गुरु पूर्णिमा गुरु-पूजन का अनूठा पर्व

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ललित गर्ग- पर्वों, त्यौहारों  और संस्कारों की भारतभूमि में गुरु का स्थान सर्वोपरि माना गया है। पश्चिमी देशों में गुरु का कोई महत्व नहीं है, वहां विज्ञान और विज्ञापन का महत्व है परन्तु भारत में सदियों से गुरु का महत्व रहा है। गुरु-पूर्णिमा गुरु-पूजन का पर्व है। सन्मार्ग एवं सत-मार्ग पर ले जाने वाले महापुरुषों… Read more »

योगेश्वर कृष्ण का युद्ध भूमि में अर्जुन को दिया गया आत्मज्ञान

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  कृष्ण जी अर्जुन को कहते हैं कि तुझे अपने धर्म का विचार करके भी डरना नहीं चाहिये क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध के अतिरिक्त क्षत्रिय का अन्य किसी प्रकार से कल्याण नहीं है। कृष्ण जी अर्जुन को यह भी समझाते हैं कि तू यह समझ कि तुझे अकस्मात् स्वर्ग का खुला हुआ द्वार मिल गया है। ऐसे युद्ध को तो सौभाग्यशाली क्षत्रिय पाते हैं। यदि तू इस धर्मयुक्त संग्राम को नहीं करेगा तो फिर अपने धर्म और यश को छोड़कर पाप को पायेगा। लोग तेरे अपयश की चर्चा सदा-सदा किया करेंगे। हे अर्जुन ! कीर्तिमान् की अपकीर्ति मौत से भी बढ़कर होती है।

श्रावणी पर्व अविद्या के नाश तथा विद्या की वृद्धि करने का विश्व का एकमात्र मुख्य पर्व

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   वेद और यज्ञ का परस्पर गहरा सम्बन्ध है। सभी यज्ञ वेद मन्त्रों के पाठ व वेद मंत्रों में निहित विधियों के द्वारा ही होते हैं। अतः श्रावण मास में यज्ञों को नियम पूर्वक करना चाहिये। यज्ञ से हानिकारक किटाणुओं का नाश होता है। वायु की दुर्गन्ध का नाश होकर वायु सुगन्धित हो जाती है जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। अनेक प्रकार के रोग नियमित यज्ञ करने से दूर हो जाते हैं और यज्ञ करने से अधिकांश साध्य व असाध्य रोगों से बचाव भी होता है। यज्ञ के प्रभाव से निवास स्थान व घर के भीतर की वायु यज्ञाग्नि की गर्मी से हल्की होकर बाहर चली जाती है और बाहर की शीतल व शुद्ध वायु घर के भीतर प्रवेश करती है जो स्वास्थ्यप्रद होती है।

सत्यार्थप्रकाश आदि समस्त ग्रन्थ मनुष्यों को सद्ज्ञान देकर उन्हें ईश्वर का सच्चा भक्त बनाकर मोक्षगामी बनाते हैं

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ऋषि दयानन्द रचित सत्यार्थप्रकाश आदि समस्त ग्रन्थ मनुष्यों को सद्ज्ञान देकर उन्हें ईश्वर का सच्चा भक्त बनाकर मोक्षगामी बनाते हैं मनमोहन कुमार आर्य ऋषि दयानन्द (1825-1883) सच्चे ऋषि, योगी, वेदों के पारदर्शी विद्वान, ईश्वर भक्त, वेद भक्त, देश भक्त, सच्चे व सुपात्र समाज सुधारक, वेदोद्धारक, वैदिक धर्म व संस्कृति के अपूर्व प्रचारक आदि अनेकानेक गुणों… Read more »

आर्यसमाज अन्य सभी से भिन्न विद्या प्रधान सर्वोत्तम धार्मिक व सामाजिक संस्था है

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मनमोहन कुमार आर्य आर्यसमाज विद्या प्रधान एक धार्मिक एवं सामाजिक संगठन है। यह ऐसी संस्था है जो कि किसी भी विषय की उपेक्षा नहीं करती और सत्य ज्ञान को ही महत्व देती है। इसकी यह भी विशेषता है कि यह सत्य व असत्य के निर्णयार्थ ज्ञान व विज्ञान सहित चिन्तन, मनन व विचार एवं ध्यान… Read more »

श्रावण महीना 2017 की शुरुआत सोमवार से होगी….

