Category: राजनीति

राजनीति

प्रबंधन कौशल के तीन वर्ष

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अनेक अनोखे तर्क विमर्श में हैं जिनमें एक यह भी है कि अविवाहित और परिवार त्यागी व्यक्ति आखिर किस लिए भ्रष्टाचार करेंगे। अथवा देश में पहली बार हिन्दू धर्म की विजय पताका फहराने वाला सशक्त नेता सत्ता में है,उसका विरोध किया तो आजीवन बहुसंख्यक होने के बावजूद अल्पसंख्यक की भांति रहना होगा। नोट बंदी और डिजिटल इकॉनॉमी आम नागरिक के लिए भ्रष्टाचार के अवसर कम करने के उपाय हैं किंतु नॉन परफार्मिंग एसेट्स की रीस्ट्रक्चरिंग तो वह अनूठी सूझ है जो कॉर्पोरेट्स की सहूलियत के लिए गढ़ी गई है।

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महिला-जगत राजनीति

महिला कल्याण पर केन्द्रीत मोदी सरकार के तीन वर्ष

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स्टार्टअप में बेटियों के लिए खास प्रयास किए गए हैं. यह सच है कि जो बेटियां घर की जिम्मेदारी सम्हाल सकती हैं, वे अपने उद्योग-धंधे की सफल कप्तान भी बन सकती हैं. आवश्यकता है तो उनके भीतर छिपे उस हुनर को तराशने की जो आने वाले दिनों में उन्हें कामयाब बनाएगी. स्टार्टअप में सरकार ने यही कोशिश की है और परिणाम आने लगा है. महिलाओं में बचत की आदत होती है लेकिन इसे बैंकिंग व्यवस्था से जोडऩे की खास पहल की है. सुकन्या, धनलक्ष्मी नाम से कुछ ऐसी योजनाएं जो महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती हैं.

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राजनीति

वाघेला ‘बापू’ कांग्रेस को गच्चा देने की फिराक में

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वाघेला की राजनीति का इतिहास रहा है कि वे अपने हर राजनीतिक कदम को बहुत नाप तोलकर रखते रहे हैं। सो, वापू के समर्थकों की तरफ से भले ही यह कहलवाया जा रहा हो कि कांग्रेस की ओर से वाघेला को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया जाए। लेकिन वाघेला खुद भी जानते हैं कि कांग्रेस ऐसा नहीं करेगी। फिर हाल ही में गुजरात कांग्रेस के प्रभारी महासचिव अशोक गहलोत ने भी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम घोषित करने से साफ इनकार भी कर ही दिया है। मतलब साफ है कि कांग्रेस से किनारा करने की पहली सीढ़ी को वाघेला ने पार कर लिया है।

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केजरीवालः हर रोज नया बवाल

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आम आदमी पार्टी का संकट यह है कि वह अपने परिवार में पैदा हो रहे संकटों के लिए भी भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। जबकि भाजपा एक प्रतिद्वंदी दल है और उससे किसी राहत की उम्मीद आप को क्यों करनी चाहिए। मुंह खोलते ही आप के नेता प्रधानमंत्री को कोसना शुरू कर देते हैं। भारत जैसे देश में जहां संघीय संरचना है वहां यह बहुत संभव है कि राज्य व केंद्र में अलग-अलग सरकारें हों। उनकी विचारधाराएं अलग-अलग हों। किंतु ये सरकारें समन्वय से काम करती हैं, एक दूसरे के खिलाफ सिर्फ तलवारें ही नहीं भांजतीं।

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कपिल मिश्रा और अरविन्द केजरीवाल की कलंक कथा

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आज केजरीवाल की कलंक कथा और कपिल के आरोप चर्चा का विषय हैं। केजरीवाल मौन हैं। हो सकता है कि वह सोच रहे हैं कि धीरे-धीरे सब शांत हो जाएगा। हम भी मानते हैं कि सब धीरे-धीरे शांत हो जाएगा, पर सत्यनिष्ठा पर जो प्रश्नचिन्ह एक बार लग जाता है वह तो चरित्र पर लगे एक दाग की भांति होता है, जिसे धोने वाली कोई साबुन आज तक नही बनी है। समाचार पत्रों को चार दिन बाद हो सकता है कि लिखने पढऩे के लिए फिर कोई 'केजरीवाल ' का 'पिता' मिल जाए या और कोई ऐसा धमाका हो जाए कि सारी मीडिया आप की सडांध मारती लाश को छोडक़र उधर को भाग ले पर दिल्ली की जनता के हृदय में तो इतनी देर में गांठ लग चुकी होगी, जिसे खोलना अब केजरीवाल के वश की बात नहीं होगी। यह जनता है जो सब जानती है-यह भूलती नही है-अपितु हृदय में लगे एक एक शूल को उठा उठाकर सुरक्षित रखती जाती है। समय आने पर सबका हिसाब किताब गिन गिनकर पूरा कर देती है। अत: केजरीवाल ध्यान रखें कि पर्दे के पीछे के उनके कुकृत्यों को जनता अपने पर्दे (हृदय) के पीछे ले गयी है और अब पर्दे का हिसाब 'पर्दे' में ही होगा।.....राज को राज रहने दो।

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