प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

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लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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लेखक - प्रमोद भार्गव - के पोस्ट :

राजनीति विविधा

पनामा लीक्स : भारत में भी हैं कालेधन के सफेद कुबेर

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प्रमोद भार्गव पड़ोसी देश पाकिस्तान एक बार फिर राजनीतिक संकट के मुहाने पर है। पनामा कांड में फंसे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सांसद पद के लिए अयोग्य करार दे दिया। इसके चलते उन्हें प्रधानमंत्री पर से भी इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि, कोर्ट के आदेश के महज छह घंटे […]

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आर्थिकी चुनाव राजनीति

राजनीतिक चंदे के लिए निर्वाचन बाॅन्ड का औचित्य

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एक मोटे अनुमान के अनुसार देश के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर 50 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होते हैं। इस खर्च में बड़ी धनराशि कालाधन और आवारा पूंजी होती है। जो औद्योगिक घरानों और बड़े व्यापारियों से ली जाती है। आर्थिक उदारवाद के बाद यह बीमारी सभी दलों में पनपी है। इस कारण दलों में जनभागीदारी निरंतर घट रही है। अब किसी भी दल के कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को पार्टी का सदस्य नहीं बनाती हैं। मसलन काॅरपोरेट फंडिंग ने ग्रास रूट फंडिंग का काम खत्म कर दिया है। इस कारण अब तक सभी दलों की कोशिश रही है कि चंदे में अपारदर्शिता बनी रहे।

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राजनीति

ट्रंप-मोदी मुलाकात ने चीन की बढ़ाई कुंठा

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  चीन की यह दोगली कूटनीति तमाम राजनीतिक मुद्दों पर साफ दिखाई देती है। चीन बार-बार जो आक्रामकता दिखा रहा है, इसकी पृष्ठभूमि में उसकी बढ़ती ताकत और बेलगाम महत्वाकांक्षा है। यह भारत के लिए ही नहीं दुनिया के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। दुनिया जनती है कि भारत-चीन की सीमा विवादित है। सीमा विवाद सुलझाने में चीन की कोई रुचि नहीं हैं। वह केवल घुसपैठ करके अपनी सीमाओं के विस्तार की मंशा पाले हुए है। चीन भारत से इसलिए नाराज है, क्योंकि उसने जब तिब्बत पर कब्जा किया था, तब भारत ने तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बतियों को भारत में शरण दी थी। जबकि चीन की इच्छा है कि भारत दलाई लामा और तिब्बतियों द्वारा तिब्बत की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई की खिलाफत करे ? दरअसल भारत ने तिब्बत को लेकर शिथिल व असंमजस की नीति अपनाई है। जब हमने तिब्बतियों को शरणर्थियों के रूप में जगह दे ही दी थी, तो तिब्बत को स्व तंत्र देश मानते हुए अंतराष्ट्रीय मंच पर समर्थन की घोषणा करने की जरुरत भी थी ? डाॅ राममनोहर लोहिया ने संसद में इस आशय का बयान भी दिया था। लेकिन ढुलमुल नीति के कारण नेहरु  ऐसा नहीं कर पाए ? इसके दुष्परिणाम भारत आज भी झेल रहा है?

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