व्यंग्य साहित्य पधारो म्हारे देस जी… October 27, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment पिछले हफ्ते मैं शर्मा जी के घर गया, तो वे दोनों आंखें बंद किये, एक हाथ कान पर रखे और दूसरा ऊपर वाले की तरफ उठाये गा रहे थे, ‘‘पधारो म्हारे देस जी…।’’ कभी वे दाहिना हाथ कान पर रखते तो कभी बायां। कभी स्वर ऊंचा हो जाता, तो कभी अचानक नीचा। मेरी गाने-बजाने से […] Read more » Featured पधारो म्हारे देस जी
लेख साहित्य प्लेग रोगी के जीवन की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगाने वाले महात्मा प. रूलिया राम जी October 26, 2017 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य पंडित रूलिया राम जी एक ऐसे महात्मा वा महापुरुष हुवे हैं जिन्होंने एक प्लेग के लोगी की जान बचाने के लिए अपने जीवन को संकट में डाला था। इतिहास में शायद ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। आज इनके जीवन की कुछ प्रेरक घटनाएं प्रस्तुत कर उन्हें श्रद्धांजली दे रहे हैं। […] Read more » रूलिया राम जी
लेख साहित्य टीपू सुल्तान — इंसान या हैवान October 26, 2017 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment पता नहीं कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को शान्त कर्नाटक में अशान्ति उत्पन्न करने और अलगाववाद को हवा देने में कौन सा आनन्द आता है। कभी वे हिन्दी के विरोध में वक्तव्य देते हैं तो कभी कर्नाटक के लिए जम्मू कश्मीर की तर्ज़ पर अलग झंडे की मांग करते हैं। आजकल उन्हें टीपू सुल्तान को […] Read more » Featured The Tyrant of Mysore Tipu Sultan Tipu Sultan : The Tyrant of Mysore टीपू सुल्तान
व्यंग्य साहित्य मुख्य अतिथि बनने का सुख October 21, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment मेहता जी एक सम्मानित व्यक्तित्व है जिसका एक मात्र उपयोग वे मुख्य अतिथि बनने में करते है। यह अनुमान लगाना कठिन है कि वे पहले से सम्मानित थे या फिर विभिन्न समारोह में मुख्य अतिथि बनने के बाद वे सम्मान-गति को प्राप्त हुए है। मेहता जी तन मन और आदतन मुख्य अतिथि है। मुख्य […] Read more » मुख्य अतिथि
कविता साहित्य चलो, दिवाली आज मनाएं October 20, 2017 by बलवन्त | Leave a Comment हर आँगन में उजियारा हो तिमिर मिटे संसार का। चलो, दिवाली आज मनाएं दीया जलाकर प्यार का। सपने हो मन में अनंत के हो अनंत की अभिलाषा। मन अनंत का ही भूखा हो मन अनंत का हो प्यासा। कोई भी उपयोग नहीं सूने वीणा के तार का । चलो, दिवाली आज मनाएं दीया जलाकर प्यार का। इन दीयों से दूर न […] Read more » दिवाली
व्यंग्य वाह ताज October 20, 2017 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment वाह ताज ….. एक शहंशाह का श्वान प्रेम ! …. ताज पर तकरार जारी। .. इक शहंशाह ने बनवा के हसीन ताज महल हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक ….. प्यार की निशानी ! ….. कैसा प्यार ! …… जिसे पाने के लिए , उसके शौहर को क़त्ल करवाया ? फिर जा के […] Read more » ताज
कविता ‘वेबलेंथ’ का खेल October 15, 2017 by अलकनंदा सिंह | Leave a Comment भावों के विशाल पर्वत पर, उगती खिलती आकाश बेल चढ़ती- कुछ हकीकतें और कुछ आस्था, का मेल होती है मित्रता। तय परिधियों के अरण्य में ब्रह्म कमल सी एक बार खिलती मन-सुगंध को अपनी नाभि में समेटने का खेल होती है मित्रता। स्त्री- पुरुष, पुरुष -स्त्री, स्त्री-स्त्री, पुरुष- पुरुष, के सारे विभेद नापती, अविश्वास से […] Read more » Featured वेबलेंथ
कविता साहित्य जब नींद नहीं आँखों में October 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment बेवजह रात को जब भी मुझे नींद नहीं आती है करवटें बदल बदल कर रात गुज़र जाती है। चादर की हर सिलवट तब, कोई कहानी अपनी, यों ही कह जाती है। जब घर में आँगन होता था और नींद नहीं आती थी चँदा से बाते होती थीं, तारों को गिनने में वो रात गुज़र जाती थी। हल्की सी बयार का झोंका जब तन को छूकर जाता था, उसकी हल्की सी थपकी, नींद बुला लाती थी। अब बंद कमरों मे जब नींद नहीं आँखों में यादों के झरोखे से अब रात के तीसरे पहर में नींद के बादल आते हैं जो मुझे सुला जाते हैं। Read more » जब नींद नहीं आँखों में
कहानी साहित्य नींद नैन में बस जाती है October 13, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment नींद हमे जब ना आती है चलती घड़ी रुक सी जाती है। कलम उठाकर लिखना चाहूँ भूली बीसरी याद आती है। कलम जब कभी रुक जाती है नींद कंहा फिर तब आती है। कोई कहानी मुकम्मल होकर जब काग़ज पे उतर आती है, नींद नैन में बस जाती है। शब्द कभी कहीं खो जाते हैं भाव रुलाने लग जाते हैं किसी पुराने गाने की लय पर कोई कविता जब बन जाती है। नींद हमें फिर आ जाती है। राह में जब रोड़े आते है, चलते चलते थक जाते हैं पैरों में छाले पड़ जाते ऐसे सपने हमें आते है, कोई नई कहानी तब सपनो में ही गढ़ी जाती है, नींद चौंक कर खुल जाती है। Read more » नींद नैन में बस जाती है
व्यंग्य हम काम से नहीं डरते October 11, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment शर्मा जी बहुत दुखी हैं। बेटे का विवाह सिर पर है और मोहल्ले की सड़क है कि ठीक ही नहीं हो रही। छह महीने पहले पानी की लाइन टूट गयी। सारा पानी सड़क पर बहने लगा। भीषण गरमी के मौसम में पूरे मोहल्ले में तीन दिन तक हाहाकार मचा रहा। छुट्टियों के कारण अधिकांश लोगों […] Read more » Featured काम काम से नहीं डरते
कहानी साहित्य काट औ छाँट जो रही जग में ! October 10, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment काट औ छाँट जो रही जग में, दाग बेदाग़ जो रहे मग में; बढ़ा सौन्दर्य वे रहे प्रकृति, रचे ब्रह्माण्ड गति औ व्याप्ति ! कष्ट पत्ती सही तो रंग बदली, लालिमा ले के लगी वह गहमी; गही महिमा ललाट लौ लहकी, किसी ने माधुरी वहाँ देखी ! सेब जो जंगलों में सेवा किये, […] Read more » काट औ छाँट
कविता साहित्य यान ही यान हैं यहाँ रमते ! October 8, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment यान ही यान हैं यहाँ रमते ! शिकागो के गगन से यान ही यान हैं यहाँ रमते, तरा ऊपर तलों में वे उड़ते; धरणि नीचे वे देख हैं लेते, साये आकाश के वे छू लेते ! कोई आते कोई चले जाते, पट्टियों पर कोई उतर चलते; कोई उन पट्टियों से उड़ जाते, उड़ते […] Read more » शिकागो के गगन से