जब जयहिंद संदेश तिरंगी बर्फी ने अंग्रेजी सत्ता की नींद उड़ा दी
Updated: January 23, 2026
प्रमोद दीक्षित मलय मिठाई मन मोहती हैं, मुंह में स्वाद घोलती हैं। चाहे बच्चे-बूढ़े हों या तरुण किशोर, प्रौढ़ स्त्री-पुरुष हों या नवजवान। नौकरीपेशा अधिकारी-कर्मचारी…
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आयुर्वेद: प्राचीन चिकित्सा पद्धति का वैश्विक उत्थान
Updated: January 21, 2026
एलोपैथिक दवाओं के साइड इफेक्ट इतने पर ही सीमित नहीं हैं। अब धीरे धीरे यह बात सामने आने लगी है कि लगभग हर अंग्रेजी दवा…
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अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच के विरुद्ध बन रहे नए समीकरण
Updated: January 21, 2026
अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति श्री निकोलस मदुरो को रात्रि के समय में गिरफ्तार कर अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चलाया जाना एवं वेनेजुएला के तेल भंडार पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का कब्जा स्थापित करने का प्रयास करना, अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच को ही दर्शाता है।
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महाराष्ट्र में भाजपा के विकास एवं विश्वास की निर्णायक जीत
Updated: January 21, 2026
-ललित गर्ग-महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न शहरी निकाय चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा, प्रवृत्ति और भविष्य का संकेत देने वाला एक बड़ा जनादेश…
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अशांति के कोलाहल में शांति का शंखनाद है मौन
Updated: January 21, 2026
मौनी अमावस्या- 18 जनवरी, 2026-ललित गर्ग-मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं है, वह आत्मा की सबसे सघन भाषा है। 18 जनवरी 2026 को आने वाली…
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महाराष्ट्र चुनाव ने क्या संदेश दिया है
Updated: January 21, 2026
राजेश कुमार पासी 2014 के बाद से मोदी की राजनीति देश के सिर पर चढ़कर बोल रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में जब भाजपा बहुमत…
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सुभाष चन्द्र बोस : जिनके नाम से अंग्रेजों के हृदय कांपते थे
Updated: January 21, 2026
प्रमोद दीक्षित मलय ब्रिटिश शासन सत्ता की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता की मुक्ति के लिए हुए स्वाधीनता समर की बलिवेदी पर वीर सपूतों ने निज जीवन की आहुति दी है। अपने सुवासित जीवन-पुष्पों की माला से भारत माता का कंठ सुशोभित किया है तो रुधिर से भाल पर अभिषेक भी। उन्हीं जननायकों में से एक महानायक बनकर उभरा जिसे विश्व सुभाष चन्द्र बोस के नाम से जानता है। सुभाष का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में प्रतिष्ठित वकील जानकी नाथ बोस एवं प्रभावती के कुल में हुआ था। 1919 में बी.ए. आनर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। विवेकानन्द साहित्य के अध्ययन ने उनको राष्ट्रीय चेतना से समृद्ध किया और चिंतन-मनन करने की सुदृढ जमीन दी। पुत्र को आईसीएस बनाने की पिता की इच्छा का मान रखते हुए सुभाष 1919 में इंगलैण्ड के लिए रवाना हुए और आईसीएस परीक्षा न केवल उत्तीर्ण की बल्कि चौथा स्थान भी हासिल किया किन्तु हृदय में धधक रही देशप्रेम की ज्वाला के कारण अंग्रेजों की चाकरी को स्वीकार न कर भारत माता की सेवा-साधना का कंटकाकीर्ण पथ अंगीकार किया। फलतः सेवा से त्यागपत्र देकर जून 1921 में भारत वापस आकर कांग्रेस में महात्मा गांधी के सुझाव पर सुभाष जी कलकत्ता जाकर देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करने लगे। चितरंजन दास का उस समय बंगाल में बहुत प्रभाव था और आम जन में उनकी छवि एक उत्कृष्ट नेता की थी। दास ने कांग्रेस के अंदर ही ‘स्वराज्य दल’ बनाकर कलकत्ता महापालिका का चुनाव लड़ा और जीत अर्जित कर महापौर बने। तब उन्होंने सुभाष को महापालिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया। यह सुभाष के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत थी। यहां पर सुभाष ने अपनी कार्यशैली और दूरदृष्टि का परिचय देकर काफी नये और महत्वपूर्ण काम किए जिससे उनकी कार्यशैली और राजनीतिक सोच से सभी परिचित हुए और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। साथ ही उनकी गिनती देश के अग्रणी नेताओं में होने लगी। उनके जीवन में समय पालन, लक्ष्य के प्रति समर्पण और अनुशासन का बहुत प्रभाव रहा जिसकी पृष्ठभूमि में विद्यार्थी जीवन में ही टेरीटोरियल आर्मी में रंगरूट के रूप में प्राप्त सैन्य प्रशिक्षण था। 1929 में कांग्रेस के अधिवेशन में सुभाष खाकी सैन्य गणवेश में उपथित होकर अध्यक्ष मोतीलाल नेहरु को सलामी दी। और आगे चलकर यही सैन्य अनुशासन ‘आजाद हिन्द फौज’ के गठन का दृढ आधार भी बना। 1933 से 1936 तक स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप प्रवास के दौरान आपने इटली के नेता मुसोलिनी और आयरलैण्ड के नेता डी. बलेरा से भेंट-विमर्श कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए सहयोग का वचन लिया। इसी दौरान आस्ट्रिया में निजी टाईपिस्ट एमिली शेंकेल की सेवा, समझ और भारत के प्रति उदात्त सोच से प्रभावित हो सुभाष ने उनसे विवाह कर लिया। वह भारत वापस आये। देश में सुभाष की लोकप्रियता उफान पर थी। 1938 में हरिपुरा में आयोजित कांग्रेस के 51वें अधिवेशन में गांधी जी ने सुभाषबाबू को अध्यक्ष मनोनीत किया और सम्मान में 51 बैलों द्वारा इनके रथ को खींचा गया। उस अवसर पर अध्यक्ष के रूप में दिया गया सुभाष का ओजस्वी भाषण दुनिया के प्रमुख भाषणों में शुमार किया जाता है। अध्यक्षीय कार्यकाल में आपने जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में ‘योजना आयोग’ और विख्यात अभियंता विश्वेश्वरैया के नेतृत्व में ‘विज्ञान परिषद’ बनाई। कांग्रेस में सुभाष के बढ़ते प्रभाव और कार्यकर्ताओं पर मजबूत होती पकड़ से कांग्रेस के अन्दर ही कुछ नेताओं का प्रभामंडल कमजोर होने लगा और वे सुभाष को कमजोर करने की चालें चलने लगें। गांधी जी से भी मतभेद हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि 1939 के त्रिपुरा अधिवेशन में अध्यक्ष के मनोनयन की परम्परा के उलट कांग्रेस को चुनाव करवाना पड़ा। देश और कार्यकर्ताओं की पसंद सुभाष ने गांधी जी के समर्थित प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर दिया। जिस पर गांधी जी की टिप्पणी, ‘‘सीतारमैया की हार मेरी हार है,‘‘ से सुभाष बहुत व्यथित हुए क्योंकि उनके मन में गांधी जी के प्रति असीम आदर भाव था। देश जानता है कि विदेश प्रवास के दौरान सुभाष ने ही अपने एक रेडियो भाषण में गांधी जी को सर्वप्रथम ‘राष्ट्रपिता’ कहकर सम्बोधित किया था लेकिन मतभेद शान्त होने की जगह बढ़ता गया। गांधी जी के कहने पर कार्यकारिणी के 15 पदाधिकारियों में से दो को छोड़कर शेष ने त्यागपत्र दे दिया तो दल की एकता और देश की मजबूती के लिए सुभाष ने विवश होकर अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस के अन्दर ही ‘फारवर्ड ब्लॉक’ बनाकर काम करने लगे लेकिन उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया। अंग्रेजी शासन ने उनको घर पर नजरबन्द कर दिया पर सुभाष तो दूसरी ही मिट्टी के बने थे, उन्हें कैद रखना अंग्रेजों के लिए आसान न था। जनवरी 1941 