कविता सबको खुश रखने के बजाए सबके साथ खुश रहना February 1, 2024 / February 1, 2024 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायक अगर जीना है तो सबको खुश रखने के बजाए सबके साथ खुश रहना होगा माना जीवन एक नाटक है स्वाभाविक है जीवन में नाटक हो जाना मगर बुरा तब होता जब जैसा तब तैसा खुद को नहीं दिखने देना जिसके साथ रिश्ते में बंध गए उसके साथ चाहिए हमेशा सामंजस्य बिठाना कलह […] Read more » सबको खुश रखने के बजाए सबके साथ खुश रहना
कविता मंत्र है, साक्षात शिवशक्ति February 1, 2024 / February 1, 2024 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव हमारा देश अनादिकाल से ज्ञान-विज्ञान की गवेषणा, अनुशीलन एवं अनुसंधान का प्रमुख केन्द्र रहा है जिसमें विद्या की विभिन्न शाखाओं में हमारे ऋषिमुनियों-ज्ञानियों ने धर्म दर्शन, व्याकरण, साहित्य, न्याय, गणित ज्योतिष सहित अनेक साधनाओं का प्रस्फुटन किया है जिनमें मंत्र, तंत्र और यंत्र का भी […] Read more » The mantra is Shiva Shakti in person
कविता हम जो छले, छलते ही गये January 25, 2024 / January 25, 2024 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment 15 अगस्त की वह सुबह तो आयी थीजब विदेशी आक्रांताओं से हमेंशेष भारत की बागड़ोर मिलीहम गुलाम थे, आजाद हुयेआजादी के समय भी हम छले गये थेआज भी हम अपनों के हाथों छले जा रहे है।भले आज हम आजादी में साँसे ले रहे हैपर यह कैसी आधी अधूरी आजादी ?पहले अंगे्रेजों के जड़ाऊ महल बनाते […] Read more » We who were deceived continued to be deceived.
कविता वाणिनी January 24, 2024 / January 24, 2024 by श्लोक कुमार | Leave a Comment कुछ ताख की मजबूरीतो, कुछ लाख की मजबूरीकुछ छड़ और खनक जाकुछ पल और सह ले तू इन रोब के उष्णता कोसुन ले ए नृत्यकार , कुछ न कहना रहजा सहन कर संसार के आहट कोसमाज के स्वरों की गूंजे गिनातीमेरी समय को ,के देख यही बिसात तेरीके तू लाख कर ले प्रयत्नरहेगी एक साख […] Read more » वाणिनी
कविता मैं भूल गया हॅू अलमारी में बंद किताबों को, जो आज भी मेरा इंतजार करती है ! January 24, 2024 / January 24, 2024 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment मैं बचपन से ही किताबों सेबहुत प्रेम करता हूं,पहले लोटपोट, मधु मुस्कान, नंदनगुड़िया जैसी किताबों का चस्का लगा थाधीरे धीरे सरिता,कादम्बिनी, मायानिरोगधाम जैसी पत्रिकाओं का शौकमुझे सातवें आसमान पर पहुंचा देता था।किताबें पढने के जुनून ने 10 साल की उम्र में ही मुझेबसस्टेण्ड पर लाकर खडा कर दियाजहॉ ब्रजकिशोर मालवीय और संजीव डेहरी मालवीय के बुकस्टाल सेकमीशन से किताबें लेता औरबस […] Read more » I have forgotten the books locked in the cupboard
कविता भाग्य हमारा श्री रामलला आ रहे हैं अपने धाम को January 22, 2024 / January 24, 2024 by ब्रह्मानंद राजपूत | Leave a Comment भाग्य हमारा श्री रामलला आ रहे हैं अपने धाम को। जन-जन में है खुशी और भज रहे हैं अपने प्रभु श्री राम को स्वागत के लिए बैठा है हर भारत वासी अपने प्रभु श्री राम को सज-धज कर तैयार है अलौकिक अयोध्या धाम अपने राम को भाग्य हमारा श्री रामलला आ रहे हैं अपने धाम को।। आनंदप्रद हुआ विश्व, दिन ये आया प्रभु श्री राम का विश्व गा रहा है स्वागत गान अपने प्रभु श्री राम का स्वर्ण कलश रखे हुए है, बंधे हुए हैं बंधन वार, सजे हुए हैं हर द्वार प्रभु श्रीराम के स्वागत को भाग्य हमारा श्री रामलला आ रहे हैं अपने धाम को।। कर रहा है प्रतीक्षा विश्व सदियों से राम के दर्शन को सरयू जोह रही बाट प्रभु श्रीराम के चरण पखारने को धन्य हुआ सम्पूर्ण विश्व, प्रभु श्री राम के आने को भाग्य हमारा श्री रामलला आ रहे हैं अपने धाम को।। रघुनन्दन के लिए शबरी ने फूलों से सजाया है पथ को, कर रही है इंतजार राम का अपने झूठे बेर खिलाने को आएगा अब राम राज्य क्योंकि प्रभु आ गए हैं अपने धाम को भाग्य हमारा श्री रामलला आ रहे हैं अपने धाम को।। -ब्रह्मानंद राजपूत Read more » Our destiny is that Shri Ramlala is coming to his abode.
