महिला-जगत सम्मान, सुरक्षा और समानता का सवाल

सम्मान, सुरक्षा और समानता का सवाल

भारत में विकास और समानता की चर्चा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक उसमें बालिकाओं की स्थिति का ईमानदार मूल्यांकन न हो। 23 जनवरी को मनाया…

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समाज हनी ट्रैप: भय, बदनामी और अपराध का संगठित जाल

हनी ट्रैप: भय, बदनामी और अपराध का संगठित जाल

पुलिस जांच में सामने आया है कि इस गिरोह में शामिल कुछ महिलाएं योजनाबद्ध ढंग से आम नागरिकों से संपर्क साधती थीं, उनसे दोस्ती और…

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शख्सियत देश के असली हीरो व अजेय योद्धा ‘नेताजी सुभाष बोस’

देश के असली हीरो व अजेय योद्धा ‘नेताजी सुभाष बोस’

डॉ. पवन सिंह ‘बिना कीमत चुकाए कुछ हासिल नहीं होता और आज़ादी की कीमत है शहादत’ आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों को इस आह्वान के…

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लेख लोकतंत्र की असली ताकत: जागरूक मतदाता

लोकतंत्र की असली ताकत: जागरूक मतदाता

राष्ट्रीय मतदाता दिवस

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राजनीति मालेगांव : जनसांख्यिकीय  घनत्व बिगड़ने की कथित धर्मनिरपेक्ष दलों को चेतावनी

मालेगांव : जनसांख्यिकीय  घनत्व बिगड़ने की कथित धर्मनिरपेक्ष दलों को चेतावनी

पिछले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र के नासिक जिले के नगर मालेगांव में वोट जिहाद होने का आरोप लगाया था,वह…

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कला-संस्कृति श्रीराम मंदिर: युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय

श्रीराम मंदिर: युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय

– डॉ. लोकेन्द्र सिंह भारत के युवाओं को लेकर देश में अलग-अलग ढंग से विमर्श चल रहे हैं। कुछ ताकतें चाहती हैं कि भारत का युवा अपनी…

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आर्थिकी वैश्विक स्तर पर युद्ध के बदलते स्वरूप 

वैश्विक स्तर पर युद्ध के बदलते स्वरूप 

21वीं सदी में शक्ति संघर्ष का स्वरूप बहुत तेजी से बदल रहा है। अब विभिन्न देशों के बीच संघर्ष, तोप, मिसाईल एवं सेनाओं के माध्यम से नहीं लड़े जा रहे हैं बल्कि तकनीकि उपलब्धता, मुद्रा नियंत्रण, पूंजी प्रवाह, खाद्य सुरक्षा, आकड़ों (डेटा) का संग्रहण, नियम निर्माण को प्रभावित करने की क्षमता एवं वैश्विक आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करना, आदि में माध्यम से लड़ा जा रहा है।

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समाज बालिका विकास के बन्द दरवाजे खोलने का समय

बालिका विकास के बन्द दरवाजे खोलने का समय

राष्ट्रीय बालिका दिवसः 24 जनवरी 2026-ललित गर्ग-राष्ट्रीय बालिका दिवस बालिकाओं के अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और सशक्तिकरण के लिए जागरूकता बढ़ाने और लैंगिक समानता को बढ़ावा…

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समाज वाइफ स्वैपिंग’ और हमारे रिश्तों की टूटती नींव: समाज का आईना 

वाइफ स्वैपिंग’ और हमारे रिश्तों की टूटती नींव: समाज का आईना 

– डॉ. प्रियंका सौरभ कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर लिखना आसान नहीं होता। वे केवल शब्दों की नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और नैतिक…

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आर्थिकी मनरेगा में सुधार का विरोध अनावश्यक है

