मांसाहारी खाने पर जारी ‘सेक्युलर सियासी खेल’ के साइड इफेक्ट्स
Updated: July 24, 2025
कमलेश पांडेय सनातनी हिंदुओं के पवित्र श्रावण यानी सावन के महीने में या आश्विन माह में पड़ने वाले शारदीय नवरात्र के दिनों में पिछले कुछ वर्षों से नॉन-वेज फूड को लेकर जो विवाद सामने आ रहे हैं, वह इस बार भी प्रकट हुए और पक्ष-विपक्ष की क्षुद्र राजनीति के बीच अपनी नीतिगत महत्ता खो बैठे। वहीं, तथाकथित एनडीए शासित राज्य की बिहार विधानसभा के सेंट्रल हॉल में गत सोमवार को खाने में जिस तरह से नॉन-वेज भी परोसा गया, उसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तलवारें खिंच गई हैं। इसी तरह, यूपी में कांवड़ यात्रा मार्ग स्थित ढाबों और भोजनालयों पर दुकान मालिकों की पहचान स्पष्ट करने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में उठा। स्पष्ट है कि यहां भी मूल में भोजन ही है। इसलिए पुनः यह सवाल अप्रासंगिक है कि कोई क्या खाता है, क्या नहीं, यह पूरी तरह व्यक्तिगत मामला है और इस पर ऐसे विवाद से बचा जा सकता था। लेकिन ऐसे सो कॉल्ड सेक्यूलर्स और वेस्टर्न लॉ एडवोकेट्स को पता होना चाहिए कि सदियों से भारतीय समाज एक संवेदनशील व सुसंस्कृत समाज रहा है, जहां स्पष्ट मान्यता है कि खान-पान से व्यक्ति के मन का सीधा सम्बन्ध होता है। कहा भी गया है कि जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन। इसलिए राजा या शासक का कर्तव्य है कि वह आमलोगों को शुद्ध और सुरुचिपूर्ण भोजन ग्रहण करने योग्य कानून बनाए और उसकी सतत निगरानी रखे। चूंकि भारतीय समाज में शाकाहारी खानपान को प्रधानता दी गई है ताकि निरोगी जीवन का आनंद लिया जा सके। इसलिए ऐसे लोगों को अभक्ष्य पदार्थों यानी अंडे, मांस-मछली का दुर्गंध नहीं मिले, इसकी भी निगरानी रखना प्रशासन का काम है। वहीं, खान-पान के व्यवसाय से जुड़ी कम्पनियां शाकाहारी लोगों को मांसाहारी उत्पाद डिलीवर न कर दें, मिलावटी शाकाहारी समान न डिलीवरी कर दें, यह देखना भी प्रशासन का ही धर्म है। यदि वह धर्मनिरपेक्षता की आड़ में अपने नैतिक दायित्वों से मुंह मोडता है तो उसे भारत पर शासन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। इसलिए देश की भाजपा नीत एनडीए सरकार, या विभिन्न राज्यों की भाजपा सरकारें या एनडीए सरकारें इस बात की कोशिश कर रही हैं कि खास पर्व-त्यौहारों पर निरामिष लोगों के अनुकूल माहौल बनाए रखा जाए। आमतौर पर यह माना जाता है कि इस्लामिक शासनकाल में और ब्रिटिश शासनकाल में सनातन भूमि पर गुरुकुल, ब्रह्मचर्य व शाकाहार को हतोत्साहित किया गया और मांसाहार तथा मद्यपान को प्रोत्साहित किया गया। जिससे कई सामाजिक कुरूतियों जैसे कोठा संस्कृति वाली वैश्यावृत्ति और अनैतिक अपराध को बढ़ावा मिला। ऐसा इसलिए कि दूषित अन्न खाने व दूषित पेय-पदार्थ पीने से मानवीय मनोवृत्ति विकृत हुई। इसलिए कहा जा सकता है कि उदार और सहनशील भारतीय समाज का जो नैतिक पतन हुआ है, कभी-कभी स्थिति पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों के काबू से बाहर हो जाती है, उसका सीधा सम्बन्ध असामाजिक तत्वों के खानपान से भी है। इसलिए इस अहम मुद्दे के सभी पहलुओं पर निष्पक्षता पूर्वक विचार होना चाहिए। इस मामले में आधुनिक प्रशासन का ट्रैक रिकार्ड बेहद ही खराब रहा है, अन्यथा जानलेवा मिलावट खोरी इतनी ज्यादा नहीं पाई जाती। मीडिया रिपोर्ट्स भी इसी बात की चुगली करती आई हैं। जहां तक व्यक्तिगत चुनाव की बात है तो यह अपने घर पर ही लागू हो सकते हैं, सार्वजनिक जगहों पर बिल्कुल नही। इस बात में कोई दो राय नहीं कि