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इस वर्ष 10 जुलाई 2017 से श्रावण मास शुरू हो रहा है. इस मौके पर मध्य प्रदेश के उज्जैन में बने ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के दर्शन करने के लिए लाखों की संख्या में यहां श्रद्धालु आते हैं | मध्यप्रदेश में उज्जैन के प्रसिद्घ ज्योतिर्लिंग महाकाल में 16 जुलाई से श्रावण महोत्सव मनाया जाएगा. श्रावण महोत्सव 16, 23, 30 जुलाई और 6, 13, 20 अगस्त को आयोजित होगा.

जानिए इस वर्ष 2017 के सावन महीना में शिव की पूजा कैसे करें…

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—  शिवलिंग पर सिन्दूर , हल्दी , लाल रंग के फूल , केतकी और केवड़े के फूल आदि या स्त्री सौंदर्य से सम्बंधित सामान ना चढ़ाएँ। क्योंकि
शिवलिंग पुरुषत्व का प्रतीक है। जलधारी पर ये चढ़ाये जा सकते है क्योकि जलधारी माता पार्वती और स्त्रीत्व का प्रतीक होती है।
—  शिव लिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है। आधी परिक्रमा ही लगाएं।

ऋषि दयानन्द ने संसार को ईश्वर के सच्चे स्वरूप और उसकी उपासना से परिचित कराया

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  मनमोहन कुमार आर्य हम मनुष्य हैं और हमारा यह मनुष्य जन्म ईश्वर के नियमों के अनुसार प्रारब्ध के कर्मों के भोग व नये कर्मों को करके विवेक प्राप्ति व जीवन उन्नति के लिए हुआ है। मनुष्य का आत्मा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञानादि गुणयुक्त, अल्पज्ञ और नित्य है। आत्मा अनादि, नित्य, अजर, अमर, एकदेशी,… Read more »

आज का मनुष्य अपने जन्मदाता और स्वयं के ज्ञान से अनभिज्ञ

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-मनमोहन कुमार आर्य क्या हम अपने आप और अपने जन्मदाता को जानते हैं। हमें लगता है कि संसार के 99 प्रतिशत लोग न तो अपने आप को जानते हैं न अपने जन्म दाता को ही जानते हैं। इस न जानने का मुख्य कारण अविद्या है। विद्या उसे कहते हैं कि जिससे पदार्थों का यथार्थ ज्ञान… Read more »

मेरा धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश

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  मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसे किसी भाषा का ज्ञान नहीं होता है, अन्य विषयों के ज्ञान होने का तो प्रश्न ही नही होता। सबसे पहले वह अपनी माता से उसकी भाषा, मातृभाषा, को सीखता है जिसे आरम्भिक जीवन के दो से पांच वर्ष तो नयूनतम लग ही जाते हैं। इसके बाद वह भाषा ज्ञान को व्याकरण की सहायता से जानकर उस पर धीरे धीरे अधिकार करना आरम्भ करता है। भाषा सीख लेने पर वह व्यक्ति उस भाषा की किसी भी पुस्तक को जानकर उसका अध्ययन कर सकता है। संसार में मिथ्या ज्ञान व सद्ज्ञान दोनों प्रकार के ग्रन्थ विद्यमान हैं। मिथ्या ज्ञान की पुस्तकें, भले ही वह धार्मिक हां या अन्य, उसे असत्य व जीवन के लक्ष्य से दूर कर अशुभ कर्म वा पाप की ओर ले जाती हैं।