मनरेगा में सुधार का विरोध अनावश्यक है

राजेश कुमार पासी मोदी सरकार ने जब से मनरेगा का नाम बदलकर जी रामजी किया है, तब से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। इसके विरोध में कांग्रेस ने 45 दिन का विरोध आंदोलन शुरू किया था जो कि अभी भी चल रहा है। तेलंगाना, पंजाब और कर्नाटक की विधानसभा  में इसके खिलाफ प्रस्ताव भी पास किया गया है। केरल, बंगाल और तमिलनाडु में भी इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है। विपक्षी दलों का सबसे पहला विरोध तो मनरेगा का नाम बदलने को लेकर ही है। उनका कहना है कि इस योजना से गाँधीजी का नाम क्यों हटाया गया है। इसके अलावा योजना के स्वरूप में बदलाव का भी विरोध किया जा रहा है जिसमें मोदी सरकार ने योजना को मांग आधारित से बदलकर आपूर्ति आधारित बना दिया है। अब इस योजना पर केंद्र सरकार का नियंत्रण ज्यादा हो गया है. इसके अलावा राज्यों पर भी वित्तीय बोझ डाला गया है। विपक्षी दल इसे राज्यों की स्वायत्तता पर हमला बता रहे हैं और उनका कहना है कि सरकार ने राज्यों पर वित्तीय बोझ लाद दिया है। कुछ राज्यों द्वारा इस योजना को अदालत में भी चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि उसने रोजगार गारंटी को 100 से 125 दिन कर दिया है। पहले इस योजना का सारा खर्च केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता था, लेकिन अब राज्यों को भी 10-40 फीसदी बोझ सहन करना होगा। केंद्र सरकार का कहना है कि उसने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि वो राज्यों की जवाबदेही तय करना चाहती है। केंद्र द्वारा सारा पैसा देने के कारण राज्य योजना पर ध्यान नहीं देते थे। सरकार ने बुवाई/कटाई के 60 दिनों के दौरान रोजगार पर रोक लगा दी है ताकि खेती के लिए मजदूर कम न पड़े। अब इस योजना में हर ग्रामीण परिवार को 125 दिन की वेतन आधारित गारंटी दी गयी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस योजना को समग्र ग्रामीण विकास के साथ जोड़ा गया है। अब ये योजना सिर्फ पैसा बांटने तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि इससे ग्रामीण इलाकों के विकास कार्यों को जोड़ा गया है। इस योजना के बारे में यह आम धारणा है कि इस योजना में सारे काम कागजों में किए जाते हैं, केंद्र सरकार इस धारणा को तोड़ना चाहती है। केंद्र सरकार चाहती है कि इस योजना के अंतर्गत किये गए कार्य धरातल पर दिखने चाहिए। सच तो यह है कि कागजों में काम होने की धारणा इसलिए बनी है क्योंकि इस योजना में किये गए काम धरातल पर दिखाई नहीं देते हैं ।                जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, उसकी हर योजना और कार्यो का विरोध करना विपक्षी दलों की आदत हो गई है। अगर मोदी सरकार ने सिर्फ योजना का नाम बदला होता तो कांग्रेस का विरोध जायज ठहराया जा सकता था लेकिन सरकार ने इस योजना में बड़े बदलाव किए हैं । ऐसा लगता है कि सरकार ने जानबूझकर कर योजना के नाम में बदलाव किया है, ताकि योजना की पहचान उसके साथ जुड़ जाए। कांग्रेस यह तो देख रही है कि केंद्र सरकार ने योजना से गांधी जी का नाम हटा दिया है लेकिन वो यह नहीं देख पा रही है कि अब योजना के साथ भगवान राम का नाम जोड़ दिया गया है। सच तो यह है कि भगवान राम ग्रामीण भारत के रग-रग में बसे हुए हैं, इसलिए मोदी सरकार ने इस योजना में राम का नाम जोड़ा है। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को बताना चाहिए कि मोदी सरकार ने जो बदलाव किए हैं, क्या वो नहीं किये जाने चाहिए थे । ये योजना यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गई थी, क्या आज कांग्रेस इस योजना में हुए भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी ले सकती है। क्या कांग्रेस बता सकती है कि हज़ारो करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद इस योजना में किये गए विकास कार्य धरातल पर क्यों दिखाई नहीं देते।  यूपीए सरकार के दौरान इस योजना के कार्यान्वयन में इतनी खामियां थी कि इसमें सुधार जरूरी हो गए थे। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस योजना में बड़े बदलाव किए थे, क्योंकि भ्रष्टाचार के कारण जनता के पैसे की बर्बादी हो रही थी। इस योजना के बारे में कहा जाता था कि पहले गड्ढे किये जाते हैं और फिर उन्हें भरा जाता है। कुछ समय पहले 55 जिलों में की जांच में 300 करोड़ के घोटाले इस योजना में सामने आए हैं। इससे पता चलता है कि इस योजना का पैसा अनावश्यक कार्यो पर खर्च किया जा रहा था। ग्रामीण विकास मंत्रालय का कहना है कि इस योजना का संचालन ही ऐसा है कि इसमें भ्रष्टाचार होता है। यही कारण है कि इस योजना में किये जाने वाले काम किसी को दिखाई नहीं देते। इस योजना के अंतर्गत किये जाने वाले कामों के निरीक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण पैसों की बंदरबांट होती है। मोदी सरकार का तो कहना है कि इस योजना में सुधार बहुत पहले किया जाना चाहिए था। इससे सवाल तो मोदी सरकार पर भी उठता है कि उसने इस सुधार के लिए इतना वक्त क्यों लिया । कांग्रेस को बताना चाहिए कि उसने इस योजना में निरीक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की थी जिसके कारण जनता के लाखों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद किसी की कोई जवाबदेही नहीं है।                  