लेख साहित्य ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की देश की आजादी में भूमिका July 4, 2017 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment मनमोहन कुमार आर्य ऋषि दयानन्द (1825-1883) के समय में देश एक ओर जहां अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, मिथ्या परम्पराओं व अनेकानेक सामाजिक बुराईयों से ग्रस्त था वहीं दूसरी ओर इन्हीं कारणों से वह विगत सात सौ से कुछ अधिक वर्षों से पराधीनता के जाल में भी फंसा हुआ था। ऋषि दयानन्द वेदों के उच्च कोटि विद्वान […] Read more » Featured आर्यसमाज की देश की आजादी में भूमिका ऋषि दयानन्द
लेख साहित्य सावधानी हटी – दुर्घटना घटी July 4, 2017 by डा. अरविन्द कुमार सिंह | Leave a Comment साहसिक साईकिल अभियान – वाराणसी से खुजराहों डा. अरविन्द कुमार सिंह, पूर्व एनसीसी अधिकारी नम्बर पन्द्रह हमेशा कष्ट में रहा। पन्द्रह नम्बर पर उसका होना उसके कष्ट से बरी हो जाने का बहाना कभी नहीं बना। कष्ट उसकी नियत थी, संयोग नहीं। पन्द्रह नम्बर से इस लेख की शुरूआत का मात्र कारण इतना है कि […] Read more » Featured साहसिक साईकिल अभियान
व्यंग्य जी एस टी –गिव सर्वाइवल टैक्स July 3, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन प्रकृति का सिद्धांत है जो विपरीत परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल पायेगा वही जीवित रहने का अधिकारी है , बाकी खल्लास . डार्विन ने भी बहुत पहले कह दिया था – सर्वाइवल ऑफ़ दि फिट्टेस्ट . अब भी आपको कोई संदेह है , तो आपका राम ही रखवाला है […] Read more » gst जी एस टी
व्यंग्य साहित्य एक पत्र बरखा रानी के नाम June 29, 2017 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment । तुम आंधी के साथ आओ, बिजली के साथ आओ, बाप बादल की पीठ पर सवार होकर आओ, लेकिन आओ। हम तोके कचौड़ी गली की कचौड़ी खिलाऊंगा, लंगड़ा आम खिलाऊंगा, गोदौलिया की मलाई वाली भांग की ठंढ़ई पिलाऊंगा, रामनगर की लस्सी पिलाऊंगा और लंका के केशव का बनारसी पान खिलाऊंगा। तुम कहोगी तो आईपी माल में ले जाकर हाफ गर्लफ़्रेंड भी दिखा दूंगा। Read more » Featured बरखा रानी
दोहे साहित्य दर्द से ऊपर निकलना चाहिये ! June 27, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment दर्द से ऊपर निकलना चाहिये; छिपा जो आनन्द लखना चाहिये ! झाँकना सृष्टि में सूक्ष्म चाहिये; चितेरे बन चित्त से तक जाइये ! सोचना क्यों हमको इतना चाहिये; हो रहा जो उसको उनका जानिये ! समर्पण कर बस उसे चख जाइये; प्रकाशों की झलक फिर पा जाइये ! मिला मन को इष्ट के […] Read more » दर्द से ऊपर निकलना चाहिये !
