हिंदी पर राष्ट्रपति का नया संदेश

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डाॅ. वेदप्रताप वैदिक हिंदी दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जो संदेश दिया है, यह मुझे ऐसा लगा, जैसे कि मैं ही बोल रहा हूं। उन्होंने राष्ट्र को वह सूत्र दे दिया है जिसे लागू कर दिया जाए तो जो बेचारी हिंदी राजभाषा बनकर हर जगह बेइज्जत हो रही है, वह सचमुच भारत… Read more »

हिंदी का राजनैतिक व मानसिक विरोध ?

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   मृत्युंजय दीक्षित हिंदी भारत की सबसे अधिक प्राचीन,सरल, लचीली ,लोकप्रिय व सीखने में आसान भाषा है। हिंदी का इतिहास भी बहुत ही प्राचीन है। हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इसलिये यह भाषा देवनागरी लिपि भी कही जाती है। देवनागरी में 11 स्वर और 33 व्यंजन भी होते हंै।  हिंदी भाषा का अब… Read more »

बिना हिंदी के हिन्दुस्तान की कल्पना नहीं की जा सकती

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14 सितंबर 2017 हिंदी दिवस पर विशेष हिंदी शब्द है हमारी आवाज का हमारे बोलने का जो कि हिन्दुस्तान में बोली जाती है। आज देश में जितनी भी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं उन सबकी जननी हिंदी है। और हिंदी को जन्म देने वाली भाषा का नाम संस्कृत है। जो कि आज देश में सिर्फ प्रतीकात्मक रूप… Read more »

संकीर्णताओं के विरोध में खड़ी है हिंदी

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जब हम हिंदी की उपेक्षा की बात करते हैं और इसके संरक्षण-संवर्धन हेतु शासकीय सहयोग की आशा करते हैं तब हमें यह भी सोचना चाहिए कि कहीं हिंदी की शक्ति और उसके सामर्थ्य के प्रति हम स्वयं ही सशंकित तो नहीं हैं जिस कारण हममें असुरक्षा की भावना आ गई है। यह एक निर्विवाद तथ्य… Read more »

हिंदी का एक उपेक्षित क्षेत्र

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डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री हिंदी इस समय एक विचित्र दौर से गुज़र रही है। अनेक शताब्दियों से जो इस देश में अखिल भारतीय संपर्क भाषा थी, और इसीलिए संविधान सभा ने जिसे राजभाषा बनाने  का निश्चय सर्वसम्मति से किया, उसे उस पद पर प्रतिष्ठित करना तो दूर, “ आधुनिक शिक्षित “ लोगों ने अखिल भारतीय संपर्क… Read more »

राजनीतिक स्वार्थ की शिकार हमारी भाषाएँ

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हिंदी पर स्वार्थ का हथोड़ा…..! दुनिया में एकमात्र स्वाधीन भारत राष्ट्र-राज्य है,  जहाँ पर सत्तर साल बीत जाने पर भी  राजनीति का इतना अधिक पराभव हुआ है कि इसकी अपनी राष्ट्रभाषा तक घोषित  नहीं हो सकी है। इतिहास गवाह रहेगा कि राजनैतिक स्वार्थ ने भारत को जोड़ने वाली, उसकी एकता की वाहक, जन-जन के ह्रदय… Read more »

हिंदी का स्वाभिमान बचाने समाचार-पत्रों का शुभ संकल्प

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ह सर्वविधित है कि हिंदी के समाचार माध्यमों में अंग्रेजी शब्दों का बढ़ता प्रयोग भारतीय मानस के लिए चिंता का विषय बन गया है। विशेषकर, हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी के शब्दों का चलन अधिक गंभीर समस्या है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी समाचार पत्रों की भाषा से नवयुवक अपनी भाषा सुधारते थे। समाचार पत्र सूचना और अध्ययन सामग्री देने के साथ-साथ समाज को भाषा का संस्कार भी देते थे।

महज़ औपचारिकता मत निभाओ… रोज हिंदी दिवस मनाओ !!!

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इंदु सिंह “इन्दुश्री’ ●●●——————————– भाषा नहीं ‘माँ’ हैं हम सबकी ‘हिंदी’ तो पहचान हैं हम सबकी ‘देवनागरी’ से बनी शान हम सबकी वर्णमाला ऐसी कि रगों में बस जाये हमारी तभी तो वो आन हैं हम सबकी ॥ ————————————●●● ‘हिंदी’ हैं हम वतन हैं… हिंदुस्तान हमारा… सिर्फ़ शब्द नहीं हमारी मातृभूमि का जयघोष हैं… जो… Read more »

हिंदी दुनिया की जरूरत है

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी भाषा के बारे में कहा जाता है कि वह स्व प्रवाहित होती है, आप चाहकर भी उसे रोक नहीं सकते । विश्व में कोई नहीं जिसका कार्य भाषा बिना चलता हो । मनुष्य की बात एक बार को छोड़ भी दीजिए तो पशु, पक्षी, कीट और पतंग भी अपने स्तर पर किसी… Read more »

संस्कृत की तरह प्रतीकात्मक होती हिंदी

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14 सितंबर 2016 हिंदी दिवस पर विशेष हिंदी शब्द है हमारी आवाज का हमारे बोलने का जो की हिन्दुस्तान मैं बोली जाती है। आज देश में जितनी भी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं उन सबकी जननी हिंदी है। और हिंदी को जन्म देने वाली भाषा का नाम संस्कृत है। जो की आज देश में सिर्फ प्रतीकात्मक रूप… Read more »