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राजनीति समाज

“इफ़्तारनामा” : ज़रूरत, धर्म के मर्म को समझने की

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तनवीर जाफ़री     ‘इफ़्तार’ उस प्रक्रिया का नाम है जो मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा माह-ए-रमज़ान में रखे जाने वाले रोज़े के समापन के समय अमल में लाई जाती है। सीधे शब्दों में रोज़ा अथवा व्रत खोलने को इफ़्तार कहा जाता है। भारतवर्ष चूंकि एक धर्मनिरपेक्ष देश है इसलिए यहां मुसलमानों द्वारा कठिन से कठिन […]

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समाज

विकास हो मनुष्यता का, नैतिकता का न कि भौतिकता का

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संपूर्ण विश्व में प्रथम विश्व युद्ध के बाद से चहुं ओर विकास-विकास-विकास का डंका बजाया जा रहा है। कुछ देशों ने अपने आप को विकसित मानकर अन्य देशों को विकासशील या अविकसित देशों की श्रेणी में डाल दिया और अपनी विकसित योजनाओं को लेकर, विकास का नारा देकर, पूरे विश्व में इन योजनाओं को थोपने का काम किया है लेकिन किसी कीमत पर यह विषय चिंतनीय और मनन करने योग्य है। इतिहास को उठाकर देखें तो जब भारत विश्व गुरु कहलाता था उस समय की शिक्षा पद्धति, संस्कृति और सभ्यता पूर्णतया नैतिकता पर आधारित होती थी। नैतिकता के पाठ का असर आचरण और व्यवहार में परिलक्षित और सर्वप्रिय होता था परंतु प्रथम विश्व युद्ध के बाद से ही नैतिकता का और चारित्रिक पतन शुरू हो गया क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद जिन लोगों ने उस समय भयावह युद्ध को और युद्ध के पश्चात भयावह मंदी को झेला था उससेे नैतिकता के सब्र के बांध न सिर्फ हिल गये, बल्कि बिखर गये थे।  तत्पश्चात मनुष्य को मात्रा एक ऊंची जाति के जानवर की तरह माना जाने लगा जिसमें बड़े-बड़े और ताकतवर लोगों का कमजोर लोगों और निम्न दर्जे के लोगों को दबाने की प्रवृत्ति हावी होने लगी। इसी बीच इस विकासवाद के बहाने लोगों पर अपना वर्चस्व जमाकर एवं दिखाकर अपने प्रभाव में लेने का सिलसिला शुरू हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया में हालात इतने खराब हुए कि अधिकतर लोग ऊसूल और नैतिक सिद्धांतों को ताक पर रख सुख-सुविधा-विलास के पीछे भागने लगे और उन पर अमीर बनने का जुनून सवार हुआ और यहीं से विकासवाद का परचम फहराने की और नैतिकता के पतन की शुरुआत हो गयी।  भारतीय सभ्यता व संस्कृति में नैतिकता को शुरू से ही ऊच्च स्थान दिया गया है। नैतिकता हमें हर कदम पर सही-गलत के ज्ञान का आभास कराती है। नैतिकता के अभाव में व्यक्ति और समाज असंतोष, अलगाववाद, उपद्रव, आंदोलन, असमानता, असामंजस्य, अराजकता, आदर्शविहीन, अन्याय, अत्याचार, अपमान, असफलता अवसाद, अस्थिरता, अनिश्चितता, संघर्ष, हिंसा आदि में घिरकर और फंस कर रह जाता है। इसके मूल कारण में देखें तो व्यक्ति और समाज सांप्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्राीयतावाद और हिंसा की संकीर्ण भावनाओं व समस्याओं में उलझ कर रह जाता है। हालांकि, उसी समाज में विभिन्न कालों, विभिन्न परिस्थितियों और विभिन्न वातावरण में नैतिकता भी बदल जाती है और समयानुसार सुधार भी हो जाता है।  समाजिक दृष्टिकोण से नैतिकता ही धर्म की आचार संहिता है; वहीं धर्म जिसको सृष्टि रचयिता द्वारा ब्रह्मांड के प्रत्येक कण-कण में निर्धारित किया हुआ है। नैतिकता के मानदंडों से ही कानून जैसी व्यवस्था की उत्पत्ति हुई है और आज विकासवाद के नाम पर व्यक्ति कानून को तोड़-मरोड़ कर इस्तेमाल कर नैतिकता को ताक पर रख भौतिकतावादी मानसिकता को मन में संजोये हुए, उचित-अनुचित का आंकलन किये बगैर अपने आप को विकसित कहलवा रहा है मगर हकीकत में पतन की ओर जा रहा है।  धर्म मनुष्य को नैतिकता के माध्यम से समस्त प्राणियों से आचरण और व्यवहार, उचित-अनुचित का ज्ञान, कर्तव्य बोध, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति दायित्व और अधिकार इत्यादि को नियम श्रृंखला में बांधकर मनुष्य को मानव बनने पर मजबूर करता है।  मनुष्य की आत्मा में समस्त ज्ञान चाहे वह भौतिक हो, नैतिक हो या आध्यात्मिक हो विराजित रहता है। मात्रा हमें उस आवरण को अनावरित करना है जिसको मनुष्य मनोचित आचरण करते हुए मनुष्य से मानव की ओर बनकर विकास यात्रा को शुरू करता है। नैतिकता की विशेषताः- थ् नैतिक शिक्षा ही मनुष्य को मानव बनाती है। थ् नैतिकता व्यक्ति के अन्तःकरण की आवाज है। यह सामाजिक व्यवहार का उचित प्रतिमान है। थ् नैतिकता के साथ समाज की शक्ति जुड़ी होती है। थ् नैतिकता तर्क पर आधारित है। नैतिकता का संबंध किसी अदृश्य पारलौकिक शक्ति से नहीं होता। थ् नैतिकता परिवर्तनशील है। इसके नियम देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं।  थ् नैतिकता का संबंध समाज से है। समाज जिसे ठीक मानता है वही नैतिक है। थ् नैतिक मूल्यों का पालन व्यक्ति स्वेच्छा से करता है। किसी ईश्वरीय शक्ति के भय से नहीं। थ् नैतिकता व्यक्ति के कर्तव्य और आचरण से जुड़ी है। थ् […]

