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Archive for the Category ‘साहित्‍य’


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60 साल की बूढी संसद को दरकार है सम्मान की

60 साल की बूढी संसद को दरकार है सम्मान की शादाब जफर ‘‘शादाब’’ देश के लोकतंत्र के सब से बडे मंदिर हमारी संसद ने 13 मई को अपनी स्थापना के साठ वर्ष पूरे किये। 13 मई 1952 को ठीक पौने ग्यारह बजे संसद के दोनो सदनो की शुरूआत दो मिनट के मौन से हुई थी। जी वी मावलंकर को देश का ...

May 16th, 2012 | लेखक : शादाब जाफर 'शादाब' | 44 views | 2 Comments »
Posted in Category: लेख | Tags: 60 years of parliament, 60 साल की बूढी संसद

बडबडाहट……गाँधीजी कि पुण्यतिथि पर मेरी दो कड़वी कविताएँ

 बडबडाहट......गाँधीजी कि पुण्यतिथि पर मेरी दो कड़वी कविताएँ कई बार आदमी कुछ कहना चाहता है पर कुछ कह नहीं पाता,ये कुछ न कह पाना उसे बहुत कुछ कहने के लिए मथ देता है,उस वक़्त उस आदमी की स्तिथि त्रिसंकू की तरह होती है वो ''कुछ'' और ''बहुत कुछ'' के बीच ''कुछ नहीं'' को नकार कर खुद से ''कुछ-कुछ'' ...

May 16th, 2012 | लेखक : अनुराग अनंत | 37 views | 1 Comment »
Posted in Category: कविता | Tags: Death Anniversary of Gandhi Ji, Gandhi Ji, गाँधीजी, गाँधीजी कि पुण्यतिथि

गजल-भेंट मज़दूरों की क्यों लेती बताओ चिमनियां-इकबाल हिंदुस्तानी

गजल-भेंट मज़दूरों की क्यों लेती बताओ चिमनियां-इकबाल हिंदुस्तानी आये दिन गिरने लगीं जब गुलशनों में बिजलियां, अब संभलकर उड़ रही हैं गुलशनों में तितलियां।   उनके कपड़ों की नुमाइश का सबब बनती हैं जो, मुफलिसों की जान ले लेती हैं वो ही सर्दियां।   रहबरी जज़्बात की काबू रखो ये जुर्म है, राख़ में तब्दील हो जाती हैं पल में बसितयां।   इस बदलते दौर में तुम ...

May 16th, 2012 | लेखक : इक़बाल हिंदुस्तानी | 14 views | No Comments »
Posted in Category: गजल | Tags: gazal by iqbal hindustani, गजल-इकबाल हिंदुस्तानी, गजल-भेंट मज़दूरों की क्यों लेती बताओ चिमनियां-इकबाल हिंदुस्तानी

कविता: जिन्दगी – लक्ष्मी नारायण लहरे

कविता: जिन्दगी - लक्ष्मी नारायण लहरे  आपना पन कहें या दोस्ताना अजीब चाहत है इस जीवन में सिर्फ संघर्ष भरी राहें है अपनों के बीच भी हम अकेले है एक -दुसरे के प्रेम से बंध कर स्वार्थ भरी जीवन जी रहे है जिन्दगी ….. की जंग में भाई -भाई को नहीं समझता माँ -बाप को नही पहचानते स्वार्थ ,भरी जीवन जी रहे है

May 16th, 2012 | लेखक : लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार | 17 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: कविता, कविता - जिन्दगी, जिन्दगी, लक्ष्मी नारायण लहरे

गजल-दुश्मनों के दुश्मनों का दोस्त बन-इकबाल हिंदुस्तानी

गजल-दुश्मनों के दुश्मनों का दोस्त बन-इकबाल हिंदुस्तानी शुक्र है मौसम सुहाना हो गया, उनके आने का बहाना हो गया।   तुम इसे चाहे कोर्इ भी नाम दो, मुल्क गै़रों का निशाना हो गया।   हो हुकूमत पांच दिन तो ठीक है, राज बरसों का पुराना हो गया।   बात कुछ भी हो विदेशी हाथ है, यह तो नाकामी छिपाना हो गया।   हमको रहबर ने अगर बेचा नहीं, फिर लबालब ...

