लेख गीता का कर्मयोग और आज का विश्व भाग-2 November 16, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment वैदिक गीता-सार सत्य गीता की उपयोगिता इसलिए भी है कि यह ग्रन्थ हमें अपना कार्य कत्र्तव्य भाव से प्रेरित होकर करते जाने की शिक्षा देती है। गीता का निष्काम-भाव सम्पूर्ण संसार को आज भी दु:खों से मुक्ति दिला सकता है। परन्तु जिन लोगों ने गीता ज्ञान को साम्प्रदायिकता का प्रतीक मान लिया, उनके स्वयं के […] Read more » Featured geeta karmayoga गीता गीता का कर्मयोग विश्व
व्यंग्य साहित्य रसगुल्ला युद्ध का मीठा समाधान November 16, 2017 by विजय कुमार | 1 Comment on रसगुल्ला युद्ध का मीठा समाधान कल सुबह शर्मा जी पार्क में घूमने आये, तो उनके हाथ में कोलकाता के प्रसिद्ध हलवाई के.सी.दास के रसगुल्लों का एक डिब्बा था। उन्होंने सबका मुंह मीठा कराया और बता दिया कि सरदी बढ़ गयी है। अतः फरवरी के अंत तक सुबह घूमना बंद। इसलिए ये रसगुल्ला सुबह की सैर से विदाई की मिठाई है। […] Read more » Featured रसगुल्ला
व्यंग्य कतार में जीवन … !! November 15, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा आज कल मनः स्थिति कुछ ऐसी बन गई है कि यदि किसी को मुंह लटकाए चिंता में डूबा देखता हूं तो लगता है जरूर इसे अपने किसी खाते या दूसरी सुविधाओं को आधार कार्ड से लिंक कराने का फरमान मिला होगा। बेचारा इसी टेंशन में परेशान हैं। यह सच्चाई है कि […] Read more » adhaar link Featured life in queue कतार में जीवन
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-1 November 13, 2017 / November 14, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य   वैदिक गीता-सार सत्य कभी-कभी मन में आता है कि वह समय कितना पवित्र और प्यारा होगा, जब भगवान श्री कृष्ण जी इस भूमण्डल पर विचरते होंगे? पर अगले ही क्षण मन में यह विचार भी आता है कि उस काल को भी पवित्र और प्यारा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि […] Read more » Featured आज का विश्व कर्मयोग गीता का कर्मयोग
व्यंग्य साहित्य दिल्ली दरबार में स्मॉग का स्वैग November 13, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अमित शर्मा देश का दिल दिल्ली, कोहरे और धुंए के लिव इन रिलेशनशिप से प्रकटे “स्मॉग” रूपी हलाहल विष से संसद की कार्यवाही की तरह ठप्प पड़ा है। पर्यावरण विशेषज्ञो की माने तो दिल्ली में वायु की शुद्धता का स्तर इतना नीचे गिर चुका है कि वो आसानी से कोई भी राजनैतिक दल ज्वाइन कर […] Read more » स्मॉग
व्यंग्य दिन में तोड़ो, रात में जोड़ो November 10, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment परसों शर्मा जी के घर गया, तो चाय के साथ बढ़िया मिठाई और नमकीन भी खाने को मिली। पता लगा कि उनका दूर का एक भतीजा राजुल विवाह के बाद यहां आया हुआ है। मैंने उसके कामधाम के बारे में पूछा, तो शर्मा जी ने उसे बुलवाकर मेरा परिचय करा दिया। – क्यों बेटा राजुल, […] Read more » Featured दिन में तोड़ो रात में जोड़ो
व्यंग्य संस्कारो की पिच पर टीम इंडिया की बैटिंग November 10, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अमित शर्मा अनादिकाल से संयममार्गी और बॉलीवुड तपस्वी श्री आलोकनाथ जी को संस्कार और संस्कारिता का प्रतीक बताया जाता रहा है, जिसे निर्विवाद रूप से तीनो लोको में स्वीकार और अंगीकार दोनों किया गया है। आलोकनाथ जी भले ही संस्कारो के अधिकृत धारक और वाहक हो किंतु संस्कारो की उत्पत्ति धर्म के गर्भ से हुई […] Read more » टीम इंडिया
कविता आज अद्भुत स्वप्न समझा ! November 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment आज अद्भुत स्वप्न समझा, जगत की जादूगरी का; नहीं कोई रहा अपना, पात्र था हर कोई उसी का ! स्वार्थ लिपटे व्यर्थ चिपटे, चिकने चुपड़े रहे चेहरे; बने मुहरे बिना ठहरे, घूमते निज लाभ हेरे ! अल्प बुद्धि अर्थ सिद्धि, पिपासा ना आत्म शुद्धि; पहन सेहरे रहे सिहरे, परम पद कब वे निहारे ! […] Read more » आज अद्भुत स्वप्न समझा !
