Archive for the Category ‘साहित्य’
कविता:अपने ही कमरे मेँ– मोतीलाल
एक विस्मृत
जर्जर कमरे मेँ
मै गिर जाता हूँ
और गुजरता हूँ
नम तंतुओँ के बीच से
नष्ट हो चुकी चीजोँ के बीच
जैसे मवेशियाँ
चरते होँ अपने चारागाह मेँ
मैँ इस तीखे माहौल मेँ
मरणासन्न गंधोँ की लहरोँ के सामने महसूसता हूँ
उन हरे पत्तोँ की सरसराहट
जो अंधेरे बरामदोँ मेँ कहीँ
किसी भी पतझड़ के विरुद्ध
लड़ने की ताकत रखता है
अपने ...‘नामवर सिंह आलोचक कम और साहित्य के प्रौपेगैण्डिस्ट ज्यादा नजर आते हैं’
जगदीश्वर चतुर्वेदी
हाल ही में राजकमल प्रकाशन के द्वारा नामवर सिंह के विचारों,आलोचना निबंधों ,व्याख्यानों और साक्षात्कारों पर केन्द्रित 4 किताबें आयी हैं। चार और आनी बाकी हैं। इन किताबों का ‘कुशल’ संपादन आशीष त्रिपाठी ने किया है।
ये किताबें आधुनिक युग में विचारों की भिड़ंत के सैलीबरेटी रूप का आदर्श नमूना ...कविता-टिमकी बजी मदारी की-प्रभुदयाल श्रीवास्तव
वाहन पंचर हुआ,लिये मैं
सड़क सड़क घूमा
टिमकी बजी मदारी की
मैं बंदर सा झूमा
कहीं दूर तक पंचरवाला
नहीं दिखाई दिया
हर दुकान पर अतिक्रमण का
ताला मिला जड़ा
जीवन के हर लम्हें में
कितने पंचर होते
अपने कटे फटेपन को
पल पल कंधे ढोते
सूजे पैर फूल गये जैसे
फूल गया तूमा
मन ने जब आदेश दिया तो
तन नट सा नाचा
अहंकार ने ...नामवर सिंह और युवालेखन की उलटबाँसी
जगदीश्वर चतुर्वेदी
नामवर सिंह को युवालेखन पसंद है। युवाओं को प्रोत्साहित करना उनके स्वभाव का सामान्य अंग है। लेकिन युवा संस्कृति को वे सरलीकरणों के जरिए व्याख्यायित करते हैं। युवाओं को सरलीकरणों के जरिए नहीं समझा जा सकता। युवाओं के साहित्य को परिवार,स्कूली शिक्षा के दर्शन ,मासकल्चर और मासमीडिया के प्रभाव ...
















