व्यंग्य मन का रावण October 27, 2019 / October 27, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment हा, तुम्हारी मृदुल इच्छाहाय मेरी कटु अनिच्छा था बहुत माँगा ना तुमने ,किंतु वह भी दे ना पाया ।था मैंने तुम्हे रुलाया ,,ये एक तसल्ली भरा सन्देश है उन लोगों की तरफ से जिन्होंने इस बार मन के रावण को पुष्पित -पल्लवित नहीं होने दिया ।इस बार का दशहरा बहुत फीका फीका रहा।,फेसबुक के कॉलेज से […] Read more »
कविता मै भारत का रहने वाला हूँ,भारत की ही बात तुम्हे सुनाता हूँ | October 26, 2019 / October 26, 2019 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मै भारत का रहने वाला हूँ,भारत की ही बात तुम्हे सुनाता हूँ |यहाँ बुद्ध राम रहीम नानक महावीर जन्मे,उनके उपदेश सुनाता हूँ ||करते थे वे सबका परोपकार, अहिंसा शांति के मार्ग पर चलते थे |दिया नहीं कभी किसी को कष्ट,सबका आदर सत्कार वे करते थे ||दिया सारे विश्व को एक नया सन्देश, वे आज भी […] Read more » भारत
लेख अच्छा है एक दीप जला लें… October 24, 2019 / October 24, 2019 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment राघवेंद्र प्रसाद मिश्रभारतीय संस्कृति का कोई भी पर्व हो वह कुछ न कुछ संदेश लेकर आता है। शरद ऋतु में पडऩे वाला रोशनी का पर्व दीपावली त्योहार एक बार भी नई उमंग व उत्साह को लेकर आया है। यूं तो देश का यह सबसे प्राचीन त्योहार माना जाता है पर समय के हिसाब से इस […] Read more »
लेख प्रकाश व खुशियों की दीपमाला का पावन पर्व दीपावली October 24, 2019 / October 24, 2019 by दीपक कुमार त्यागी | Leave a Comment दीपक कुमार त्यागीसनातन धर्म व हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार हम सभी के जीवन में त्यौहारों का विशेष महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ तक कि अगर हम भारत को त्यौहारों की अद्भुत संस्कृति के महाकुंभ की संपन्न विशाल नगरी कहें तो यह कहना भी गलत नहीं होगा। हमारे प्यारे देश में वर्ष भर आयेदिन कोई न […] Read more »
कविता मैं कैसे करूँ गर्व ! October 23, 2019 / October 23, 2019 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment मैं कैसे करूँ गर्व, सर्व उसका जब रहा; दर्पण में रूप लखके कहूँ, मेरा कब रहा ! है कथानक उसी का, चर्म उसका ही रहा; हर मर्म पीछे झाँका वही, कर्त्ता वो रहा ! भरता उमँग औ तरंग, वह-ही तो रहा; हर ताल लय में नृत्य देखे, चाहे वो रहा ! वर्चस्व जो भी बचा […] Read more »
व्यंग्य गोली नेकी वाली October 21, 2019 / October 21, 2019 by दिलीप कुमार सिंह | Leave a Comment “ये दौरे सियासत भी क्या दौरे सियासत है चुप हूँ तो नदामत है ,बोलूँ तो बगावत है” आम वोटर चुनाव के वक्त ऐसे ही सोचता है कि वो क्या बोले ,सब कुछ तो बोल दिया है नेताजी ने।नेताजी जवान हैं ,स्टाइलिश कपड़े पहनते हैं ,कभी मीडिया के लाडले हुआ करते थे ,सबको कान के नीचे बजाने की […] Read more »
लेख आइए जिंदगी को सवारें October 21, 2019 / October 21, 2019 by ललित गर्ग | Leave a Comment -ललित गर्ग-जिंदगी को हर कोई अनूठा रचना चाहता है एवं तरक्की के शिखर देना चाहता है। इसी भांति जिन्दगी के मायने भी सबके लिये भिन्न-भिन्न है। किसी के लिए जिन्दगी कर्म है, तो किसी के लिए रास्ता। ऐसे भी कई मिल जाएंगे, जिन्होंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं। जिंदगी को कुछ लोग प्रकृति […] Read more » आइए जिंदगी को सवारें
कहानी अम्मा October 20, 2019 / October 20, 2019 by बीनू भटनागर | Leave a Comment अम्मा की उम्र यही होगी क़रीब 78 साल और बाबूजी होंगे 82 के। अम्मा बड़ी लगन से पूजा पाठ व्रत उपवास करती थीं उनके व्रत उपवास पूजा पाठ सब सफल हुए क्योंकि उनके दोनों बेटे बहुत लायक निकले, अच्छी बहुएं मिली, आदर सत्कार मिला और किसी को क्या चाहिये। उम्र के साथ स्वास्थ्य में गिरावट […] Read more »
लेख देश में धर्म व संस्कृति पर हावी होता बाजारवाद October 20, 2019 / October 20, 2019 by दीपक कुमार त्यागी | Leave a Comment दीपक कुमार त्यागीआज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बाजारवाद और इसकी ताकतवर व्यवस्था के प्रभाव से समाज का कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहा है। हालात यह हो गये हैं कि सनातन धर्म की संस्कृति व त्यौहारों की बेहद गौरवशाली परम्पराएं भी बाजारवाद के आसान शिकार बन गये हैं। देश में स्थिति ऐसी हो गयी […] Read more »
पुस्तक समीक्षा संभावना और चुनौतियों के बीच मूल्यानुगत मीडिया का आग्रह October 18, 2019 / October 18, 2019 by लोकेन्द्र सिंह राजपूत | Leave a Comment – लोकेंद्र सिंह सक्रिय पत्रकारिता और उसके शिक्षण-प्रशिक्षण के सशक्त हस्ताक्षर प्रो. कमल दीक्षित की नयी पुस्तक ‘मूल्यानुगत मीडिया : संभावना और चुनौतियां’ ऐसे समय में आई है, जब मीडिया में मूल्यहीनता दिखाई पड़ रही है। मीडिया में मूल्यों और सिद्धांतों की बात तो सब कर रहे हैं, लेकिन उस तरह का व्यवहार मीडिया का दिखाई नहीं दे रहा है। […] Read more »
कविता खुलेपन के मायने October 17, 2019 / October 17, 2019 by डा.सतीश कुमार | Leave a Comment खुलेपन के मायने बदल गए हैं, विचारों के खुलेपन को नहीं , शरीर के खुलेपन को , तरजीह मिलने लगी है। हद होती है, हर बात की, शरीर के खुलेपन की, कोई हद नज़र आती नहीं। हर युग की जरूरतें, स्थितियाँ, परिस्थितियां अलग होती हैं। परिवर्तित होती हैं मन:स्थितियाँ, शारीरिक पहनावा, मौसम अनुसार भी। माहौल […] Read more »
कविता खोई कलम को खोज ले October 17, 2019 / October 17, 2019 by डॉ कविता कपूर | Leave a Comment धर्म की छत तले अधर्म का कैक्टस पले, जातिवाद का कहर और जिहाद का ज़हर चखकर आज कबीर की वाणी मुख हो गई, ना जाने कबीर की कलम कहांँ खो गई। ना जाने कबीर की कलम कहांँ खो गई…. नारी निर्मला की दशा निम्न से निम्नतर हो गई निर्मला के आँसू रीते नहीं कि वह […] Read more »