व्यंग्य ताजा दल बदलिए से संवाद January 23, 2017 / January 23, 2017 by अशोक गौतम | Leave a Comment वे नख से शिख तक अलग ही भाव भंगिमा में लचकते- मटकते आते दिखे पर फिर भी उन्हें पहचानते देर न लगी। सोचा, चुनाव के दिनों में ठूंठ भी लहलहाने लगते हैं और ये तो …… वे नजदीक आए तो वही निकले पर उनके सिर पर उस विरोधी दल की टोपी देख हैरत हुई जिसे […] Read more » ताजा दल बदलिए से संवाद
कविता साहित्य जो रक्तकणों से लिखी गई,जिसकी “जयहिन्द” निशानी है । January 23, 2017 by शकुन्तला बहादुर | 2 Comments on जो रक्तकणों से लिखी गई,जिसकी “जयहिन्द” निशानी है । सुभाष चंद्र बोस*भारत के अमर स्वतन्त्रता सेनानी नेताजी शुभाषचन्द्र बोस के * * जन्मदिवस २३ जनवरी के पुनीत अवसर पर श्रद्धा सुमन -* है समय नदी की बाढ़ कि, जिसमें सब बह जाया करते हैं , है समय बड़ा तूफ़ान , प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं । अक्सर दुनिया के लोग समय में, चक्कर […] Read more » Featured poem on subhash chandra bose
व्यंग्य साहित्य मारक होती ‘ माननीय ‘. बनने की मृगतृष्णा …!! January 23, 2017 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा … देश और जनता की हालत से मैं दुखी हूं। इसलिए आपके बीच आया हूं। अब बस मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं… राजनीति से अलग किसी दूसरे क्षेत्र के स्थापित शख्सियत को जब भी मैं ऐसा कहता सुुनता हूं तो उसका भविष्य मेरे सामने नाचने लगता है। मैं समझ जाता हूं […] Read more » ' माननीय '. बनने की मृगतृष्णा ...!! मृगतृष्णा
लेख साहित्य जीवित अन्त्येष्टि January 17, 2017 by गंगानन्द झा | 2 Comments on जीवित अन्त्येष्टि कभी कभार आपको ऐसी किताब मिल जाती है जो आपको चौंकाती है और जीवन के प्रति आकर्षण बढ़ाती है। पिछले दिनो एक किताब पढ़ने का अवसर मिला। किताब का नाम है Tuesdays with Morrie. यह किताब अमेरिका के मैसाचुसेट्स के ब्राण्डिस विश्वविद्यालय में सामाजिक मनोविज्ञान के प्रोफेसर मॉरी श्वार्ज़ की कहानी कहती है। मॉरी जीवन […] Read more » Tuesdays with Morrie जिन्दगी और मौत के बीच के आखिरी पुल की सैर जीवित अन्त्येष्टि
कहानी साहित्य प्यार की गरमी January 16, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment मोहन उनकी इरादे समझ गया। वह बोलना तो नहीं चाहता था, पर आज उससे रहा नहीं गया, ‘‘हां, ठीक कहते हो। तुम्हारे स्वेटर और कोट इतने गरम हो भी नहीं सकते। चूंकि उनमें पैसों की गरमी है और मेरे स्वेटर में दीदी के प्यार की गरमी। सब लड़कों का मुंह बंद हो गया। Read more » warmth of love प्यार की गरमी
कविता साहित्य खड़े जब अपने पैर हो जाते ! January 15, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment खड़े जब अपने पैर हो जाते, आत्म विश्वास से हैं भर जाते; सिहर हम मन ही मन में हैं जाते, अजब अनुभूति औ खुशी पाते ! डरते डरते ही हम ये कर पाते, झिझकते सोचते कभी होते; जमा जब अपने पैर हम लेते, झाँक औरों की आँख भी लेते ! हुई उपलब्धि हम समझ लेते, […] Read more » खड़े जब अपने पैर हो जाते !
