समाज, प्रकृति और विज्ञान
Updated: September 18, 2017
समाज का प्रकृति एजेण्डा जगाती एक पुस्तक समीक्षक: अरुण तिवारी पुस्तक का नाम: समाज, प्रकृति और विज्ञान लेखक: श्री विजयदत्त श्रीधर, श्री राजेन्द्र हरदेनिया,…
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कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ !
Updated: September 18, 2017
कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ, कुहक ले चल पड़ो कृष्ण चाहे; कृपा पा जाओगे राह आए, कुटिल भागेंगे भक्ति रस पाए ! भयंकर रूप…
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परबुद्ध सम्मेलन
Updated: September 18, 2017
मैं दोपहर बाद की चाय जरा फुरसत से पीता हूं। कल जब मैंने यह नेक काम शुरू किया ही था कि शर्मा जी का फोन…
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विकृत मानसिकता और कांग्रेस के नेता
Updated: September 18, 2017
सुरेश हिन्दुस्थानी भारतीय संस्कृति से साक्षात्कार करने वाला व्यक्ति कभी अपशब्द नहीं बोल सकता, जो अपशब्द बोलता है, वह भारतीय संस्कृति का संवाहक हो ही…
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हिंदी पर राष्ट्रपति का नया संदेश
Updated: September 18, 2017
डाॅ. वेदप्रताप वैदिक हिंदी दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जो संदेश दिया है, यह मुझे ऐसा लगा, जैसे कि मैं ही बोल…
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भारत में न्यायिक प्रणाली, समस्याएं और सुधार
Updated: September 18, 2017
एडवोकेट डा. राधेश्याम द्विवेदी लोकतांत्रिक भारत सरकार की तीन स्वतंत्र शाखाएं हैं – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका। भारतीय न्यायिक प्रणाली अंग्रेजों ने औपनिवेशिक शासन के…
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विश्वगुरू के रूप में भारत-25
Updated: September 18, 2017
राकेश कुमार आर्य   हमारे प्राचीन ऋषियों ने पशु-पक्षियों की अनेकों प्रेरणास्पद कहानियों का सृजन किया, और उन्हें बच्चों को बताना व पढ़ाना आरंभ…
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हरसिंगार
Updated: September 18, 2017
हरसिंगार की ख़ुशबू कितनी ही निराली हो चाहें रात खिले और सुबह झड़ गये बस इतनी ज़िन्दगानी है। जीवन छोटा सा हो या हो लम्बा, ये बात ज़रा बेमानी है, ख़ुशबू बिखेर कर चले गये या घुट घुट के जीलें चाहें जितना। जो देकर ही कुछ चले गये उनकी ही बनती कहानी है। प्राजक्ता कहलो या पारितोष कहो केसरिया डंडी श्वेत फूल की चादर बिछी पेड़ के नीचे वर्षा रितु कीबिदाई है शरद रितु की अगवानी है। अब शाम सुबह सुहानी हैं।
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मैं भी तो आगे बढ़ नहीं पायी
Updated: September 18, 2017
जब गुजरती हूँ उन राहों से, मेरी तेज धड़कने आज भी तेरे होने का एहसास करा जाती है । जब गुज़रती हूँ उन…
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देश पर कम होता ऋण भार
Updated: September 17, 2017
डॉ. मयंक चतुर्वेदी ऋण को विकास के लिए जितना अधिक अपरिहार्य माना गया है, उतना ही लगातार इससे डूबे रहने को जनमानस में घोर विपत्तिकारक स्वीकार्य…
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क्यों जिन्दगी का सच नहीं ढूंढ़ पाये?
Updated: September 17, 2017
ललित गर्ग जिन्दगी के सवालों से घिरा वक्त जीवन के सच को ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा है। यह कोशिश अतीत से वर्तमान तक होती…
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नरेन्द्र मोदी रूपी युगयात्रा की आवाज को सुनें
Updated: September 16, 2017
नरेन्द्र मोदी के 67वें जन्म दिवस, 17 सितम्बर 2017 के उपलक्ष में -ललित गर्ग – एक दीया लाखों दीयों को उजाला बांट सकता है यदि…
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