राहुल गांधी

कहीं अपने होने का अर्थ ही न खो दें राहुल गांधी !

राहुल गांधी शुरू से ही राजनीति को लेकर दुविधा में दिखते रहे हैं। वे सार्वजनिक रूप से यहां तक कह चुके हैं कि सत्ता तो जहर है। लेकिन फिर भी मनमोहन सिंह की पहली सरकार में ही मंत्री बन गए होते, तो देश चलाना सीख जाते और सत्ता का जहर पीना भी। कांग्रेस ने अगली बार फिर जब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था, तब भी उनको न बनाकर, राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया जाता, तो कोई कांग्रेस का क्या बिगाड़ लेता ?

राहुल गांधी में दम है, तो कांग्रेस का दम क्यों निकल रहा है ?

ताजा परिदृश्य में देखे, तो पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में शाश्वत रूप से असफल रहे हैं। राहुल गांधी के पार्टी की कमान पूरी तरह से संभालने में लगातार देरी भी उनकी काबिलियत पर सवाल खड़े कर रही है। राज्यों में पार्टी की कमान सौंपने के मामले में भी गलतियां हो रही हैं।

राहुल गांधी पर अपने भाषणों में बहुत क्रूर हैं मोदी !

देखा जाए तो, मोदी को इस क्रूर अंदाज में लाने का श्रेय भी कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी और उनकी माता सोनिया गांधी को ही जाता है, जिन्होंने मोदी को ‘लाशों का सौदागर’ से लेकर ‘शहीदों के खून का दलाल’… और न जाने क्या क्या कहा। फिर वैसे देखा जाए, तो लोकतंत्र में अपनी ताकत को ज्यादा लंबे वक्त तक जमाए रखने के लिए कुछ हद तक क्रूर और अत्यंत आक्रामक होना भी आज मोदी की सबसे पहली जरूरत है।