व्यंग्य साहित्य बैंकों का घुमावदार सीढ़ियां … !! March 8, 2018 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा तब तक शायद बैंकों का राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ था। बचपन के बैक बाल मन में भारी कौतूहल और जिज्ञासा का केंद्र होते थे। अपने क्षेत्र में बैंक का बोर्ड देख मैं सोच में पड़ जाता था कि आखिर यह है क्या बला। बैंकों की सारी प्रक्रिया मुझे अबूझ और रहस्यमय लगती। समझ […] Read more » Curved stairs of banks ... !! Featured घुमावदार सीढ़ियां बैंक बैंकों का घुमावदार सीढ़ियां
व्यंग्य साहित्य दिदी की मासिक धर्मनिरपेक्षता के पुनर्पाठ का स्कूली प्रसंग March 7, 2018 by मनोज ज्वाला | 2 Comments on दिदी की मासिक धर्मनिरपेक्षता के पुनर्पाठ का स्कूली प्रसंग रामकृष्ण परमहंस की तपोभूमि और विवेकानन्द की ज्ञानभूमि पश्चिम बंगाल में वहां के शासन की धर्मनिरपेक्षता इन दिनों फिर उफान पर है । सियासत की तिजारत में वामपंथियों को परास्त कर चुकी ममता दिदी अपनी धर्मनिरपेक्षता का एक नया कीर्तिमान स्थापित करने में लगी हुई हैं । इस बावत हिंसक जेहाद का प्रशिक्षण देने के […] Read more » Featured Mamta Banerjee secularism of Didi दिदी
लेख गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-64 March 6, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य गीता का ग्यारह अध्याय और विश्व समाज अर्जुन कह रहा है कि मैं जो कुछ देख रहा हूं उसकी शक्ति अनन्त है, भुजाएं अनन्त हैं, सूर्य चन्द्र उसके नेत्र हैं, मुंह जलती हुई आग के समान है। वह अपने तेज से सारे विश्व को तपा रहा है। वह सर्वत्र व्याप्त होता दीख […] Read more » Featured karmayoga of geeta आज का विश्व. karmayoga of geeta गीता
लेख गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-63 March 6, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य   गीता का आठवां अध्याय और विश्व समाज स्वामी चिन्मयानन्द जी की बात में बहुत बल है। आज के वैज्ञानिकों ने ‘गॉड पार्टीकल’ की खोज के लिए अरबों की धनराशि व्यय की और फिर भी वह ‘गॉड पार्टीकल’ अर्थात ब्रह्मतत्व की वैसी खोज नहीं कर पाये-जैसी हमारे श्री ऋषि-महर्षियों ने हमें […] Read more » Featured geeta आज का विश्व. karmayoga of geeta गीता गीता का कर्मयोग
कविता साहित्य स्वच्छ सुन्दर पथ सँवारे ! March 6, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment स्वच्छ सुन्दर पथ सँवारे, गा रही हिम रागिनी; छा रही आल्ह्वादिनी उर, छिटकती है चाँदनी ! वन तड़ागों बृक्ष ऊपर, राजती सज रजत सी; घास की शैया विराजी, लग रही है विदूषी ! रैन आए दिवस जाए, रूप ना वह बदलती; रूपसी पर धूप चखके, मन मसोसे पिघलती ! वारिशों में रिस रसा कर, धूलि से तन तरजती; त्राण को तैयार बैठी, प्राण को नित धारती ! धवलता से जग सजाए, सहजता प्रतिपालती; ‘मधु’ को मोहित किए वह, वारती मन योगिनी ! स्वर स्वप्न की गति को तके स्वर स्वप्न की गति को तके, उर दहन की ज्वाला लखे; सुर हृदय की भाषा पढ़े, त्वर गति चले मन बढ़ चले ! लखके विपिन पृथ्वी नयन, ज्यों यान से भास्वर मनन; करि कल्पना निज अल्पना, हृद भाव से चखते सुमन ! जो गगन की वीरानगी, मधु मेघ की वह वानगी; स्वर दे चले प्रभु यामिनी, शुभ मन बसे ज्यों दामिनी ! जग स्वप्न को दे चाँदनी, पग हर तके सौदामिनी; हर कल्पना को रंग दे, हर अल्पना को ढंग दे ! बढती चले संकल्प ले, चढती चले सोपान ले; नभ की थिरन मन में रखे, ‘मधु’ विहग को नव पँख दे ! आज अद्भुत स्वप्न समझा ! आज अद्भुत स्वप्न समझा, […] Read more » पथ
कविता लगाये कितने क़यास ! March 6, 2018 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment लगाये कितने क़यास, जानने अपना सकाश; उड़ने आकाँक्षा का आकाश, अथवा पाने कुछ अवकाश ! जानने निज इतिहास, पहचानने मृदु हास; करने कभी अट्टहास, जानने अपना अहसास ! आम्र मुकुल का सुहास, भ्रमर का बढ़ता साहस; करा देता कुछ प्रयास, दिखा देता आत्म प्रकाश ! आशाओं से भरा सन्देश, आलोकित होजाता अनायास; आलोक का लोक आवास, लोकातीत को दे जाता सुवास ! उद्घोष से उत्प्रेरित श्वाँस, बदल जाती शरीर का लिवास; ‘मधु’ का बढ़ जाता विश्वास, त्रिलोकी में हो जाता निवास ! Read more » लगाये कितने क़यास !