ये योजना  गरीबों के साथ जुड़ी हुई है, क्योंकि इससे उन्हें रोजगार दिया जाता है जिससे उनका घर चलता है। इस योजना का विरोध करने वालों को गरीब विरोधी करार दिया जाता है, शायद इसलिए इसमें सुधार करने में इतनी देर लगाई गई है। कांग्रेस भी यही विमर्श चला रही है कि मोदी सरकार गरीब विरोधी है, इसलिए योजना में बदलाव किया गया है। इस योजना में फर्जीवाड़े की एक खबर सामने आई है कि इस योजना में पंजीकृत पांच लाख मजदूरों की उम्र 80 साल से ज्यादा थी । मनरेगा में इन श्रमिकों से  कठिन परिश्रम वाले काम कराए गए थे, जिसमें गड्ढे खोदना, तालाबों, पोखरों और कच्ची सड़कों का निर्माण करना शामिल हैं। 80 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों के लिए फावड़ा उठाकर ये काम करना असम्भव है । इससे साबित होता है कि इन श्रमिकों के नाम पर सरकारी पैसे की लूट की गई है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की जांच में सामने आया है कि इनमें से कई लोगों की कार्य क्षमता खत्म हो चुकी थी और कुछ लोगों की तो मृत्यु भी हो चुकी है। देशभर में मनरेगा योजना के अंतर्गत 6.5 करोड़ लोग पंजीकृत है जिसमें से एक करोड़ लोगों की उम्र 61 साल से ज्यादा है।  इसका मतलब है कि लगभग 15 प्रतिशत लोग इस लायक नहीं हैं कि उनसे कठिन परिश्रम का काम कराया जा सके । आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, गोआ, पुडुचेरी, लद्धाख,मणिपुर जैसे राज्यों में 61 से 80 साल वाले श्रमिकों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक है। जहां तक 80 साल से ज्यादा उम्र वाले श्रमिकों की बात है तो इसमें आंध्रप्रदेश में 1,22,902, तेलंगाना में 1,22,121, तमिलनाडु में 58,976 और राजस्थान में 36,119 श्रमिक पंजीकृत हैं। वैसे इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिये क्योंकि जब इस योजना में मरे हुए लोग काम कर सकते हैं तो 80 साल वाले क्यों नहीं कर सकते। ये हालत तब है, जब मोदी सरकार ने भुगतान को बैंक खातों और आधार से जोड़ दिया है। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है, जब सारा भुगतान नकद में किया जा रहा था, तब इस योजना की क्या हालत होगी । सच तो यह है कि इस योजना में काम करने के लिए युवा अपनी बारी का इंतजार करते थे तो योजना का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों के नाम पर हजम कर लिया जाता था। गरीबों के नाम पर देश के पैसे की बर्बादी का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। देखा जाए तो कांग्रेस का दूसरा नाम ही भ्रष्टाचार है, जिसकी हर योजना देश का पैसा लूटने का साधन थी । इस योजना में जबरदस्त लूट मचाई गयी है । कांग्रेस को योजना में बदलाव का विरोध करने की जगह ये बताना चाहिए कि इस लूट में उसकी जेब में कितना पैसा गया है । जब योजना का कार्यान्यवन करने की क्षमता कांग्रेस सरकार के पास नहीं थी तो उसने ऐसी योजना लागू ही क्यों की थी। क्या यह माना जाए कि ये योजना सरकारी धन को लूटने के लिए ही लायी गयी थी।                मोदी सरकार ने योजना का नाम बदलने के साथ-साथ जो बदलाव किए हैं, वो बहुत जरूरी हैं।  हज़ारो करोड़ रुपये खर्च होने के बाद जमीन पर कोई काम न दिखना ही भ्रष्टाचार का सबूत है। जनता ने देश चलाने की जिम्मेदारी मोदी सरकार को दी हुई है और ये सरकार पिछले 11 सालों से लगातार काम कर रही है। 11 सालों के शासन के बावजूद मोदी की लोकप्रियता घटने की जगह बढ़ रही है, इसका मतलब है कि जनता मोदी पर विश्वास करती है और उनके काम से खुश है। जनता यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और नाकामियों को अभी तक नहीं भूली है, इसलिए कांग्रेस केंद्र के साथ-साथ राज्यों की सत्ता से भी बाहर हो गई है। विपक्ष होने के नाते कांग्रेस द्वारा सरकार का विरोध करना सही है लेकिन विरोध के लिए विरोध नहीं होना चाहिए। मनरेगा में बदलाव के विरोध के कारण इसकी खामियां उजागर हो रही हैं। जहां कांग्रेस इस योजना में बदलाव के विरोध से सरकार को घेरना चाहती है तो दूसरी तरफ इस योजना की खामियां सामने आने से कांग्रेस खुद कठघरे में खड़ी हो गई है। जनता को रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके साथ-साथ सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि पैसे का इस्तेमाल सही तरीके से हो। कांग्रेस को विरोध करने के लिए सही मुद्दे चुनने चाहिए ताकि जनता में उसकी विश्वसनीयता बढ़े ।  राजेश कुमार पासी

