कविता साहित्य रावण क्या बन पावोगे October 9, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment कीट मकोड़े पशु जानवर, भी बन पाना आसान नहीं। सब के अपने लक्ष्य होते हैं,सब कर पाना आसान नहीं।। चारो वेद का ज्ञाता था वह, वीणा संगीत में सानी नहीं। राजनीतिज्ञ था पराक्रमी , ज्ञानी सम उसके कोई नहीं।। Read more » रावण क्या बन पावोगे
कविता साहित्य फल की इच्छा September 27, 2016 by बीनू भटनागर | Leave a Comment कर्म का उद्देश्य ही फल है, तो फल की इच्छा होना तो ज़रूरी है। थोड़ी व्याकुलता भी होगी ही, Read more » Featured फल की इच्छा
कविता साहित्य तलाश पूरी हुई September 22, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment राजेश बाबू देहरादून में रहते हैं। उनकी बेटी सुमन एम.ए. के अंतिम वर्ष में थी। हर पिता की तरह वे भी उसके विवाह के लिए चिंतित थे। उनकी इच्छा थी कि परीक्षा के बाद इस सर्दियों में उसके हाथ पीले कर दिये जाएं। उन्होंने अपने मित्रों और सम्बन्धियों को यह कह रखा था कि उनकी […] Read more » Featured तलाश पूरी हुई
कविता साहित्य नारी का दर्द September 17, 2016 by चारु शिखा | Leave a Comment क्यों दर्द हैं उसकी बातों में हमेशा मुस्कुराती है जो , इतना अकेली क्यों हैं वो जो मर्यादित है , जो संयमित है, जो नाजुक है , जो शांत है , आखिर एक अबला है वह उसकी की देह तो सबको दिखती है। उसकी आंतरिक सुंदरता क्यों नहीं दिखती.. कहाँ सुरक्षित है वो घर -बाहर […] Read more » नारी का दर्द
कविता साहित्य शहर मर भी रहा है September 16, 2016 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment हर शहर की सरहद के उस पार से कुछ ठंडी हवाएँ हर बार जरूर आती है अपने साथ सभ्यताओं का एक पुलिंदा भी साथ में गाहे-ब-गाहे जरूर ले आती हैं वही हवाएँ, शहरी हवाओं के साथ मिलकर एक रंग बना देती है रंग शहर के पुरातन के साथ भी अक्सर घुल-मिल जाया करता है जैसे […] Read more » शहर मर भी रहा है
कविता तुम से प्यार कितना है September 7, 2016 / September 7, 2016 by मनीषा गुप्ता | Leave a Comment मनीषा गुप्ता क्या कहूँ की तुम से प्यार कितना है तेरी चाहत पर एतबार कितना है !! की साँसे भी अब तो कर देती है बगावत की तुम बिन चलना अब उनका भी मुहाल कितना है !! की तेरी आने की आहट से ही महक जाता है श्रृंगार मेरा देखो मेरे वज़ूद में बसता तेरा […] Read more » तुम से प्यार कितना है
कविता साहित्य मानसिक पतन September 5, 2016 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment उपहास और उलाहना समाज में साथ दौड़ते रहते हैं, जैसे कोई पतंगा भोजन की तलाश में भागता है। एक चौराहे के मानिंद मानता है समग्र शक्ति को, जहाँ कल्पित जिंदगी का नाम गुजर भर जाना है। शहर की भाषा में आधी आबादी एक गहरा तंज है, आदमी स्त्री को गहरे चिंतन में भी शक से […] Read more » मानसिक पतन
कविता साहित्य कागजों पर अहसास लिखता हूँ। August 31, 2016 by आकाश कुमार राय | Leave a Comment ना कवि, ना लेखक, ना ही इतिहासकार हूँ… जीवन है अबूझ पहेली, उसके कुछ पल लिखता हूँ.. ना लिखता हूँ शायरी.. ना दोहों की करता बातें.. गुजरे उम्र का.. कागजों पर अहसास लिखता हूँ। यादों के मर्म की बस.. कुछ बात लिखता हूँ.. कुछ उलझे हुए से अपने हालात लिखता हूँ.. जीवन उलझा जिनमें वो […] Read more » कागजों पर अहसास लिखता हूँ।
कविता साहित्य प्रेम भी अपरिपक्व होने लगा है………. August 28, 2016 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment अर्पण जैन ‘अविचल’ स्त्री की देह तालाब-सी है, बिल्कुल ठहरी हुई सी उसमे नदी के मानिंद वेग और चंचलता कुछ नहीं फिर भी पुरुष उस तालाब में ही प्रेम खोजता है, सत्य है क़ि खोज की भाषा भी सिमट-सी गई हैं वेग का आवरण भी कभी कुंठा के आलोक में तो कभी पाश्चात्य के स्वर […] Read more » Featured प्रेम भी अपरिपक्व होने लगा है
कविता साहित्य सलामती की दुआ मै करती रहूँगी August 18, 2016 by शालिनी तिवारी | Leave a Comment तुम्हारी कलाइयों में रक्षा की राखी, बरस दर बरस मैं बाँधती रहूँगी, दिल में उमंगे और चेहरे पर खुँशियाँ, हर एक पल मै सजाती रहूँगी, कभी तुम न तन्हा स्वयं को समझना, कदम से कदम मैं मिलाती रहूँगी, तुम हर इक दिन आगे बढ़ते ही रहना, सलामती की दुआ मै करती रहूँगी । खुदा ने […] Read more » Featured सलामती की दुआ मै करती रहूँगी
कविता साहित्य मुझको अब सहना आता है………. August 16, 2016 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मुझको अब सहना आता है इतनी पीड़ा सहने पर अब, ईश्ववर भी याद नहीं आता, जितनी पीड़ा देनी है दे दे वो, मुझको अब सहना आता है। पीड़ा आज गई घर अपने, फिर आऊंगी वादा करके। हर आहट पर लगता है कहीं पीड़ा वापिस आने का संकेत तो नहीं ………….. इतनी पीड़ा सहकर अब रोज़ […] Read more » मुझको अब सहना आता है
कविता साहित्य अधूरी है आज़ादी August 15, 2016 by नरेश भारतीय | Leave a Comment नरेश भारतीय अधूरी क्यों है अभी भी यह आज़ादी? विभाजन को स्वीकार करने की मजबूरी क्या थी? जो कट कर अलग हुए क्या ख़ुश रहे? जो मारकाट से आहत हुए किसके दुश्मन थे? साम्प्रदायिक हत्याओं की भेंट चढ़ती गई आज़ादी सरहद के उस पार जो आज होता दिख रहा विध्वंस और विनाश के कगार पर […] Read more » Featured poem on Independence Day अधूरी है आज़ादी आजादी