May 16th, 2012 | लेखक : इक़बाल हिंदुस्तानी | 23 views | No Comments »
Posted in Category: गजल | Tags: gazal by iqbal hindustani, गजल-दुश्मनों के दुश्मनों का दोस्त बन-इकबाल हिंदुस्तानी

सम्बद्धता क्या है?

सम्बद्धता क्या है? - राकेश कुमार आर्य किसी मान्यता, सिद्धांत, वस्तु व्यक्ति आदि के प्रति सहज रूप में बिना किसी बाहरी दबाव के आपका जुड़ जाना उसके प्रति आपकी सम्बद्धता है। ऐसी मानसिकता के वशीभूत होकर आप पूर्ण मनोयोग और प्राणपण से कार्य करने के लिए तो सक्रिय रहेंगे ही साथ ही उस मान्यता, ...

May 14th, 2012 | लेखक : राकेश कुमार आर्य | 37 views | 1 Comment »
Posted in Category: लेख | Tags: Rakesh Arya, Relativity, राकेश आर्या, सम्बद्धता

गज़ल:रिश्तों में प्यार का व्यापार नहीं होता– सत्येंद्र गुप्ता

गज़ल:रिश्तों में प्यार का व्यापार नहीं होता– सत्येंद्र गुप्ता रिश्तों में प्यार का व्यापार नहीं होता तराजू से तौलकर भी तो प्यार नहीं होता। दिल की ज़ागीर को मैं कैसे लुटा दूं हर कोई चाहत का हक़दार नहीं होता। उजाड़ शब की तन्हाई का आलम न पूछिए मरने का तब भी तो इंतज़ार नहीं होता। चमकते थे दरो-दीवार कभी मेरे घर के भी अब शोखियों से ...

May 13th, 2012 | लेखक : सत्येन्द्र गुप्ता | 45 views | 1 Comment »
Posted in Category: गजल | Tags: gazal by satendra gupta, गज़ल:रिश्तों में प्यार का व्यापार नहीं होता– सत्येंद्र गुप्ता

कविता:अपने ही कमरे मेँ– मोतीलाल

कविता:अपने ही कमरे मेँ– मोतीलाल एक विस्मृत जर्जर कमरे मेँ मै गिर जाता हूँ और गुजरता हूँ नम तंतुओँ के बीच से नष्ट हो चुकी चीजोँ के बीच जैसे मवेशियाँ चरते होँ अपने चारागाह मेँ   मैँ इस तीखे माहौल मेँ मरणासन्न गंधोँ की लहरोँ के सामने महसूसता हूँ उन हरे पत्तोँ की सरसराहट जो अंधेरे बरामदोँ मेँ कहीँ किसी भी पतझड़ के विरुद्ध लड़ने की ताकत रखता है   अपने ...

May 13th, 2012 | लेखक : मोतीलाल | 25 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem by motilal, कविता:अपने ही कमरे मेँ

जननी तेरी जय है।

जननी तेरी जय है। राजेश कश्यप ‘‘माँ !’’ यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘माँ’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा ...

May 13th, 2012 | लेखक : राजेश कश्यप | 31 views | No Comments »
Posted in Category: लेख | Tags: mother day

मॉ की ममता, मां का ऑचल जींस और टॉप में गायब हो गया ……..

मॉ की ममता, मां का ऑचल जींस और टॉप में गायब हो गया ........ शादाब जफर ‘‘शादाब’’ दुनिया ने आज भले ही चाहे कितनी तरक्की कर ली हो, पर हम लोगो द्वारा स्थापित दिखावे की तैयार की गई इस संस्कृति से हमारे अपने जीवन और समाज में अशांति और विषमता आज लगातार बढती जा रही है। जिसने कई बुनियादी रिश्तो के साथ ही आज समाज ...

