समाज जीवन जीने की कला है योग June 16, 2018 / June 16, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डॉ नीलम महेन्द्र योग के विषय में कोई भी बात करने से पहले जान लेना आवश्यक है कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आदि काल में इसकी रचना, और वर्तमान समय में इसका ज्ञान एवं इसका प्रसार स्वहित से अधिक सर्व अर्थात सभी के हित को ध्यान में रखकर किया जाता रहा है।अगर […] Read more » Featured कार्य और विचार जीवन जीने की कला है योग जोश और उत्साह तथा मनुष्य मन संयम और संतुष्टि स्फूर्ति स्वास्थ्य
समाज बुखारी और दानव अधिकार आयोग June 16, 2018 / June 16, 2018 by डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Leave a Comment डॉ. वेदप्रताप वैदिक कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की निर्मम हत्या का अर्थ क्या है ? यह हत्या उस समय की गई है जबकि रमजान का पवित्र त्यौहार चल रहा है। ईद आने को है। क्या इस हत्या को इस्लामी कहा जा सकता है ? क्या यह इस्लाम का सम्मान है ? या अपमान […] Read more » ‘सशस्त्र समूह Featured ईद कश्मीरियत जायद राद अल-हुसैन दानव अधिकार आयोग बुखारी और संयुक्त राष्ट्रसंघ
समाज ‘संतान के लिए सुरक्षा-कवच है पिता’ June 15, 2018 / June 15, 2018 by डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र | Leave a Comment डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र ‘पिता’ शब्द् संतान के लिए सुरक्षा-कवच है। पिता एक छत है, जिसके आश्रय में संतान विपत्ति के झंझावातों से स्वयं को सुरक्षित पाती है। पिता संतान के जन्म का कारण तो है ही, साथ ही उसके पालन-पोषण और संरक्षण का भी पर्याय है। पिता आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति की गारंटी है। पिता शिशु […] Read more » ‘नचिकेता’ ‘भीष्म’ ‘श्रवणकुमार’ ‘संतान के लिए सुरक्षा-कवच है पिता’ Featured बागवान’ राम वृद्धाश्रमों संतान सहृदय-संवेदनशील
समाज भीड़तंत्र का हत्यारा बन जाने का दर्द June 14, 2018 / June 14, 2018 by ललित गर्ग | Leave a Comment ललित गर्ग महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के चंदगांव में सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे फर्जी मेसेज पर यकीन करके भीड़ द्वारा दो लोगों को पीट-पीट के हत्या कर दिये जाने का मामला सामने आया है। इससे पहले असम के कार्बी आंग्लोंग जिले में भीड़ ने बच्चा चोरी के संदेह में पेशे से साउंड इंजीनियर […] Read more » Featured आग्रही पकड़ गौमांस खाने भीड़तंत्र का हत्यारा बन जाने का दर्द भीड़तंत्र हिंसक मुसलमान विचारधारा स्वार्थी सोच ने हत्याकांड देश
समाज “करके देखो अच्छा लगता है! June 14, 2018 / June 14, 2018 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment लायन विकास मित्तल दोस्तों विश्व रक्तदाता दिवस प्रतिवर्ष. 10 जून को मनाया जाता है। क्या आप रक्तदान करते है ??? क्या कहा नही ?? ये तो गलत बात है विश्व रक्तदान दिवस मनाने में मजा तभी आयेगा जब सभी लोग 90 दिन के बाद खुद रक्तदान करने के लिए ब्लड बैंक पहुचें।अभी भी जागरुकता की […] Read more » "करके देखो अच्छा लगता है! Featured कैंसर मधुमेह रक्तग्रुप 'AB रक्तदान समाज हृदय रोग
समाज भय्यू महाराज: मध्यान्ह में सूर्यास्त June 14, 2018 / June 14, 2018 by डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Leave a Comment डॉ. वेदप्रताप वैदिक इंदौर के मेरे भक्त और प्रेमी उदय देशमुख, जिन्हें लोग भय्यू महाराज के नाम से जानते हैं, उनके निधन की खबर सुनकर मैं सन्न रह गया। अभी कुछ दिन पहले बैतूल (मप्र) के एक पुस्तक-विमोचन कार्यक्रम में वे मेरे साथ रहनेवाले थे। बहन उमा भारती तो पहुंचीं लेकिन वे नहीं आए। हम […] Read more » Featured उमा भारती गुजरात और मध्यप्रदेश भय्यू महाराज: मध्यान्ह में सूर्यास्त महाराष्ट्र मेधावी और साहसी संतों
