समाज ‘संस्कृत’ का रक्षक बना कर्नाटक का एक गाँव

‘संस्कृत’ का रक्षक बना कर्नाटक का एक गाँव

डॉ. रमेश ठाकुर एकाध दशकों से पश्चिमी भाषा इस कदर हावी हुई है जिससे हम अपनी पारंपरिक भाषाएं और सभ्यताओं को पीछे छोड़ दिया है…

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लेख गाँव का अस्तित्व और पलायन 

गाँव का अस्तित्व और पलायन 

विवेक रंजन श्रीवास्तव  दुनिया में हमारे गांवो की विशिष्ट पहचान यहां की आत्मीयता,सचाई और प्रेम है . विकास का अर्थ आर्थिक उन्नति से ही लगाया…

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राजनीति धर्मांतरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है

धर्मांतरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है

राजेश कुमार पासी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो व्यक्ति अपना धर्म बदलता है वो केवल अपना धर्म नहीं बदलता बल्कि वो अपने समाज और देश से भी कट जाता है । यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण को देश के लिए बड़ा खतरा बताया था और सरकारों को इसके खिलाफ कदम उठाने को कहा था । धर्मांतरण के बाद व्यक्ति अपना परिवार और अपनी संस्कृति छोड़ देता है, अपना खानपान और पहनावा बदल लेता है । धर्मांतरित मुस्लिम इस्लाम के प्रति अपनी वफादारी साबित करने के लिए आतंकी संगठनों के साथ भी चले जाते हैं । यही कारण है कि धर्मांतरण देश की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है । दुनिया में कई देश हैं, जहां धर्मांतरण के कारण डेमोग्राफी बदलने से दंगों की आग में जलना पड़ रहा है । बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था कि हिन्दू-मुस्लिम के बीच तनाव के कई कारण हैं जिनके कारण दंगे भी होते हैं । उन्होंने इस्लाम को एक बंद समाज कहा था क्योंकि उनका कहना था कि मुस्लिमों का भाईचारा आपसी होता है. दूसरों को वो काफिर मानते हैं । उन्होंने गौमांस, धर्मांतरण और मस्जिदों के आगे संगीत बजाने को दंगों का बड़ा कारण बताया था । उन्होंने कहा था कि जब दोनों समुदाय मिलते हैं तो धर्मांतरण एकतरफा होता है. हिन्दू कभी धर्म परिवर्तन का प्रयास नहीं करते । यही कारण है कि किसी भी मुस्लिम देश में धर्मांतरण विरोधी कानून नहीं है क्योंकि मुस्लिमों की उसकी जरूरत ही नहीं है लेकिन गैर-मुस्लिम देशों की इसकी जरूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि मुस्लिम समुदाय पूरी आक्रामकता के साथ धर्मांतरण की कोशिश करता है । ये अजीब बात है कि मुस्लिम बहुल देशों में सभी नागरिकों को धीरे-धीरे मुस्लिम बना दिया जाता है लेकिन जहां मुस्लिम अल्पसंख्यक होते हैं, वहां भी वो धीरे-धीरे बहुसंख्यक समाज को इस्लाम में शामिल कर लेते हैं । इस तरीके से कई देशों को इस्लामिक मुल्क बना दिया गया है और भारत को भी 2047 तक मुस्लिम संगठन इस्लामिक मुल्क बनाने का संकल्प लेकर धर्मांतरण के अभियान में जुटे हुए हैं । ज्यादातर मुस्लिम संगठन दावा करते हैं कि वो धर्मांतरण नहीं करवाते हैं बल्कि लोग अपनी खुशी से इस्लाम धर्म अपनाते हैं । सवाल यह है कि अगर लोगों को अपनी खुशी से इस्लाम अपनाना है तो वो खुद मस्जिद में जायेंगे न कि उनका