व्यंग्य साहित्य अथ श्री चचा कथा ….!! November 6, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | 1 Comment on अथ श्री चचा कथा ….!! से देखा जाए तो आम चचा भी एेसे ही होते हैं। भतीजा सामने आया नहीं कि शुरू हो गए, अरे पुत्तन... जरा इहां आओ तो बिटवा, सुनो जाओ फट से उहां चला जाओ.. अउर इ काम कर डाओ...। Read more » Featured चचा कथा
कविता साहित्य बेसहारा बाप की व्यथा November 4, 2016 by अमन कौशिक | 1 Comment on बेसहारा बाप की व्यथा उधर भूख से बिलख रही थी नवासी मेरी.. इधर दुनिया को छोड़ चुकी थी बिटिया मेरी.. क्या करूँ, क्या पूछूँ, कुछ नहीं था सूझ रहा.. क्या वज़ह थी इसके पीछे, कुछ नहीं था दिख रहा.. Read more » "बेसहारा बाप की व्यथा" Featured
कविता साहित्य मेरा इंतजार November 3, 2016 / November 3, 2016 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment इंतज़ार में हूं मैं कि कुछ वक़्त खुद के लिए तलाश पाऊंगी इंतज़ार में हूं मैं कि अपना हाल-ए-दिल उनसे कह पाऊंगी। इंतज़ार में हूं मैं कि उनके साथ एक हसीं शाम बिता पाऊंगी। इंतज़ार में हूं मैं कि शायद कभी अपनी पहचान जान पाऊंगी। इंतज़ार में हूं मैं कि अपने दिल के दर्द को […] Read more » मेरा इंतजार
कविता साहित्य मेरी मां की डायरी October 30, 2016 by बीनू भटनागर | Leave a Comment मेरी मां लिखा करती थी, रोज़ डायरी का इक पन्ना, ये सिलसिला कब शुरू हुआ, कैसे शुरू हुआ ये तो याद नहीं, पर तब तलक चलाता रहा.. जब तक होशो हवास थे। कितने साल तक लिखा ,क्या लिखा, ये तो पता नहीं, पर कुछ किस्से, कहानी और कविता सुना देतीं वो खुद ही कभी कभी। […] Read more » मेरी मां की डायरी
कविता साहित्य दिव्य आभा दिलों में ढाली है ! October 30, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment दिव्य आभा दिलों में ढाली है; प्रभा लेकर दिवाली आई है ! ख़ुशाली हर जगह पै छायी है; प्रमा में आत्म हर सुहायी है ! Read more » दिव्य आभा दिलों में ढाली है !
गजल साहित्य मैं और मेरी जिंदगी.. October 28, 2016 / October 28, 2016 by अमन कौशिक | Leave a Comment मैं और मेरी जिंदगी.. Read more » मैं और मेरी जिंदगी..
कविता साहित्य चलो, दिवाली आज मनायें October 28, 2016 by बलवन्त | Leave a Comment चलो, दिवाली आज मनायें Read more » चलो दिवाली आज मनायें
व्यंग्य साहित्य किताब तो छप गई मगर …………. October 27, 2016 by बीनू भटनागर | Leave a Comment अब हमें कुछ किताबें अपने नज़दीकी रिश्तेदारों को भेजनी थीं, साहित्य जगत के उन वरिष्ठ लोगों को उपहार में भेजनी थीं जो हमें प्रोत्सहन देते रहे थे या फिर वो जिनके लेखन से हम प्रभावित थे, जिन्हे हमने किताबें भेजी उनमें से कुछ ने अतिरिक्त किताबों की मांग की तो हमने साफ़ कह दिया कि अतिरिक्त किताब तो उन्हे हमसे ख़रीदनी होगी।अब हमे ढेरों किताबें कोरियर से भेजनी थीं उपहार वाली भी और ख़रीद वाली भी। Read more » किताब तो छप गई मगर .............
खेल जगत मनोरंजन व्यंग्य यहाँ तो घर की मुर्गी दाल बराबर ही है ! October 27, 2016 by सुप्रिया सिंह | Leave a Comment स्थिति ऐसी लगती है जैसा कबड्डी के साथ घर की मुर्गी दाल बराबर जैसा व्यवहार हो रहा है । वर्ल्ड कप , वर्ल्ड कप होता है चाहे वे किसी भी खेल का क्यों न हो पर अपने यहाँ तो वर्ल्ड कप मतलब क्रिकेट वर्ल्ड कप और कुछ नही । ये बात समझी जा सकती है कि व्यक्ति की खेल भावना मे एकाएक बड़ा बदलाव सम्भव नही है और न ही कोई क्रिकेट प्रेमी एकाएक कबड्डी प्रेमी बनकर उसकी बारिकियों का विश्लेषण कर सकता है और एकाएक इतने बड़े बदलाव की उम्मीद न तो समाज हमसे करता और न ही उस खेल के खिलाड़ी , वे तो बम इस इतनी Read more »
लेख साहित्य अकबर की 411वीं पुण्यतिथि 27 अक्टूबर October 27, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment रियासतों के रूप में टुकड़ों टुकड़ों में टूटे हुए भारत को एक बनाने की बात हो, या हिन्दू मुस्लिम झगडे मिटाने को दीन ए इलाही चलाने की बात, सब मजहब की दीवारें तोड़कर हिन्दू लड़कियों को अपने साथ शादी करने का सम्मान देने की बात हो, या हिन्दुओं के पवित्र स्थानों पर जाकर सजदा करने की, हिन्दुओं पर से जजिया कर हटाने की बात हो या फिर हिन्दुओं को अपने दरबार में जगह देने की, Read more » अकबर
व्यंग्य साहित्य खान मियां का ‘हलाल -हलाला ‘ October 26, 2016 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment मुस्लिम देशों में ऐसी वहशीता का बहुत प्रचलन है ..... और सुविधा के अनुरूप ही सज़ा या मज़ा का चलन है। अफगानिस्तान में एक सैनिक ने एक गधे के साथ पशुगमन किया। उसे महज़ चार दिन कैद की सज़ा मिली और छूट गया। हमारे पडोसी देश 'पाक ' के पश्चिमी पंजाब ,खैबर ,पख्तूनवा ,बलोचिस्तान आदि में पशुगमन का आंम प्रचलन है ........ Read more » खान मियां का 'हलाल -हलाला '
व्यंग्य साहित्य अस्पताल में एक और आम हादसा October 25, 2016 by अशोक गौतम | Leave a Comment नहीं सर! वह तो बेचारी समान नागरिक संहिता के दौर में भी हरदम बस इसी बात से डरी रहती है कि दूसरे धर्म का होने के बाद भी जो भोलाराम ने सपने तक में उसे तीन बार तलाक तलाक तलाक कह दिया तो इस बुढ़ापे में कहां जाएगी? सोचती है तो उसके हाथ पांव फूल जाते हैं।हाय री रूह! गजब के मर्द हैं ये भी! सारी उम्र प्रेम. प्रेम करते. करते, कहते.कहते भी अपनी बीवी से प्रेम नहीं कर पाते पर सिर्फ तीन बार तलाक तलाक तलाक कहकर उसे तलाक जरूर दे देते हैं। कौन से धर्म की पोथी पढ़े हैं री ये मर्द? Read more » अस्पताल में एक और आम हादसा