साहित्य इतिहास की समाधि पर कैमरून March 4, 2013 / March 4, 2013 by राकेश कुमार आर्य | Leave a Comment भारत में शिक्षा पद्घति की प्रचलित परंपरा को बदलकर अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को भारत में लागू कर अंग्रेज जाति के भारत में युग युगों तक शासन करने का सपना बुनने वाले लॉर्ड मैकाले ने जब इतिहास को थोड़ा दूर से देखा और उसका अंतिम समय आया तो उसे ‘सच का बोध हुआ’ और उसने कहा-मुझे […] Read more » इतिहास की समाधि पर कैमरून
गजल फिर गांव को शहर में बदलने की सोचना…. March 3, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी नफ़रत से दूसरों को ना नीचे दिखाइये, गर हो सके तो खुद को ही ऊंचा उठाइये। औरों को चोट देने में घायल ना आप हों, पागल के हाथ में ना यूं पत्थर थमाइये। फिर गांव को शहर में बदलने की सोचना, पहले शहर को प्यार से जीना सिखाइये […] Read more »
कविता “आँखे, झरोखें और उष्मा” March 3, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment कुछ आँखें थी सपनों को भरे अपने आगोश में. कुछ झरोखें थे जो पलकों के साथ हो लेते थे यहाँ वहां. आँखें झरोखों से आती किरणों में अक्सर तलाशती थी उष्मा को. बर्फ हो गए सपनों के संसार में उष्मा की छड़ी लिए चल पड़ती थी आँखें और बर्फ से करनें लगती थी वो संघर्ष […] Read more » “आँखे झरोखें और उष्मा”
गजल आजकल ज़िंदगी का भरोसा नहीं…. February 25, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी उसको शिकवा है उसको समझा नहीं, उसके बारे में मैंने तो सोचा नहीं। क़र्ज़ के वास्ते देश भी बेच दो, तुमने तारीख़ से कुछ भी सीखा नहीं। आईना तोड़कर आप धोखे में हैं, अपने चेहरे के दाग़ों को देखा नहीं। ज़िंदगी तल्खि़यों से बचा लीजिये, आजकल ज़िंदगी का भरोसा नहीं। […] Read more »
कविता पाषाण-मूर्ति February 24, 2013 / February 24, 2013 by विजय निकोर | 4 Comments on पाषाण-मूर्ति मैं पाषाण-मूर्ति-सी खड़ी रही, तुम असीम नम्रता के प्रतीक पेड़ की शाख़ा-से झुके रहे, और हर बार और भी झुकते गए। तुम्हारी स्नेह-दृष्टि अनुकंपा-सरोवर, तुम्हारे बोल संवेदना से भरपूर , शब्द मख़मली, मैं अनजाने में कभी बे-मुरव्वत कभी जाने में बेलिहाज़ , तुम अकृत्रिम, अप्रभावित सदैव विनम्र रहे, निरहंकार रहे , और इसीलिए अब […] Read more »
कविता ‘वो हिन्दू थे ‘ February 23, 2013 / February 23, 2013 by सुधीर मौर्य 'सुधीर' | 3 Comments on ‘वो हिन्दू थे ‘ सुधीर मौर्य ‘सुधीर’ उन्होंने विपत्ति को आभूषण की तरह धारण किया उनके ही घरों में आये लोगों ने उन्हें काफ़िर कहा क्योंकि वो हिन्दू थे। उन्होंने यूनान से आये घोड़ो का अभिमान चूर – चूर कर दिया सभ्यता ने जिनकी वजह से संसार में जन्म लिया वो हिन्दू थे। जिन्होंने तराइन के […] Read more » 'वो हिन्दू थे '
कविता एहसास ‘आधुनिकता’ का February 20, 2013 / February 20, 2013 by ऋषभ कुमार सारण | 1 Comment on एहसास ‘आधुनिकता’ का ऋषभ कुमार सारण थके हारे काम से आकर, एक कोरे कागज को तख्ती पे लगाया, मन किया कागज की सफेदी को अपने ख्वाबों से रंगने को, उंगिलया मन की सुन के चुपचाप लिखने लगी, और लेखनी भी कदम से कदम लाने लगी, पर दिमाग “डिक्शनरी” में लफ़्ज ढूंढ़ रहा था ! और मेरा “जिया” […] Read more » एहसास ‘आधुनिकता’ का
कविता कविता – अस्तित्व February 20, 2013 / February 20, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment घुप्प अंधेरे में टिमटिमाता है एक दीया मेरे कमरे में । जानता हूँ अच्छी तरह नहीं मिटा सकती अंधेरे को उसकी रोशनी । उधर चाँद झांकता है और कतरा-दर-कतरा घुसता है उसकी रोशनी मेरे अंधेरे कमरे में । फिरभी नहीं मिटता अंधेरा और मैं टटोलता हूँ दो दिन की पड़ी बासी रोटी […] Read more » कविता - अस्तित्व
कविता दूरियों की दूरी February 18, 2013 / February 18, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment विजय निकोर मंज़िल की ओर बढ़ने से सदैव दूरियों की दूरी … कम नहीं होती। बात जब कमज़ोर कुम्हलाय रिश्तों की हो तो किसी “एक” के पास आने से, नम्रता से, मित्रता का हाथ बढ़ाने से, या फिर भीतर ही भीतर चुप-चाप अश्रुओं से दामन भिगो लेने से रिश्ते भीग नहीं जाते, उनमें पड़ी […] Read more » दूरियों की दूरी
गजल जो भी बेटियां बहूं बनी जल रही हैं रोज़ आजकल…. February 17, 2013 / February 17, 2013 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी उम्र नौकरी की चल बसी अर्ज़ियोें का क्या करें जनाब, सबकी सब जला के आ गये डिग्रियों का क्या करें जनाब। पार आके फिर ना जायेंगे उसने ये क़सम दिलाई है, कश्तियां जला रहे हैं हम कश्तियों का क्या करें जनाब। डस रहे हैं दौलतो के नाग दानिशो ज़हीन को यहां, […] Read more »
साहित्य राणा उदय सिंह के साथ न्याय करो February 16, 2013 / February 16, 2013 by राकेश कुमार आर्य | 11 Comments on राणा उदय सिंह के साथ न्याय करो महाराणा प्रताप सिंह के पिता राणा उदय सिंह के साथ इतिहास में न्याय नही किया गया। सचमुच उनकी आत्मा आज तक हमारे द्वारा अपने साथ किये गये व्यवहार को लेकर दुखी होगी। हमने राणा उदय सिंह को बहुत ही ‘दुर्बल और कायर’ राणा सिद्घ करके रख दिया है। महाराणा प्रताप के प्रति जहां असीम श्रद्घा […] Read more » राणा उदय सिंह के साथ न्याय करो
व्यंग्य जंग, दिल और दिमाग़ की February 16, 2013 by बीनू भटनागर | 6 Comments on जंग, दिल और दिमाग़ की ‘जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे ’ पुराना गाना है, पर शायद सबने सुना हो। दिल टूटने के बाद जी ही नहीं सकते, जब आपके पास ऐसा कोई विकल्प है ही नहीं, तो ये क्या कहना कि जी कर क्या करेंगे! शायरों को थोड़ा सा जीव-विज्ञान का ज्ञान होता तो बहुत […] Read more » जंग दिल और दिमाग़ की