व्यंग्य साहित्य #नोटबंदी पर रामभुलावन ने कहा, हम कितने ढीठ किस्म के हो गए हैं साहब ! November 20, 2016 by मयंक चतुर्वेदी | 1 Comment on #नोटबंदी पर रामभुलावन ने कहा, हम कितने ढीठ किस्म के हो गए हैं साहब ! हम कितने ढीठ किस्म के हो गए हैं, वह ऐसे ही नहीं कह रहा, उसके पीछे ओर भी कई कारण है। रामभुलावन आगे बोला..मसलन लोगों ने लाइन में लगने को ही धंधा बना डाला, सरकार ने बैंक से नोट बदलने की सुविधा एटीएम का उपयोग करने वालों की तुलना में जो लोग इस का उपयोग नहीं करते हैं, उनको ध्यान में रखकर की थी लेकिन हुआ क्या ..... लोग चंद रुपयों के लालच में लाइन में लगकर काले को सफेद करने के फेर में पड़ गए। जिसके बाद मजबूरी में सरकार को 4 हजार 500 की नगद राशि परिवर्तन किए जाने के निर्णय को वापिस लेकर उसे 2 हजार रुपए करना पड़ा। Read more » Featured नोटबंदी
कविता नन्हें बच्चे November 18, 2016 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment नन्हें बच्चे Read more » Featured नन्हें बच्चे
कविता साहित्य अधूरी दास्ताँ November 17, 2016 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment कुछ पुरानी यादें… और तुम्हारा साथ… वही पुराने प्रेम पत्र और अपनी बात… पलभर की गुस्ताख़ी, और अंधेरी रात… टूटें हुए मकान और सुना पड़ा खाट.. ‘अवि‘ के दिल के अरमान और आँसुओं की बरसात… सवेरे की लालिमा और घायल ज़ज्बात… सबकुछ सिर्फ़ तुम पर ही आकर ख़त्म हो जाता है… और तुमसे […] Read more » अधूरी दास्ताँ
कविता डरता है मन मेरा November 17, 2016 by लक्ष्मी अग्रवाल | Leave a Comment डरता है मन मेरा कहीं हो न जाए तेरे भी जीवन में अंधेरा नाजों से पली थी मैं अपनी बगिया की कली थी एक दिन उस बगिया को छोड़ चली थी मैं नए सपनों को देख मचली थी मैं जैसे बहारों के मौसम में खिली थी मैं पर अगले ही दिन मुस्कान खो चुकी थी […] Read more » डरता है मन मेरा
व्यंग्य साहित्य पप्पू गिरी November 16, 2016 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment खबरियों के लिए खबर थी और मनचलों के लिए सेल्फी लेने का एक मौका पप्पू महज़ ४००० हज़ार के गाँधी बैंक में बदलने जा पहुंचे ..... गाड़ियों का काफिला और अनगिनत अंग रक्षक साथ में पप्पू के पप्पियों की फौज ,ऊपर से खबरियों का झुण्ड - मधुमखियों की भांति पप्पू पर मंडरा रहा था ..... पप्पू इतरा रहे थे ....मैं इन लोगों के लिए लाइन में लगा हूँ ..... मोदी के सताए हुए हैं ये सब। Read more » पप्पू गिरी
लेख साहित्य खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी : रानी लक्ष्मीबाई November 16, 2016 by ब्रह्मानंद राजपूत | Leave a Comment (रानी लक्ष्मीबाई के 181वें जन्मदिवस 19 नवंबर 2016 पर विशेष) 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त् रता संग्राम में अहम् भूमिका नि भाने वाली झाँसी की रानी लक्ष् मीबाई का जन्म मोरोपन्त तांबे औ र भागीरथीबाई के घर वाराणसी जि ले के भदैनी में 19 नवम्बर 1935 को हुआ था। रानी लक्ष्मीबा ई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था । परन्तु प्यार से लोग उसे मनु कहकर पुकारते थे। रानी लक्ष्मी बाई जब 4 साल की थी तब उनकी माँ भागीरथीबाई का देहांत हो गया। इसलिए मणिकर्णिका का बचपन अपने पिता मोरोपन्त तांबे की देखरेख में बीता। मनु ने बचपन में शा स्त्रों की शिक्षा ग्रहण की। मणि कर्णिका बचपन में ही तलबार, धनुष सहित अन्य शस्त्र चलाने में नि पुण हो गयीं थी। और छोटी सी उम्र में ही घुड़सवारी करने लगी थीं । मोरोपन्त मराठी मूल के थे और मराठा बाजीराव द्वितीय की सेवा में रहते थे। माँ की मृत्यु के बाद घर में मणिकर्णिका की देखभाल के लिये कोई नहीं था। इसलिए पिता मोरोपन्त मणिकर्णिका को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले जा ने लगे। दरबार में सुन्दर मनु की चंचलता ने सबका मन मोह लिया। मणिकर्णिका बाजीराव द्वितीय की भी प्यारी हो गयीं। बाजीराव मनु को अपनी पुत्री की तरह मानते थे। और मनु को प्यार से छबीली कहकर बुलाते थे। सन् 1842 में मणिकर्णिका का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ और मनु छोटी सी उम्र में झाँसी की रानी बन गयीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सन् 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर चार महीने की आयु में गम्भीर रूप से बीमार होने की वजह से उसकी मृत्यु हो गयी। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दरबारियों ने दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी। दरबारि यों की सलाह मानते हुए रानी ने पुत्र गोद लिया दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया। पुत्र गोद लेने के कुछ दिनों बाद बीमारी के कारण 21 नवम्बर 1853 को रा जा गंगाधर राव का देहांत हो गया । अब रानी लक्ष्मीबाई अकेली पड़ गयीं और दरवारियों की सलाह पर झाँ सी की गद्दी पर बैठकर झाँसी का कामकाज देखने लगी। उस समय भारत के बड़े क्षेत्र पर अंग्रेजों का शासन था। और ईस्ट इंडिया कंपनी का राज चलता था। अंग्रेज झाँसी को भी ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन करना चाहते थे। राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों को यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्मीबाई स्त्री है और उनका का प्रतिरोध नहीं करेगी। राजा गंगाधर राव का कोई पुत्र न होने का कह कर अंग्रेजों ने रानी के दत्तक- पुत्र दामोदर राव को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर […] Read more » रानी लक्ष्मीबाई
व्यंग्य साहित्य आखिर क्यों युवराज की करीबी दूरी में बदल रही है ? November 15, 2016 by सुप्रिया सिंह | 1 Comment on आखिर क्यों युवराज की करीबी दूरी में बदल रही है ? कहते है कि युवराज को कोई चीज बिना मांगे ही मिल जाती है और जब तक युवराज उस चीज की मांग करता है तब तक वे चीज उसके सामने हाजिर हो जाती है पर यहाँ तो स्थिति उल्टी ही है युवराज बेचारा हर बार कहता है कि वे अब बड़ा हो गया है और जिम्मेदारी उठा सकता है पर महारानी का पद लोभ और युवराज का अपरिपवक्क व्यवहार महारानी को उनके पद से दूर नही जाने दे रहा है और युवराज को पद के करीब नही आने दे रहा है । Read more » Featured
व्यंग्य साहित्य इस लाइन को देख कर मुझे ‘कालिया ’ याद आ गया….!! November 14, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा बचपन में एक फिल्म देखी थी … कालिया। इस फिल्म का एक डॉयलॉग काफी दिनों तक मुंह पर चढ़ा रहा… हम जहां खड़े हो जाते हैं… लाइन वहीं से शुरू होती है। इस डॉयलॉग से रोमांचित होकर हम सोचते थे… इस नायक के तो बड़े मजे हैं। कमबख्त को लाइन में खड़े […] Read more »
कविता बच्चों का पन्ना साहित्य बचपन की कैद November 14, 2016 by लक्ष्मी अग्रवाल | Leave a Comment नन्हें नन्हें कांधों पर वजन उठाये कौन सी जंग लड़ रहे हैं ये ज़िन्दगी के मासूम सिपाही। क्या यही है इनके लिये ज़िन्दगी की अनमोल सौगात? कब तक यूँ ही बोझा ढोयेंगे ये नन्हें-नन्हें कोमल हाथ? क्या यही है इनके लिये ज़िन्दगी के असली मायने? या देख पाएंगे ये भी कभी बचपन के सपने सुहाने? गुड्डे-गुड़ियों का घर सजाने […] Read more » बचपन की कैद
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म लेख साहित्य स्वास्तिक शास्वत और विश्वव्यापी सनातन प्रतीक November 14, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का अर्थ 'सत्ता' या 'अस्तित्व' और 'क' का अर्थ 'कर्त्ता' या करने वाले से है। इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द का अर्थ हुआ 'अच्छा' या 'मंगल' करने वाला। 'अमरकोश' में भी 'स्वस्तिक' का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - 'स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध' अर्थात् 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।' Read more » Featured अन्य देशों के लिए स्वास्तिक के चिन्ह का महत्व भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक का पौराणिक महत्त्व विश्वव्यापी सनातन प्रतीक स्वस्तिक चिह्न :- स्वास्तिक के चिन्ह का महत्व स्वास्तिक शास्वत
व्यंग्य बेचारा गाँधी November 12, 2016 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment एल आर गाँधी यकायक ५०० -१००० के गाँधी पर बैन लगा कर माया-मुलायमों और नकली गान्धिओं को तो मोदी ने एक ही झटके में हलाल कर दिया ! झटका तो इस बेचारे असली गाँधी को भी लगा और झटका देने वाली कोई और नहीं हमारी अर्धाङ्गिनी जी ही थीं। माचिस की डिबिया खरीदने के […] Read more » बेचारा गाँधी
गजल साहित्य अब पहले वाली कोई बात न रही ! November 11, 2016 / November 11, 2016 by मनीष कुमार सिंह | Leave a Comment बस इतना इल्म कर लो अंधेरें के रहनुमाओं ! आफताब के आने पर कोई रात न रही !! ऐतबार किस पर करें इस शहर में हम 'मनीष' ! आदमी अब भरोसे वाली जात न रही !! Read more » अब पहले वाली कोई बात न रही !