खाने-पीने की पसंद किसी व्यक्ति की पहचान और उसकी संस्कृति का हिस्सा होती है। इसलिए भारत में जैसी विविधता पूर्ण संस्कृति रहती आई है, वैसे ही यहां के खाने में भी विविधता सर्वस्वीकार्य है। इसलिए किसी को क्या खाना चाहिए, इसकी पुलिसिंग होनी चाहिए या नहीं, विवाद का विषय है। कहना न होगा कि जैसे कानून किसी को भी जहर खाने की इजाजत नहीं देता है, वैसे ही मीठे जहर के रूप में प्रचलित बाजारू चीजों की भी जांच-पड़ताल की जानी चाहिए और यदि वे जनस्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल हों तो उनपे निर्विवाद रूप से रोक भी लगनी चाहिए। यही बात मांसाहार पर भी लागू होनी चाहिए, क्योंकि इससे मानवीय शरीर में विभिन्न प्रकार के संक्रामक रोगाणुओं को भी बढ़ावा मिलता है। बर्ड फ्लू इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। कुछ लोग बताते हैं कि लोगों के खानपान की पुलिसिया निगरानी या ऐसी कोई भी कोशिश संविधान के उस अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगी, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है। इसलिए भोजन और पहनावा भी इसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। लेकिन यह सिर्फ घर के चहारदीवारी के भीतर होनी चाहिए, वो भी तभी तक जब तक कि पड़ोसी को आपत्ति नहीं हो। ऐसा इसलिए कि आधुनिक फ्लैट संस्कृति में एक घर के रसोई की सुगंध या दुर्गंध पड़ोसियों के बेडरूम तक पहुंच जाती हैं। इसलिए भोजन निजी पसंद की चीज है, लेकिन बगलगीर की भावनाओं का सम्मान करना भी मांसाहारियों की नैतिक जिम्मेदारी है, क्योंकि कुछ शाकाहारी लोग तो दुर्गंध मात्र से उल्टी कर बैठते हैं। इससे उनका जीवन भी खतरे में आ जाता है। इसलिए यह राजनीतिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि सियासी सूझबूझ का परिचायक समझा जा सकता है। भारतीय राजनीति की एक सबसे बड़ी कमी यह महसूस की जाती है कि हमारी कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया को जनहितैषी बनाने में यह विगत सात-आठ दशकों में भी शत-प्रतिशत क्या, पचास प्रतिशत भी सफल नहीं हुई है। लोकतंत्र और पाश्चात्य लोकतांत्रिक मूल्यों, जिस खुद पश्चिमी देश अपनी सुविधा के अनुसार चलते हैं, भारत में आँखमूद कर लागू कर दिए जाते हैं। इसलिए व्यापक जनहित का सवाल व्यवहारिक रूप से काफी पीछे छूट जाता है। हालांकि इसके बाद भी सावन में पिछले कुछ वर्षों से नॉन-वेज फूड को लेकर विवाद खड़े होते रहे हैं। देखा जाए तो ज्यादातर के मूल में राजनीति होती है। बिहार में दो साल पहले भी सावन पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी का आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी के घर जाकर मटन पकाना एक सियासी मुद्दा बन गया था। कुछ दिनों पहले, जब प्रशांत किशोर की पार्टी में बिरयानी बंटी, तब भी हंगामा हुआ और सफाई देनी पड़ी कि यह तो वेज थी ! यही वजह है कि खानपान को लेकर नीतिगत संतुलन की जरूरत सबको है। इसलिए आस्था को भोजन के साथ मिलाने पर जो समस्या खड़ी होती है, वैसी ही समस्या इसकी अनदेखी के पश्चात भी खड़ी होती बताई जाती है। चूंकि दोनों ही निजी मामले हैं और दोनों में ही किसी को दखल देने का हक नहीं है। हां, यह जरूर है कि जब बात किसी खास आयोजन या धार्मिक अवसर पर किसी समुदाय की भावनाओं से जुड़ी हो, तो वहां सभी पक्षों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत पड़ती है। ऐसा ही होता भी आया है। वहीं, भोजन किसी व्यक्ति की गरिमा का सवाल भी है। असल में, भोजन केवल भूख से नहीं, व्यक्ति की गरिमा से भी जुड़ा होता है। यह