कविता साथ जो छोड़ कर चले जाते ! January 15, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment (मधुगीति १७०११४ ब) साथ जो छोड़ कर चले जाते, लौटकर देखना हैं फिर चहते; रहे मजबूरियाँ कभी होते, वक़्त की राह वे कभी होते ! देखना होता जगत में सब कुछ, भोग संस्कार करने होते कुछ; समझ हर समय कोई कब पाता, बिना अनुभूति उर कहाँ दिखता ! रहते वर्षों कोई हैं अपने बन, विलग […] Read more »
व्यंग्य साहित्य डिलीट गांधी –पेस्ट मोदी January 14, 2017 by जगमोहन ठाकन | Leave a Comment जग मोहन ठाकन खादी ग्रामोद्योग के कलेंडर –डायरी से गांधी जी की फोटो डिलीट कर मोदी जी की फोटो पेस्ट कर देने मात्र से न जाने कुछ लोगों के पेट में क्यों मरोड़े उठने लगे हैं । समय बड़ी तेज़ी से बदल रहा है । इतने लंबे अरसे तक गांधी जी को चरखे पर सूत […] Read more » Featured खादी ग्रामोद्योग के कलेंडर –डायरी डिलीट गांधी पेस्ट मोदी
लेख साहित्य स्थानीय हिन्दू शासक भी लड़ते रहे अपना स्वतंत्रता संग्राम January 14, 2017 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment राकेश कुमार आर्य  सिकंदर लोदी बना सुल्तान बहलोल लोदी की मृत्यु जुलाई 1489 ई. में हो गयी थी। तब उसके पश्चात दिल्ली का सुल्तान उसका पुत्र निजाम खां सिकंदर दिल्ली का सुल्तान बना। उस समय दिल्ली सल्तनत कोई विशेष बलशाली सल्तनत नही रह गयी थी। उसके विरूद्घ नित विद्रोह हो रहे थे और सुल्तानों […] Read more » इब्राहीम लोदी सिकंदर लोदी स्वतंत्रता संग्राम हिन्दू शासक
कविता साहित्य बोन्साई January 12, 2017 by बीनू भटनागर | 1 Comment on बोन्साई मेरी ज़ड़ों को काट छाँट के, मुछे बौना बना दिया, अपनी ख़ुशी और सजावट के लिये मुझे, कमरे में रख दिया। मेरा भी हक था, किसी बाग़ मे रहूँ, ऊँचा उठू , और फल फूल से लदूँ। फल फूल तो अब भी लगेंगे, मगर मै घुटूगाँ यहीं तुम्हारी, सजावट के शौक के लिये, जिसको तुमने […] Read more » बोन्साई
कहानी साहित्य लघुकथा : बचपन की पूंजी January 12, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment घर में सब लोग साथ बैठकर खाना खा रहे थे। चार साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग सब वहां थे। मां सेब काट कर सबको दे रही थीं। जब उन्होंने चार साल के चुन्नू को भी एक फांक दी, तो वह मचलता हुआ बोला, ‘‘मैं दो सेब लूंगा।’’ मां ने चाकू […] Read more » बचपन की पूंजी
लेख विविधा साहित्य हिंदी दिवस विश्व हिन्दी दिवस का हिन्दी के वैश्विक विस्तार में योगदान January 11, 2017 / January 11, 2017 by डॉ. शुभ्रता मिश्रा | Leave a Comment डॉ. शुभ्रता मिश्रा 10 जनवरी का दिन विश्व हिन्दी दिवस के रुप में मनाया जाना हर उस भारतवासी के लिए गौरव का विषय है, जो अपनी हिन्दी भाषा से सच्चा प्रेम करता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी माता, अपनी मातृभूमि और अपनी मातृभाषा से प्राकृतिक रुप से प्रेम होता है। इसे जताने की आवश्यकता नहीं […] Read more » Featured विश्व हिन्दी दिवस हिन्दी के वैश्विक विस्तार में योगदान