धर्मांतरण करवाने के लिए करोड़ों रुपये की फंडिंग लानी पड़ेगी और गैंग बनाने पड़ेंगे । वास्तव में धर्मांतरण करवाने के लिए लालच, भय और धोखे का सहारा लिया जाता है । हमारा संविधान अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार देता है और व्यक्ति को अपनी मर्जी से धर्म बदलने का भी  अधिकार देता है । दूसरी तरफ यही संविधान कहता है कि किसी भी व्यक्ति को लालच, भय और धोखे से धर्मांतरित नहीं किया जा सकता । वास्तव में हमारे देश में लोगों को धोखा भय और लालच देकर ही धर्मांतरित किया जा रहा है ।                   हमारे देश का सेकुलर गैंग यह चिल्लाता है कि देश में भाईचारा बढ़ाने की जरूरत है, इसे खतरे में नहीं डालना चाहिए लेकिन सच्चाई यह है कि अगर आपको मुस्लिमों और ईसाइयों के साथ भाईचारा निभाना है तो उनके धर्म को अपनाना होगा । जब तक आप ऐसा नहीं करते हैं वो आपसे भाईचारा नहीं निभा सकते क्योंकि ये दोनों धर्म दूसरे धर्म को बर्दाश्त नहीं कर सकते । यही कारण था कि मुस्लिम आक्रांताओं  ने हिन्दुओं के सामने तीन विकल्प रखे थे । पहला उन्हें धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बनना होगा, दूसरा अगर इस्लाम नहीं अपनाना है तो जजिया कर देना होगा और अगर ये दोनों विकल्प नहीं लिए तो मौत ही आखिरी विकल्प होगा । सेकुलर  गैंग कहता है कि अगर मुस्लिम शासकों ने जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाया था तो हिन्दू कैसे बचे रह गए । वास्तव में हिन्दुओं ने अपना धर्म परिवर्तन करने की जगह जजिया कर चुकाना ज्यादा पसंद किया था । बेइंतहा जुल्म, उत्पीड़न और शोषण के बावजूद हिन्दू अपने धर्म पर अडिग रहे । इसके बावजूद करोड़ों लोगों ने भय और लालच  के कारण धर्म परिवर्तन  कर लिया और भारत में मुस्लिमों की आबादी इतनी बढ़ गई कि देश का विभाजन करना पड़ा । समस्या यह है कि इसके बाद भी यह जारी है और ये तब तक रुक नहीं सकता जब तक कि पूरे देश को धर्मांतरित न कर दिया जाए । विभाजन के बाद इसको रोका जा सकता था लेकिन हमारे नेताओं पर सेक्युलरिज्म का ऐसा भूत सवार था कि इसको रोकने की कोशिश नहीं की गई । अब ये तब रुकेगा जब देश का एक और विभाजन हो जाएगा ।  इससे पहले इसके रुकने की उम्मीद दिखाई नहीं देती है। धर्मांतरण करने वाले संगठनों के पास विदेशों से अथाह पैसा आता है जिसका इस्तेमाल ये लोग पुलिस और प्रशासन में बैठे लोगों को खरीदने के लिए करते हैं । इसके कारण पुलिस और प्रशासन न केवल इनके कारनामों की अनदेखी करने लगता है बल्कि इनके खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने की हर संभव कोशिश करता है । छांगुर बाबा के खिलाफ जिन लोगों ने भी शिकायत की थी पुलिस ने उनके ही खिलाफ फर्जी मुकदमें ठोक दिये । सरकार किसी की भी हो लेकिन इको सिस्टम अभी भी पुराना ही चल रहा है ।                  