सम्मान के साथ कमाने और खाने का हक इस देश के सभी नागरिकों को देता है। किसी भी वजह से इन हकों को छीनने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। फिर यह भी देखना चाहिए कि खाने का इस्तेमाल राजनीति की बिसात पर न हो। साथ ही, इस राजनीति से लोगों की रोजी-रोटी पर आंच भी नहीं आनी चाहिए। आखिर हमें यह मानना पड़ेगा कि भजन की तरह भोजन भी स्वरूचि का विषय है लेकिन जिस तरह से भजन का नाता आतंकवाद और विघटन कारी तत्वों से जुड़ गया है, कुछ वैसी ही आशंका भोजन को लेकर भी जन्म ले रही हैं। इसलिए विधायी, प्रशासनिक, न्यायिक और मीडिया के स्वविवेक से जब इस जटिल मुद्दे का समाधान भारतीय सभ्यता-संस्कृति के अनुरूप निकाला जाएगा तो मुझे उम्मीद है कि शाकाहारी लोगों की जनभावना आहत नहीं होंगी। कमलेश पांडेय
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ब्रिटेन के समझौते से किसको संदेश दे रहे मोदी
Updated: July 24, 2025
राजेश कुमार पासी प्रधानमंत्री मोदी ब्रिटेन की विदेश यात्रा पर हैं, जहां भारत ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने वाला है। 2022 से इसके लिए भारत सरकार और ब्रिटिश सरकार के बीच बातचीत चल रही थी और अब इस समझौते पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं। बेशक ये समझौता भारत और ब्रिटेन के बीच होने जा रहा है लेकिन इस समझौते से मोदी पूरी दुनिया को एक संदेश देने जा रहे हैं। विशेष तौर पर मोदी इस समझौते के जरिये अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक बड़ा संदेश देने जा रहे हैं। जब से भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम हुआ है तब से डोनाल्ड ट्रंप यह राग अलाप रहे हैं कि उन्होंने दोनों देशों के युद्ध विराम करवाया था । भारत सरकार द्वारा अधिकारिक रूप से नकार दिये जाने के बावजूद उनका राग अलापना बंद नहीं हुआ है । उनका कहना है कि उन्होंने दोनों देशों को ट्रेड डील करने की बात कहकर मनाया था । सवाल यह है कि पाकिस्तान ऐसा क्या बनाता है जिससे वो अमेरिका के साथ व्यापार करने जा रहा है । दूसरा सवाल यह है कि अमेरिका की कई धमकियों के बावजूद भारत ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की तरफ कदम नहीं बढ़ाए हैं । जो समझौता हुआ ही नहीं, उसके कारण कैसे भारत पाकिस्तान अमेरिकी प्रभाव में युद्ध रोकने के लिए सहमत हो गए । जहां भारत का अमेरिका के साथ अभी तक व्यापार समझौता नहीं हो पाया है तो वहीं दूसरी तरफ तीन वर्षों की मेहनत के बाद ब्रिटेन के साथ भारत का समझौता होने जा रहा है । भारत इस समझौते के जरिये अमेरिका को संदेश दे रहा है कि वो अपने हितों के साथ कोई समझौता नहीं करने वाला है । इस समझौते के जरिये भारत ने सुनिश्चित किया है कि उसके 99 प्रतिशत निर्यात उत्पादों को ब्रिटेन में जीरो डयूटी श्रेणी में रखा जाएगा । भारत पर अमेरिका द्वारा लगातार डेडलाइन देकर समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा है लेकिन भारत ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि वो किसी डेडलाइन के डर से समझौता नहीं करने वाला है । भारत अपने हितों को देखते हुए ही अमेरिका के साथ समझौता करेगा । वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अमेरिका को कहा था कि हम समझौता जरूर करेंगे लेकिन बिना किसी डेडलाइन के करेंगे । उन्होंने कहा था कि इस तरीके से बातचीत की जाएगी तो हमें कोई ट्रेड डील नहीं करनी है । पहले अमेरिका ने 9 जुलाई की डेडलाइन दी थी और अब इसे बढ़ाकर 31 जुलाई कर दिया गया है । अमेरिकी दबाव का नतीजा ये निकला है कि