आलोचना लेख समाज पुरूष भी होते है पत्नियो द्वारा प्रताड़ित March 24, 2011 / December 14, 2011 by शादाब जाफर 'शादाब' | 7 Comments on पुरूष भी होते है पत्नियो द्वारा प्रताड़ित पति और सास ने बेचारी पूनम का रोज रोज के लडाई झगडे मारपीट से जीना दुश्वार कर रखा है। ये शब्द हमे हर रोज रोज कही न कही सुनने को जरूर मिलते है। पर कही ये सुनने को नही मिलता कि पूनम ने अपने पति और सास का जीना दुश्वार कर रखा है क्यो ? […] Read more »
समाज ईंट भट्ठों की तपिश में मजबूर होते मजदूर March 11, 2011 / December 15, 2011 by विकास कुमार | 5 Comments on ईंट भट्ठों की तपिश में मजबूर होते मजदूर उत्तर भारत(खासकर) बिहार और उत्तर प्रदेश में ग्रामीण इलाक़ों का दायरा काफ़ी विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है। इन क्षेत्रों में बड़ी-बड़ी कंपनियों तथा कारखानों का अभाव बना रहता है। ऐसे में कुछ पूंजीपति लोगों द्वारा छोटे-मोटे कारखाने या फिर निजी व्यवसाय ही वहाँ के मजदूरों के लिए जीविका का साधन होता है। इस क्रम […] Read more » Laborer मजदूर
समाज कोई साथ, कोई दूर ! March 7, 2011 / December 15, 2011 by संजय सक्सेना | 2 Comments on कोई साथ, कोई दूर ! ‘एक अच्छा इंसान ही एक अच्छा नेता बन सकता है।’ यह एक सोच है। इस सोच को आसानी से झुठलाया नहीं कहा जा सकता। हिन्दुस्तान की राजनीति का इतिहास उठा कर देखा जाए तो इसकी बानगी सहज ही देखने को मिल जाएंगी।देश में कई ऐसा नेता और महापुरूष हुए जिन्होंने अपनी विचारधारा से कभी समझौता […] Read more » social
समाज मानव मात्र को बांटने की नायाब कोशिश March 4, 2011 / December 15, 2011 by इफ्तेख़ार अहमद | Leave a Comment मो. इफ्तेख़ार अहमद, यूरोपियन अब तक अपने आपको दुनिया के सबसे स्मार्ट, सभ्य और दुनियाभर को सभ्य बनाने का ठेकेदार मानते रहे हैं। इनके इस सिध्दांत को दुनियाभर से चुनौती मिली। 21वीं सदी में एशिया के उभार ने तो इसे पूरी तरह ख्वारिज कर दिया। अब ये जग जाहिर हो चुका है कि 21वीं सदी […] Read more » social सामाजिक
समाज वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता के खतरे February 27, 2011 / December 15, 2011 by संजय द्विवेदी | 10 Comments on वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता के खतरे स्त्री को बाजार में उतारने की नहीं उसकी गरिमा बचाने की जरूरत -संजय द्विवेदी कांग्रेस की सांसद प्रिया दत्त ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जाहिर तौर पर उनका विचार बहुत ही संवेदना से उपजा हुआ है। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि “मेरा मानना है कि वेश्यावृत्ति को […] Read more » Prostitution वेश्यावृत्ति
समाज बेहया और बदमिजाज पीढ़ी (Generation Next.???) February 16, 2011 / December 15, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on बेहया और बदमिजाज पीढ़ी (Generation Next.???) अमित तिवारी अचानक से मन थोडा व्यथित हो गया. एक खबर मिली कि एक लड़के ने दो हत्याएं महज इसलिए कर दी कि लड़की ने उसके प्रेम को अस्वीकार कर दिया था. लड़की के अस्वीकार से क्षुब्ध हुआ वह सीधे उसके ऑफिस पहुँच गया, जहाँ बीच-बचाव की कोशिश करते एक लड़का भी मारा गया और […] Read more » Youth Generation युवा पीढ़ी
