लेख विविधा सर्व प्रथम, यह पाखण्ड नहीं है. October 27, 2015 / October 28, 2015 by आर. सिंह | 16 Comments on सर्व प्रथम, यह पाखण्ड नहीं है. संगोष्ठी (सम्मान वापसी -प्रतिरोध या पाखंड?) सर्व प्रथम, यह पाखण्ड नहीं है. आज यह प्रश्न उठ रहा है या उठाया जा रहा है कि अवार्ड इस समय ही क्यों लौटाए जा रहे हैं,पहले क्यों नहीं?आम लोगों को यह प्रश्न स्वाभाविक लग रहा है,पर मेरे विचार से यह प्रश्न एक सिरे से अस्वाभाविक है.यह प्रश्न उन […] Read more » Featured यह पाखण्ड नहीं है.
लेख विविधा लेखक के विरोध का तरीका केवल लेखन है October 27, 2015 / October 28, 2015 by राजीव रंजन प्रसाद | Leave a Comment राजीव रंजन प्रसाद व्यवस्था के विरुद्ध सभी लड़ाईयों में जो सर्वाधिक कारगर हथियार सिद्ध होता रहा है वह है – कलम। सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन हों अथवा साम्प्रदायिक असहिष्णुताओं को समरसताओं में कायांतरित किये जाने के प्रयास, यह अब तक लेखकों के कंधों का दायित्व रहा है। व्यवस्था कोई भी हो और सरकारें कैसी भी हों, लेखन […] Read more » Featured लेखक के विरोध का तरीका
विधि-कानून विविधा न्यायपालिका की तानाशाही October 27, 2015 / October 28, 2015 by वीरेंदर परिहार | Leave a Comment वीरेन्द्र सिंह परिहार लंबी सुनवाई के बाद आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने मोदी सरकार के ‘‘न्यायिक नियुक्ति आयोग’’ को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कहा गया कि संविधान द्वारा न्यायपालिका को स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है और एनजेएसी एक्ट से इस अधिकार मे […] Read more » Featured न्यायपालिका की तानाशाही
विधि-कानून विविधा सामाजिक न्याय और न्यायपालिका की भूमिका October 27, 2015 / October 28, 2015 by शैलेन्द्र चौहान | Leave a Comment शैलेन्द्र चौहान इतिहास गवाह है कि अनेकों शताब्दियां बीत गईं लेकिन मानव सामाजिक न्याय को प्राप्त करने भटकता रहा है और इसी कारण दुनिया में कई युद्ध, क्रांति, बगावत, विद्रोह, हुये हैं जिसके कारण अनेक बार सत्ता परिवर्तन हुए हैं। अगर भारत की बात की जाये तो हमारा भारतीय समाज पहले वर्ण व्यवस्था आधारित था […] Read more » Featured न्यायपालिका की भूमिका सामाजिक न्याय
खेत-खलिहान विविधा दाल: जमाखोरों पर नकेल के सार्थक परिणाम October 26, 2015 by प्रमोद भार्गव | 1 Comment on दाल: जमाखोरों पर नकेल के सार्थक परिणाम प्रमोद भार्गव दाल के जमाखोरों और कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ छापा डालकर नकेल कसने की कार्यवाही से जो सार्थक परिणाम निकले हैं, उससे साफ है कि बाजार में महंगी होती दालों का कारण उपज की कमी से नहीं थी। क्योंकि पांच हजार टन दालें आयात कर लिये जाने के बावजूद कीमतें घट नहीं रहीं […] Read more » Featured जमाखोरों पर नकेल के सार्थक परिणाम दाल
कला-संस्कृति विविधा गोरक्षा-आन्दोलन और गोपालन का महत्व October 26, 2015 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment आर्य विद्वान और नेता लौह पुरूष पं. नरेन्द्र जी, हैदराबाद की आत्मकथा ‘जीवन की धूप-छांव’ से गोरक्षा आन्दोलन विषयक उनका एक संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं कि ‘सन् 1966 ईस्वी में पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य के नेतृत्व में गोरक्षा आन्दोलन चलाया गया था। पांच लाख हिन्दुओं का एक ऐतिहासिक जुलूस लोकसभा तक […] Read more » Featured गोपालन का महत्व गोरक्षा-आन्दोलन
