व्यंग्य व्यंग्य हैप्पी वेलेंटाइन मेरी जान! February 12, 2013 by अशोक गौतम | Leave a Comment अशोक गौतम हम दोनों की एक समान विशेषता है कि हम दोंनों एक दूसरे को हीन मानते हैं। वह मुझे इसलिए हीन मानता है कि मै शादी शुदा हूं तो मैं उनको इसलिए हीन मानता हूं कि वह अभी तक अविवाहित है। हीन के साथ साथ वह मुझे छूत भी मानता है। इसलिए जब जब […] Read more » व्यंग्य हैप्पी वेलेंटाइन मेरी जान!
गजल अहसास ए दर्द वो करे गर चोट खायें हम…. February 10, 2013 / February 10, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी नामो निशां भी जुल्म का जिसमें ना पायें हम, ऐसा निज़ाम देश में लाकर दिखायें हम। अब ऐसे आदमी को मसीहा बनाइये, अहसासे दर्द वो करे गर चोट खायें हम। ग़ल्ती करेंगे खायेंगे ठोकर बुरा नहीं, संभलें अगर तो कुछ ना कुछ सीख जायेें हम। जीना तो दूर रहना भी […] Read more » अहसास ए दर्द वो करे गर चोट खायें हम....
कविता मैने कहाँ मांगा था… February 10, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on मैने कहाँ मांगा था… मैने कहाँ मांगा था सारा आसमा, दो चार तारे बहुत थे मेरे लियें, दो चार तारे भी नहीं मिले तो क्या.. चाँद की चाँदनी तो मेरे साथ है। मैने नहीं माँगा था कभी इन्द्रधनुष, जीवन मे कुछ रंग होते बहुत था, दो रंग भी नहीं मिला तो क्या.. श्वेत-श्याम ही बहुत हैं मेरे लियें। […] Read more » मैने कहाँ मांगा था...
कविता मौन February 10, 2013 by विजय निकोर | 2 Comments on मौन विजय निकोर तुम्हारी याद के मन्द्र – स्वर धीरे से बिंध गए मुझे कहीं सपने में खो गए और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ अपने विस्मरण से खीजता बटोरता रहा रात को और उस में खो गए सपने के टुकड़ों को | कोई गूढ़ समस्या का समाधान करते विचारमग्न रात अँधेरे में डूबी कुछ और रहस्यमय हो गयी […] Read more »
कविता बसंत बहार February 10, 2013 by बीनू भटनागर | 1 Comment on बसंत बहार गूंजा राग बसंत बहार दिशा दिशा सम्मोहित हैं, फूल खिले तो रंग बिखरे हैं, गूंजा जब मधुरिम आलाप। भंवरों पर छाया उन्माद, स्वरों की हुई जो बौछार, तितली भंवरे और मधुलिका, पुष्पों के रस मे डूब रहे हैं। प्रकृति और संगीत एक रस, स्वर ताल के संगम में अब, झूल रहे हैं फूलों के दल, […] Read more » बसंत बहार
कविता हम हिन्दु अब आतन्कवादी हो गये… February 6, 2013 / February 6, 2013 by अभिनव शंकर | 1 Comment on हम हिन्दु अब आतन्कवादी हो गये… जाँत-पाँत पर,ऊँच-नीच पर तोड़-तोड़ कर, परम्पराओं को,पुराणों को मोड़-मोड़ कर, पश्चिमीकरण की अखिल भारतीय आंधी चला , स्वदेशी को गाँधी की सती बना, चिता जला, नर-पिशाच वो खडे आज पहन खादी हो गये, हम हिन्दु अब आतंकवादी हो गये … जिसके प्रतिष्ठा को लड़े-भिड़े, हुएँ खेत शिवाजी, जिसके लिए महाराणा हुएँ घास खाने को […] Read more »
व्यंग्य जनतंत्र में तंत्रमंत्र February 6, 2013 by सचिन कुमार जैन | Leave a Comment सचिन कुमार जैन हाँ, शासन व्यवस्था धराशायी हो चुकी है. “राज्य” संविधान के मुताबिक़ लोगों के संरक्षण देने में नाकाम है. अब विकल्पों की बात होना चाहिए. किसी ने कहा है “विकल्पहीन नहीं है दुनिया और नई दुनिया संभव है”. एक किस्सा सुनाया जाता है. एक विदेशी भारत आया. पर्यटन करने के साथ ही यहाँ […] Read more » जनतंत्र में तंत्रमंत्र
गजल वक्त है प्यार से ज़हनों में उतर जाने का…. February 5, 2013 / February 6, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment ज़िंदगी नाम है ख़तरों से उभर आने का, खुदकशी नाम है डर डर के भी मर जाने का। चुप ना बैठो कि अब हालात से लड़ना सीखो, है तरीक़ा यही हालात संवर जाने का। घर तुम्हारा भी तो उस आग में जल सकता है, शौक़ जिसका है तुम्हें औरों पे बरसाने का। तुम […] Read more » वक्त है प्यार से ज़हनों में उतर जाने का....
गजल गजल- सत्येन्द्र गुप्ता February 2, 2013 by सत्येन्द्र गुप्ता | Leave a Comment मन लगा यार फ़कीरी में क्या रखा दुनियादारी में ! धूल उड़ाता ही गुज़र गया तो क्या रखा फनकारी में ! वो गुलाब बख्शिश में देते हैं जब भी मिलते हैं बीमारी में ! फिर हिसाब फूलों का लेते हैं वो ज़ख्मों की गुलकारी में ! किस किस को समझाओगे कुछ नहीं रखा लाचारी में […] Read more »
कविता कविता – यायावर February 2, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment वह मेरे खाने के पीछे पड़ा था जब मैं खाना चाहता था अपना रुखा-सूखा खाना । वह मेरी नींद चुराना चाहता था जब मैं सोना चाहता था थक-हारकर एक पूरी नींद । वह मेरे प्यास के पीछे भी पड़ गया जब मैं पीना चाहता था चुल्लू भर पानी । वह मेरे घर […] Read more »
कविता चिन्ह February 2, 2013 / February 2, 2013 by विजय निकोर | 2 Comments on चिन्ह कोई अविगत “चिन्ह” मुझसे अविरल बंधा, मेरे अस्तित्व का रेखांकन करता, परछाईं-सा अबाधित, साथ चला आता है । स्वयं विसंगतिओं से भरपूर मेरी अपूर्णता का आभास कराता, वह अनन्त, अपरिमित विशाल घने मेघ-सा, अनिर्णीत, मेरे क्षितिज पर स्वछंद मंडराता है । उस “चिन्ह” से जूझने की निरर्थकता मुझे अचेतन करती, निर्दयता से घसीट […] Read more »
गजल कौन किसको क्या कहे . । February 1, 2013 / February 1, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment कामिनी कामायनी रायगा है उनकी महफिल,है वहाँ दीवाने सब , बेरहम,महरुम बंदे ,बदगुमानी से है भरे । किसको है फुर्सत यहाँ पर ,बज्म का देखे मिजाज सब कहर ढाने को आगे ,सब जहर से हैं भरे । वह शिकस्ता नाव अपनी कब से कोने में खड़ी जाना था उस पर जिनको ,सब के सब डरके […] Read more »