में अपने घर पर नजरबंदी के दौरान ही ब्रिटिश पुलिस और जासूसों को चकमा देकर एक पठान के रूप में सुभाष निकल भागे और पेशावर, काबुल, मास्कों होते हुए जर्मनी पहुंचे। हिटलर एवं जर्मनी के अन्य नेताओं से भेंट कर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग का वचन प्राप्त किया और वहीं ‘आजाद हिन्द रेडियो’ की स्थापना की। वहां से आप जापान पहुंच कर जनरल तोजो से भेंट की और जापानी संसद को सम्बोधित किया। जापान के सहयोग से रासबिहारी बोस के मार्गदर्शन में ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन कर सिपाहियों और नागरिकों का आह्वान किया कि ‘तुम मूझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’। 5 जुलाई, 1943 को सिंगापुर में टाउन हॉल के सामने आजाद हिन्द फौज के वीर सिपाहियों के सम्मुख ओजस्वी भाषण देते हुए ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया था जिसे प्रत्येक सिपाही ने हृदय से स्वीकार कर बर्मा (अब म्यांमार), कोहिमा, इम्फाल के मोर्चे पर अंग्रेजी सेना से मुकाबला कर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। 21 अक्टूबर, 1943 को सुभाष ने आजाद हिन्दुस्तान की अंतरिम सरकार बनाई जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री का दायित्व स्वयं निर्वहन किया। इस आजाद हिन्द सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैण्ड आदि 9 देशों ने मान्यता प्रदान की थी। और जापान सरकार द्वारा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह सुभाषबाबू की उस अस्थायी सरकार को भेंट किए गये थे जिसे सुभाष ने ‘शहीद’ और ‘स्वराज्य’ नाम दे अमर कर दिया। उस अस्थायी सरकार के गठन के 75 वर्ष पूर्ण होने के सुअवसर पर अक्टूबर 2018 में भारत के प्रधानमंत्री मा0 नरेन्द्र मोदी द्वारा लालकिले पर तिरंगा ध्वज फहराकर उसके महत्व को रेखांकित किया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद सुभाष आजादी की लड़ाई हेतु आवश्यक संसाधन जुटाने हेतु रूस जाने का निश्चय कर 18 अगस्त, 1945 को हवाई जहाज से निकले किन्तु रास्ते में ही वे लापता हो गये। कहा गया कि उनका हवाई जहाज ताईवान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें सुभष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। हालांकि ताईवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया था कि उस दिन ताईवान के आकाश में कोई विमान दुर्घटना ही नहीं हुई। सुभाष जीवित रहे या विमान दुर्घटना का शिकार हुए, यह सत्य तो काल के गर्भ में है पर कोटि-कोटि भारतीयों के हृदय में वह सदा सर्वदा जीवित रहेंगे। भारत माता के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किया गया अनथक अदम्य प्रयास उन्हें चिरकाल तक अमर रखेगा। नेता जी सुभाषचन्द्र बोस की एक भव्य प्रतिमा राजपथ दिल्ली में लगाई गयी है और उनके जन्मदिवस को पराक्रम दिवस के रूप में 2021 से मनाया जा रहा है। प्रमोद दीक्षित ʺमलयʺ
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शांति का मुखौटा, सत्ता की रणनीतिः ट्रंप का वैश्विक विरोधाभास
Updated: January 21, 2026
-ललित गर्ग- नोबेल शांति पुरस्कार की उत्कट अभिलाषा में डूबे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का व्यक्तित्व और कार्यशैली वैश्विक राजनीति के लिए एक गहरी विडंबना…
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बर्फ़ और गर्मी के बीच मुक़ाबला तय: जलवायु संकट के साये में 2026 विंटर ओलंपिक
Updated: January 21, 2026
फ़रवरी 2026 में जब इटली के मिलान और कॉर्टीना द’आम्पेज़ो में विंटर ओलंपिक की शुरुआत होगी, तब खेल सिर्फ एथलीटों के बीच नहीं होगा। मुकाबला…
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