भारत सरकार ने अन्य देशों के साथ व्यापार करने के लिए जो शर्ते तय की थी, उनके अनुसार अमेरिका के साथ बातचीत नहीं होने जा रही है बल्कि भारत का कहना है कि जैसे अमेरिका बात करेगा, उससे वैसे ही बात की जाएगी । भारत का अमेरिका को सीधा संदेश है कि वो किसी दबाव में व्यापार समझौता करने वाला नहीं है । भारत और ब्रिटेन के बीच फ्री ट्रेड डील की बातचीत के दौरान ब्रिटेन के तीन प्रधानमंत्री बदल गए लेकिन बातचीत चलती रही । इससे यह भी संदेश जाता है कि ट्रेड डील किन्हीं दो लोगों के बीच नहीं होती बल्कि दो देशों के बीच होती है । बिट्रिश प्रधानमंत्री स्ट्रार्मर ने कहा है कि ब्रेग्जिट के बाद ये उनके देश की सबसे बड़ी ट्रेड डील होने वाली है । उनका कहना है कि इससे दोनों देशों को बड़ा फायदा होने वाला है । इस समझौते से भारत में 50 लाख नौकरियां पैदा होने की संभावना है और मेक इन इंडिया को इससे फायदा होने की संभावना जताई जा रही है । भारत इससे यह संदेश दे रहा है कि अमेरिका भारत को कमजोर देश न समझे. हो सकता है कि उसकी दबाव बनाकर समझौता करने की रणनीति कुछ देशों के साथ सफल हो गई हो लेकिन भारत के मामले में ऐसा होने वाला नहीं है । अमेरिका को समझना होगा कि उसकी भारत के साथ इस मामले की कई बैठकें हो चुकी हैं लेकिन अभी तक कोई परिणाम नहीं निकला है । यहां तक कि कोई छोटी डील भी नहीं हो सकी है । अमेरिका की दबाव बनाने की रणनीति का ये परिणाम निकला है कि भारत ने कई ऐसे क्षेत्रों को बातचीत से बाहर निकाल दिया है जिन्हें पहले वो अमेरिका के लिए खोलने की बात करने वाला था । भारत दूसरे देशों को उन क्षेत्रों में आने के लिए बात करने के लिए तैयार है लेकिन अमेरिका से अब उन क्षेत्रों के बारे में कोई बात नहीं होगी । भारत ने अमेरिका को बता दिया है कि बिना किसी दबाव के भी दूसरे देशों के साथ समझौता किया जा सकता है । जहां तक भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाले समझौते की बात है तो दोनों देशों ने इसके लिए चौदह दौर की बातचीत की है और इसके बाद ही दोनों देशों के बीच सहमति बनी है । मोदी जी की उपस्थिति में इस पर हस्ताक्षर होने वाले हैं । इस समझौते का लक्ष्य है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक दोगुना करके 120 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया जाए । इस समझौते से भारत के वस्त्र उद्योग, इंजीनियरिंग उत्पाद, दवाएं और अन्य कई प्रमुख क्षेत्रों के लिए ब्रिटेन का बाजार शून्य शुल्क या कम शुल्क में उपलब्ध हो जाएगा । इसके अलावा भारत के कामगारों और प्रोफेशनल को ब्रिटेन में काम करने में आसानी होगी और उनको सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाएगी और उन्हें ब्रिटेन की पेंशन योजना के लिए कोई पैसा नहीं देना होगा। ब्रिटेन को भी इस समझौते से बड़ा फायदा होने जा रहा है। ब्रिटेन के अल्कोहल और यात्री कारों को भारत के बाजार में जगह मिलेगी. इन्हें शुल्कमुक्त नहीं किया जा रहा है लेकिन दूसरे देशों के मुकाबले बहुत कम शुल्क पर भारत में इनकी बिक्री हो सकेगी। इसके अलावा कई अन्य क्षेत्रों में ब्रिटिश सामानों को भारत में सस्ते में बेचा जा सकेगा। इससे ब्रिटिश सामान दूसरे देशों की तुलना में भारत में काफी सस्ते हो जाएंगे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ब्रिटेन की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए यूरोपियन यूनियन के साथ दोबारा जुड़ना चाहते हैं लेकिन ब्रिटेन को यह भी समझ आ रहा है कि यूरोपियन यूनियन की अर्थव्यवस्था खुद ही डूब रही है तो उसके साथ जुड़कर