व्यंग्य साहित्य मिलावट का व्याकरण March 4, 2017 by वीरेन्द्र परमार | Leave a Comment देश के प्रतिष्ठित नक्कालों, कालाबाजारियों और मिलावट विशेषज्ञों को इसका सदस्य बनाया जाएगा I ये सदस्य विभिन्न वस्तुओं की नक़ल बनाने एवं मिलावट की आधुनिक प्रविधि के संबंध में बहुमूल्य सुझाव देंगे I हमारा शोध संस्थान डुप्लीकेट चैनल नामक एक टी वी चैनल आरम्भ करेगा जिसके माध्यम से अलंकृत शैली और काव्यमय – अनुप्रासयुक्त शब्दावली में विज्ञापनबालाओं द्वारा उत्पादों का विज्ञापन किया जाएगा I Read more » मिलावट मिलावट का व्याकरण
लेख शख्सियत साहित्य देह के बाद अनुपम March 4, 2017 by अरुण तिवारी | 2 Comments on देह के बाद अनुपम अरुण तिवारी जब देह थी, तब अनुपम नहीं; अब देह नहीं, पर अनुपम हैं। आप इसे मेरा निकटदृष्टि दोष कहें या दूरदृष्टि दोष; जब तक अनुपम जी की देह थी, तब तक मैं उनमें अन्य कुछ अनुपम न देख सका, सिवाय नये मुहावरे गढ़ने वाली उनकी शब्दावली, गूढ से गूढ़ विषय को कहानी की तरह […] Read more » Anupam Mishra death of Anupam Mishra Featured अनुपम मिश्र परंपरागत वर्षा जल-संरक्षण
व्यंग्य जनजागरण की लीला March 4, 2017 / March 4, 2017 by दीपक शर्मा 'आज़ाद' | Leave a Comment देखा जाये तो जनजागरण शब्द राष्ट्रवादी है क्योंकि अभी तक किसी अन्य ने इस पर अपना अधिकार नहीं जताया है। ऐसा मैं इसलिये कह रहा हूं क्योंकि हमारी दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों की आपसी लड़ाई का केंद्र ही गांधी और पटेल पर अपने अपने आधिपत्य को लेकर रहा है। मैं तो कहूंगा न केवल यह […] Read more » जनजागरण
व्यंग्य गाजर मूली के साथ धनिया मिर्ची फ्री March 3, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment गली में कई दिनों बाद नत्थू सब्जी वाले की आवाज़ सुनाई दी । देखा तो सामने नत्थू ही अपनी गधा-रेहड़ी पर सब्जी लादे आवाज़ लगा रहा है । मैंने पूछा – अरे नत्थू ! सब कुशल तो है ? कहीं चले गए थे क्या ? नहीं साहब , हम कहाँ जा सकते हैं । बस […] Read more » गाजर मूली के साथ धनिया मिर्ची फ्री
कला-संस्कृति लेख साहित्य होली के रंगों का आध्यात्मिक महत्व March 2, 2017 by ललित गर्ग | Leave a Comment श्वेत रंग की कमी होती है, तो अशांति बढ़ती है, लाल रंग की कमी होने पर आलस्य और जड़ता पनपती है। पीले रंग की कमी होने पर ज्ञानतंतु निष्क्रिय बन जाते हैं। ज्योतिकेंद्र पर श्वेत रंग, दर्शन-केंद्र पर लाल रंग और ज्ञान-केंद्र पर पीले रंग का ध्यान करने से क्रमशः शांति, सक्रियता और ज्ञानतंतु की सक्रियता उपलब्ध होती है। होली के ध्यान में शरीर के विभिन्न अंगों पर विभिन्न रंगों का ध्यान कराया जाता है और इस तरह रंगों के ध्यान में गहराई से उतरकर हम विभिन्न रंगों से रंगे हुए लगने लगा। Read more » होली
लेख स्मारकों के सुरक्षा में हम कितने सफल February 28, 2017 / February 28, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा.राधेश्याम द्विवेदी स्मारक किसे कहते हैं:- कोई वस्तु या रचना जो किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति या घटना की स्मृति को बनाए रखने के लिए हो, स्मारक कहलाता है, जैसे- शहीद स्मारक, मकबरा, समाधि, स्तूप और निशानीय स्मृति चिह्न आदि। राष्ट्रीय स्मारक एक एसा स्मारक होता है जिसे उस देश के इतिहास, राजनीति या उसके लोगों के […] Read more » स्मारकों के सुरक्षा
