कविता चाँदनी June 10, 2013 / June 10, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on चाँदनी धूँधट हटाकर बादलों का चाँद ने, धरती को देखा तो लगी वो झूमने, खिले हैं फूल और छिटकी हुई है चाँदनी, पवन के वेग से उड़ती हुई है औढ़नी। सुरीली तान छेड़ी बाँसुरी पर, सजे सपने पलक पालकी पर, झंकार वीणा की मधुर है रागिनी, ढोल की थाप पर है लय बाँधनी। […] Read more » poem by binu bhatnagar ji चाँदनी
कविता साहित्य चक्रव्यूह June 8, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment दुनिया तो है एक मेला पर, देखिये इस मेले में आदमी कितना है अकेला . घिरा है भीड़ से पर, कैसे खोजें अपनों को अजनबियों के बीच से . भीड़ समस्याओं की भी लगी है चारों ओर . हर तरफ है शोर ही शोर . समस्याओं के एक चक्रव्यूह से निकलते ही , दूसरे में […] Read more » चक्रव्यूह
कविता साहित्य श्रंगार रस के कवि June 8, 2013 / June 8, 2013 by बीनू भटनागर | 3 Comments on श्रंगार रस के कवि मित्र एक कविता लिखें, चित्र भी संग चिपकायें, चित्र देख कविता लिखें, या लिखकर गूगल पर जायें। शब्द जाल ऐसा बिछायें, हम उलझ उलझ रह जायें। श्रँगार मिलन की वेला मे हवा मे ख़ुशबू उड़ायें। सूखे पत्तो से भी , कवि उनकी आहट पाँयें। दूजे मित्र कविता लिखें, समय के घाव बतायें, विरह की […] Read more » श्रंगार रस के कवि
कविता साहित्य मंदिर जाता भेड़िया June 6, 2013 / June 6, 2013 by श्यामल सुमन | Leave a Comment शेर पूछता आजकल, दिया कौन यह घाव। लगता है वन में सुमन, होगा पुनः चुनाव।। गलबाँही अब देखिये, साँप नेवले बीच। गद्दी पाने को सुमन, कौन ऊँच औ नीच।। मंदिर जाता भेड़िया, देख हिरण में जोश। साधु चीता अब सुमन, फुदक रहा खरगोश।। पीता है श्रृंगाल अब, देख सुराही नीर। थाली में खाये सुमन, कैसे […] Read more » मंदिर जाता भेड़िया
कविता साहित्य सोना हो चाहत अगर June 5, 2013 by श्यामल सुमन | 1 Comment on सोना हो चाहत अगर सोना हो चाहत अगर, सोना हुआ मुहाल। दोनो सोना कब मिले, पूछे सुमन सवाल।। खर्च करोगे कुछ सुमन, घटे सदा परिमाण। ज्ञान, प्रेम बढ़ते सदा, बाँटो, देख प्रमाण।। अलग प्रेम से कुछ नहीं, प्रेम जगत आधार। देख सुमन ये क्या हुआ, बना प्रेम बाजार। प्रेम त्याग अपनत्व से, जीवन हो अभिराम। बनने से पहले लगे, […] Read more » सोना हो चाहत अगर
कविता साहित्य सन्नाटा June 5, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on सन्नाटा कभी कभी एक सन्नाटा, छा जाता है, भीतर ही भीतर, तब कोई आहट , कोई आवाज़, बेमानी सी हो जाती है। इस सन्नाटे से डरती हूँ, क्योंकि इस सन्नाटे में, अतीत और भविष्य, दोनो की नकारात्मक, तस्वीरें उभरने लगती हैं, वर्तमान का अर्थ ही बदल जाता है, सब बेमानी होने लगता है। इस सन्नाटे से […] Read more » सन्नाटा
कविता साहित्य छोटी- सी आशा June 5, 2013 / June 5, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment जानता नहीं है कहाँ है उसका मुकाम । वह तो लगा रहता है बनाने में एक के बाद दूसरा बहुमंजिला मकान । छोटे-से गाँव का है वह एक कुशल कारीगर । आ गया है यहाँ अपना घर – द्वार छोड़कर । गाँव का वह झोपड़ीनुमा घर भी गिरवी रख आया था, जिसे कुछेक सालों में […] Read more » छोटी- सी आशा
कविता भारत एक बड़ा बाज़ार बन गया है June 3, 2013 / June 3, 2013 by ऋतु राय | 1 Comment on भारत एक बड़ा बाज़ार बन गया है भारत एक बड़ा बाज़ार बन गया है बिकने लगा सब कुछ विदेशी हाथों का औज़ार बन गया है इंसान बिक गया, ईमान बिक गया घर में रखा साजों-सामान बिक गया विचार बिक गया समाचार बिक गया आदमी की भीतर से बाहर तक शिष्टाचार बिक गया अब खिलौनों की क्या बात करे ना रहा दम-ख़म खेल […] Read more » भारत एक बड़ा बाज़ार बन गया है
कविता साहित्य आज का मानव June 1, 2013 / June 1, 2013 by मिलन सिन्हा | 1 Comment on आज का मानव आज हरेक के जेब में मानव हरेक के पेट में मानव पेट से निकला है मानव पेट से परेशान है मानव अन्तरिक्ष में क्रीड़ा कर रहा है मानव सड़क पर लेटा है मानव जोड़ – घटाव में व्यस्त है मानव वैरागी बन रहा है मानव मशीन बन रहा है मानव समुद्र की लहरें गिन रहा […] Read more » आज का मानव
कविता कविता : संकल्प May 29, 2013 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा जो है खरा झंझावात में भी वही रह पायेगा खड़ा . नहीं दिखेगा वह कभी भी डरा-डरा . कोई भी उसे अपने संकल्प से नहीं डिगा पायेगा पर, जो खोटा है भले ही मोटा है देखने में चिकना चुपड़ा है सौन्दर्य प्रसाधनों का चलता-फिरता विज्ञापन है, मुखौटा हटते ही उसका असली चेहरा दिखेगा […] Read more » कविता : संकल्प
कविता मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी May 28, 2013 by पंकज त्रिवेदी | 1 Comment on मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी अब मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी कविताएँ ही पढ़ता हूँ कविता ही क्या ? तुम्हें भी तो पढता हूँ… महज़ एक कोशिश ! तुम्हारी मुस्कान के पीछे छुपा वो दर्द कचोटता है मेरे मन को तुम्हारी खिलखिलाती हँसी सुनकर लगता है जैसे किसी गहराई से एक दबी सी आवाज़ भी उसके पीछे से कराहती है […] Read more » मैं सिर्फ तुम्हारी लिखी
कविता कितने प्यार से May 28, 2013 by पंकज त्रिवेदी | 1 Comment on कितने प्यार से सींचा था मैंने उस रिश्ते को अपने ही हाथों मे संभाला था उसे किसी फूल की तरह समझदार तो था मगर हरबार हौसला बढाता रहा मैं वो आगे बढता रहा आगे बढते हुए वो इतना आगे निकल गया कि अब वो मुडकर भी नहीं देख पाता गिला वो नहीं कि वो आगे […] Read more »