May 12th, 2012 | लेखक : शादाब जाफर 'शादाब' | 115 views | 3 Comments »
Posted in Category: लेख | Tags: mother day

कविता-श्यामल सुमन

कविता-श्यामल सुमन श्यामल सुमन सेवा है साहित्य सुमन व्यापार नहीं लेखन में प्रतिबंध मुझे स्वीकार नहीं प्रायोजित रचना से कोई प्यार नहीं   बच के रहना साहित्यिक दुकानों से जी कर लिखता हूँ कोई बीमार नहीं   मठाधीश की आज यहाँ बन आई है कितने डर से करते हैं तकरार नहीं   धन प्रभाव के बल पर उनकी धूम मची कितने जिनको साहित्यक आधार ...

May 12th, 2012 | लेखक : श्‍यामल सुमन | 11 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: कविता-श्यामल सुमन

समलैंगिक स्वीकृति के मायने

समलैंगिक स्वीकृति के मायने हरपाल सिंह इस पृथ्वी पर जीवन और सृष्टि का सुचारू रूप से संचालन करती है । इसके लिये उसकी अपनी व्यवस्थाएं हैं अनुकुलता और स्वतंत्रता देने के बावजूद कुदरत ने अपना अधिकार बनाये रखा है । इसके भंडार में जीव-जगत और जन के लिये बहुत कुछ अज्ञात है, सो उसे सही ...

May 12th, 2012 | लेखक : हरपाल सिंह | 83 views | 4 Comments »
Posted in Category: जरूर पढ़ें, लेख | Tags: gay marraige, समलैंगिक स्वीकृति के मायने

गजल-आये दिन गिरने लगीं जब….-इकबाल हिंदुस्तानी

गजल-आये दिन गिरने लगीं जब….-इकबाल हिंदुस्तानी भेंट मज़दूरों की क्यों लेती बताओ चिमनियां..... आये दिन गिरने लगीं जब गुलशनों में बिजलियां, अब संभलकर उड़ रही हैं गुलशनों में तितलियां।   उनके कपड़ों की नुमाइश का सबब बनती हैं जो, मुफलिसों की जान ले लेती हैं वो ही सर्दियां।   रहबरी जज़्बात की काबू रखो ये जुर्म है, राख़ में तब्दील हो जाती हैं पल ...

May 12th, 2012 | लेखक : इक़बाल हिंदुस्तानी | 13 views | 1 Comment »
Posted in Category: गजल |

गजल-वतन महफ़ूज़ रखना है हमें खुद भी फ़ना होकर…..इकबाल हिंदुस्तानी

गजल-वतन महफ़ूज़ रखना है हमें खुद भी फ़ना होकर.....इकबाल हिंदुस्तानी इसी मिटटी में रहना है खुशी से या ख़फ़ा होकर, कहां हम जायेंगे बतलाइये तुमसे जुदा होकर।   ये है वक़्ती सभी नज़दीकियां धोखा ना खा जाना, हमारे वोट मांगेंगे ये सब हम पर फि़दा होकर।   तुम्हारी भूल को हम 6 दिसंबर याद रक्खेंगे, हज़ारों साल लिपटेंगी तुम्हें अब ये बला होकर।   विरासत क़र्ज़ की हिस्से में ...

May 12th, 2012 | लेखक : इक़बाल हिंदुस्तानी | 18 views | No Comments »
Posted in Category: गजल | Tags: gazal by iqbal hindustani

‘नामवर सिंह आलोचक कम और साहित्य के प्रौपेगैण्डिस्ट ज्यादा नजर आते हैं’

'नामवर सिंह आलोचक कम और साहित्य के प्रौपेगैण्डिस्ट ज्यादा नजर आते हैं' जगदीश्वर चतुर्वेदी  हाल ही में राजकमल प्रकाशन के द्वारा नामवर सिंह के विचारों,आलोचना निबंधों ,व्याख्यानों और साक्षात्कारों पर केन्द्रित 4 किताबें आयी हैं। चार और आनी बाकी हैं। इन किताबों का ‘कुशल’ संपादन आशीष त्रिपाठी ने किया है। ये किताबें आधुनिक युग में विचारों की भिड़ंत के सैलीबरेटी रूप का आदर्श नमूना ...