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समाज

मैं भी अब मास्टर बन सकती हूँ

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  शराब के खिलाफ महिलाओं के प्रयास ने सजाया बच्चों की आंखों में सपना अनीसुर्रहमान खान बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में “सभी प्रकार की हिंसा से बच्चों की सुरक्षा” उनका मौलिक अधिकार घोषित किया गया है, बच्चों के खिलाफ हिंसा के सभी रूपों को समाप्त करने के लिए सतत विकास केलक्ष्य 2030 के एजेंडा में एक विशिष्ट लक्ष्य (एसडीजी 16.2) को शामिल किया गया है। जो भय, उपेक्षा, दुर्व्यवहार और शोषण से मुक्त रहने के लिए प्रत्येक बच्चे के अधिकार की प्राप्ति को एक नई गति मिलती है। एक भयावह सच यह है कि बच्चों के साथ होने वाले यौन शोषण की घटनाओं के मामले में भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है। जबकि आदिवासी बहुल राज्य ओडिशा इसी श्रेणी में देश में चौथे स्थान पर है। राष्ट्रीयअपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार ओडिशा में बच्चों के साथ होने वाले अपराधों के अंतर्गत बड़ी संख्या में केस दर्ज किये जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार ओडिशा के एक लाख बच्चों में से प्रत्येक सात बच्चों का यौनशोषण किया जाता है। मनोवैज्ञानिक इन अपराधों के पीछे कई कारणों को ज़िम्मेदार मानते हैं, जिनमें शराब का सेवन भी प्रमुख है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए ओडिशा के संभलपुर जिला स्थित लरियापली ग्रामपंचायत की महिलाओं ने सख़्त क़दम उठाते हुए क्षेत्र को शराब जैसी कुरीतियों से मुक्त करने का बीड़ा उठाया है। इससे बच्चों का न केवल भविष्य संवर रहा है बल्कि उनके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के भी प्रयास जारी हैं। महिलाओं के इस हौसले ने गांव के लोगों विशेषकर पुरुषों में शराब के प्रति सोंच को भी बदलने का काम किया है। शराबबंदी से होने वाले परिवर्तनों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए गांव की एक युवा लड़की बताती है कि”अब मुझे विश्वास हो गया है कि मास्टर बनने का मेरा सपना अब पूरा हो सकता है।” वहीं दूसरी ओर आठवीं क्लास में पढ़ने वाली चौदह वर्षीय सुकांति कालू आत्मविश्वास से लबरेज होकर बताती है कि “पहले मेरे पापान केवल सभी प्रकार का नशा किया करते थे बल्कि घर में झगड़ा और मारपीट भी करते थे। जब शाम को उनके घर आने का समय होता तो हम लोग घर का अंधेरा कोना खोज कर इसमें अपने आप को छिपाने के प्रयास में लग जाते, लेकिन बेचारी माँ! उसकी तो जम कर पिटाई होती थी। माँ को मार खाता देख, बर्दाश्त नहीं होता तो मैं उस को बचाने जाती, मगर जब खुद की पिटाई होती तो न चाहते हुए भी अलग होना पड़ताथा।” सुकांती के पिता घनश्याम कालू एक राजमिस्त्री है, जो दिन भर की अपनी मेहनत की कमाई को शाम में शराब की चंद बोतलों में उड़ा दिया करता था। उसकी एक रिश्तेदार रुक्मणी प्रधान कहती हैं कि “घनश्यामकालू पहले महुआ और चावल से बने स्थानीय शराब का भी आदी था, इतना ही नहीं उसकी पत्नी भी ताड़ी का सेवन की आदी थी”। लेकिन अब उन्होंने इस बुराई से तौबा कर ली है।   दाहिने हाथ में कलम और बाएँ हाथ में कॉपी पकड़े कुर्सी पर बैठी सुकांति मुस्कुराते हुए कहती है कि “अब हमारे पापा और मम्मी हमें खूब पढ़ाना चाहते हैं, अब शाम को जब हमारे पिता घर आते हैं तो उनके हाथ मेंहमारे लिए मिठाइयां या फल होते हैं। हमारी एक मांग पर कॉपी, कलम, किताब सब कुछ हाज़िर कर देते हैं और कहते हैं कि एक दिन मेरी बेटी मेरा नाम रोशन करेगी, मैं ने भी सोच रखा है कि अब मैं दिल व जान सेपढ़ाई करूंगी और मास्टर बनकर गांव के सारे बच्चों को भी पढ़ाऊंगी।” गांव में अचानक आये इस बदलाव को लेकर 23 वर्षीय पदमनी बदनाईक कहती हैं कि “मैं खुद बी.