कविता उर की तरन में घूर्ण दिए ! July 12, 2018 / July 12, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment गोपाल बघेल ‘मधु (मधुगीति १८०७०३ द) उर की तरन में घूर्ण दिए, वे ही तो रहे; सम-रस बनाना वे थे चहे, हम को विलोये ! हर तान में उड़ा के, तर्ज़ हर पे नचा के; तब्दील किए हमरा अहं, ‘सो’ से मिला के ! सुर दे के स्वर बदल के, कभी रौद्र दिखा के; पोंछे भी कभी अश्रु रहे, गोद बिठा के ! फेंके थे प्रचुर दूर कभी, निकट बुलाए; ढ़िंग पाए कभी रास, कभी रास न आए ! जो भी थे किए मन को लिये, हिय में वे भाए; ‘मधु’ समझे लीला प्रभु की, चरण उनके ज्यों गहे !’ Read more » ‘सो’ से मिला के ! उर की तरन में घूर्ण दिए ! गोद बिठा के ! तब्दील किए हमरा अहं निकट बुलाए; पोंछे भी कभी अश्रु रहे फेंके थे प्रचुर दूर कभी
कविता वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं ! July 12, 2018 / July 12, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment (मधुगीति १८०७१२) गोपाल बघेल ‘मधु’ वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं, सत्ताएँ उनके संकल्प से सृजित व समन्वित हैं; संस्थिति प्रलय लय उनके भाव से बहती हैं, आनन्द की अजस्र धारा के वे प्रणेता हैं ! अहंकार उनके जागतिक खेत की फ़सल है, उसका बीज बो खाद दे बढ़ाना उनका काम है; उसी को देखते परखते व समय पर काटते हैं, वही उनके भोजन भजन व व्यापार की बस्तु है ! विश्व में सभी उनके अपने ही संजोये सपने हैं, उन्हीं के वात्सल्य रस प्रवाह से विहँसे सिहरे हैं; उन्हीं का अनन्त आशीष पा सृष्टि में बिखरे हैं, अस्तित्व हीन होते हुए भी मोह माया में अटके हैं ! जितने अधिक अपरिपक्व हैं उतने ही अकड़े हैं, सिकुड़े अध-खुले अन-खिले संकुचित चेतन हैं; स्वयं को कर्त्ता निदेशक नियंत्रक समझते हैं, आत्म-सारथी गोपाल का खेल कहाँ समझे हैं ! वे चाहते हैं कि हर कोई उन्हें समझे उनका कार्य करे, पर स्वयं को समझने में ही जीव की उम्र बीत जाती है; ‘मधु’ के बताने पर भी बात कहाँ समझ आती है, प्रभु जगत से लड़ते २ भी कभी उनसे प्रीति हो जाती है ! Read more » Featured अस्तित्व आशीष पा सृष्टि बीज बो खाद वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं !
कविता गोरी की सुन्दरता पर उपमाये July 12, 2018 / July 12, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment आर के रस्तोगी लाल टमाटर से गाल है गोरी,सब्जी मंडी क्यों जाऊ आज दफतर से छुट्टी लेकर,क्यों न मै मौज मनाऊ हिरणी जैसी आंखे तेरी,क्यों शिकार करने मै जाऊ आज शिकार घर में करेगे,क्यों जंगल अब मै जाऊ सुराही सी गर्दन गोरी तेरी,क्यों कुम्हार के घर जाऊ जब सुराही अपने घर में,क्यों बाहर का पानी […] Read more » गोरी गोरी की सुन्दरता पर उपमाये चांदी जैसा बदन लाल टमाटर सब्जी मंडी सुनहरे बाल
कविता प्रतिध्वनि 2- कलेवर July 12, 2018 / July 12, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment अनुपम सक्सेना बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो अनकही रह जाती हैं कई प्रश्न ऐसे होते हैं जो अनुत्तरित रह जाते हैं बहुत कुछ पकड़ने की कोशिश में कुछ चीजें छूट जातीं हैं कुछ सच ऐसे होतें हैं जिन पर पर्दा डाल दिया जाता है इन्ही अनकहे अनुत्तरित छूटे हुए सच की मैं प्रतिध्वनि […] Read more » आत्म गौरव आत्मसम्मान और स्वाभिमान प्रतिध्वनि 2- कलेवर फटे कपड़ों बहुत सी बातें
कविता पिया की प्रतीक्षा में जगती रही July 10, 2018 / July 10, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment पिया की प्रतीक्षा में जगती रही रात भर करवटे बदलती रही स्वप्न भी हो गये अब स्वप्न जैसे कोई हो गया हो दफन कब आओगे मेरे प्यारे सजन ? पूछ रहे है ये मेरे भीगे नयन मन मेरा रात भर मचलता रहा तन मेरा अग्न से जलता रहा ये अग्न कैसे बुझेगी सनम ? ये […] Read more » अब तो दिन में पिया की प्रतीक्षा में जगती रही बैचेन होने लगी हूँ रोते रोते सूज
