Category: राजनीति

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अम्बेदकर के नाम पर कायमदलित-राजनीति के पीछे विदेशी संगठनों की सक्रियता चिन्ताजनक

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डी०एन०एफ०नामक अमेरिकी संस्था एक तरफ भारत के भीतर बहुसंख्यक समाज के विरूद्ध दलितों और अल्पसंख्यकों को भडका कर विखण्डन के दरार को चौडा करने में लगी हुई है , तो दूसरे तरफ भारत के बाहर वैश्विक मंचों पर भारतीय राज्य-व्यवस्था को अक्षम-अयोग्य व पक्षपाती होने का दुष्प्रचार कर इस देश में अमेरिका के हस्तक्षेप का वातवरण तैयार करने में भी सक्रिय है । ऐसी एक नहीं अनेक संस्थायें हैं , जो भिन्न-भिन्न तरह के मुद्दों को लेकर भारत के विरूद्ध अलग-अलग मोर्चा खोली हुई हैं ,

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पाकिस्तान का एक और झूठ उजागर

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इस संदेह को दूर करने के लिए मुसलमानों को भी राष्ट्र की मुख्य धारा में आने का प्रयास करना चाहिए, जिससे समाज के अंदर व्याप्त वैमनस्य के भाव को समाप्त करने में सहयोग मिल सके। पाकिस्तान ने जिस प्रकार से कुलभूषण को मौत की सजा सुनाई है, उससे पाकिस्तान की नीयत में खोट दिखाई देता है। भारत ने जिस प्रकार से आतंकी कसाब को सारे प्रमाण होने के बाद भी वकील उपलब्ध कराकर उसे अपने आपको निर्दोष प्रमाणित करने की खुली छूट दी थी, लेकिन पाकिस्तान ने कुलभूषण को अधिकार होने के बाद भी किसी प्रकार की कोई सुनवाई का अधिकार नहीं दिया। ऐसा केवल इसलिए ही किया होगा, क्योंकि कुलभूषण भारत का बेटा है।

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तीस्ता के जल बंटवारे का नहीं हुआ समाधान

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ममता बनर्जी राजनीति की चतुर खिलाड़ी हैं, इसलिए वे एक तीर से कई निशाने साधने की फिराक में भी रहती हैं। तीस्ता का समझौता पश्चिम बंगाल के अधिकतम हितों को ध्यान में रखते हुए होता है तो ममता बंगाल की जनता में यह संदेश देने में सफल होंगी कि बंगाल के हित उनकी पहली प्राथमिकता हैं। जल बंटवारे के अलावा ममता की दिलचस्पी भारत और बांग्लादेश के बीच नई रेल और बस सेवाएं शुरू करने की थी। इसके लिए मोदी और हसीना भी सहमत थे। नतीजतन दोनों दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों के बीच एक बंद पड़ा पुराना रेल मार्ग बहाल कर दिया गया।

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कौन सा रास्ता…..

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रामजन्म भूमि में राममंदिर तों बनेगा, पर हिन्दू समाज की भावना एवं आस्था को देखते हुये मुस्लिम समुदाय यदि स्वतः उसके निर्माण में आगे आये तो हिन्दू-मुसलमान एकाकी दृष्टि से ऐतिहासिक पहल हो सकती है। वैसे भी राम सिर्फ हिन्दुओं ही नहीं, भारतीय मुसलमानों के भी महान पूर्वज है। ईरान में मुसलमान रूस्तम और सोहराब को अपना पूर्वज मानकर गर्व कर सकते है तो भारतीय मुसलमान राम पर गर्व क्यों नही कर सकते ?

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भारतीय परिप्रेक्ष में राष्ट्रीय राजनीति का उदय

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निसंदेह एक साधारण से दिखने वाले युवक ने अपना जीवन धर्म की सेवा व साधना के लिये समर्पित करते हुए भगवा धारण किया। 'भगवा' मात्र रंग ही नही हमारी महान संस्कृति का सूचक और वाहक है। जिसका संदेश है..."असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय , मृत्योर्मामृतं गमय" अर्थात "हे भगवान मुझको असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर एवं मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो"। जिसको अपनाते हुए युवा अजय सिंह अपनी वर्षों की अथक तपस्या से योगी आदित्यनाथ बन गये।

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वंदे मातरम्-विवाद नहीं, विकास का माध्यम बने

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मुसलमानों को ‘वन्दे मातरम्’ गाने पर आपत्ति इसलिये भी बतायी जा रही है, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है। जबकि यह गान किसी देवी नहीं, बल्कि धरती माता की पूजा की बात कहता है। माता भी कौन-सी? पृथ्वी। जो जड़ है। इसमें भारत को माता कहा गया है। वंदे-मातरम् में भारत के जलवायु, फल-फूल, नदी-पहाड़, सुबह-शाम और शोभा-आभा की प्रशंसा की गई है। किसी खास देवी की पूजा नहीं की गई है। वह कोई हाड़-मासवाली देवी नहीं है। वह एक प्रतीक है। विभिन्न मुस्लिम देशों में भी वहां राष्ट्रीय गीतों में मातृ-भूमि का यशोगान गाया गया है।

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अलगाववादियों से कैसा लगाव ?

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बड़ा खेद होता है जब इन विपक्षी नेताओं में अनेक आतंकवादी घटनाओं में पीड़ित व विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की पीड़ा के प्रति कोई भाव ही नहीं जागता बल्कि उनकी दुर्दशा के जिम्मेदार अलगाववादियों से वार्तालाप करके मुसलमानों को ही संतुष्ट करना चाहते है । अनेक बार यह आवाज उठाई जाती है कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा ) को कश्मीर से हटा लिया जायें क्योंकि वहां सेनाओं के कारण सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है । परन्तु क्या वहां के आम नागरिको की सुरक्षा की कोई गारंटी लेगा ? बात-बात पर सेना को कोसने के पीछे केवल एक ही मंशा होती है कि भारत सरकार कश्मीरियों का उत्पीड़न कर रही है ।

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योगी राज में दारू पर ‘दंगल’

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जितना सच यह है कि शराबबंदी आंदोलन योगी सरकार की कड़ी परीक्षा ले रहा हैै, उतनी की हकीकत यह भी है कि योगी सरकार को माया-अखिलेश सरकार की कारगुजारी का खामियाजा उठाना पड़ रहा है। अखिलेश तो अपनी पूर्ववर्ती मायावती सरकार से पे्ररणा लेते हुए 2017-2018 तक के लिये आबकारी नीति बना कर चले गये हैं।बात खामियों की कि जाये तो दरअसल, योगी की पूर्ववर्ती सरकारों ने शराब बिक्री का लाइसेंस जारी करते समय कभी तय मानकों का ध्यान नहीं रखा। नियम-कानून ताक पर रख दिये गयें ताकि उनकी जेबें भरी रहें।

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अरविन्द केजरीवाल जैसा मुख्यमंत्री पालना कितना मुश्किल है

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जेठामलानी की नज़र में मुक़द्दमा लेते समय तो केजरीवाल अमीर थे और फ़ीस देते समय अचानक ग़रीब हो गए हैं । इसलिए अब वे उनका मुक़द्दमा मुफ़्त लड़ेंगे । जेठामलानी की पारखी नज़र को मानना पड़ेगा । सारे देश में उन्होंने मुफ़्त मुक़द्दमा लड़ने के लिए मुवक्किल भी ढूँढा तो वह अरविन्द केजरीवाल मिला । यानि जो पौने चार करोड़ वक़ील को न अदा कर सके वह बीपीएल की श्रेणी में आता है । बिलो पावर्टी लाईन ।

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