व्यंग्य साहित्य मूर्ख परंपरा और समर्पित मूर्ख February 28, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment मैं बचपन से मूर्ख रहा हूँ पर कभी इस पर गर्व नहीं किया, करता भी क्यों आखिर, गर्व मनुष्य द्वारा स्वअर्जित चीज़ों पर किया जाना चाहिए, प्रकृतिप्रदत्त वस्तुओ पर कैसा गुमान, वो तो आपके पूर्व जन्म में किये गए कर्मो का ही फल होता है, जो कभी बासी नहीं होता है। प्रकृति के इस “फल” […] Read more » मूर्ख परंपरा समर्पित मूर्ख
कला-संस्कृति लेख जहां कण-कण में बिखरी है ऋषि वाल्मिकी की स्मृतियां…!! February 27, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा — सीता ने व्यतीत किया था अज्ञातवास — लव-कुश का हुआ था जन्म आधुनिकता के उच्चतम शिखर पर जहां आज भी मानव जीवन के चिह्न नदारद हो वहां सदियों पहले मानवीय दिनचर्या की उपस्थिति किसी को भी देवत्व प्रदान करने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में सामान्य जीवन यापन […] Read more » Featured ऋषि वाल्मिकी पश्चिम मेदिनीपुर जिला अंतर्गत नयाग्राम के तपोवन
कविता सत्य पथ का मुसाफिर February 25, 2017 by कुमार विमल | 1 Comment on सत्य पथ का मुसाफिर कुमार विमल कोई पथ जाती है धन को, कोई सुख साधन को, और कोई प्रेमिका के मधुर चितवन को। पर छोड़ ये सारे सुलभ पथ को तूने चुना है सत्य को नमन है तेरे त्याग और तप को। पग-पग है संग्राम जिस पथ का, मापदंड साहस जिस पथ का , इंतिहान तप,तेज और बल […] Read more » Featured सत्य पथ का मुसाफिर
व्यंग्य साहित्य मैं जब भ्रष्ट हुआ February 24, 2017 / February 24, 2017 by वीरेन्द्र परमार | Leave a Comment वीरेन्द्र परमार मेरी नियुक्ति जब एक कमाऊ विभाग में हुई तो परिवार के लोगों और सगे – संबंधियों को आशा थी कि मैं शीघ्रातिशीघ्र भ्रष्ट बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा में जुड़ जाऊंगा लेकिन आशा के विपरीत जब मैं एक दशक तक भ्रष्ट नहीं हुआ तो सभी ने एक स्वर से मुझे कुल कलंक घोषित कर […] Read more » Featured भ्रष्ट भ्रष्ट होना एक राष्ट्रीय उत्सव भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार मुक्त समाज
व्यंग्य खट्ठा-मीठा : भाभी से होलियाना छेड़छाड़ February 23, 2017 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment ऐसे दीवाने देवरों को देखकर भाभी डर गयीं। भैया से शिकायत करने की धमकी दी। इस पर देवर और भी अधिक हो-हल्ला करने लगे। ‘भाभी, हम भैया से नहीं डरते। अगर भैया डाँटेंगे, तो उनको भी गुलाल लगा देंगे। पर हम भाभी से होली जरूर खेलेंगे।’ भाभी जानती थी कि ससुर जी से भी शिकायत करने का कोई लाभ नहीं होगा। वे तो ज्यादा से ज्यादा यही कहेंगे कि ‘लड़के हैं, लड़कों से गलतियाँ हो जाती हैं।’ Read more » भाभी भाभी से होलियाना छेड़छाड़ होलियाना छेड़छाड़
व्यंग्य साहित्य आईपीएल, मनोरंजन और भारतीय दर्शन February 22, 2017 / February 22, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment आईपीएल की बोली लग चुकी है, खिलाडी बिक चुके है, बस अब खेल का बिकना बाकी है। मज़मा लग चुका हैै, खिलाडी मुजरा करने को तैयार है। बाज़ारीकरण के इस दौर में “आई-पिल” और “आईपीएल” दोनों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है क्योंकि दोनों ही कम समय में “सुरक्षित” मनोरंजन सुनिश्चित करते है। विकासशील […] Read more » Featured आईपीएल भारतीय दर्शन मनोरंजन