कविता साहित्य नव रूप में नव प्रीति में ! November 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment ‘नव रूप में नव प्रीति में , आते रहेंगे ज्योति में; अनुभूति में चित दीप में, वाती जलाते श्रीति में ! वे दूर ना हम से गये, बस टहलने सृष्टि गये; अवलोकते हमको रहे, वे और भास्वर हो रहे ! देही बदल आजाएँगे, वे और प्यारे लगेंगे; दुलरा हमें पुनि जाएँगे, जो रह गया दे जाएँगे ! है लुप्त ना कोई यहाँ, बस व्याप्ति के वश जहान; है जन्मना मरना वहाँ, पर सभी कुछ उनके मना ! नाटक नियति के पात्र वे, अपना है धर्म निभा रहे; ‘मधु’ आ रहे या जा रहे, गोदी सदा प्रभु की रहे ! गोपाल बघेल ‘मधु’ Read more » नव रूप में नव प्रीति में !
कविता कुछ नया, कुछ पुराना November 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment पुरानी धुनों पे नये गीत लिखना, पुराने गीतों को नई ताल देना, नई ताल पर पांवो का थिरकना, बुरा तो नहीं है पर , पुराने को पुराना ही रहने देना। पुरानी नीव पर नया घर बनाना, पुराने की ख़ुशबू मगर रहने देना। नये को स्वीकारो, पुराना नकारो ऐसा नहीं कभी भी होने देना। जो आज नया है, कल पुराना लगेगा पुराने को हमने कुछ यों संवारा, पुराने नये में अंतर न जाना। समय की पर्तों मे है जो पुराना, नये ढंग में लायेगा वो ज़माना, ना कुछ नया है ना ही पुराना बदलाव करने का है बहाना। ना पुराना सब सही था मैने न जाना ना नया सब गलत है,ये भी ना माना समझ जाओ तो, नयों को समझाना पुरानों और नयों को अब है पीढ़ियों का अंतर मिटाना, दोनो को जोड़कर समन्वय बनाना। Read more » कुछ नया कुछ पुराना
लेख साहित्य हमें इतिहास में जीना छोड़ना होगा October 30, 2017 by राजू पाण्डेय | Leave a Comment यह विवाद जोरों पर है कि सत्ता पक्ष देश के इतिहास को परिवर्तित कर नया इतिहास गढ़ रहा है जो उचित नहीं है। सत्ता हमेशा ही इतिहास का उपयोग अपनी नीतियों और विचारधारा को उचित ठहराने के लिए करती रही है और इतिहास की पुनर्व्याख्या होती रही है। वर्तमान कोशिश में नया कुछ भी नहीं […] Read more » Featured
लेख साहित्य अयोध्या की दीवाली और टीपू सुल्तान की जयन्ती October 28, 2017 by डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री | Leave a Comment डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री दीवाली की शुरुआत आज से लगभग पौने दो लाख साल पहले त्रेता युग में अयोध्या से हुई थी । उस दिन श्री राम चन्द्र चौदह साल का वनवास काट कर , श्री लंका के रावण को पराजित कर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण सहित अपने शहर अयोध्या वापिस आए थे […] Read more » Featured अयोध्या अयोध्या की दीवाली टीपू सुल्तान टीपू सुल्तान की जयन्ती दीवाली