कविता साहित्य बोन्साई January 12, 2017 by बीनू भटनागर | 1 Comment on बोन्साई मेरी ज़ड़ों को काट छाँट के, मुछे बौना बना दिया, अपनी ख़ुशी और सजावट के लिये मुझे, कमरे में रख दिया। मेरा भी हक था, किसी बाग़ मे रहूँ, ऊँचा उठू , और फल फूल से लदूँ। फल फूल तो अब भी लगेंगे, मगर मै घुटूगाँ यहीं तुम्हारी, सजावट के शौक के लिये, जिसको तुमने […] Read more » बोन्साई
कविता आज नया कुछ लिख ही दूँ January 9, 2017 by बीनू भटनागर | 3 Comments on आज नया कुछ लिख ही दूँ कुछ नया करने की चाह में, अपनी ही कविताओं के, अंग्रेज़ी में अनुवाद कर डाले, या उन्हे ही उलट पलट कर, दोहे कुछ बना डाले। जो कल नया था आज पुराना सा लगने लगा है अब….. तो सोचा….. आज कुछ नया ही लिख दूँ। रोज़ होते रहे बलात्कार, उनपर टीका टिप्पणी और विश्लेषण तो अब […] Read more » आज नया कुछ लिख ही दूँ
कविता साहित्य दिल्ली पुस्तक मेला January 9, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment प्रगति मैदान लग गया,पुस्तक का भण्डार अपना अपना शोर है, अपनी अपनी रार! बड़े-बड़े लोगों के ,अपने अपने स्टाल, वे ही सब ले जायेंगे,पुरुस्कार या शाल! बड़े बड़े अब रचयिता, आये दिल्ली द्वार, किसकी किताब ने किया,सर्वाधिक व्यापार? कवि व्यापारी से लगें,जब बेचते किताब, आज एक से लग रहे, आफ़ताब महताब! मेला किताब का लगा,होगा […] Read more » दिल्ली पुस्तक मेला
कविता माँ तुम्हें पुकारती, माँ तुम्हें पुकारती ।। January 4, 2017 by शकुन्तला बहादुर | 2 Comments on माँ तुम्हें पुकारती, माँ तुम्हें पुकारती ।। एक आह्वान एवं भावांजलि – वीर सेनानियों को । देश के सपूतों ! मातृभू के रक्षकों ! शूरवीर सैनिकों ! क्रान्तिवीर बन्धुओं ! साहसी सेनानियों ! माँ तुम्हें पुकारती , माँ तुम्हें पुकारती ।। * आज सब आतंकियों को, आक्रमणकारियों को, और देशद्रोहियों को , भेज दो यमलोक को । माँ तुम्हें पुकारती, माँ तुम्हें […] Read more » माँ तुम्हें पुकारती
कविता साहित्य याद तुम्हारी January 3, 2017 / January 3, 2017 by मधु शर्मा कटिहा | Leave a Comment मधु शर्मा कटिहा खुश बहुत थी याद तेरी अब मुझे आती नहीं, डूबकर इक अक्स में अब मैं खो जाती नहीं। उफ़! भूलते ही याद आ गया फिर से तू क्यों? कोई रिश्ता ही नहीं तो दर्द भी देते हो क्यों? चल रही हवा तो पत्ते चुप से हैं मायूस क्यों? रोशनी सूरज की […] Read more » याद तुम्हारी
कविता यादेँ व उम्मीद :-सौरभ चतुर्वेदी December 31, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment मयस्सर डोर से फिर एक मोती झड़ रहा है , तारीखों के जीने से दिसम्बर उतर रहा है | कुछ चेहरे घटे , चंद यादें जुड़ीं गए वक़्त में, उम्र का पंछी नित दूर और दूर उड़ रहा है |… गुनगुनी धूप और ठिठुरती रातें जाड़ो की, गुजरे लम्हों पर झीना-झीना पर्दा गिर रहा है। […] Read more » यादेँ व उम्मीद
कविता साहित्य ऐसा ही कुछ करना होगा December 31, 2016 by शालिनी तिवारी | Leave a Comment लम्बे अर्से बीत चले हैं, इनसे कुछ सबक लेना होगा, उम्मीदों की सतत् कड़ी में, इस बार नया कुछ बुनना होगा, अपने समाज के अन्तिम जन को, अब तो बेहतर करना होगा, शिक्षित और जागरूक बनाकर, इनके हक में लड़ना होगा, कुछ न कुछ पाने का सबका, अपना अपना सपना होगा, सूख चुके आँसुओं को […] Read more » ऐसा ही कुछ करना होगा
कविता साहित्य इस साल न हो पुर-नम आँखें December 28, 2016 by डॉ.कुमार विश्वास | Leave a Comment “इस साल न हो पुर-नम आँखें, इस साल न वो खामोशी हो इस साल न दिल को दहलाने वाली बेबस-बेहोशी हो इस साल मुहब्बत की दुनिया में, दिल-दिमाग की आँखें हों इस साल हमारे हाथों में आकाश चूमती पाँखें हों ये साल अगर इतनी मुहलत दिलवा जाए तो अच्छा है ये साल अगर हमसे हम […] Read more » इस साल न हो पुर-नम आँखें
कविता शख्सियत साहित्य शमशेर की कविता December 24, 2016 / December 24, 2016 by पिन्टू कुमार मीणा | Leave a Comment पिन्टू कुमार मीणा शमशेर बहादुर सिंह दूसरे सप्तक के कवि है । इनके 1956 और 1961 में दो काव्य संग्रह प्रकाशित हुए- ‘कुछ कविताएँ’ और ‘कुछ और कविताएँ’ । शमशेर आधुनिक दौर के सबसे जटिल कवि माने जाते हैं । इसका कारण कविता को समझने की पाठक / आलोचक की वह पारंपरिक धारणा रही है […] Read more » Featured Shamsher Bahadur Singh शमशेर बहादुर सिंह
कविता नन्हें बच्चे November 18, 2016 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment नन्हें बच्चे Read more » Featured नन्हें बच्चे
कविता साहित्य अधूरी दास्ताँ November 17, 2016 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment कुछ पुरानी यादें… और तुम्हारा साथ… वही पुराने प्रेम पत्र और अपनी बात… पलभर की गुस्ताख़ी, और अंधेरी रात… टूटें हुए मकान और सुना पड़ा खाट.. ‘अवि‘ के दिल के अरमान और आँसुओं की बरसात… सवेरे की लालिमा और घायल ज़ज्बात… सबकुछ सिर्फ़ तुम पर ही आकर ख़त्म हो जाता है… और तुमसे […] Read more » अधूरी दास्ताँ
कविता डरता है मन मेरा November 17, 2016 by लक्ष्मी अग्रवाल | Leave a Comment डरता है मन मेरा कहीं हो न जाए तेरे भी जीवन में अंधेरा नाजों से पली थी मैं अपनी बगिया की कली थी एक दिन उस बगिया को छोड़ चली थी मैं नए सपनों को देख मचली थी मैं जैसे बहारों के मौसम में खिली थी मैं पर अगले ही दिन मुस्कान खो चुकी थी […] Read more » डरता है मन मेरा