May 10th, 2012 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 78 views | 3 Comments »
Posted in Category: आलोचना, जरूर पढ़ें, महत्वपूर्ण लेख | Tags: आलोचना, नामवर सिंह

गजल-भारत मेरा काबुल नहीं बग़दाद नहीं है….-इकबाल हिंदुस्तानी

गजल-भारत मेरा काबुल नहीं बग़दाद नहीं है....-इकबाल हिंदुस्तानी खुदग़र्जियां तो है मगर जेहाद नहीं है, सब भूल गये हम हमें कुछ याद नहीं है।   बेमेल मुहब्बत का नतीजा ही तो ग़म है, शीरीं तो हैं कर्इ मगर फ़रहाद नहीं है।   नेपाल है प्यारा हमें लंका भी पसंद है, भारत मेरा काबुल नहीं बग़दाद नहीं है।   हम में से कोर्इ कुछ हो मुहाजिर तो नहीं ...

May 8th, 2012 | लेखक : इक़बाल हिंदुस्तानी | 74 views | No Comments »
Posted in Category: गजल | Tags: गजल-भारत मेरा काबुल नहीं बग़दाद नहीं है....-इकबाल हिंदुस्तानी

रानी को कौन कहे कि अग्गा ढक

रानी को कौन कहे कि अग्गा ढक एल.आर.गाँधी महामहिम अपनी २३वी विदेश यात्रा के साथ अपनी अंतिम घुमक्कड़ जिज्ञ्यासा पूरी कर लेंगी और इसके साथ ही राष्ट्राध्यक्षों में सबसे अधिक विदेश यात्रु महामहिम का कीर्तिमान अपने नाम कर लेंगी . महामहिम पर अब तक करीबन २०६ करोड़ रूपए, इस घुमाकड़ जिज्ञासा को पूरे करने पर सरकार के खर्च ...

May 8th, 2012 | लेखक : एल. आर गान्धी | 108 views | 2 Comments »
Posted in Category: आलोचना |

आ केहू खराब नइखे, सबे ठीक बा…

आ केहू खराब नइखे, सबे ठीक बा... संजय स्वदेश जब भी किसी राज्य की सरकार बदलती है, समाज की आबो-हवा करवट लेती है। भले ही इस करवट से कांटे चुभे या मखमली गद्दे सा अहसास हो, परिर्वतन स्वाभाविक है। बिहार में नीतीश से पहले राजद का शासन था। जब लालू प्रसाद का शायन काल आया था तब भी ...

May 8th, 2012 | लेखक : संजय स्‍वदेश | 19 views | 1 Comment »
Posted in Category: आलोचना | Tags: police and humanity, police and society

कविता-टिमकी बजी मदारी की-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

कविता-टिमकी बजी मदारी की-प्रभुदयाल श्रीवास्तव वाहन पंचर हुआ,लिये मैं सड़क सड़क घूमा टिमकी बजी मदारी की मैं बंदर सा झूमा   कहीं दूर तक पंचरवाला नहीं दिखाई दिया हर दुकान पर अतिक्रमण का ताला मिला जड़ा जीवन के हर लम्हें में कितने पंचर होते अपने कटे फटेपन को पल पल कंधे ढोते सूजे पैर फूल गये जैसे फूल गया तूमा   मन ने जब आदेश दिया तो तन नट सा नाचा अहंकार ने ...

May 8th, 2012 | लेखक : प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 13 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem by Prabhudayal Srivastav, कविता-टिमकी बजी मदारी की-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

नामवर सिंह और युवालेखन की उलटबाँसी

नामवर सिंह और युवालेखन की उलटबाँसी जगदीश्‍वर चतुर्वेदी नामवर सिंह को युवालेखन पसंद है। युवाओं को प्रोत्साहित करना उनके स्वभाव का सामान्य अंग है। लेकिन युवा संस्कृति को वे सरलीकरणों के जरिए व्याख्यायित करते हैं। युवाओं को सरलीकरणों के जरिए नहीं समझा जा सकता। युवाओं के साहित्य को परिवार,स्कूली शिक्षा के दर्शन ,मासकल्चर और मासमीडिया के प्रभाव ...

May 7th, 2012 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 32 views | 1 Comment »
Posted in Category: आलोचना | Tags: नामवर सिंह, युवालेखन

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