ब्रिटिश अर्थव्यवस्था कैसे ऊपर उठ सकती है। यही कारण है कि ब्रिटेन दूसरे देशों की तरफ देख रहा है। ब्रिटेन को चीन से भी बड़ी उम्मीद है लेकिन चीन की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है और चीन की अर्थव्यवस्था भी नीचे की ओर जा रही है। ऐसे हालात में ब्रिटेन भारत की अनदेखी नहीं कर सका है और उसका भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता होने जा रहा है। भारत के लिए अब यूरोपियन यूनियन का रास्ता भी खुलने जा रहा है। पीएम मोदी इस समझौते के जरिये दुनिया को संदेश दे रहे हैं कि अब भारत की अनदेखी कोई देश नहीं कर सकता हालांकि यह भी सच है कि अमेरिका के साथ भारत के व्यापार को देखते हुए ब्रिटेन के साथ हुआ समझौता ज्यादा महत्वपूर्ण नजर नहीं आता है। लेकिन सच यह भी है कि ऐसे कई समझौते मिलकर बड़ा असर दिखा सकते हैं। अमेरिका को समझना होगा कि जैसे भारत को अमेरिका की जरूरत है वैसे ही अमेरिका को भारत की जरूरत है। अमेरिका भारत को धमकी देना बंद करके आपसी समझ के साथ आगे बढ़े ताकि दोनों देशों के बीच सहमति से व्यापार समझौता हो जाये । इससे दोनों देशों को ही फायदा होगा। डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और बयानों के कारण भारत और अमेरिका के बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है और दूसरी तरफ रूस और चीन भारत को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका की गलती के कारण रूस पहले ही चीन के साथ जुड़ चुका है, अगर अमेरिका नहीं संभला तो भारत का रूस और चीन के साथ ऐसा गठजोड़ बन सकता है जो अमेरिका के वैश्विक प्रभाव को बहुत कम कर देगा । अमेरिका की खुशकिस्मती यह है कि भारत चीन पर भरोसा नहीं करता है इसलिए इस संभावित गठजोड़ से दूरी बनाए हुए है । मोदी इस समझौते के जरिये देश को भी संदेश दे रहे हैं कि वो किसी के दबाव में नहीं आते हैं । मोदी के लिए देशहित से ऊपर कुछ भी नहीं है और अमेरिका के सामने भी वो झुकने वाले नहीं हैं । राजेश कुमार पासी
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कर्नाटक का ‘रोहित वेमुला विधेयक 2025’ हिन्दुओं को बाँटने की साजिश तो नहीं!
Updated: July 24, 2025
रामस्वरूप रावतसरे कर्नाटक में सिद्दारमैया सरकार आगामी मानसून सत्र में ‘रोहित वेमुला विधेयक 2025’ को पेश करने की पूरी तैयारी कर चुकी है। राहुल गाँधी के ‘हुक्म’…
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हाइड्रोपोनिक खेती: भविष्य की दिशा या सीमित समाधान?
Updated: July 24, 2025
सचिन त्रिपाठी भारत कृषि प्रधान देश है परंतु कृषि आज भी एक असुरक्षित, अनिश्चित और घाटे का सौदा बनी हुई है। भूमि क्षरण, जल संकट, मौसम की मार, लागत में वृद्धि और बाजार की अस्थिरता ने किसानों को वैकल्पिक तकनीकों की ओर देखने के लिए मजबूर कर दिया है। ऐसे में ‘हाइड्रोपोनिक’ खेती अर्थात मिट्टी रहित, नियंत्रित वातावरण में पौधों की खेती को कृषि क्षेत्र के भविष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह तकनीक भारत के किसानों के लिए व्यावहारिक और टिकाऊ समाधान बन सकती है? हाइड्रोपोनिक खेती की शुरुआत नीदरलैंड, इजरायल और अमेरिका जैसे देशों में हुई जहां भूमि और जल की सीमित उपलब्धता ने वैज्ञानिकों को नियंत्रित खेती की दिशा में प्रयोग के लिए प्रेरित किया। आज इजरायल इस तकनीक में वैश्विक अगुवा है जहाँ रेगिस्तानी क्षेत्रों में अत्याधुनिक हाइड्रोपोनिक फार्म फसल उत्पादन कर रहे हैं। अमेरिका और कनाडा में यह तकनीक शहरी कृषि, सुपरमार्केट और ग्रीन रेस्टोरेंट्स के लिए ताज़ी सब्जियों की