Category: राजनीति

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केजरीवालः हर रोज नया बवाल

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आम आदमी पार्टी का संकट यह है कि वह अपने परिवार में पैदा हो रहे संकटों के लिए भी भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। जबकि भाजपा एक प्रतिद्वंदी दल है और उससे किसी राहत की उम्मीद आप को क्यों करनी चाहिए। मुंह खोलते ही आप के नेता प्रधानमंत्री को कोसना शुरू कर देते हैं। भारत जैसे देश में जहां संघीय संरचना है वहां यह बहुत संभव है कि राज्य व केंद्र में अलग-अलग सरकारें हों। उनकी विचारधाराएं अलग-अलग हों। किंतु ये सरकारें समन्वय से काम करती हैं, एक दूसरे के खिलाफ सिर्फ तलवारें ही नहीं भांजतीं।

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कपिल मिश्रा और अरविन्द केजरीवाल की कलंक कथा

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आज केजरीवाल की कलंक कथा और कपिल के आरोप चर्चा का विषय हैं। केजरीवाल मौन हैं। हो सकता है कि वह सोच रहे हैं कि धीरे-धीरे सब शांत हो जाएगा। हम भी मानते हैं कि सब धीरे-धीरे शांत हो जाएगा, पर सत्यनिष्ठा पर जो प्रश्नचिन्ह एक बार लग जाता है वह तो चरित्र पर लगे एक दाग की भांति होता है, जिसे धोने वाली कोई साबुन आज तक नही बनी है। समाचार पत्रों को चार दिन बाद हो सकता है कि लिखने पढऩे के लिए फिर कोई 'केजरीवाल ' का 'पिता' मिल जाए या और कोई ऐसा धमाका हो जाए कि सारी मीडिया आप की सडांध मारती लाश को छोडक़र उधर को भाग ले पर दिल्ली की जनता के हृदय में तो इतनी देर में गांठ लग चुकी होगी, जिसे खोलना अब केजरीवाल के वश की बात नहीं होगी। यह जनता है जो सब जानती है-यह भूलती नही है-अपितु हृदय में लगे एक एक शूल को उठा उठाकर सुरक्षित रखती जाती है। समय आने पर सबका हिसाब किताब गिन गिनकर पूरा कर देती है। अत: केजरीवाल ध्यान रखें कि पर्दे के पीछे के उनके कुकृत्यों को जनता अपने पर्दे (हृदय) के पीछे ले गयी है और अब पर्दे का हिसाब 'पर्दे' में ही होगा।.....राज को राज रहने दो।

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‘लहरी’ नही ‘प्रहरी’ बनें जनप्रतिनिधि

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सत्ता में अपने लिए 'प्रबंध' और दूसरे के लिए 'प्रतिबंध' का खेल चलता रहता है। जो थोड़े से मुखर जनप्रतिनिधि होते हैं वे इस खेल में पारंगत होते हैं। वे दूसरों का रास्ता रोकने (प्रतिबंध) और अपना रास्ता प्रशस्त करने (प्रतिबंध करने) की कला को जानते हैं। इस प्रकार के जनप्रतिनिधि सत्ता में लॉबिंग करते देखे जा सकते हैं। इसीलिए ये कुछ मुखर रहते हैं। पार्टी के भीतर पार्टी बनाकर ये लोग सत्ता को भ्रमित करने या अपने अनुसार हांकने का भी प्रयास करते हैं। ये ऐसी शक्ति भी रखते हैं कि चुनावों के समय किसी का टिकट भी कटवा सकते हैं। इनके चिंतन में भी राष्ट्रचिंतन कम और अपने आपको सत्ता हिलाने में समर्थ दिखाने की चाह अधिक होती है। इस प्रकार इनसे भी देश का भला नहीं हो पा रहा।

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गुजरात की आंधी में मारवाड़ का ‘गांधी’

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दिसंबर से पहले गुजरात में चुनाव होने हैं। लेकिन समय बहुत कम है। थोड़ा सा जमीनी स्तर पर जाकर देखें, तो गहलोत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि गुजरात के कई कई गांवों में न तो कांग्रेस का कोई नाम लेनेवाला है और न ही कोई शुभचिंतक। फिर, प्रदेश में कांग्रेस का कोई भी ऐसा नेता नहीं है, जिसके नाम से कहीं पर भी एक हजार लोग भी इकट्ठे किए जा सकें। गुजरात मं तो राहुल गांधी को भी रोड़ शो के जरिए लोगों की संख्या ज्यादा दिखाने का नुस्खा अपनाना पड़ता है। हालांकि गुजरात के सारे कांग्रेसी नेता थोड़े बहुत जनाधारवाले जरूर हैं, लेकिन पूरे प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में माहौल खड़ा कर दे, यह क्षमता किसी में नहीं है। जिस गुजरात में कांग्रेस मरणासन्न अवस्था में हैं, वहां गहलोत के लिए अपनी पार्टी को चुनाव जितवाना तो दूर बल्कि कांग्रेस संगठन को फिर से खड़ा करना भी जिस एक अलग किस्म की चुनौती है, उस पर विस्तार से बात कभी और करेंगे।

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राष्ट्र के ब्रह्मा, विष्णु, महेश

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जब उसे विश्वमंचों पर देश के नायक के रूप में अपनी बात कहने का अवसर मिलता है। पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल जी ने अनेकों अवसरों पर विश्वमंचों पर देश का सम्मान बढ़ाया था, तब लोगों को लगता था कि उनके पास कोई नेता है। आज उसी परंपरा को नरेन्द्र मोदी आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने चीन में या उससे पूर्व अन्य देशों में जाकर जो सम्मान अर्जित किया है उससे देश का मस्तक ऊंचा हुआ है। उन्होंने चीन की धरती से ठीक ही कहा है कि चीन के राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल तोडकऱ जिस प्रकार उनका सम्मान किया है वह मेरे देश के सवा अरब लोगों को दिया गया सम्मान है। जिस किसी ने भी मोदी के यह शब्द सुने उसी ने प्रसन्नता का अनुभव किया। हर व्यक्ति ने मोदी से अधिक स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया। कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री बनने की सोच सकता है, और समय आने पर जनता की इच्छा से प्रधानमंत्री बन भी सकता है, यह एक अलग बात है।

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