इस्लाम धर्म के अनुसार हर मुस्लिम का प्रथम कर्तव्य है कि वो गैर मुस्लिम को अपने धर्म में लेकर आये क्योंकि एक दिन पूरी दुनिया को इस्लामिक बनाना है। जब तक पूरी दुनिया मुस्लिम  नहीं बन जाती तब तक मुस्लिम समुदाय  चैन से नहीं बैठ सकता। इस सच को हम माने या न माने लेकिन इससे भाग नहीं सकते । मुस्लिम संगठनों को हिंदुओं और अन्य धर्म के लोगों को मुसलमान बनाने के लिए अरबों रुपये की फंडिंग मिल रही है। यही कारण है कि मुस्लिम युवा लव जिहाद की आड़ में हिंदू लड़कियों को पहले धोखे से बहला उनसे फुसलाकर कर शादी कर लेते हैं और इसके बाद उनका धर्मांतरण करवा देते हैं। इसके बदले उन्हें लाखों रुपये मिलते हैं. दूसरी तरफ अपना धार्मिक कर्तव्य पूरा करने की खुशी भी मिलती है।  धर्म परिवर्तन के बाद लड़कियों को गौमांस खिलाया जाता है और कहा जाता है कि इसके बाद ही तुम्हारा धर्मांतरण पूरा होगा । उन्हें मुस्लिम पहनावे और खानपान के लिए मजबूर किया जाता है ।  छांगुर बाबा के बारे में दावा किया जा रहा है कि उसने 5000 लोगों का धर्मांतरण करवाया था और उसमें से 1500 हिन्दू लड़कियां थी । उसके नेटवर्क को देखते हुए कहा जा सकता है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है क्योंकि कई जिलों की बदलती डेमोग्राफी इसकी गवाही देती है। ये और इसके परिवार के सदस्यों ने सेकड़ो अमीर मुस्लिम देशों की यात्रा की थी। धर्मांतरण के काम मे इसके मुख्य सहयोगी वो लोग थे जिनका इसने धर्म परिवर्तन करवाया था। इसने धर्मांतरण के लिए लोगों को ट्रेनिंग देने का बड़ा इंतज़ाम किया हुआ था, इसके लिए कोठियों और बड़े भवनों के तहख़ानों का इस्तेमाल किया जाता था। दुबई और दूसरे मुस्लिम देशों से ये जेहादी ट्रेनर और मौलाना को बुलाता था । इसका पूरा नेटवर्क मिलकर गैर मुस्लिमों का ब्रेनवाश करके मुस्लिम बनाने का धंधा करता था ।  गरीब, दलित, आदिवासी और युवा लड़कियों को विशेष तौर पर निशाने पर रखा जाता था।                ईसाई संगठनों का तरीका अलग है, वो धर्म परिवर्तन के बाद कुछ नहीं बदलने देते और किसी को पता भी नहीं चलता कि इस व्यक्ति ने अपना धर्म बदल लिया है । पंजाब में कई संगठनों ने दावा किया है कि ईसाई आबादी 15 प्रतिशत को पार कर गई है जबकि 2011 में यह आबादी सिर्फ डेढ़ प्रतिशत थी । ज्यादातर दलित समाज के लोग पंजाब में धर्मांतरण कर रहे हैं क्योंकि वहां जातिवाद के कारण इनके साथ उत्पीड़न अभी भी जारी है और भेदभाव किया जा रहा है । ईसाई संगठन दलितों की कई तरह से मदद करके उनको अपने धर्म में लेकर जा रहे हैं । दलितों में अंधविश्वास बहुत ज्यादा है और ईसाई संगठन इस कमजोरी का फायदा उठाकर तथाकथित चमत्कारों के जरिये उनको  बहला फुसलाकर अपने धर्म में ले जा रहे हैं । धर्मांतरण देश के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है क्योंकि इसके कारण कई राज्यों की डेमोग्राफी बदल चुकी है । इसके कारण कई जगहों पर सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक परेशानियां खड़ी हो  रही हैं । धर्मांतरण को छोटी समस्या नहीं समझना चाहिए, अगर इस पर लगाम नहीं लगाई गई तो देश दंगों की आग में ऐसा जलेगा कि एक और विभाजन की जरूरत पड़ सकती है । इसके अलावा विदेशी शक्तियां इन लोगों का देश के खिलाफ इस्तेमाल कर सकती हैं । सुप्रीम कोर्ट और बाबा साहब की चेतावनी को याद रखना चाहिए और धर्मांतरण पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए । सैकड़ों छांगुर बाबा धर्मांतरण का गैंग चलाकर करोड़पति बन रहे हैं और देश को खतरे में डाल रहे हैं ।   राजेश कुमार पासी