विविधा संस्कृति है चक्रीय हिण्डोला और भाषा उसकी धुरी: October 26, 2015 by डॉ. मधुसूदन | 15 Comments on संस्कृति है चक्रीय हिण्डोला और भाषा उसकी धुरी: डॉ. मधुसूदन प्रवेश: (अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर विचार) ॐ —संस्कृति, एक मण्डलाकार (मेरी गो राउण्ड) हिण्डोला, भाषा है उसकी धुरी। ॐ—सांस्कृति हिण्डोले की प्रेरणा कौनसी है ? ॐ—विविध परम्पराओंका योगदान: ॐ—पुरातन, अद्यतन, नित्य नूतन वही सनातन: ॐ—सत्य की उपलब्धि वैयक्तिक: ॐ— पराकोटि की प्रेरणा होती है : (एक) संस्कृतिः एक मण्डलाकार हिण्डोला, और […] Read more » Featured भाषा उसकी धुरी: संस्कृति है चक्रीय हिण्डोला
विविधा रेल नीरःबोतलबंद पानी का खेल October 24, 2015 by प्रमोद भार्गव | 3 Comments on रेल नीरःबोतलबंद पानी का खेल प्रमोद भार्गव देश की महत्वपूर्ण रेलों में ‘रेल नीर‘ आपूर्ति से जुटे भ्रष्टाचार के संबंध में सीबीआई द्वारा की गई छापेमारी के दौरान घोटाले में भी घोटाला सामने आया है। इस मामले में बरामद की गई 27 करोड़ की नगद धनराशि में 4 लाख रुपए के नोट जाली मिले हैं। इस मामले में सीबीआई ने […] Read more » Featured बोतलबंद पानी का खेल रेल नीर
विविधा प्रतिस्पर्धा उग्रता दर्शाने की? October 24, 2015 by निर्मल रानी | Leave a Comment निर्मल रानी हमारे देश के संविधान निर्माताओं द्वारा यहां का संविधान तथा क़ानून हालांकि ऐसा बनाया गया है जिसमें सभी धर्मों,जातियों,वर्गों तथा सभी क्षेत्रों के लोगों को समान अधिकार दिए गए हैं। इस संविधान में किसी एक वर्ग विशेष व धर्म विशेष या क्षेत्र विशेष के लोगों को किसी भी विषय पर उग्रता दिखाने की […] Read more » Featured प्रतिस्पर्धा उग्रता दर्शाने की?
जन-जागरण विविधा बारुद के ढेर पर बैठा हुआ देश October 23, 2015 / October 23, 2015 by डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Leave a Comment डॉ. वेदप्रताप वैदिक क्या स्वतंत्र भारत में कभी ऐसा हुआ है कि किसी राष्ट्रपति को दो हफ्तों में तीन बार अपील करनी पड़े? राष्ट्रपति को बार−बार क्यों कहना पड़ रहा है कि लोग सद्भाव और सहनशीलता का वातावरण बनाए रखें? प्रधानमंत्री ने दबी जुबान से वही बात दोहराई, जो राष्ट्रपति ने कही। दोनों की अपीलों […] Read more » Featured बारुद के ढेर पर बैठा हुआ देश
विविधा क्या आप वाकई साहित्कार है? October 23, 2015 by डा. अरविन्द कुमार सिंह | 5 Comments on क्या आप वाकई साहित्कार है? डा. अरविन्द कुमार सिंह क्षमा कीजिएगा मैं कोई साहित्यकार नही हूॅ। पेशे से एक अध्यापक हूॅ। चरित्र से राष्ट्रवादी हूॅ। विचारों में अपना देश बसता है और अपने देश के लिये चरित्रवान नौजवानों को गढने का कार्य करता हूॅ। मेरे अल्फाजों से यदि किसी को चोट लगे तो क्षमा चाहूॅगा क्योकि सच झूठ की तरह […] Read more » Featured क्या आप वाकई साहित्कार है?
खेत-खलिहान विविधा दाल की महंगाई में फंसी केंद्र सरकार October 23, 2015 by पियूष द्विवेदी 'भारत' | Leave a Comment पीयूष द्विवेदी कहावत है कि घर की मुर्गी दाल बराबर; लेकिन इन दिनों दाल की कीमतें जिस तरह से आसमान छू रही हैं, उसने इस कहावत को मजाक बना दिया है। आलम यह है कि अब दाल मुर्गे यानी नॉन वेज से ज्यादा महँगी हो गयी है। मुर्गा जहाँ १५० से १८० रूपये किग्रा के […] Read more » Featured केंद्र सरकार दाल की महंगाई दाल की महंगाई में फंसी केंद्र सरकार