दोहे साहित्य माखन चखत मोहन रहत ! May 26, 2017 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment माखन चखत मोहन रहत, गोपिन के मन गोपन रमत; Read more » माखन चखत मोहन रहत
लेख साहित्य महाकवि रंगपालजी की लोक रचनाएं May 25, 2017 / May 25, 2017 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी (स्रोत : डा. मुनिलाल उपाध्याय कृत “बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1) रंगपाल नाम से विख्यात महाकवि रंग नारायण पाल जूदेश वीरेश पाल का जन्म सन्तकबीर नगर (उत्तर प्रदेश) के नगर पंचायत हरिहरपुर में फागुन कृष्ण 10 संवत 1921 विक्रमी को हुआ था। ‘बस्ती जनपद के छन्दकारों का सहित्यिक […] Read more » महाकवि रंगपालजी
लेख साहित्य 1857 की क्रांति की 160वीं जयंती May 25, 2017 / May 25, 2017 by डॉ शैलेन्द्र कुमार | Leave a Comment कई इतिहासकारों ने यह भी कहा है कि इस युद्ध में पूरा देश शामिल नहीं था। इसलिए इसे राष्ट्रीय युद्ध की संज्ञा देना अनुचित होगा। तो प्रश्न उठता है कि किसी स्थान विशेष में किया गया युद्ध राष्ट्रीय क्यों नहीं हो सकता। इस पर यदि गहराई से विचार करें तो बीसवीं शताब्दी के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी ऐसे अनेक आंदोलन हुए जो किसी स्थान विशेष तक ही सीमित रह गए। यहां तक कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की तीव्रता भी सारे देश में एक समान नहीं थी। Read more » 1857 की क्रांति Featured the revolution of 1857
कविता साहित्य वीरवार बाज़ार May 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment महानगरों में भी लगता है, हफ्ते का हाट, मौलों की चकाचौंध और एयर कंडीशन्ड बड़े बडे शो रूमों नये से नये रैस्टोरैंट के बीच ज़िन्दा है अभी भी हफ्ते का हाट! हमारा वीर बाजार! यहाँ सब कुछ मिलता है…. सब्ज़ी फल के लियें लोग यहाँ आते है बड़ी बड़ी गाड़ियों वाले भी भर के ले […] Read more » वीरवार बाज़ार
कविता बाल्कनी May 25, 2017 by बीनू भटनागर | Leave a Comment महानगरों में, ऊँची उँची इमारते, यहाँ कोई पिछवाड़ा नहीं, ना कोई सामने का दरवाज़ा, इमारत के चारों तरफ़ , बाल्कनी का नज़ारा, धुले हुए कपड़े……… बाल्कनी में लहराते सूखते, कभी झाड़न पोछन सूखते, कभी कालीन या रजाई को धूप मिलती, घर के फालतू सामान को पनाह देती है ये बाल्कनी, घर का अहम हिस्सा है […] Read more » बाल्कनी
व्यंग्य साहित्य चोरी और डकैती का लाइसेंस May 24, 2017 by विजय कुमार | Leave a Comment सच कहूं, मैं कपिल सिब्बल से बहुत प्रभावित हूं। यद्यपि मेरी उनसे आज तक भेंट नहीं हुई। भगवान न करे कभी हो। चूंकि वकील, डॉक्टर और थाने के चक्कर में एक बार फंसे, तो जिंदगी भले ही छूट जाए, पर ये पिंड नहीं छोड़ते। हमारे प्रिय शर्मा जी ने जवानी में डेढ़ साल कानून की […] Read more » कपिल सिब्बल
व्यंग्य साहित्य अथ श्री आलोचक कथा May 24, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment वे आलोचक है, अभी से नहीं, तभी से, मतलब जब से उनके धरती पर अवतरित होने की दुर्घटना हुई थी तब से। यहाँ तक की उन्होंने अपने अवतरित होने की भी आलोचना कर दी थी। वो आलोचना खाते, पीते, ओढ़ते और बिछाते है। उनकी रग- रग में आलोचना समाई हुई है। वो कर्मयोगी भी है, […] Read more » Featured अथ श्री आलोचक कथा
कहानी कलयुग के देवता May 24, 2017 / May 24, 2017 by मालचन्द कन्नौजिया 'बेपनाह' | Leave a Comment कहने को आजाद हो गये हम पर मिली आजादी किस बात की जब बिना रिश्वतखोरी के आती नहीं है साँसभी। घर से निकलते होती है मुलाकात रिश्वतखोर दलालों से येहैं कलयुग के देवता पाला न पड़े गद्दारों से।। कैसे छुपायें, पचती नहीं गैस बनती है बात भी बिना रिशवतखोरी के आती नहीं है साँसभी।। करप्सन,करप्शन, […] Read more »
दोहे साहित्य तुम चलत सहमित संस्फुरत ! May 16, 2017 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment उड़िकें गगन आए धरणि, बहु वेग कौ करिकें शमन; वरिकें नमन भास्वर नयन, ज्यों यान उतरत पट्टियन ! बचिकें विमानन जिमि विचरि, गतिरोध कौ अवरोध तरि; आत्मा चलत झाँकत जगत, मन सहज करि लखि क्षुद्र गति ! Read more » तुम चलत सहमित संस्फुरत !
कविता साहित्य मेरा एकालाप May 15, 2017 by आशुतोष माधव | Leave a Comment बोल उठी तब त्रिपुरसुंदरी तू डूबे क्यों,क्यों पार तरे? तेरे समस्त गान, रुदन औ' हास ऊँ नमो मणिपद्मे हुं का पाठ तेरा प्रचलन मेरी प्रदक्षिणा तेरा कुछ भी मेरा सबकुछ ओ मेरे प्यारे अबोध शिशु गोद भरे,तू मुझमें नित-नूतन मोद भरे। Read more » Featured चन्द्रमा देवदारु हिमालय
कविता साहित्य रेलवे स्टेशन पर: बारिश की एक शाम May 15, 2017 by आशुतोष माधव | Leave a Comment आशुतोष माधव भीग-भीग कर सड़ता एक पीला उदास स्टेशन. जर्जर सराय सा, हाँफ-हाँफकर पहुँचते जाने कितने कलावंत गर्जन तर्जन लोहित देह; कुछ श्रीमंत केवल छूकर कर जाते छि:, चलन ऐसा मानो मैनाक को धन्य कर रहे हों हनुमान. यह प्रौढ़ा चिर-सधवा पीली देह उदास तार तार उतारती रहती पार-पार नाविक तरणी पतवार मँझधार शहरी गँवार […] Read more » बारिश की एक शाम
व्यंग्य साहित्य नयेपन की डिमांड और अलग तरह की राजनीती May 13, 2017 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment आम आदमी के नाम पर बनी पार्टी ने मतदाता के एंटरटेनमेंट का पूरा ख्याल रखा है । आम आदमी पार्टी ("आप") ने लोकतंत्र की नीरसता को ना केवल दूर करने का काम किया है बल्कि दूरदर्शी राजनैतिक मूल्यों की स्थापना करने में भी महती भूमिका निभाई है। आप पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप लगाए उससे पहले ही आप सबको भ्रष्टाचारी घोषित कर स्वयं को ईमानदारी का एकमात्र मसीहा घोषित कर दो। इससे ना तो आप की ईमानदारी साबित होती है और ना ही दूसरे की बेईमानी लेकिन टाइमपास अच्छा हो जाता है और मुँह बाए खड़ी सैंकड़ो समस्याओ के बावजूद सबका मूड फ्रेश रहता है। Read more » Featured नयेपन की डिमांड