कविता आए रहे थे कोई यहाँ ! July 10, 2018 / July 10, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | 2 Comments on आए रहे थे कोई यहाँ ! (मधुगीति १८०७०३ स) आए रहे थे कोई यहाँ, पथिक अजाने; गाए रहे थे वे ही जहान, अजब तराने ! बूझे थे कुछ न समझे, भाव उनके जो रहे; त्रैलोक्य की तरज़ के, नज़ारे थे वे रहे ! हर हिय को हूक दिए हुए, प्राय वे रहे; थे खुले चक्र जिनके रहे, वे ही पर सुने ! टेरे वे हेरे सबको रहे, बुलाना चहे; सब आन पाए मिल न पाए, परेखे रहे ! जो भाए पाए भव्य हुए, भव को वे जाने; ‘मधु’ उनसे मिल के जाने रहे, कैसे अजाने ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ Read more » आए रहे थे कोई यहाँ ! टेरे वे हेरे सबको रहे मधु वे ही पर सुने
कविता एक हास्य व व्यंग कविता July 9, 2018 / July 9, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment पेट्रोल के दाम बढ़ रहे फिर भी वाहन चल रहे महंगाई भी रोजना बढ़ रही फिर भी लोग होटल में खा रहे सत्ता के सब लालची हो रहे देश को भाड में झोक रहे नेता आपस में लड़ रहे जनता को एकता का सबक दे रहे जो कभी आपस में दुश्मन थे आज वे आपस […] Read more » एक हास्य व व्यंग कविता पेट्रोल के दाम बढ़ रहे फिर भी लोग होटल में खा रहे महंगाई भी रोजना बढ़ रही
कविता अब तो आ जाओ सनम July 9, 2018 / July 9, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment दिन ढल चूका है,शाम हो गई है चिराग जल चुके है,रात हो गई है मिटाने जा रहे है, वे अपने गम न जाने कहाँ हो तुम ? अब तो आ जाओ सनम तेल जल चूका है,बाति कम हो गई है चिराग की लो भी अब कम हो गई है बुझ रहा है वह,निकल रहा उसका […] Read more » अब तो आ जाओ सनम चाँद जा चूका है चाँदनी अब सो गई है तितलियाँ
कविता एक गजल बेटा बाप को नहीं देखता July 7, 2018 / July 7, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment जीता हूँ अपनी धुन में,इस दुनिया का कायदा नहीं देखता रिश्ते निभाता हूँ दिल से कभी अपना फायदा नहीं देखता लिखता हूँ अपने दिल से, कभी किसी का दिल नहीं दखाता शब्दों की माला पिरोता हूँ कभी किसी की कविता नहीं चुराता आँखे सभी की दो दो है,पर वह अपने पापो को नहीं देखता अँधा […] Read more » एक गजल बेटा काबिलियत बाप को नहीं देखता मोदी देश
कविता रेप के समस्या का समाधान July 6, 2018 / July 6, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment रोज रोज रेप होते हुये, एक वैश्या दुखी होकर बोली आ जाओ हवस की दरिंदो,मैंने रेप की दुकान खोली मेरे भी एक औरत है,एक औरत का दर्द समझती हूँ पेट की भूख के कारण, कोठो पर हर पल सजती हूँ मैंने इन दरिंदो के लिये, यहाँ फ्री सेल लगा रक्खी है मिटा ले अपनी हवस […] Read more » दरिंदो पुलिस बच्चियों रेप के समस्या का समाधान संसद कानून
कविता मोक्ष के लिये बुरारी मौत-कांड July 5, 2018 / July 5, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मोक्ष के लिये मौत को गले लगाया सभी तुमने एक नहीं पूरे परिवार को मौत में सुलाया तुमने पढ़-लिख कर भी,ना समझ बन गये थे क्यों तुम ? अंध विश्वासी,रुढ़िवादी अधर्मी बन गये थे तब तुम क्यों उकसाया परिवार को तुमने आत्महत्या के लिये ? क्या मजबूरी थी,उनको मजबूर किया मरने के लिये ? मोक्ष […] Read more » पढ़-लिख बुद्ध और महावीर मोक्ष के लिये बुरारी मौत-कांड मौत हिन्दू शास्त्रों
कविता नारी की पीड़ा July 4, 2018 / July 4, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment नारी तुझको कोई अबला कहता,कोई सबला भी कहता है पुरुष तुझको सबला कहकर,फिर भी वह प्रताड़ित करता है तूही द्वापर में,तूही त्रेता में,तूही कलयुग में आई है कही तुझे जुए में हारा,कही तूने अग्नि परीक्षा पाई है जो नारी का करे अपमान,वह मर्द कभी नहीं हो सकता है जो बहन का करे न सुरक्षा,वह भाई […] Read more » तूही कलयुग तूही त्रेता में तूही द्वापर में नारी की पीड़ा