ए पास हूँ, मेरा घर सुनदरगढ़ जिले में है लेकिनमैं ने यह तय कर रखा है कि अपने लोगों के लिए कुछ ज़रूर करूँगी, यह उसी का हिस्सा है कि मैं यहाँ महिलाओं को एकत्रित करके उन्हें शराब से होने वाले जानी माली नुकसान से अवगत कराया, और महिलाओं कोतैयार किया कि गांव में शराब की क्रय-विक्रय को बंद किया जाए, शुरू में इस काम में थोड़ी मुश्किल ज़रूर आई, लेकिन अब स्थिति बहुत बेहतर है”। अपनी मुहिम के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “शुरुआत में, हमने यहाँ की महिलाओं को समूह से जोड़ने के लिए, उनके घर गए और साथ बैठ कर समस्या का समाधान करने की कोशिश की, लेकिन हताश औरमार खाने की आदी हो चुकी अधिकांश महिलाओं ने यही उत्तर दिया कि “हम क्या कर सकते हैं?” लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और धीरे धीरे दस महिलाओं का एक स्वयं सहायता समूह (एस.एच.जी) बनाया, जिन्होंनेशराब की भट्ठी चलाने वालों का विरोध शुरू कर दिया, देखते ही देखते और भी महिलाएं समूह का हिस्सा बनने लगीं, तो समूह को बड़ा करते हुए इसका नाम “नारी शक्ति संघ” कर दिया गया”। “नारी शक्ति संघ” की अध्यक्षा हमादरी धरवा अपनी पंचायत की उप सरपंच भी हैं, जबकि सचिव परीमोदोनिय नायक हैं। एक अन्य सदस्य अपना परिचय कराते हुए कहती है कि “मेरा नाम पुष्पलता नायक है, गांव केअन्य पुरुषों की तरह मेरा पति भी शराब पीता था, जिस के कारण हमारे घरेलू हालात बद से बदतर हो गए थे। यही हाल गांव की अन्य महिलाओं के घरों का भी था, इसलिए सभी ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया किइसके ज़िम्मेदार शराब की भट्ठी को बंद करवाना होगा। इस निर्णय को बदलने के लिए हमारे पतियों ने हमपर काफी दबाब बनाया यहां तक कि हमारे साथ मारपीट भी की, वहीं दूसरी ओर हमारे आंदोलन को ख़त्म करनेके लिए शराब भट्टी के मालिकों ने कई तरह के प्रलोभन और धमकियां भी दीं, लेकिन आखिरकार हमारे अटल इरादे के आगे उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा। गांव में शराबबंदी को सख्ती से लागू  समूह ने यह फैसला भी लिया कि यदि गांव में कोई भी पुरुष या महिला शराब पीकर गाली गलौज करेगा तो उस पर पहली बार एक हजार रूपए का जुर्माना लगाया जाएगा। अगरदूसरी बार भी पकड़ा गया तो जुर्माने की राशि बढ़ कर दो हजार हो जाएगी। ऐसे ही शराब की भट्टी वालों के लिए भी एक कानून बनाया कि अगर गांव में शराब बनाते हुए पकड़े गए तो पहली बार पांच हज़ार का जुर्मानादेना होगा और यदि दूसरी बार भी पकड़े जाते हैं, तो दंड की राशि दोगुनी हो जाएगी। हमारे इस फैसले का गांव में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला। शराबबंदी से एक तरफ जहां गांव के लोगों के जीवन स्तर में सुधारआया है वहीँ दूसरी ओर उनके घर की आमदनी भी बढ़ी है। अब बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी बल दिया जा रहा है। लरियापली जैसे हजारों गाँव में लाखों बच्चे न जाने कैसे कैसे सपनों को अपनी आँखों में सजाते होंगे। लेकिन क्या हर बच्चे अपने सपनों को सुकांति की तरह पूरा कर पाते है? यह वह प्रश्न है जो हर शराबी को कम सेकम एक बार अपने हाथ में शराब की बोतल पकड़ने से पहले अवश्य करना चाहिए, आप का यह प्रश्न और उत्तर लाखों बच्चों की ज़िंदगी बदल देगा।

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चिंतन समाज

 भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का गिरता स्तर

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देवेंद्रराज सुथार किसी भी देश में स्वास्थ्य का अधिकार जनता का सबसे पहला बुनियादी अधिकार होता हैं। लेकिन भारत में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में रोज़ाना हजारों लोग अपनी जान गंवा देते हैं। भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे हैं। इसका खुलासा […]

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