लेख ईश्वर मनुष्यादि प्राणियों के सभी शुभाशुभ कर्मों का द्रष्टा व फलप्रदाता है March 4, 2018 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। यह समस्त दृश्यमान जगत ईश्वर ने बनाया है और वही इसका पालन कर रहा है। इस सृष्टि का इसकी अवधि पूरी होने पर प्रलय भी वही करता है। यह एक तथ्य है कि इससे पूर्व भी असंख्य बार सृजित हुई है व असंख्य बार ही इसका प्रलय भी हुआ है। यह […] Read more » ईश्वर
कहानी साहित्य उस बुजुर्ग की एक छोटी सी सीख ने बदल दी मेरी सोच March 3, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment तब मैं 11वीं का छात्र था और हास्टल में रहा करता था। मेरा हास्टल और इंटर कालेज मेरे गांव से 30 से 35 किमी ही दूर था और वह सरकारी था। इसलिए वहां मेश आदि की कोई सुविधा नहीं थी। लिहाजा खाना आदि हम लोग स्वयं बनाते थे और उसके लिए राशन पानी यहां तक […] Read more » Featured बुजुर्ग बुजुर्ग की छोटी सी सीख
पुस्तक समीक्षा ध्येय पथ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक March 3, 2018 by संजय द्विवेदी | 1 Comment on ध्येय पथ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक पुस्तक-समीक्षा आरएसएस की अविराम एवं भाव यात्रा का ‘ध्येय पथ’ – लोकेन्द्र सिंह जनसंचार माध्यमों में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में भ्रामक जानकारी आती है, तब सामान्य व्यक्ति चकित हो उठते हैं, क्योंकि उनके जीवन में संघ किसी और रूप में उपस्थित रहता है, जबकि आरएसएस विरोधी ताकतों द्वारा मीडिया में संघ की […] Read more » ध्येय पथ
व्यंग्य साहित्य होली और बुरा ना मानो महोत्सव March 1, 2018 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment होली, भारत का प्रमुख त्यौहार है, क्योंकि इस दिन पूरे भारत मे बैंक होली-डे रहता है अर्थात अवकाश रहता है जिसकी वजह से बैंक में घोटाले होने की संभावना नही रहती है, मतलब होली के दिन केवल आप रंग लगा सकते है, चूना लगाना मुश्किल होता है। इसी कारण से होली देश की समरसता के […] Read more » बुरा ना मानो महोत्सव होली
कविता साहित्य चलती फिरती जेल या अँधा-इंसाफ़ ? March 1, 2018 by डॉ. मधुसूदन | 6 Comments on चलती फिरती जेल या अँधा-इंसाफ़ ? डॉ. मधुसूदन चार चार बेगमों का, हक मर्दों को. और चलती-फिरती जेल,*बेगम को . मूँद कर आँख इक रोज़ बेगम बन जा. पहन कर बुरका ज़रा संसद* हो आ. अण्डे* से बाहर निकल कर देख. आँखों से, हरा चष्मा उतार कर देख. (अण्डा= दकियानूसी रुढियाँ) बुरका नहीं, है ये, चलती फिरती जेल है; हिम्मत है, चंद […] Read more » Featured चलती फिरती जेल दकियानूसी रुढियाँ बुरका
लेख साहित्य गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-62 February 21, 2018 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य   गीता का दसवां अध्याय और विश्व समाज ”तुझे पर्वतों में खोजा तो लिये पताका खड़ा था। तुझे सागर मेें खोजा तो मां के चरणों में पड़ा था। सर्वत्र तेरे कमाल से विस्मित सा था मैं, मुझे पता चल गया तू सचमुच सबसे बड़ा था।।” ईश्वर को खोजने वाली दृष्टि होनी […] Read more » Featured karmayoga of geeta todays world आज का विश्व कर्मयोग गीता गीता का कर्मयोग गीता का दसवां अध्याय विश्व समाज