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आर्थिकी विश्व आर्थिक मंच पर भारतीय ट्रेड कूटनीति के मायने

विश्व आर्थिक मंच पर भारतीय ट्रेड कूटनीति के मायने

कमलेश पांडेय दावोस में चली विश्व आर्थिक मंच (WEF) की बैठक में भारत ने अपनी मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक उपस्थिति दर्ज कराई है। यहां पर भारतीय ट्रेड कूटनीति ने जो पॉलिसी नैरेटिव सेट किए और ग्लोबल इमेज विकसित किया, वह यहां कई मायने में अहम है। सबसे बड़ी बात तो यह कि यहां पर भारत ने वैश्विक निवेशकों के सामने खुद को चीन का वैकल्पिक हब के रूप में प्रस्तुत किया और विकसित भारत होने का स्थायी नजरिया पेश किया। दरअसल, इस अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत ने जिस आर्थिक स्थिरता, वैश्विक लोकतंत्र और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर बल दिया, उससे वैश्विक नीति-निर्धारण में इंडिया की भूमिका और अधिक मजबूत हुई। जब संयुक्त राष्ट्र संघ की कीमत पर अमेरिका नई विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने हेतु एक से बढ़कर एक जोखिम भरे दांव चल रहा हो, उस दौर में भी भारत की यह अहम उपस्थिति बहुत कुछ चुगली करती है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने के मोदी सरकार के इरादे स्पष्ट हैं जिसे भरपूर दुनियावी समर्थन भी मिल रहा है। इसके अहम आर्थिक व कूटनीतिक मायने हैं। देखा जाए तो इस महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय बैठक में भारत के विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रमुख उद्योगपतियों के बड़े प्रतिनिधिमंडल ने जिस तैयारी के साथ शिरकत की और निजी वैश्विक निवेश आकर्षित करने पर जोर दिया, उसका रणनीतिक महत्व है। इस दौरान देखा गया कि दावोस में भारत का प्रतिनिधिमंडल रेल, आईटी, ऊर्जा और उद्योग जैसे मंत्रालयों के मंत्रियों के साथ महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, असम, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक फैला हुआ था जबकि रिलायंस, टाटा, महिंद्रा, इंफोसिस जैसे अंतर्राष्ट्रीय कॉरपोरेट दिग्गजों की भागीदारी ने निजी क्षेत्र में भारत की अहम ताकत दिखाई।  इससे नानाविध लाभ मिला और निवेश समझौते हुए, जैसे महाराष्ट्र के लिए हजारों करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर होना। इससे दावोस में भारत पर चर्चा का केंद्र बना रहा। चर्चा भी वह कि क्या भारत मैन्युफैक्चरिंग और निवेश का नया हब बन सकता है, खासकर दिन ब दिन बदलते भू-राजनीतिक तनावों के बीच। सबसे खास बात यह कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के अध्यक्ष ने भारत को सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताते हुए पीएम मोदी के सुधारों और ग्लोबल साउथ की आवाज की भरपूर सराहना की। इससे भारत-ईयू व्यापार समझौते पर भी सकारात्मक इनपुट के संकेत मिले। इस तरह से देखा जाए तो दावोस (WEF 2026) की मौजूदा बैठक से भारत को सीधे‑सीधे दो तरह के बड़े फायदे मिलते दिखाई दे रहे हैं– पहला, निवेश व व्यापार के ठोस मौके, और दूसरा, भारत की छवि व कूटनीतिक प्रभाव में बढ़त। वहीं, निवेश और जॉब के बेशुमार मौके मिलने की बात अलग है। कहना न होगा कि भारत का पवेलियन और अलग‑अलग राज्य (खासतौर पर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि) दावोस में निवेश आकर्षित करने के लिए आक्रामक तरीके से रोडशो, मीटिंग और एमओयू साइन कर रहे हैं, जिनका फोकस मैन्युफैक्चरिंग, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर व डिजिटल इकोनॉमी पर है।  