कविता फिर कौरव सेना सम्मुख है एक महाभारत रच डालो March 12, 2013 / March 12, 2013 by मनोज नौटियाल | 1 Comment on फिर कौरव सेना सम्मुख है एक महाभारत रच डालो कभी गुलामी के दंशों ने , कभी मुसलमानी वंशों ने मुझे रुलाया कदम कदम पर भोग विलासीरत कंसो ने जागो फिर से मेरे बच्चों शंख नाद फिर से कर डालो फिर कौरव सेना सम्मुख है एक महाभारत रच डालो|| मनमोहन धृष्टराष्ट बन गया कलयुग की पहचान यही है गांधारी पश्चिम से आकर जन गण […] Read more » फिर कौरव सेना सम्मुख है एक महाभारत रच डालो
गजल जहां ग़रीब है सबका शिकार क्या होगा…. March 11, 2013 / March 11, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी जहां के रहनुमा करते हैं वार क्या होगा, जहां ग़रीब है सबका शिकार क्या होगा। जो आगे आयेगा वो दौर और मुश्किल है, यहां गुलों में है चुभन तो ख़ार क्या होगा। नई नस्ल की तरक़्क़ी की सोच को बदलो, समझ रहे हैं बुज़ुर्गों को भार क्या होगा। जो आग […] Read more »
लेख उम्मीदों की लौ जलती रहनी चाहिए March 9, 2013 / June 9, 2022 by अरूण कुमार जैन | Leave a Comment तेरह दिन तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष के बाद अंततः गैंगरेप से पीड़ित लड़की दामिनी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। दुनिया को उसने अलविदा तो कह दिया, लेकिन जाते-जाते वह कुछ ऐसे सवाल छोड़ गयी है जिसकी गुत्थी सुलझाने में आज पूरा समाज, पूरी व्यवस्था एवं सरकार उलझी पड़ी है। लड़की […] Read more » damini rape case Let the flame of hope keep burning
कविता ब्रह्मनाद और स्मृतियाँ March 8, 2013 / March 8, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment एक शिरा दो धमनियां तीन स्पंदन इन सभी का एक छोटा सा बुलबुला और तुम्हारें मेरें प्यार के बड़े होते संसार में बची कुछ अनुभूतियाँ. जिजीविषा के साथ जीवन को जी लेती स्मृतियां और इन सभी के सान्निध्य को लिए कहीं दूर से होते, आते, पुकारतें आकाश गंगा के जैसे अनवरत, अक्षुण्ण, अनाकार, अनंत ब्रह्मनाद. […] Read more » ब्रह्मनाद और स्मृतियाँ
गजल सुबह की ख्वाहिसों में रात की तन्हाईयाँ क्यूँ हैं March 8, 2013 / March 8, 2013 by मनोज नौटियाल | Leave a Comment मनोज नौटियाल सुबह की ख्वाहिसों में रात की तन्हाईयाँ क्यूँ हैं नहीं है तू मगर अब भी तेरी परछाईयाँ क्यूँ हैं || नहीं है तू कहीं भी अब मेरी कल की तमन्ना में जूनून -ए – इश्क की अब भी मगर अंगड़ाइयां क्यूँ हैं ? मिटा डाले सभी नगमे मुहोबत्त के तराने […] Read more » सुबह की ख्वाहिसों में रात की तन्हाईयाँ क्यूँ हैं
व्यंग्य कुर्सी नहीं, सोफे पर बैठाइए हिंदुस्तान के वजीर को ! March 7, 2013 by आशीष महर्षि | Leave a Comment आशीष महर्षि हिंदुस्तान का वजीर बनने के लिए बड़ी हाय हाय मची हुई है। पद एक। कुर्सी एक। लेकिन हर कोई ख्वाब देख रहा है। कोई पीएम इन वेटिंग है तो कोई पीएम इन फ्यूचर। कुछ का तो एक पैर कब्र में और दूसरा दिल्ली की ओर है। कोई गुजरात से आकर दिल्ली पर बैठना […] Read more » प्रधानमंत्री
व्यंग्य राहुल बाबा..आप खुद समझदार हैं! March 6, 2013 by अरुण कान्त शुक्ला | Leave a Comment एकदम सच कहते हो राहुल बाबा! शादी, बोले तो एकदम झमेला। शादी करेंगा तो बीबी, बच्चों की रिस्पांसबिलिटी तो लेना का होता| अब अपने अखिलेश भैया की बात को ही ले लो। शादी किया तो मुख्यमंत्री बनने के बाद बीबी को सांसद बनाया की नहीं और वो भी निर्विरोध। अपुन को नहीं मालूम की कभी […] Read more »
कविता मेरी जीवन रामायण में March 6, 2013 / March 8, 2013 by मनोज नौटियाल | 1 Comment on मेरी जीवन रामायण में मनोज नौटियाल मेरी जीवन रामायण में एक अकेला मै वनवासी मै ही रावण मै ही राघव द्वन्द भरी लंका का वासी कभी अयोध्या निर्मित करने की मन में अभिलाषा आये डूब गयी वह विषय सिन्धु में ,जब तक निर्मित हुयी ज़रा सी || सुख -दुःख की आपाधापी में जीवन की परिभाषा डोले मन की […] Read more »
व्यंग्य डुबकी नहीं लगानी क्या? March 5, 2013 / March 5, 2013 by अशोक गौतम | Leave a Comment अषोक गौतम कुंभ स्नान के लिए पार्वती प्रभु से बारबार आग्रह कर रही थीं पर प्रभु थे कि कोर्इ न कोर्इ बहाना बना पार्वती की बात टाल जाते। आखिर जब कुंभ खत्म होने के सिरे आया तो पार्वती ने प्रभु से कहा ,’ हे प्रभु! मैं जितनी बार कुंभ स्नान करने को कहती हूं आप […] Read more »
कविता मैं March 5, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment मैं चुप रहता हूँ कुछ भी काम नहीं करता सिर्फ सपने बुनता हूँ अकेला दौड़ता रहता हूँ धूल भरी मेड़ों पर । मैं खो जाता हूँ देर तक कविताओं में और डूबता-उबरता हूँ उन कविताओं के स्पंदन में । मैं नहीं चाहता हूँ विष बोना आदमियत की मिट्टी में । मैं यही […] Read more » मैं
कविता चाय March 5, 2013 / March 5, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on चाय नींद खुलते ही चाय जो मिल जाय, पूरा दिन अच्छा ही अच्छा जाय। नाश्ते के साथ भी चाय ज़रूरी है, चाय के बिना कहानी ही अधूरी है। महमान आ जाय,फिर चाय हो जाय, महमान चाय पिये बिन जाने न पाय। चाय भी कौन अकेली ही पी जाय, नमकीन और कुकी हों तो मज़ा आ जाय। […] Read more » चाय
कविता तूम और तेरा साथ March 5, 2013 / March 5, 2013 by ऋषभ कुमार सारण | Leave a Comment ऋषभ कुमार सारण कर जातें है, कतल वो, नजराने तेरी आँखों के, अफसाने तेरे उन लफ्जातों के, आ जाती हो जब तुम, दरमियां मेरे उन सपनों के, कर अहसास तेरे दामन का, एक लम्हा सा जी जाता हूँ ! मेरी इस तन्हाई में भी, यूँ बस जन्नत सी पा जाता हूँ !! सुनता हूँ […] Read more » तूम और तेरा साथ