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लेख यौन हिंसा पर सख्त कानून के बावजूद आखिर अपराधों में कमी क्यों नहीं आ रही ?

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हाल ही में ओडिशा के बालेश्वर जिले के एक कॉलेज में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यौन…

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राजनीति क्या बिहार में सुशासन अब जंगलराज में बदल रहा है?

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-ललित गर्ग-बिहार में एक बार फिर कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बेखौफ अपराधियों का आतंक, दिन-दहाड़े हत्याएं, लूट, अपहरण और महिलाओं के…

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राजनीति छांगुर बाबा के काले कारनामे और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी

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सूफी संत के वेष में भी अनेक ऐसे मुस्लिम रहे हैं, जिन्होंने सनातन धर्म का बहुत भारी अहित किया है। भारतवर्ष में ऐसे कथित सूफी…

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कविता सावन

सावन

नील गगन घनश्यामाच्छादित,तेज तड़ित की दमक उठे।जो संग पवन के द्रुत गति वो,अगले बादल चमक उठे। मेघ उच्च जो श्यामवर्ण हैं,मंद चाल विचरण करते।जीत समर…

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लेख कोख में कत्ल होती बेटियाँ: हरियाणा की घुटती संवेदना

कोख में कत्ल होती बेटियाँ: हरियाणा की घुटती संवेदना

हरियाणा में केवल तीन महीनों में एक हज़ार एक सौ चौवन गर्भपात। कारण – कन्या भ्रूण हत्या की आशंका। छप्पन आशा कार्यकर्ताओं को कारण बताओ…

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राजनीति भारतीय चुनावी लोकतंत्र की रीढ़ है-अनुच्छेद 326

भारतीय चुनावी लोकतंत्र की रीढ़ है-अनुच्छेद 326

हाल ही में बिहार वोटर लिस्‍ट रिवीजन में एक बड़ा खुलासा हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वोटर लिस्‍ट में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के…

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खान-पान स्वास्थ्य बनाम स्वादः समोसा और जलेबी से सावधान!

स्वास्थ्य बनाम स्वादः समोसा और जलेबी से सावधान!

-ललित गर्ग- भारत जैसे विविधताओं वाले देश में जहां हर नुक्कड़ पर समोसे की महक और जलेबी की मिठास लोगों को आकर्षित करती है, वहीं…

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लेख चिंताजनक है नदियों का मौन