धर्म-अध्यात्म समाज धर्म और समाज में तालमेल जरूरी February 1, 2011 / December 15, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment विमल कुमार सिंह पूर्ण मानव समाज, चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में रहता हो, किसी न किसी धार्मिक विश्वास या मान्यता से अवश्य जुड़ा रहा है। यद्यपि कुछ लोग ऐसे भी रहे हैं जो धार्मिक विश्वास के सभी रूपों को नकारने में लगे रहे, परंतु इतिहास के पन्ने पलटने पर हमें ज्ञात होता […] Read more » harmony in society धर्म धर्म और समाज में तालमेल समाज में तालमेल
समाज बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है क्रिसमस January 6, 2011 / December 16, 2011 by सरफराज़ ख़ान | Leave a Comment क्रिसमस ईसाइयों का प्रमुख त्यौहार है. यह पर्व ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. इसे बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है. ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों के मेल से बना है, जो मध्य काल […] Read more » Christmas क्रिसमस
विविधा समाज मुंशी राम से स्वामी बने श्रद्धानन्द December 22, 2010 / December 18, 2011 by विनोद बंसल | Leave a Comment – विनोद बंसल काशी विश्व नाथ मंदिर के कपाट सिर्फ़ रीवाँ की रानी हेतु खोल कर, साधारण जनता के लिए बन्द किए जाने तथा एक कैथोलिक पादरी के व्यभिचार का दृश्य देख मुंशी राम का धर्म से विश्वास उठ गया और वे बुरी संगत में पड़ गए। किन्तु, स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ बरेली में […] Read more » Swamy Shradhanand स्वामी श्रद्धानंद
समाज आदिवासियों में जेण्डर समानता का मिथ December 18, 2010 / December 18, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment जगदीश्वर चतुर्वेदी आदिवासियों के बारे में यह मिथ प्रचलित है कि उनमें स्त्री-पुरूष का भेद नहीं होता। यह धारणा बुनियादी तौर पर गलत है। आदिवासियों के परंपरागत नियम-कानून के मुताबिक स्त्री का दर्जा पुरूष से नीचे है। वह पुरूष की मातहत है। जिन आदिवासी इलाकों में जमीन के सामूहिक स्वामित्व की जगह जमीन के व्यक्तिगत […] Read more » Aboriginal आदिवासी
विविधा समाज देहव्यापार के बदलते स्वरुप और बिलखती घुंघरू December 13, 2010 / December 18, 2011 by अनिल अनूप | 6 Comments on देहव्यापार के बदलते स्वरुप और बिलखती घुंघरू अनिल अनूप महानगरीय संस्कृति एवं ग्लैमर ने आज देह व्यापार के मायने ही बदल दिए हैं. काफी हाई टेक हो गया है यह व्यापार, देश में आज कुल ग्यारह सौ सत्तर रेड लाइट एरिया हैं. इसमें ब्यापारिक दृष्टिकोण से सबसे ज्यादा धंधा वाला एरिया है कोलकता और मुंबई . कडोडो रूपये का साप्ताहिक आंकडा है […] Read more » Body Profession देहव्यापार
समाज आदिवासी जीवन में परिवर्तन का विरोध क्यों ? December 10, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on आदिवासी जीवन में परिवर्तन का विरोध क्यों ? -जगदीश्वर चतुर्वेदी आदिवासियों के जब भी सवाल उठते हैं तो एक सवाल मन में आता है कि क्या आदिवासी अपरिवर्तनीय हैं ? क्या वे जैसे रहते आए हैं उन्हें वैसे ही रहने दिया जाए ? भारत में पूंजीवादी परिवर्तनों का आदिवासियों पर क्या असर हुआ है ? भारत में 400 आदिवासी समुदाय रहते हैं। जिन्हें […] Read more » Aboriginal आदिवासी