लेख साहित्य भारत के राष्ट्रपुरुष शिवाजी महाराज June 8, 2017 by ललित कौशिक | Leave a Comment ललित कौशिक जब देश परतंत्र में जाता है तब शासनकर्ता की जमात का अनुकरण और अनुसरण लोग करने लगते हैं और समाज का नेतृत्व करने वाले विद्वतजन, सेनानी, राजधुरंधर परानुकरण में धन्यता मानने लगते हैं. जिससे समाज भी इन्हीं लोगों का अनुकरण करना शुरू कर देता है जिसके कारण धर्म की ग्लानि होती है, परधर्म […] Read more »
कविता ये ज़रूरी तो नहीं June 8, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मैं ख़ुद से ही रूठी रहती हूँ, कोई मनाये मुझको आकर, ये ज़रूरी तो नहीं, मैं ख़ुद को ही मना लेती हूँ। कुछ भी लिखूं या करूँ मैं जब अपनी प्रशंसा भी कर लेती हूँ , कोई और भी मेरा प्रशंसक हो, ये ज़रूरी तो नहीं………… जो भी काम पूरा कर लेती हूँ, […] Read more » ये ज़रूरी तो नहीं
लेख साहित्य कौन कहता है कि हम एक हजार वर्ष गुलाम रहे June 7, 2017 by राकेश कुमार आर्य | 3 Comments on कौन कहता है कि हम एक हजार वर्ष गुलाम रहे झूठे चाटुकारों से और लेखनी को बेचकर व आत्मा को गिरवी रखकर लिखने वाले इतिहासकारों से स्वतंत्रता के अमर सैनानियों के ये पावन स्मारक यही प्रश्न कर रहे हैं। समय के साथ हम इन प्रश्नों को जितना उपेक्षित और अनदेखा करते जा रहे हैं-उतना ही बड़ा प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है। Read more » 712 ई. में मौहम्मद बिन कासिम Featured गुरू अर्जुन गुरू गोविंद सिंह गुरू तेगबहादुर गोरा और बादल जयमल और फत्ता दुर्गादास और शिवाजी पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी महाराणा सांगा और प्रताप राजा कर्ण हजार वर्ष गुलाम हरि सिंह नलवा
कविता साहित्य एक क़दम तुम बढ़ाओ…… June 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment एक क़दम तुम बढ़ाओ, दो हम बढ़ायेंगे। फ़ासले जो दरमियां हैं, दूर होते जायेंगे। दूरियाँ मन की नहीं थीं, विचारों के द्वन्द थे, आओ बैठो, बातें करो,मसले सब सुलझ जायेंगे। वक़्त मिलता ही नहीं…,…… कहने से उलझने बढ़ जायेंगी। वक़्त को वक़्त से चुराकर, कुछ वक़्त तो देना पड़ेगा। एक छोर तुम पकड़ना, मैं हर […] Read more » एक क़दम तुम बढ़ाओ
कविता ‘आज’ का क्या करूं मै June 6, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment वो शाम चुलबुली सी रातें खिली खिली सी वक़्त के समंदर में वो वक़्त ही घुल गया है। अब शांत सी शामें हैं, चादर में नहीं हैं सिलवट नींद से रूठा मनाई, यादें आईं नई पुरानी, बचपन की कोई कहानी या जवानी की नादानी, रातों को आंखो में आकर, नीदें चुराने लगी हैं। भविष्य भी […] Read more » ‘आज' का क्या करूं मै
कविता साहित्य मैं मैं हूँ मैं ही रहूँगी June 6, 2017 by बीनू भटनागर | 10 Comments on मैं मैं हूँ मैं ही रहूँगी मै नहीं राधा बनूंगी, मेरी प्रेम कहानी में, किसी और का पति हो, रुक्मिनी की आँख की किरकिरी मैं क्यों बनूंगी मै नहीं राधा बनूँगी। मै सीता नहीं बनूँगी, मै अपनी पवित्रता का, प्रमाणपत्र नहीं दूँगी आग पे नहीं चलूंगी वो क्या मुझे छोड़ देगा मै ही उसे छोड़ दूँगी, मै सीता नहीं बनूँगी। मै […] Read more » मैं मैं हूँ मैं ही रहूँगी