राजनीति समाज भारत में ब्लड बैंक सिस्टम सुधारने की आवश्यकता June 14, 2018 / June 14, 2018 by देवेंद्रराज सुथार | Leave a Comment देवेंद्रराज सुथार रक्तदान जिंदगी, से जूझ रहे लोगों को नया जीवन प्रदान करता हैं। इसलिए रक्तदान को महानदान व जीवनदान कहा गया है। रक्तदान के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने व रक्त की ज़रूरत पड़ने पर उसके लिए पैसे देने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए जैसे उद्देश्यों को ध्यान में रखकर विश्व स्वास्थ्य संगठन […] Read more » Featured आंध्र प्रदेश पश्चिम बंगाल भारत में ब्लड बैंक सिस्टम सुधारने की आवश्यकता मध्यप्रदेश महाराष्ट्र रक्तदान जिंदगी हिमाचल प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह
राजनीति समाज “इफ़्तारनामा” : ज़रूरत, धर्म के मर्म को समझने की June 11, 2018 / June 11, 2018 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तनवीर जाफ़री ‘इफ़्तार’ उस प्रक्रिया का नाम है जो मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा माह-ए-रमज़ान में रखे जाने वाले रोज़े के समापन के समय अमल में लाई जाती है। सीधे शब्दों में रोज़ा अथवा व्रत खोलने को इफ़्तार कहा जाता है। भारतवर्ष चूंकि एक धर्मनिरपेक्ष देश है इसलिए यहां मुसलमानों द्वारा कठिन से कठिन […] Read more » "इफ़्तारनामा" : ज़रूरत Featured अतार्किक अधार्मिक व अमानवीय क़िस्म इफ़्तार पार्टियां धर्म के मर्म को समझने की बेबुनियाद मुख्यमंत्री आवासों राजभवनों विभिन्न राजनैतिक दलों सरकारी व ग़ैर सरकारी कार्यालयों
समाज विकास हो मनुष्यता का, नैतिकता का न कि भौतिकता का June 10, 2018 / June 10, 2022 by अरूण कुमार जैन | Leave a Comment संपूर्ण विश्व में प्रथम विश्व युद्ध के बाद से चहुं ओर विकास-विकास-विकास का डंका बजाया जा रहा है। कुछ देशों ने अपने आप को विकसित मानकर अन्य देशों को विकासशील या अविकसित देशों की श्रेणी में डाल दिया और अपनी विकसित योजनाओं को लेकर, विकास का नारा देकर, पूरे विश्व में इन योजनाओं को थोपने का काम किया है लेकिन किसी कीमत पर यह विषय चिंतनीय और मनन करने योग्य है। इतिहास को उठाकर देखें तो जब भारत विश्व गुरु कहलाता था उस समय की शिक्षा पद्धति, संस्कृति और सभ्यता पूर्णतया नैतिकता पर आधारित होती थी। नैतिकता के पाठ का असर आचरण और व्यवहार में परिलक्षित और सर्वप्रिय होता था परंतु प्रथम विश्व युद्ध के बाद से ही नैतिकता का और चारित्रिक पतन शुरू हो गया क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद जिन लोगों ने उस समय भयावह युद्ध को और युद्ध के पश्चात भयावह मंदी को झेला था उससेे नैतिकता के सब्र के बांध न सिर्फ हिल गये, बल्कि बिखर गये थे। तत्पश्चात मनुष्य को मात्रा एक ऊंची जाति के जानवर की तरह माना जाने लगा जिसमें बड़े-बड़े और ताकतवर लोगों का कमजोर लोगों और निम्न दर्जे के लोगों को दबाने की प्रवृत्ति हावी होने लगी। इसी बीच इस विकासवाद के बहाने लोगों पर अपना वर्चस्व जमाकर एवं दिखाकर अपने प्रभाव में लेने का सिलसिला शुरू हो गया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया में हालात इतने खराब हुए कि अधिकतर लोग ऊसूल और नैतिक सिद्धांतों को ताक पर रख सुख-सुविधा-विलास के पीछे भागने लगे और उन पर अमीर बनने का जुनून सवार हुआ और यहीं से विकासवाद का परचम फहराने की और नैतिकता के पतन की शुरुआत हो गयी। भारतीय सभ्यता व संस्कृति में नैतिकता को शुरू से ही ऊच्च स्थान दिया गया है। नैतिकता हमें हर कदम पर सही-गलत के ज्ञान का आभास कराती है। नैतिकता के अभाव में व्यक्ति और समाज असंतोष, अलगाववाद, उपद्रव, आंदोलन, असमानता, असामंजस्य, अराजकता, आदर्शविहीन, अन्याय, अत्याचार, अपमान, असफलता अवसाद, अस्थिरता, अनिश्चितता, संघर्ष, हिंसा आदि में घिरकर और फंस कर रह जाता है। इसके मूल कारण में देखें तो व्यक्ति और समाज सांप्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्राीयतावाद और हिंसा की संकीर्ण भावनाओं