कविता साहित्य हर उम्र वैसे अजीब होती है December 5, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment ये सत्तर की उम्र भी अजीब होती है, बुढ़ापे की दहलीज़ होती है, इसके आगे जितनी मिल जाये, सूद पर व्याज होती है। सत्तर की उम्र में भी रोमांस होता है, अंदाज़ ज़रा सा अलग होता है तुमने दवाई खाई अब आराम करलो, ऐसी बातें होती है। किसको कितनी दवाइयां निगलनी […] Read more » Featured हर उम्र वैसे अजीब होती है
कविता साहित्य कुछ और उठो सत्यार्थी November 27, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment इंसान ज्वालामुखी बन चुके थे, पहले ही, इंसानो के बच्चे भी मासूमियत छोड़कर, ज्वालामुखी बनने लगे हैं, जो कभी भी फट कर सब कुछ जला सकते हैं। कोई चार साल की उम्र में हैवानियत कर गया, किसी किशोर ने बच्चे को मार दिया, इमतिहान के डर ने गुनाह करवा डाला! दोष किसे दूँ सीखा तो […] Read more » सत्यार्थी
कविता साहित्य तेरी आँखों में कहीं, खो गए हैं, जागती आँखों में, सो गए हैं। November 25, 2017 by रवि श्रीवास्तव | Leave a Comment देखकर तुझको मुझे, कुछ ऐसा लगा। बात दिल की तुझसे, मैं कह न सका। आसमां से जैसे ,कोई उतरी हो परी। मेरी धड़कन में बसी, तेरी तस्वीर अधूरी। चलती है जब तू, दिल में उठती है लहर, रूका,रूका सा दिखे, मुझे पूरा तो शहर। पूरी महफिल है यहां, फिर भी बेगाने से […] Read more » तेरी आँखों में
कविता साहित्य यमुना मइया की कामना November 25, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी मेरे पद पंकज का वंदन चाहे मत एक बार करो । गाल बजाने वालो के सब ढोंगो का प्रतिकार करो । भाव सुमन के नहीं दिखावटी माला मुझे चढ़ाते हो । सड़ी गली बदबुओं से मेरी पवित्रता मिटाते हो ।। मुझको चुनरी नहीं चढ़ाओ मत दीपो का दान करो । दीन हीन […] Read more » यमुना मइया की कामना
कविता आज अद्भुत स्वप्न समझा ! November 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment आज अद्भुत स्वप्न समझा, जगत की जादूगरी का; नहीं कोई रहा अपना, पात्र था हर कोई उसी का ! स्वार्थ लिपटे व्यर्थ चिपटे, चिकने चुपड़े रहे चेहरे; बने मुहरे बिना ठहरे, घूमते निज लाभ हेरे ! अल्प बुद्धि अर्थ सिद्धि, पिपासा ना आत्म शुद्धि; पहन सेहरे रहे सिहरे, परम पद कब वे निहारे ! […] Read more » आज अद्भुत स्वप्न समझा !
कविता साहित्य नव रूप में नव प्रीति में ! November 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment ‘नव रूप में नव प्रीति में , आते रहेंगे ज्योति में; अनुभूति में चित दीप में, वाती जलाते श्रीति में ! वे दूर ना हम से गये, बस टहलने सृष्टि गये; अवलोकते हमको रहे, वे और भास्वर हो रहे ! देही बदल आजाएँगे, वे और प्यारे लगेंगे; दुलरा हमें पुनि जाएँगे, जो रह गया दे जाएँगे ! है लुप्त ना कोई यहाँ, बस व्याप्ति के वश जहान; है जन्मना मरना वहाँ, पर सभी कुछ उनके मना ! नाटक नियति के पात्र वे, अपना है धर्म निभा रहे; ‘मधु’ आ रहे या जा रहे, गोदी सदा प्रभु की रहे ! गोपाल बघेल ‘मधु’ Read more » नव रूप में नव प्रीति में !