लेख फेसबुक पर सात साल June 26, 2017 by बीनू भटनागर | 5 Comments on फेसबुक पर सात साल लगभग सात साल से फेसबक से जुड़ी हूँ। फेसबुक के माध्यम से ही हिन्दी साहित्य की समकालीन गतिविधियों की जानकारी मिली और इसी के माध्यम से आज के साहित्यकारों से व उनकी लेखनी से परिचय हुआ।हिन्दी में आज भी बहुत अच्छा लिखा जा रहा है परन्तु जनमानस का रुझान हिन्दी से इतना हटा है […] Read more » फेसबुक पर सात साल
पुस्तक समीक्षा साहित्य सजग पत्रकार की दृष्टि में मोदी-युग June 23, 2017 by संजय द्विवेदी | Leave a Comment संजय द्विवेदी के जन्म से पूर्व के एक तथ्य को मैं अपनी तरफ से जोड़ना चाहता हूं, जब भारत विभाजन के पश्चात पश्चिमी पंजाब से लाखों की संख्या में हिंदू पूर्वी पंजाब पहुंचे तो संघ के स्वयंसेवकों ने बड़ी संख्या में उनके आतिथ्य, त्वरित पुर्नवास और उनके संबंधियों तक उन्हें पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय बड़ी तादाद में अनेक व्यक्ति घायल और अंग-भंग के शिकार होकर विभाजित भारत में पहुंचे थे। उन्हें यथा संभव उपचार उपलब्ध कराने में संघ के स्वयंसेवकों ने शासन-प्रशासन तंत्र को मुक्त सहयोग दिया था। उसके साथ ही स्वतंत्र भारत ने अनेक प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी संघ के अनुषांगिक संगठनों से जुडे़ समाज सेवियों को स्वतःस्फूर्त सक्रिय पाया जाता रहा। Read more » मोदी युग सजग पत्रकार की दृष्टि में मोदी-युग
व्यंग्य हैलो माईक टेस्टिंग , हैलो , हैलो June 22, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment चौबे जी मंद मंद मुस्काये , बोले –ठीक पकड़े है . आज की सत्ता के शिखर पर बैठे पुरोधा यही तो चाहते हैं , यही तो इनका एजेंडा है , कि वजन बढे तो केवल उनका , दूसरा कोई इनके समान वजन धारी ना हो जाए . सुना है कि कुछ ‘शाह’ लोग ज्यादा ही वजनधारी होने लगे थे , पर समय रहते हमारे पारखी ‘ग्रीन टी’ वाले की नजर पड़ गयी और आज उनका लगभग बीस किलो वजन कम हो गया बताते हैं . वजन कम करने की तकनीक में तो ग्रीन टी का कोई सानी नहीं है . कल तक जिनकी ‘वाणी’ में अदम्य ‘जोश’ था , आज उनका इतना कम वजन हो गया है कि कोई उनका वजन तौलने तक राजी नहीं है . Read more »
लेख शख्सियत क्षणजन्मा डॉक्टर हेनरी नॉर्मन बेथुन June 22, 2017 / June 22, 2017 by गंगानन्द झा | Leave a Comment किताब चलते रहने का हौसला पैदा करती है, रास्ता दिखाती है और कभी कभी हमारा रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है। — अनाम कभी कभार ही ऐसा होता है कि आपके हाथ ऐसी किताब लग जाए जो सालों बीत जाने पर भी आपकी चेतना को संस्कार-मण्डित करती रहती है और सदा के लिए महत्वपूर्ण […] Read more » Featured हेनरी नॉर्मन बेथुन
कविता साहित्य है नाट्यशाला विश्व यह ! June 18, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment है नाट्यशाला विश्व यह, अभिनय अनेकों चल रहे; हैं जीव कितने पल रहे, औ मंच कितने सज रहे ! रंग रूप मन कितने विलग, नाटक जुटे खट-पट किए; पट बदलते नट नाचते, रुख़ नियन्ता लख बदलते ! उर भाँपते सुर काँपते, संसार सागर सरकते; निशि दिवस कर्मों में रसे, रचना के रस में हैं लसे […] Read more » नाटक नियन्ता के अनंत ! हैं कीट कितने विचरते ! है नाट्यशाला विश्व यह !
कविता साहित्य मैं आज तेरा नाम लिख लूँ June 16, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment प्रेम के इक गीत पर मैं आज तेरा नाम लिख लूँ पंछियों की चहक मीठी शहद जैसे मन में घोले कोकिला की मृदु कुहुक पर आज तेरा नाम लिख लूँ रंग हर ऋतु का अलग है ढंग भी उसका नया है धूप के हर क़तरे पर मैं आज तेरा नाम लिख लूं […] Read more » मैं आज तेरा नाम लिख लूँ
कविता साहित्य क्योंकि मोबाइल है… June 16, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment घड़ी पहनने की आदत छूट गई, पहले पैन साथ लेके चलते थे वो आदत भी छूट गई अब तो क्योंकि मोबाइल है……,, कैमरे की भी ज़रूरत नहीं है अब, पहले वीडियो बनाना मुश्किल था, अब स्टिंग इतने होते हैं क्योंकि मोबाइल है…………. पहले कैसेट सी डी से गाने सुनतेथे साथ बैठकर रेडियो भी सुनते थे […] Read more » क्योंकि मोबाइल है...