व समस्याओं में उलझ कर रह जाता है। हालांकि, उसी समाज में विभिन्न कालों, विभिन्न परिस्थितियों और विभिन्न वातावरण में नैतिकता भी बदल जाती है और समयानुसार सुधार भी हो जाता है। समाजिक दृष्टिकोण से नैतिकता ही धर्म की आचार संहिता है; वहीं धर्म जिसको सृष्टि रचयिता द्वारा ब्रह्मांड के प्रत्येक कण-कण में निर्धारित किया हुआ है। नैतिकता के मानदंडों से ही कानून जैसी व्यवस्था की उत्पत्ति हुई है और आज विकासवाद के नाम पर व्यक्ति कानून को तोड़-मरोड़ कर इस्तेमाल कर नैतिकता को ताक पर रख भौतिकतावादी मानसिकता को मन में संजोये हुए, उचित-अनुचित का आंकलन किये बगैर अपने आप को विकसित कहलवा रहा है मगर हकीकत में पतन की ओर जा रहा है। धर्म मनुष्य को नैतिकता के माध्यम से समस्त प्राणियों से आचरण और व्यवहार, उचित-अनुचित का ज्ञान, कर्तव्य बोध, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति दायित्व और अधिकार इत्यादि को नियम श्रृंखला में बांधकर मनुष्य को मानव बनने पर मजबूर करता है। मनुष्य की आत्मा में समस्त ज्ञान चाहे वह भौतिक हो, नैतिक हो या आध्यात्मिक हो विराजित रहता है। मात्रा हमें उस आवरण को अनावरित करना है जिसको मनुष्य मनोचित आचरण करते हुए मनुष्य से मानव की ओर बनकर विकास यात्रा को शुरू करता है। नैतिकता की विशेषताः- थ् नैतिक शिक्षा ही मनुष्य को मानव बनाती है। थ् नैतिकता व्यक्ति के अन्तःकरण की आवाज है। यह सामाजिक व्यवहार का उचित प्रतिमान है। थ् नैतिकता के साथ समाज की शक्ति जुड़ी होती है। थ् नैतिकता तर्क पर आधारित है। नैतिकता का संबंध किसी अदृश्य पारलौकिक शक्ति से नहीं होता। थ् नैतिकता परिवर्तनशील है। इसके नियम देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। थ् नैतिकता का संबंध समाज से है। समाज जिसे ठीक मानता है वही नैतिक है। थ् नैतिक मूल्यों का पालन व्यक्ति स्वेच्छा से करता है। किसी ईश्वरीय शक्ति के भय से नहीं। थ् नैतिकता व्यक्ति के कर्तव्य और आचरण से जुड़ी है। थ् […] Read more » Evolution Be of Humanityof EthicsNot of Materiality विकास हो मनुष्यता का
समाज एक बिहारी- सब पर भारी: कल्पना कुमारी June 8, 2018 / June 8, 2018 by निर्मल रानी | Leave a Comment हमारे देश में महिलाओं को लेकर समाज में पाया जाने वाला दोहरापन किसी से छुपा नहीं है। यह वही भारत महान है जहां कन्याओं की पूजा का प्रदर्शन किया जाता है,अनेक देवियों की पूजा होती है,उनके नाम पर कई व्रत रखे जाते हैं और अक्सर लोग ‘जय माता दी’ के उद्घोष करते हुए भी सुनाई […] Read more » Featured एक बिहारी- देश भ्रष्टाचार महिलाओं राजनैतिक समीकरण सब पर भारी: कल्पना कुमारी समाज
समाज प्रकृति की रक्षा कैसे करें ? June 6, 2018 / June 6, 2018 by डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Leave a Comment डॉ. वेदप्रताप वैदिक आज विश्व-पर्यावरण दिवस है। आज का विश्व किसका बनाया हुआ है ? अमेरिका का। एक भौतिकवादी ओर उपभोगवादी अमेरिका का ! वह भारत को क्या सिखाएगा, पर्यावरण की रक्षा ! उस भारत को, जिसमें बच्चों को सिखाया जाता है कि सूर्यास्त के बाद फूल मत तोड़ लेना, क्योंकि पौधे मनुष्यों की तरह […] Read more » Featured अमेरिका कोयले पर्यावरण दिवस पेट्रोल पौधे मनुष्यों प्रकृति की रक्षा कैसे करें ? प्लास्टिक भौतिकवादी ओर उपभोगवादी
समाज भारतीय संस्कृति में पर्यावरण का महत्व June 6, 2018 / June 6, 2018 by डॉ. सौरभ मालवीय | Leave a Comment डॉ. सौरभ मालवीय भारतीय संस्कृति में प्रकृति को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसी कारण भारत में प्रकृति के विभिन्न अंगों को देवता तुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। भूमि को माता माना जाता है। आकाश को भी उच्च स्थान प्राप्त है। वृक्षों की पूजा की जाती है। पीपल को पूजा जाता है। पंचवटी […] Read more » Featured पर्यावरण का महत्व पृथ्वी ब्रम्हा भगवान विष्णु भारतीय संस्कृति मनुष्य प्राकृतिक