चिंताजनक है नदियों का मौन

डा.वेदप्रकाश      नदियां बोलती हैं। उनका कल कल- छल छल स्वर और निरंतर प्रवाह उनकी जीवंतता का प्रमाण है। भारतीय ज्ञान परंपरा के आदि ग्रंथ ऋग्वेद के 33वें सूक्त में ऋषि विश्वामित्र और नदी का संवाद है। जहां नदियों को गायों और घोड़े के सदृश शब्द करती व दौड़ती वर्णित किया गया है। वहां कहा गया है कि नदियां सबका उपकार करने वाली होती हैं और कभी जल से हीन नहीं होती। वहां ऋषि द्वारा नदी पार करने हेतु प्रार्थना भी है। इसी प्रकार 75वें सूक्त में- इमं मे गंड्गे यमुने सरस्वति…के माध्यम से विभिन्न नदियों का महत्व और शोभा वर्णित है। आदिकाव्य रामायण और रामचरितमानस में भी विभिन्न प्रसंगों में नदियों से संवाद एवं स्तुति मिलती है। सुंदरकांड में प्रभु श्रीराम समुद्र से प्रार्थना, पूजन व संवाद करते हैं।       नदियों का सतत प्रवाह अथवा गतिशीलता मानव चेतना को साहस प्रदान करता रहा है। हरिद्वार, ऋषिकेश, मथुरा, काशी,प्रयागराज और गंगासागर आदि अनेक तीर्थ नदियों से ही बने हैं। नदियों के  किनारे ही सभ्यता एवं संस्कृति विकसित हुई हैं। ध्यान रहे नदियां हैं तो प्रकृति है, संस्कृति है, संतति है, वर्तमान है और भविष्य भी इन्हीं से होगा। कहीं बीहड़ जंगलों से तो कहीं कठोर पर्वत श्रेणियों से निकलती नदियां उनकी संघर्ष यात्रा के प्रमाण हैं। गंगा,यमुना, सरस्वती, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी, चंबल, बागमती, सिंधु , झेलम, चेनाब,रावी, व्यास, सतलुज, नर्मदा, ताप्ती, वैतरणी, कृष्णा,कावेरी, लूनी, माच्छू , बनास, साबरमती, काली, पेरियार आदि देश की छोटी बड़ी सैकड़ों नदियां बड़े भू भाग को सींचने के साथ-साथ जीवन की रेखाएं भी हैं। अनेक नदियां पर्वत, मैदान, हिम क्षेत्र और मरुस्थल में भी जीवनदायिनी बनकर बहती हैं। विभिन्न नदियों पर बने बड़े बांध जहां विद्युत उत्पादन के बड़े स्रोत हैं तो वहीं कृषि आवश्यकताओं हेतु नहरों से जल का फैलाव भी करते हैं। आज दर्जनों नदियां मर चुकी हैं, दर्जनों भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदूषण के कारण बदहाली का शिकार हैं और जो बची हैं उनमें भी पानी का स्तर लगातार कम हो रहा है। कुल मिलाकर नदियां मौन होती जा रही हैं, क्या नदियों का यह मौन मनुष्य सहित समूची जीव सृष्टि के लिए चिंताजनक नहीं है?     भारत विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। ऐसे में औद्योगिक, कृषि, पेयजल एवं खाद्यान्न हेतु जल की कमी और नदियों पर मंडराता संकट बड़ी चुनौती के रूप में सामने खड़ा है। गंगा और यमुना जैसी देश की बड़ी नदियों के किनारे अनेक औद्योगिक इकाइयां हैं। साथ ही मछली पालन के रूप में भी आजीविका के बड़े अवसर हैं लेकिन यदि नदियां मौन होती जाएगी तो इससे इन पर निर्भर लोगों को आर्थिक संकट के साथ-साथ विस्थापन भी झेलना पड़ेगा। यमुना नदी के संबंध में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की एक रिपोर्ट बताती है कि नदी के न्यूनतम बहाव के लिए जितना पानी होना चाहिए उसका आधा भी फिलहाल नहीं है। दिल्ली सहित देश के विभिन्न राज्यों एवं महानगरों में घरेलू कचरा, सीवेज और औद्योगिक दूषित जल सीधे नदियों में गिर रहा है। राजधानी दिल्ली में 28 औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र हैं जिनमें से केवल 17 कॉमन एफ्लूएंट ट्रीटमेंट प्लांट यानी सीईटी से जुड़े हैं। 11 के लिए कोई ट्रीटमेंट प्लांट है ही नहीं। जब राष्ट्रीय राजधानी की यह दशा है तो देश के अन्य औद्योगिक महानगरों की स्थिति सहज ही समझी जा सकती है। नदियों के स्वतंत्र प्रवाह में अतिक्रमण और अवैध खनन भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। अप्रैल 2025 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने देहरादून की विभिन्न नदियों, नालों और खालों से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया है। समाचारों के अनुसार देहरादून में 100 एकड़, विकासनगर में 140 एकड़, ऋषिकेश में 15 एकड़ और डोईवाला में 15 एकड़ नदियों की भूमि पर अतिक्रमण है। विगत में सुप्रीम कोर्ट भी