पुस्तक समीक्षा समाज, प्रकृति और विज्ञान

समाज, प्रकृति और विज्ञान

समाज का प्रकृति एजेण्डा जगाती एक पुस्तक समीक्षक: अरुण तिवारी   पुस्तक का नाम: समाज, प्रकृति और विज्ञान लेखक: श्री विजयदत्त श्रीधर, श्री राजेन्द्र हरदेनिया,…

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कविता कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ !

कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ !

कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ, कुहक ले चल पड़ो कृष्ण चाहे; कृपा पा जाओगे राह आए, कुटिल भागेंगे भक्ति रस पाए !   भयंकर रूप…

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व्यंग्य    परबुद्ध सम्मेलन 

   परबुद्ध सम्मेलन 

मैं दोपहर बाद की चाय जरा फुरसत से पीता हूं। कल जब मैंने यह नेक काम शुरू किया ही था कि शर्मा जी का फोन…

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राजनीति विकृत मानसिकता और कांग्रेस के नेता

विकृत मानसिकता और कांग्रेस के नेता

सुरेश हिन्दुस्थानी भारतीय संस्कृति से साक्षात्कार करने वाला व्यक्ति कभी अपशब्द नहीं बोल सकता, जो अपशब्द बोलता है, वह भारतीय संस्कृति का संवाहक हो ही…

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विविधा हिंदी पर राष्ट्रपति का नया संदेश

हिंदी पर राष्ट्रपति का नया संदेश

डाॅ. वेदप्रताप वैदिक हिंदी दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जो संदेश दिया है, यह मुझे ऐसा लगा, जैसे कि मैं ही बोल…

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विधि-कानून भारत में न्यायिक प्रणाली, समस्याएं और सुधार 

भारत में न्यायिक प्रणाली, समस्याएं और सुधार 

एडवोकेट डा. राधेश्याम द्विवेदी लोकतांत्रिक भारत सरकार की तीन स्वतंत्र शाखाएं हैं – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका। भारतीय न्यायिक प्रणाली अंग्रेजों ने औपनिवेशिक शासन के…

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विविधा विश्वगुरू के रूप में भारत-25

विश्वगुरू के रूप में भारत-25

राकेश कुमार आर्य   हमारे प्राचीन ऋषियों ने पशु-पक्षियों की अनेकों प्रेरणास्पद कहानियों का सृजन किया, और उन्हें बच्चों को बताना व पढ़ाना आरंभ…

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कविता हरसिंगार

हरसिंगार

हरसिंगार की  ख़ुशबू कितनी ही निराली हो चाहें रात खिले और सुबह झड़ गये बस इतनी ज़िन्दगानी है। जीवन छोटा सा हो या हो लम्बा, ये बात ज़रा बेमानी है, ख़ुशबू बिखेर कर चले गये या घुट घुट के जीलें चाहें जितना। जो देकर ही कुछ चले गये उनकी ही बनती कहानी है। प्राजक्ता कहलो या पारितोष कहो केसरिया डंडी श्वेत फूल की चादर बिछी पेड़ के नीचे वर्षा रितु कीबिदाई  है शरद रितु की अगवानी है। अब शाम सुबह सुहानी हैं।

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कविता मैं भी तो आगे बढ़ नहीं पायी

मैं भी तो आगे बढ़ नहीं पायी

  जब गुजरती हूँ उन राहों से, मेरी तेज धड़कने आज भी तेरे होने का एहसास करा जाती है ।   जब गुज़रती हूँ उन…

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आर्थिकी देश पर कम होता ऋण भार

देश पर कम होता ऋण भार

डॉ. मयंक चतुर्वेदी ऋण को विकास के लिए जितना अधिक अपरिहार्य माना गया है, उतना ही लगातार इससे डूबे रहने को जनमानस में घोर विपत्‍ति‍कारक स्‍वीकार्य…

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समाज क्यों जिन्दगी का सच नहीं ढूंढ़ पाये? 

क्यों जिन्दगी का सच नहीं ढूंढ़ पाये? 

ललित गर्ग जिन्दगी के सवालों से घिरा वक्त जीवन के सच को ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा है। यह कोशिश अतीत से वर्तमान तक होती…

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राजनीति नरेन्द्र मोदी रूपी युगयात्रा की आवाज को सुनें

नरेन्द्र मोदी रूपी युगयात्रा की आवाज को सुनें

नरेन्द्र मोदी के 67वें जन्म दिवस, 17 सितम्बर 2017 के उपलक्ष में -ललित गर्ग – एक दीया लाखों दीयों को उजाला बांट सकता है यदि…

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