कविता क्षितिज के पार January 18, 2024 / January 18, 2024 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव दूर क्षितिज के पार शून्य मेंऑखें भेदना चाहती है व्योम कोपुच्छल छल्लों का बनता बिगड़ता गुच्छाऑखों की परिधि में आवद्घ रहकरथिरकता हुआ ओझल हो जाता हैऑखें कितनी बेबश होती हैअपनी पूर्ण क्षमता केउन गुच्छों के स्वरूप कोथिर देखने को उत्सुक ।अनवरत चल पडता हैउन छल्लों का शक्तिस्त्रोतऑखों से फूटताअज्ञात यात्रा की ओरयह क्रमवार […] Read more » क्षितिज के पार
कविता प्रेयसी – मिलन January 11, 2024 / January 11, 2024 by अजय एहसास | Leave a Comment पता नहीं कुछ वर्षों की या जन्मों का है सहारा ना तेरा ना मेरा कहता, कहता सब है हमारा उसे प्रेयसी ने जब प्रथम मिलन को पुकारा मन में खुशी लिए तुरत ही हो गया नौ दो ग्यारा मन में था डर, क्या करता पर यह ना सोचा क्या होगा तब जान जाये जब सबके […] Read more » beloved - union
कविता अनुबाद January 8, 2024 / January 8, 2024 by माधब चंद्र जेना | Leave a Comment जीवन मृत्यु में अनुबाद होता है धीरे-धीरे, बेहद धीरे-धीरे l पिता से पुत्र का अनुवाद पुत्र से पिता का, माँ से बेटी का अनुवाद पुनः बेटी से मां का बादल से वर्षा और बरसा से बादल जल का सटिक अनुवाद असंभव है जब तक प्यास का अनुवाद न हो जाए सभी अनुवाद पूरा पूरा असंभव […] Read more »
कविता पेड़ की हत्या January 8, 2024 / January 8, 2024 by माधब चंद्र जेना | Leave a Comment जब में पेड़ बनके मरता हूँ मेरे हत्यारे कहीं फरार नहीं होता वल्कि वह अस्त्र उठाके ऐसे चलता है जैसे कोई युद्ध जीतके लौटा है l मेरा जब हत्या होता है वहां कोई अपराध नहीं होता क्योंकि पेड़ का इनसान जैसा कोई प्राण नहीं होता पेड़ का माँ बाप नहीं होते, कोई अपने नहीं होते […] Read more »
कविता कितना अच्छा होता January 8, 2024 / January 8, 2024 by माधब चंद्र जेना | Leave a Comment कितना अच्छा होता अगर दुनिआ में इनसान नहीं होते चारो तरफ जंगल ही जंगल होता पानी ही पानी होता चिड़िया अपने सुर में गाते सारे अपने धुन में जीते हवा अपने मन से बहता पानी अपने मन से बहता कभी कहीं पे कान फटने वाला डी जे नहीं होता बारात नहीं होता की बारदात भी […] Read more »
कविता रामलला का दर्शन कर ले बंदे January 3, 2024 / January 3, 2024 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायक रामलला का दर्शन कर ले बंदे राम मर्यादित चरित्र जीनेवाला राम ही भव बंधन मिटानेवाला राम से मानव जाति का भला! रामलला का मासूम सा मुखड़ा राम ही सुनते हैं सबकी दुखड़ा राम से बड़ा न भला करनेवाला राम ही जग में है सबसे भला! रामलला का पूजन कर ले बंदे रामलला […] Read more » रामलला का दर्शन कर ले बंदे