दिल्ली में यमुना नदी को अतिक्रमण मुक्त करने का आदेश दे चुका है। देश के अन्य प्रदेशों में नदी क्षेत्र के अतिक्रमण की स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। समाचार यह भी बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया की 87 प्रतिशत नदियां गर्म हो रही हैं और 70 प्रतिशत नदियों में आक्सीजन की कमी हो रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। मौसम का चक्र बदल रहा है। दुनियाभर में नदियों का आकार भी सिकुड़ रहा है। ध्यान रहे नदियों की बदहाली और उनका मौन होना नदी के अंदर और आसपास की पारिस्थितिकी को भी गहरे प्रभावित करता है। घातक रसायनों एवं प्रदूषण के कारण नदी जीवन के लिए आवश्यक मछली, कछुए और अन्य जीवों की संख्या भी लगातार घट रही है और नदी क्षेत्र के प्रकृति-पर्यावरण में भी बदलाव देखे जा सकते हैं। मार्च 2025 के वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के एक अध्ययन से यह सामने आया है कि नदियां कार्बन डाइआक्साइड को अवशोषित करने के साथ ही उसे वातावरण में वापस छोड़ने का काम भी कर रही है… नदियों के पानी में ठहराव और प्रदूषण के कारण यदि उसका तापमान बढ़ता है तो उसमें गैसों का उत्सर्जन और तेज होगा। प्रदूषण वाले भाग पर कचरे से मिथेन गैस भी निकलती है जो कार्बन डाइआक्साइड से 21 गुना अधिक खतरनाक है।     मानसून के मौसम में नदियों में जल की अधिकता होती है। यह जल नदियों को नवजीवन प्रदान करने के साथ-साथ समूचे नदी क्षेत्र को जल से भरता है। जिससे वहां भिन्न-भिन्न प्रकार की वनस्पतियां पोषित होती हैं और आसपास के क्षेत्र में भूजल का स्तर भी संतुलित रहता है। यह नदियों का रौद्र रूप नहीं है अपितु नदी क्षेत्र में मनुष्य का अनुचित हस्तक्षेप हो रहा है इसलिए दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं। क्या यह हस्तक्षेप अनुचित नहीं है?      ध्यान रहे नदियां अपने उद्गम से फिर किसी संगम अथवा सागर तक की यात्रा में समूची जीव सृष्टि के लिए जल एवं खाद्यान्न पैदा करती हैं। समूचा जलचक्र नदियों एवं सागर के द्वारा ही पूरा होता है। क्या नदियों का मौन होना समूचे जलचक्र को प्रभावित नहीं करेगा? नदियों के पुनर्जीवन एवं संरक्षण-संवर्धन हेतु आज यह आवश्यक है कि समुचित रणनीति बनाते हुए नदियों की प्रकृति को समझकर प्रबंधन किया जाए। नदियों की स्थिति को गंभीर एवं प्रमुखता की श्रेणी में रखते हुए उससे संबंधित नौकरशाही की जिम्मेदारी तय की जाए। यह सत्य है कि पर्याप्त सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट और औद्योगिक क्षेत्र में समुचित व्यवस्था न होने के जिम्मेदार नौकरशाह हैं। बिना सरकारी और नौकरशाही सहयोग के नदी और जल स्रोतों पर अतिक्रमण और खनन संभव नहीं है। संविधान में वर्णित मौलिक कर्तव्य हमें नदी, झीलों एवं जल स्रोतों के संरक्षण-संवर्धन हेतु दायित्व देते हैं। क्या हम संविधान की भावना के अनुरूप काम कर रहे हैं? मार्च 2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदियों के विषय में अपना फैसला देते हुए कहा- गंगा और यमुना नदियां अपना अस्तित्व खोने के खतरे में हैं और इसलिए उन्हें अधिकारों के साथ कानूनी इकाई घोषित किया गया है। लेकिन यह विडंबना ही है कि कुछ समय बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी। आज हमें यह समझना होगा कि गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियां भारत की बड़ी आबादी के अस्तित्व, उनके स्वास्थ्य और जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। अनादि काल से ये नदियां मनुष्य को शारीरिक, आध्यात्मिक और भिन्न-भिन्न प्रकार का पोषण प्रदान करती रही हैं। आज जब ये जीवनदायिनी नदियां अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं, भयंकर प्रदूषण की चपेट में हैं तब यह आवश्यक है कि इन्हें कानूनी इकाई घोषित किया जाए। सरकारों के साथ-साथ समाज भी इनके संरक्षण-संवर्धन हेतु अपना दायित्व समझे,जिससे इन्हें मौन होने से बचाया जा सके क्योंकि नदियों का मौन होना समूची जीव सृष्टि के अंत की ओर बढ़ना है। डा.वेदप्रकाश