कविता कुछ नया, कुछ पुराना November 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment पुरानी धुनों पे नये गीत लिखना, पुराने गीतों को नई ताल देना, नई ताल पर पांवो का थिरकना, बुरा तो नहीं है पर , पुराने को पुराना ही रहने देना। पुरानी नीव पर नया घर बनाना, पुराने की ख़ुशबू मगर रहने देना। नये को स्वीकारो, पुराना नकारो ऐसा नहीं कभी भी होने देना। जो आज नया है, कल पुराना लगेगा पुराने को हमने कुछ यों संवारा, पुराने नये में अंतर न जाना। समय की पर्तों मे है जो पुराना, नये ढंग में लायेगा वो ज़माना, ना कुछ नया है ना ही पुराना बदलाव करने का है बहाना। ना पुराना सब सही था मैने न जाना ना नया सब गलत है,ये भी ना माना समझ जाओ तो, नयों को समझाना पुरानों और नयों को अब है पीढ़ियों का अंतर मिटाना, दोनो को जोड़कर समन्वय बनाना। Read more » कुछ नया कुछ पुराना
कविता साहित्य चलो, दिवाली आज मनाएं October 20, 2017 by बलवन्त | Leave a Comment हर आँगन में उजियारा हो तिमिर मिटे संसार का। चलो, दिवाली आज मनाएं दीया जलाकर प्यार का। सपने हो मन में अनंत के हो अनंत की अभिलाषा। मन अनंत का ही भूखा हो मन अनंत का हो प्यासा। कोई भी उपयोग नहीं सूने वीणा के तार का । चलो, दिवाली आज मनाएं दीया जलाकर प्यार का। इन दीयों से दूर न […] Read more » दिवाली
कविता ‘वेबलेंथ’ का खेल October 15, 2017 by अलकनंदा सिंह | Leave a Comment भावों के विशाल पर्वत पर, उगती खिलती आकाश बेल चढ़ती- कुछ हकीकतें और कुछ आस्था, का मेल होती है मित्रता। तय परिधियों के अरण्य में ब्रह्म कमल सी एक बार खिलती मन-सुगंध को अपनी नाभि में समेटने का खेल होती है मित्रता। स्त्री- पुरुष, पुरुष -स्त्री, स्त्री-स्त्री, पुरुष- पुरुष, के सारे विभेद नापती, अविश्वास से […] Read more » Featured वेबलेंथ
कविता साहित्य जब नींद नहीं आँखों में October 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बेवजह रात को जब भी मुझे नींद नहीं आती है करवटें बदल बदल कर रात गुज़र जाती है। चादर की हर सिलवट तब, कोई कहानी अपनी, यों ही कह जाती है। जब घर में आँगन होता था और नींद नहीं आती थी चँदा से बाते होती थीं, तारों को गिनने में वो रात गुज़र जाती थी। हल्की सी बयार का झोंका जब तन को छूकर जाता था, उसकी हल्की सी थपकी, नींद बुला लाती थी। अब बंद कमरों मे जब नींद नहीं आँखों में यादों के झरोखे से अब रात के तीसरे पहर में नींद के बादल आते हैं जो मुझे सुला जाते हैं। Read more » जब नींद नहीं आँखों में
कविता साहित्य यान ही यान हैं यहाँ रमते ! October 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment यान ही यान हैं यहाँ रमते ! शिकागो के गगन से यान ही यान हैं यहाँ रमते, तरा ऊपर तलों में वे उड़ते; धरणि नीचे वे देख हैं लेते, साये आकाश के वे छू लेते ! कोई आते कोई चले जाते, पट्टियों पर कोई उतर चलते; कोई उन पट्टियों से उड़ जाते, उड़ते […] Read more » शिकागो के गगन से
कविता साहित्य कभी कुछ भी नज़र नहीं आए ! October 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment कभी कुछ भी नज़र नहीं आए ! शिकागो के गगन से कभी कुछ भी नज़र नहीं आए, धुँधलका आसमान में छा जाए; श्वेत बादल बिछे से नभ पाएँ, व्योम में धूप सी नज़र आए ! ज्योति सम-रस सी रमी मन भाये, मेघ लीला किए यों भरमाएँ; धरा से देख यह कहाँ पायें, रुचिर […] Read more » कभी कुछ भी नज़र नहीं आए !