Category: राजनीति

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मुसलमानों का सशक्तिकरण क्यों ?

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यह भी समझना होगा कि कुल मुसलमानों की संख्या की तुलना में भी हिंदुओं की संख्या अधिक है जो पिछड़ी हुई है और संसाधनों की कमियों को झेल रही है।सुरेश तेंदुलकर समिति की संभवतः 2012-13 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 37.2 % भाग गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे रहता है। अतः इसके अनुसार बीपीएल के नीचे रहने वाले हिंदुओं की संख्या उस समय लगभग 35-36 करोड़ थी जोकि अधिकांशतः ग्रामीण क्षेत्रो व नगरों में झुग्गी - झोपड़ियों में रहने को विवश है।

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राष्ट्रपति चुनावः पसोपेश में विपक्ष

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कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद इस फैसले को इकतरफा मानकर चल रहे है। ऐसी ही राय सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी की है। दरअसल देरी से उम्मीदवारी की घोषणा करना भाजपा की रणनीति का हिस्सा है, ताकि अंतिम दिनों में विपक्ष अपना प्रत्याशी चुनने की हड़बड़ी में कमजोर प्रत्याशी उतार दें। इसीलिए जब राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू ने सोनिया गांधी और येचुरी से राष्ट्रपति चुनाव पर आम सहमति बनाने की कवायद की थी, तब किसी नाम पर कोई चर्चा नहीं हुई थी। इसलिए आम सहमति विपक्ष को भ्रम में रखने की महज एक रस्म-अदायगी थी।

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सिर्फ दो लोग जानते हैं कि कौन होगा अगला राष्ट्रपति

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हमारे हिंदुस्तान के अगले राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवारी किसको दी जाए, उस व्यक्ति के नाम पर सत्ता पक्ष और विरोधी दलों में चर्चा की शुरुआत कोई डेढ़ – दो महीने पहले से ही गई थी। लेकिन पक्ष हो या विपक्ष, जिन नेताओं के बीच चर्चा चल रही है, उन्हें और सहमति बनाने के लिए डगर डगर फिर रहे देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह और नगर विकास मंत्री वेंकैया नायडू को सच में नहीं पता कि सहमति आखिर किसके नाम पर बनानी है। राजनीति का यह सबसे मनोरंजक परिदृश्य है कि देश के आला मंत्री भी नहीं जानते कि उन्हें किसके नाम पर सहमति बनानी है।

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यूपी में दलित वोट के लिये दे दनादन

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सियासी फायदा पाने के लिये दलित उत्पीड़न की छोटी-छोटी घटनाओं को भी सियासी जामा पहना दिया जाता है। अतीत में दलित वोट बैंक की सियासत करने वालों द्वारा हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वोमेला और जेएनयू के विवाद को भी दलित टच देने की कोशिश की जा चुकी है। गुजरात में दबंगों द्वारा दलितों की पिटाई का प्रकरण अथवा सहानपुर का दंगा, जिसमें दलितों के घर जला दिये गये थे। दलित-ठाकुरों के बीच हुए इस विवाद में जानमाल दोनों का नुकसान हुआ। तो इसको लेकर सियासत भी खूब हुई।

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मिसाल बनेगी महाराष्ट्र की किसान ऋणमाफी

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ऐसी विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न कर दिए जाने के बावजूद कृषि उत्पादनों के दाम उस अनुपात में नहीं बढ़े जिस अनुपात में अन्य जरूरी वस्तुओं और सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान बढ़े ? इस कारण किसान और किसानी से जुड़ा मजदूर लगातार आर्थिक विशमता के शिकार होते चले गए। 1960-70 के दशक तक 1 तोला सोना करीब 2 क्विंटल गेंहूं में आ जाया करता था। लेकिन आज इतने ही सोने के दाम 20 क्विंटल गेंहूं के बराबर हैं। 1970 से 2016 के दौरान गेंहूं के मूल्य में वृद्धि महज 19 गुना हुई है, जबकि इसी अवधि के दौरान सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान 120 से 150 गुना तक बढ़ाए गए है।

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