दरअसल पिछले सालों के ट्रेंड के आधार पर दावोस प्लेटफॉर्म से भारत को अरबों डॉलर के निवेश आश्वासन मिलते रहे हैं, जो बाद में प्लांट, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप फंडिंग के रूप में नौकरियां और उत्पादन क्षमता बढ़ाते हैं। वहीं इस बार की खास बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावोस में भारतीय बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट लीडर्स के साथ विशेष बैठक कर रहे हैं, जिसे संभावित भारत‑अमेरिका व्यापार समझौते की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यदि यहां किसी प्रकार की रूपरेखा या राजनीतिक सहमति बनती है तो आगे चलकर टैरिफ, मार्केट एक्सेस और टेक्नोलॉजी/डिफेंस कोऑपरेशन में भारत के लिए बेहतर शर्तें निकल सकती हैं। विश्व आर्थिक मंच (WEF) पर भारत को “सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था”, ग्लोबल ग्रोथ में लगभग 20 प्रतिशत योगदान देने की क्षमता वाला देश और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज़ के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है। इससे भारत की पॉलिसी नैरेटिव मजबूत हुई है और देश के ग्लोबल इमेज में उत्तरोत्तर सुधार होते रहने के संकेत मिले हैं। ऐसा इसलिए कि अश्विनी वैष्णव जैसे नरेंद्र मोदी के कुशल मंत्री वहाँ अगले 5 साल के लिए 6–8% ग्रोथ, 2047 तक प्रति व्यक्ति आय 5 गुना करने, ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस, लेबर रिफॉर्म और डिजिटल पब्लिक इंफ्रा (UPI आदि) जैसे एजेंडा को सफलता पूर्वक पेश कर रहे हैं, जिससे विदेशी निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ता है। उनकी कोशिशों से भारत के राज्यों को भी भरपूर लाभ मिलने वाले हैं। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र राज्य उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, डिफेंस कॉरिडोर, डेटा सेंटर व मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर को ग्लोबल प्लेयर्स के सामने रख कर अलग से निवेश आकर्षित कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर इंडस्ट्रियलाइजेशन की संभावनाएं बढ़ती हैं। वहां देखा गया कि दावोस का “इंडिया पवेलियन” अब डील‑मेकिंग का हब बन चुका है, जहाँ राज्य सरकारें और केंद्र सरकार संयुक्त रूप से “टीम इंडिया” के रूप में प्रेज़ेंट हो रही हैं। इससे दुनिया को स्पष्ट संदेश जाता है कि भारत में नीतिगत स्थिरता और कोऑर्डिनेशन की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि भले ही दावोस से सीधे सीधे किसी को सब्सिडी या स्कीम नहीं मिलती है, लेकिन वहां तय हुए निवेश, व्यापार समझौते, और पॉलिसी भरोसे का असर मीडियम टर्म में नौकरियों, इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के रूप में स्पष्ट दिखता है। यहां पर यदि भारत निवेश का भरोसेमंद सेंटर बनता प्रतीत होता है तो मैन्युफैक्चरिंग/ग्रीन एनर्जी/डिजिटल सेक्टर में बड़े प्रोजेक्ट आते हैं, जिसका असर वेतन, लोकल इकोनॉमी, टैक्स रेवेन्यू और कल्याणकारी व्यय पर पड़ेगा, जो अंततः आम नागरिक तक पहुँचेगा। यही वजह है कि दावोस की हालिया विश्व आर्थिक मंच (WEF) 2026 बैठक में भारत ने निवेश आकर्षण और आत्मनिर्भरता पर केंद्रित प्रमुख पहलों की घोषणा की, जिसमें निजी क्षेत्र की बड़ी योजनाएं शामिल रहीं। ये घोषणाएं महाराष्ट्र, असम और झारखंड जैसे राज्यों में ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल इंफ्रा पर फोकस करती हैं। यदि उपलब्धियों की बात करें तो अडानी ग्रुप ने एविएशन, क्लीन एनर्जी, डिजिटल इंफ्रा और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग में 6 लाख करोड़ रुपये (लगभग 6.6 बिलियन डॉलर) के निवेश का ऐलान किया। इसमें असम में 2700 मेगावाट सौर क्षमता, महाराष्ट्र में धारावी पुनर्विकास, नवी मुंबई एयरपोर्ट लॉजिस्टिक्स, 3000 मेगावाट ग्रीन डेटा सेंटर, 8700 मेगावाट पंप्ड स्टोरेज और सेमीकंडक्टर फैब शामिल हैं। यह 7-10 वर्षों का प्लान रोजगार सृजन और ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा देगा। वहीं, झारखंड में टाटा स्टील ने ग्रीन स्टील प्रोजेक्ट्स के लिए 11,000 करोड़ रुपये निवेश की प्रतिबद्धता जताई जबकि महाराष्ट्र ने रायगढ़-पेण ग्रोथ सेंटर की घोषणा की, जो 1 लाख करोड़ के निवेश का केंद्र बनेगा। देखा जाए तो दावोस में वैश्विक साझेदारियां मजबूत हुईं हैं। यहीं पर भारत-यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर सकारात्मक प्रगति हुई, जिसे ईयू प्रमुख ने “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा। वहीं, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एआई (AI) समिट होस्ट करने की घोषणा की जो भारत के वैश्विक तकनीकी नेतृत्व को मजबूत करेगी। वहीं ये पहलें भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने पर जोर देती हैं। कुलमिलाकर दावोस बैठक से भारत को प्राप्त निवेश प्रतिबद्धताएँ निम्नलिखित हैं जो मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर और डिजिटल इकोनॉमी पर केंद्रित हैं, जो लाखों नौकरियाँ पैदा करने की क्षमता रखती हैं। इनसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के माध्यम से 5-10 लाख नौकरियाँ बनने का अनुमान है, खासकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े व अहम राज्यों में। पिछले दावोस चक्रों के आधार पर 20 लाख करोड़ रुपये के निवेश से औसतन 5-8 लाख प्रत्यक्ष नौकरियाँ (फैक्ट्री वर्कर, इंजीनियर) और दोगुने अप्रत्यक्ष रोजगार (लॉजिस्टिक्स, सर्विसेज) उत्पन्न होते हैं। हरित ऊर्जा व डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स से विशेष रूप से 2-3 लाख हाई-स्किल्ड जॉब्स (टेक्नीशियन, एनालिस्ट) बनेंगी। पहला, मैन्युफैक्चरिंग: फैक्ट्री ऑपरेटर, स्किल्ड वेल्डर, क्वालिटी कंट्रोलर- 3 लाख+ जॉब्स, मुख्यतः स्किल्ड/सेमी-स्किल्ड श्रमिक। दूसरा, हरित ऊर्जा: सोलर इंस्टॉलर, विंड टरबाइन टेक्नीशियन, प्रोजेक्ट मैनेजर – 1-2 लाख जॉब्स, फोकस इंजीनियरिंग व सस्टेनेबिलिटी स्किल्स पर। तीसरा, डेटा सेंटर/डिजिटल: सर्वर एडमिन, डेटा एनालिस्ट, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट– 1 लाख+ हाई-पे जॉब्स, आईटी/सॉफ्टवेयर बैकग्राउंड वालों के लिए। जहां तक इसके क्षेत्रीय प्रभाव की बात है तो उत्तर प्रदेश के डिफेंस कॉरिडोर व डेटा सेंटर से स्थानीय स्तर पर 2 लाख+ जॉब्स, जिसमें 40% महिलाओं/युवाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। वहीं, महाराष्ट्र व गुजरात जैसे राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से अतिरिक्त 1-2 लाख रोजगार जोड़ेंगे। इन जॉब्स में 60% स्किल्ड (ITI/डिप्लोमा) की जरूरत होगी, इसलिए ITI व अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग पर फोकस बढ़ेगा। देरी से बचने के लिए एमओयू लागू करने पर सबकुछ निर्भर करेगा अन्यथा सिर्फ 50-70% ही मटेरियलाइज होंगी। कमलेश पांडेय

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