कविता साहित्य श्री देवी के अंतिम वाक्य March 19, 2018 / March 19, 2018 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment संसार एक थियेटर घर है अनेको पात्र इसमें आते है अपना अपना रोल निभा कर अपने घरो को चले जाते है मैं भी इस थियेटर घर में अपना रोल निभाने आई थी मेरा रोल अब खत्म हुआ घर जाने की बारी आई थी डायरेक्टर ऊपर बैठा हुआ है सबको डायरेक्शन दे रहा डायरेक्शन के […] Read more » Featured श्री देवी
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-71 March 19, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य   गीता का तेरहवां अध्याय और विश्व समाज जैसे एक खेत का स्वामी अपने खेत के कोने-कोने से परिचित होता है कि खेत में कहां कुंआ है? कहां उसमें ऊंचाई है? कहां नीचा है? उसकी मिट्टी कैसी है? उसमें कौन सी फसल बोयी जानी उचित होगी?-इत्यादि। वैसे ही हममें से अधिकांश […] Read more » Featured आज का विश्व गीता का कर्मयोग गीता का तेरहवां अध्याय विश्व समाज
कविता साहित्य ना ही शरीर ना ही मन हूँ ! March 18, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment ना ही शरीर ना ही मन हूँ, आत्म स्वयम्भू; क्यों वृथा व्यथा मैं हूँ सहूँ, विचरते विभु ! करते हैं नाट्य सब पदार्थ, प्राण त्राण वश; अस्तित्व कहाँ अपने, नृत्य करते वे विवश ! शक्ति है शिव की, प्रकृति कृति गति उन्हीं के हाथ; वे ही त्रिलोक विचरें सतत, पात्र हर के साथ ! हैं देश काल उनके, ब्रह्म-कण उन्हीं के गात; वे ही समात प्रष्फुरात, विहँसे सिहरे गात ! वे मेरे शीष दे अशीष, ‘शिवोऽहम्’ कहत; ‘मधु’ उनकी गोद बैठे रमत, रुनझुनात भू ! रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’ Read more » ना ही शरीर ना ही मन हूँ !
कविता साहित्य बिजली के तार पर, बेल चढ जाती है. March 16, 2018 by डॉ. मधुसूदन | 5 Comments on बिजली के तार पर, बेल चढ जाती है. डॉ. मधुसूदन (१) फूलों को फैलाकर सौरभ* को बाँटकर बिजली के तार पर बेल चढ जाती है. {सौरभ*=सुगंध, सुवास) (२) मानव की सत्ता को चुनौती देती है गिलहरी तारपर कर्तब दिखाती है. (३) रास्ते की भीड़ है, पीपल का पेड़ है. डाली पर बसता एक, चिडिया का नीड़* है. {नीड़*= घोंसला} (४) तिनके की […] Read more » creepers On the electric wire Featured बेल
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-70 March 16, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य    गीता का तेरहवां अध्याय और विश्व समाज श्री अरविन्द का कहना है कि कर्म को और ज्ञान को हम अपनी इच्छा से चलायें या इन्हें भगवान की इच्छा में लीन कर दें? -गीता ने इस प्रश्न को उठाकर इसका उत्तर दिया है। हमारा कर्म, हमारा ज्ञान कितना संकुचित है, […] Read more »  गीता का कर्मयोग आज का विश्व  गीता का तेरहवां अध्याय Featured आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग गीता का बारहवां अध्याय विश्व विश्व समाज
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-69 March 16, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य   गीता का बारहवां अध्याय और विश्व समाज यहां पर गीता के 12वें अध्याय के जिस श्लोक का अर्थ हमने ऊपर दिया है-उसमें ‘सर्वारम्भ परित्यागी’ शब्द आया है। इसके विषय में सत्यव्रत सिद्घान्तालंकार जी बड़ी तार्किक बात कहते हैं :-”सर्वारम्भ त्यागी का अर्थ कुछ लोग यह करते हैं कि जो किसी […] Read more »  गीता का बारहवां अध्याय Featured आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग विश्व विश्व समाज
व्यंग्य साहित्य आम आदमी का आधार… खास का पासपोर्ट …!! March 13, 2018 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा अपने देश व समाज की कई विशेषताएं हैं। जिनमें एक है कि देश के किसी हिस्से में कोई घटना होने पर उसकी अनुगूंज लगातार कई दिनों तक दूर – दूर तक सुनाई देती रहती है। मसलन हाल में चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद त्रिपुरा में प्रतिमा तोड़ने की घटना की प्रतिक्रिया […] Read more » Featured आधार आम आदमी खास का पासपोर्ट
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-68 March 13, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य   गीता का बारहवां अध्याय और विश्व समाज गीता का उद्देश्य है कि हे संसार के लोगों! चाहे तुम जिस रास्ते को भी अपनाओ उसे अपना लो, पर मेरी एक शर्त है कि बनो धार्मिक। तुम्हारी धार्मिकता ही तुम्हें संसार के लिए उपयोगी बनाये रखेगी। यदि बहुत ऊंची और गहरे ज्ञान […] Read more » Featured आज का विश्व गीता गीता का कर्मयोग गीता का बारहवां अध्याय विश्व समाज
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-67 March 13, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य    गीता का बारहवां अध्याय और विश्व समाज यह जो अव्यक्त है ना, इसके ओर-छोर का पता तो प्रकाश की गति से दौडक़र भी नहंी लगाया जा सकता। इसके उपासक होने का अर्थ भी उतना ही व्यापक है जितना अव्यक्त स्वयं में व्यापक है, विशाल है, विस्तृत है। आप अनुमान […] Read more » Featured आज का विश्व गीता गीता का कर्मयोग गीता का बारहवां अध्याय विश्व समाज
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-66 March 10, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य  गीता का ग्यारह अध्याय और विश्व समाज श्रीकृष्णजी को यह स्पष्ट हो गया था कि अब युद्घ अनिवार्य है और अर्जुन ने गांडीव की डींगें हांकते हुए कौरवों को समाप्त करने का संकल्प भी ले लिया पर जब युद्घ की घड़ी आयी तो अर्जुन की मति मारी गयी। अब वह ‘किंकत्र्तव्यविमूढ़’ […] Read more » Featured karmayoga of geeta आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग गीता का ग्यारह अध्याय विश्व समाज
लेख गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-65 March 10, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य    गीता का ग्यारह अध्याय और विश्व समाज श्रीकृष्ण जी कह रहे हैं कि अर्जुन अब जो कुछ होने जा रहा है उससे क्यारियों में नये फूल खिलने वाले हैं। इन पौधों का समय पूर्ण हो गया है। ये अपने कर्मों का फल पाने के लिए अब अपने आप ही मृत्यु के […] Read more » Featured karmayoga of geeta आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग
कविता इंजीनियर बनेगा बेटा अपना… March 10, 2018 by कुमार विमल | Leave a Comment बाप ने देखा एक सपना, इंजीनियर बनेगा बेटा अपना, पढ़ लिखकर कर, यह कुछ काम करेगा, लाडला बेटा, देश का ऊँचा नाम करेगा। बेटा था आज्ञाकारी, शुरू किया तैयारी , FITJEE, Aaksh, BANSAL में भरी गई फीस भारी, आखिर क्यों ना हो ! यह थी युद्ध की तैयारी। सपने […] Read more » Featured इंजीनियर