातकाल… Read more »

आपात्काल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और स्मृतियां – भाग-३

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इमर्जेन्सी की ३७वीं बरसी पर विशेष विपिन किशोर सिन्हा थानेदार नागेन्द्र सिंह चारों से बस एक ही सवाल बार-बार पूछता – “बता सालो, नानाजी देशमुख कहां है?” इतनी यातना के बाद भी होमेश्वर हंसता रहा। उसने थानेदार से ही प्रश्न पूछा – “आप कहां तक पढ़े हैं?” “मैं इन्टर पास हूं।” “आपको पता है, जिन्हें… Read more »

आपात्काल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और स्मृतियां – भाग-२

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आपातकाल की ३७वीं बरसी पर विशेष विपिन किशोर सिन्हा आपात्काल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और स्मृतियां – भाग-१ मैंने उसी दिन से रात में हास्टल में रहना छोड़ दिया। क्लास खत्म होने के बाद अलग-अलग रास्ते से विश्वविद्यालय से बाहर निकलता और दूर के रिश्ते के अपने मामाजी के यहां रात गुजारता। पढ़ाई बुरी तरह बाधित… Read more »

आपात्काल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और स्मृतियां – भाग-१

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आपात्काल की ३७वीं बरसी पर विशेष विपिन किशोर सिन्हा उस समय महानगरों को छोड़ दूरदर्शन की सुविधा कहीं थी नहीं। समाचारों के लिए आकाशवाणी और अखबारों पर ही निर्भरता थी। २५ जून, १९७५ की काली रात! आकाशवाणी ने रात के अपने समाचार बुलेटिन में यह समाचार प्रसारित किया कि अनियंत्रित आन्तरिक स्थितियों के कारण सरकार ने… Read more »