व्यंग्य व्यंग : आप हमारे लीडर नही हो …! June 3, 2017 by अनुज हनुमत | Leave a Comment पहले दिल्ली और लखनऊ में टिकट के लिए हाथ फैलाते हैं फिर जनता के पास आकर वोट के लिए । अगर आपकी दिल्ली -लखनऊ में बात नही बनी तो वहीं विचारों में मतभेद बताकर आप दूसरी पार्टी में भी छलांग लगाकर कूदने से बाज नही आते हो । अगर पिछले 5 साल अच्छे से मन […] Read more » लीडर
दोहे साहित्य चलि दिए विराट विश्व ! June 3, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment चलि दिए विराट विश्व, लै कें फुरकैंया; ध्यान रह्यौ निज सृष्टा, नैनन लखि पैयाँ ! पैंजनियाँ बजति रहीं, देखत है मात रही; प्रकृति ललचात रही, झाँकन रुचि आत रही ! सँभलावत गात चलत, मोहन मन कछु सोचत; अँखियन ते जग निरखत, पगडंडिन वे धावत ! पीले से वस्त्र पहन, गावत तुतलात रहत; दौड़त कबहू ठहरत, […] Read more » चलि दिए विराट विश्व !
कविता लपक लिए आम June 3, 2017 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment प्रभुदयाल श्रीवास्तव लपकी ने लपक लिए, थैले से आम। अम्मा से बोली है, आठ आम लूँगी मैं। भैया को दीदी को, एक नहीं दूँगी मैं। जो भी हो फिर चाहे, इसका अंजाम। न जाने किसने कल ,बीस आम खाये थे। अम्मा ने दिन में जो, फ्रिज में रखवाए थे। शक के घेरे में था, मेरा […] Read more » लपक लिए आम
व्यंग्य बकरी हों तो वही… May 31, 2017 by विजय कुमार | 1 Comment on बकरी हों तो वही… हमारे प्रिय शर्मा जी पिछले दिनों किसी विवाह के सिलसिले में मध्य प्रदेश गये थे। परसों वे लौटे, तो मैं उनसे मिलने चला गया। चाय पीते और शादी की मिठाई खाते हुए शर्मा जी ने म.प्र. का एक अखबार मुझे देकर कहा – लो वर्मा, इसे पढ़ो..। – शर्मा जी, कहां ताजी चाय और कहां […] Read more » Featured मुनव्वर सलीम मुनव्वर सलीम की 23 बकरियां
पुस्तक समीक्षा आत्ममंथन से व्यंग्यमंथन तक May 27, 2017 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल की पुस्तक “कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की ” जब मेरे हाथों में उन्होंने सौंपी, तो कुछ समय के लिए तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. बस दो पल का आत्मीय मिलन सदियों पुराना बन गया. यह पुस्तक आत्म मंथन से व्यंग्य मंथन तक का सफ़र […] Read more » आत्ममंथन से व्यंग्यमंथन तक कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की
व्यंग्य साहित्य खबरों के खजाने का सूखाग्रस्त क्षेत्र …!! May 27, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा ब्रेकिंग न्यूज… बड़ी खबर…। चैनलों पर इस तरह की झिलमिलाहट होते ही पता नहीं क्यों मेरे जेहन में कुछ खास परिघटनाएं ही उमड़ने – घुमड़ने लगती है। मुझे लगता है यह ब्रेकिंग न्यूज देश की राजधानी दिल्ली के कुछ राजनेताओं के आपसी विवाद से जुड़ा हो सकता है या फिर किसी मशहूर […] Read more » सूखाग्रस्त क्षेत्र