कविता साहित्य आओ खेलें वैदिक होली March 8, 2017 by विमलेश बंसल 'आर्या' | Leave a Comment विमलेश बंसल ‘आर्या’ होली को पावन त्यौहार आज कछु ऐसे मनाऊँगी। लगाकर सबके चंदन माथे, सौम्य हो जाऊंगी। बड़ों को करके ॐ नमस्ते, छोटों को हृदय लगाऊंगी। नवान्न आटे की गुजिया बना, प्रसाद बनाऊंगी। वृहद यज्ञ सामूहिक कर के नौत खिलाऊंगी। उंच नीच का भेद भुलाकर, प्रीति निभाऊंगी उत्तम पेय पिला ठंडाई, फाग गवाऊँगी। पूरे […] Read more »
कविता सत्य पथ का मुसाफिर February 25, 2017 by कुमार विमल | 1 Comment on सत्य पथ का मुसाफिर कुमार विमल कोई पथ जाती है धन को, कोई सुख साधन को, और कोई प्रेमिका के मधुर चितवन को। पर छोड़ ये सारे सुलभ पथ को तूने चुना है सत्य को नमन है तेरे त्याग और तप को। पग-पग है संग्राम जिस पथ का, मापदंड साहस जिस पथ का , इंतिहान तप,तेज और बल […] Read more » Featured सत्य पथ का मुसाफिर
कविता साहित्य उर में आता कोई चला जाता ! February 10, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment उर में आता कोई चला जाता, सुर में गाता कभी है विचलाता; सुनहरी आभा कभी दिखलाता, कभी बे-रंग कर चला जाता ! वश भी उनका स्वयं पे कब रहता, भाव भव की तरंगें मन बहता; नियंत्रण साधना किये होता, साध्य पर पा के वो कहाँ रहता ! जीव जग योजना विविध रहता, विधि वह उचित […] Read more » उर में आता कोई चला जाता !
कविता साहित्य हे खाली बोतल बता February 2, 2017 / February 2, 2017 by सिया अर्पण राम | Leave a Comment सिया अर्पण राम हे खाली बोतल बता तुझे तो होगा पता क्या था तेरे अंदर ऐसा जिसे पहली बार पीकर ही हो गए वे बावले और छोड़ दिया सब घर-बार दूसरो के हवाले हे खाली बोतल बता तुझे तो होगा पता ऐसी क्या थी वह तरल जवाब तो होगा सरल हे खाली बोतल बता तुझे […] Read more » सिया अर्पण राम
कविता साहित्य वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता ! January 30, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता, निरीक्षण करना बहुत कुछ होता; जाना पहचाना पुरातन होता, परीक्षण करना पुन: पर होता ! समय से बदलता विश्व रहता, द्रष्टा भी वैसा ही कहाँ रहता; द्रष्टि हर जन्म ही नई होती, कर्म गति अलहदा सदा रहती ! बदल परिप्रेक्ष्य पात्र पट जाते, रिश्ते नाते भी हैं सब उलट […] Read more » वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता !
कविता साहित्य ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई ! January 29, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई, बना ऋषि घुमाया है हर कोई; ख़ुद छिपा झाँकता हृदय हर ही, कराता खोज स्वयं अपनी ही ! पूर्ण है पूर्ण से प्रकट होता, चूर्ण में भी तो पूर्ण ही होता; घूर्ण भी पूर्ण में मिला देता, रहस्य सृष्टि का समझ आता ! कभी मन द्रष्टि की सतह खोता, कभी […] Read more » ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई !
कविता साहित्य प्रेरणा January 28, 2017 / January 28, 2017 by अजय कुमार | Leave a Comment बस्ती – बस्ती गली – गली फैली एक निराशा | कल कल करती बहती नदियां फिर भी मैं हूं प्यासा || जीवन के दुख द्वन्द लिए पागल पथिक सा चलता जाऊं | एक क्षण में रोता हूं दूजे क्षण मैं गाता जाऊं || समझ चुका था जीवन का हर नियम और वो कायदा | तपकर […] Read more »
कविता साहित्य गीत सुनाने निकली हूँ January 26, 2017 by शालिनी तिवारी | Leave a Comment भारत माँ की बेटी हूँ और गीत सुनाने निकली हूँ, वीरों की गाथा को जन जन तक पहुँचाने निकली हूँ, भारत माँ के शान के खातिर सरहद पर तुम ड़टे रहे, सर्दी गर्मी बरसातों में भी तुम अड़िग वीर बन खड़े रहे, कोई माँ कहती है कि मेरा लाल गया है सीमा पर, दुश्मन को […] Read more » गीत सुनाने निकली हूँ
कविता साहित्य संस्कार सुर में फुरक कर ! January 24, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment संस्कार सुर में फुरक कर, ‘सो-हं’ की गंगा लुढ़क कर; ‘हं’ तिरोहित ‘सो’ में हुआ, ‘सो’ समाहित ‘हं’ में हुआ ! वह विराजित विभु में हुआ, अपना पराया ना रहा; अपनत्व पा महतत्व का, था सगुण गुण ले मन रहा ! शाश्वत खिला पा द्युति दिशा, मन महल वत चमका किया; रहना था बस उसका […] Read more »
कविता साहित्य जो रक्तकणों से लिखी गई,जिसकी “जयहिन्द” निशानी है । January 23, 2017 by शकुन्तला बहादुर | 2 Comments on जो रक्तकणों से लिखी गई,जिसकी “जयहिन्द” निशानी है । सुभाष चंद्र बोस*भारत के अमर स्वतन्त्रता सेनानी नेताजी शुभाषचन्द्र बोस के * * जन्मदिवस २३ जनवरी के पुनीत अवसर पर श्रद्धा सुमन -* है समय नदी की बाढ़ कि, जिसमें सब बह जाया करते हैं , है समय बड़ा तूफ़ान , प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं । अक्सर दुनिया के लोग समय में, चक्कर […] Read more » Featured poem on subhash chandra bose
कविता साहित्य खड़े जब अपने पैर हो जाते ! January 15, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment खड़े जब अपने पैर हो जाते, आत्म विश्वास से हैं भर जाते; सिहर हम मन ही मन में हैं जाते, अजब अनुभूति औ खुशी पाते ! डरते डरते ही हम ये कर पाते, झिझकते सोचते कभी होते; जमा जब अपने पैर हम लेते, झाँक औरों की आँख भी लेते ! हुई उपलब्धि हम समझ लेते, […] Read more » खड़े जब अपने पैर हो जाते !
कविता साथ जो छोड़ कर चले जाते ! January 15, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment (मधुगीति १७०११४ ब) साथ जो छोड़ कर चले जाते, लौटकर देखना हैं फिर चहते; रहे मजबूरियाँ कभी होते, वक़्त की राह वे कभी होते ! देखना होता जगत में सब कुछ, भोग संस्कार करने होते कुछ; समझ हर समय कोई कब पाता, बिना अनुभूति उर कहाँ दिखता ! रहते वर्षों कोई हैं अपने बन, विलग […] Read more »