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राजनीति बिहार चुनाव : मतदाता सूची पर सवाल,राजनीतिक दलों का बवाल

बिहार चुनाव : मतदाता सूची पर सवाल,राजनीतिक दलों का बवाल

प्रदीप कुमार वर्मा बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” को लेकर मचे बवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए अपनी टिप्पणी में कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और सुप्रीम कोर्ट भी एक संवैधानिक संस्था होने के नाते दूसरी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर दखल नहीं देना चाहती। सुप्रीम कोर्ट के इस इनकार के बाद विपक्ष को इंटर्नशिप रिवीजन पर रोक लगाने की कवायद धक्का लगा है। वहीं, बिहार की सत्ता पर काबिज एनडीए गठबंधन के दलों ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का स्वागत करते हुए शुद्ध एवं अपडेट मतदाता सूची बनाने के लिए इसे एक सराहनीय कदम करार दिया है।         स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए किसी भी चुनाव से पहले मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है, जो एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन चुनाव आयोग ने इस बार एक जुलाई से मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा शुरू कर दी है। इसे लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। चुनाव आयोग की दलील है कि बिहार में मतदाता सूची की गंभीर समीक्षा की ऐसी आख़िरी प्रक्रिया 2003 में हुई थी और उसके बाद से नहीं हुई है। इसलिए ये मुहिम ज़रूरी है। मतदाता सूची की गहन समीक्षा के लिए चुनाव आयोग ने मतदाताओं के लिए एक फॉर्म तैयार किया है, जो मतदाता 1 जनवरी, 2003 की मतदाता सूची में शामिल थे, उन्हें सिर्फ़ यह गणना पत्र भरकर जमा करना है। उन्हें कोई सबूत नहीं देना होगा।         बिहार में ऐसे करीब 4.96 करोड़ मतदाता हैं। चुनाव आयोग ने 2003 की ये वोटर लिस्ट अपनी वेबसाइट पर डाल दी है। बिहार चुनाव से पूर्व मतदाता सूची की गहन समीक्षा की कवायद में यह सारा हंगामा 2003 के बाद मतदाता बने लोगों से सबूत मांगने को लेकर है। चुनाव आयोग के मुताबिक 1 जुलाई 1987 से पहले पैदा हुए नागरिकों जो 2003 की मतदाता सूची में नहीं थे, उन्हें अपनी जन्मतिथि और जन्मस्थान का सबूत देना होगा। ऐसे सभी मतदाता आज की तारीख़ में 38 साल या उससे बड़े होंगे। जो लोग 1 जुलाई 1987 से लेकर 2 दिसंबर 2004 के बीच पैदा हुए हैं, उन्हें अपनी जन्मतिथि और जन्मस्थान और अपने माता-पिता में से किसी एक की जन्मतिथि और जन्मस्थान का सबूत देना होगा।            ये सभी लोग क़रीब आज 21 से 38 साल के बीच के होंगे। इसके अलावा 2 दिसंबर 2004 के बाद पैदा हुए नागरिकों को अपनी जन्मतिथि और जन्मस्थान और अपने माता-पिता दोनों की ही जन्मतिथि और जन्मस्थान का भी सबूत देना होगा। बस इन ही सबूतों की मांग को लेकर सारा विवाद खड़ा हो गया है कि इतनी जल्दी ये सबूत कहां से लेकर आएं? चुनाव आयोग के मुताबिक 2003 के बाद बीते 22 साल में तेज़ी से शहरीकरण हुआ है यानी गांवों से लोग शहरों में गए हैं। जैसे लोगों का पलायन एवं प्रवास काफ़ी तेज़ हुआ है। इस पूरी कवायद में बिहार के लोग दूसरे राज्यों गए हैं, दूसरे राज्यों के लोग बिहार आए हैं। इसके साथ ही कई नागरिक 18 साल पूरा करने के बाद नए मतदाता बने हैं।         वहीं,कई मतदाताओं की मृत्यु की जानकारी अपडेट नहीं हुई है। सबसे अहम मतदाता सूची में दूसरे देशों से आए अवैध अप्रवासियों को भी अलग किया जाना ज़रूरी है। यही वजह है कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियां का गहन रिवीजन का काम किया जा रहा है। मतदाता सूचियां के गहन रिवीजन के इतिहास पर गौर करें,तो इससे पूर्व तत्कालीन मुख्यमंत्री राबडी देवी के शासनकाल में भी मतदाता सूचियां का गहन रिवीजन किया गया था और तब यह काम मैच 31 दिन में पूरा किया गया था। उसे दौरान चुनाव आयोग ने मात्र तीन दस्तावेजों की बाध्यता की थी बदले हुए प्रवेश में चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे मतदाता सूचियां के गहन रिवीजन के काम में चुनाव आयोग ने इस डरे को बढ़ाते हुए 11 दस्तावेज मांगे हैं।      चुनाव आयोग द्वारा मांगे जा रहे दस्तावेजों में जन्म प्रमाण पत्र,पासपोर्ट,हाईस्कूल सर्टिफिकेट,स्थायी निवास प्रमाण पत्र,वन अधिकार प्रमाण पत्र,जाति प्रमाण पत्र,एनआरसी में नाम,परिवार रजिस्टर,ज़मीन या आवास आवंटन पत्र,केंद्र या राज्य सरकार के कर्मचारी या पेंशनर का कोई आई कार्ड,सरकार या बैंक या पोस्ट ऑफ़िस या एलआईसी या सरकारी कंपनी का आई कार्ड या सर्टिफिकेट शामिल है। चुनाव आयोग के मुताबिक ये लिस्ट अंतिम नहीं है। यानी कुछ और दस्तावेज़ों को भी मान्यता दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को इस मामले में सुनवाई होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग को आधार कार्ड,मनरेगा कार्ड एवं राशन कार्ड को इस सूची में शामिल करने का आग्रह किया है।    …

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