आपूर्ति का मुख्य आधार बन चुकी है। जापान और सिंगापुर जैसे देश जहां कृषि भूमि सीमित है, वहां हाइड्रोपोनिक्स वर्टिकल फार्मिंग के साथ जोड़ा गया है। भारत में इस तकनीक को अब धीरे-धीरे अपनाया जा रहा है, विशेष रूप से बड़े शहरों और कुछ विकसित राज्यों में। बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, गुरुग्राम, अहमदाबाद जैसे शहरों में कई निजी स्टार्टअप शहरी हाइड्रोपोनिक फार्मिंग को बढ़ावा दे रहे हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, हरियाणा और तेलंगाना की सरकारों ने इस तकनीक के लिए कुछ प्रोत्साहन योजनाएं भी चलाई हैं। हालांकि भारत में अब तक यह तकनीक प्रायोगिक और व्यावसायिक सीमित क्षेत्रों तक ही केंद्रित है। गांवों या छोटे किसानों में इसका प्रसार नगण्य है। भारत सरकार की ‘स्मार्ट एग्रीकल्चर’ और ‘डिजिटल इंडिया’ पहल के तहत नवीन कृषि तकनीकों को बढ़ावा देने की दिशा में कुछ प्रयास हो रहे हैं। कृषि मंत्रालय ने ‘प्रिसिजन फार्मिंग’ और ‘कंट्रोल्ड एनवायरनमेंट एग्रीकल्चर’ को प्राथमिकता क्षेत्र बताया है और विभिन्न राज्य सरकारें स्टार्टअप्स को सहायता दे रही हैं परंतु, जमीनी स्तर पर इसे अपनाने में अभी भी कई बाधाएं हैं ,खासकर पूंजी, प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचे की सीमाओं के कारण। हाइड्रोपोनिक सिस्टम की स्थापना में प्रति एकड़ ₹25 लाख से अधिक का खर्च आता है। 86% भारतीय किसान सीमांत और छोटे हैं जिनकी वार्षिक कृषि आय ₹1 लाख से भी कम है। यह तकनीक उनके लिए सुलभ नहीं है। यह खेती ‘लो टेक’ नहीं है। पीएच बैलेंस, इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी, नमी नियंत्रण, पोषक घोल का ज्ञान ये सब आवश्यक हैं। ग्रामीण किसानों के पास इसके लिए प्रशिक्षण और संसाधन नहीं हैं। सतत और गुणवत्ता युक्त जल तथा बिजली की उपलब्धता इस तकनीक की रीढ़ है। भारत के अनेक गांवों में अभी भी ये आधारभूत सुविधाएं बाधित रहती हैं। हाइड्रोपोनिक उत्पादों की मांग फिलहाल शहरी उच्च वर्ग तक सीमित है। बाजार की सीमाएं और मूल्य अस्थिरता इसे जोखिम भरा बना देती हैं। भारत में एक समान नीति लागू नहीं की जा सकती। जल संकट से जूझते राज्यों (जैसे राजस्थान, तमिलनाडु) और शहरी क्षेत्रों के पास स्थित बेल्ट्स को प्राथमिकता दी जाए। एफपीओ, एसएचजी या कृषि स्टार्टअप्स के माध्यम से साझा हाइड्रोपोनिक यूनिट्स को प्रोत्साहित किया जाए ताकि लागत और जोखिम का बंटवारा हो। केवीके और कृषि विश्वविद्यालयों के माध्यम से व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए। अनुसंधान संस्थानों को भारतीय जलवायु के अनुकूल प्रणाली विकसित करने की दिशा में कार्य करना चाहिए। नाबार्ड और अन्य वित्तीय संस्थानों को हाई रिस्क कृषि निवेश के लिए विशेष स्कीम लानी चाहिए। बीमा सुरक्षा और मूल्य गारंटी योजना तकनीक को अपनाने में सहायक होगी। हाइड्रोपोनिक खेती कोई ‘मैजिक बुलेट’ नहीं है जो सभी समस्याओं का समाधान कर दे। परंतु यह तकनीक भारत के बदलते कृषि संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उपकरण बन सकती है यदि इसे व्यवस्थित, नीति-सहायक और क्षेत्रीय जरूरतों के अनुसार लागू किया जाए। यह तकनीक उन किसानों के लिए व्यवहारिक है जो शहरी मांगों से जुड़े हैं, पूंजी और तकनीकी पहुंच रखते हैं, या जो संगठित समूहों के तहत काम करते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, एक तकनीक सभी के लिए नहीं हो सकती, लेकिन सही क्षेत्र, सही समूह और सही नीति के तहत हाइड्रोपोनिक खेती भविष्य की दिशा तय कर सकती है। सचिन त्रिपाठी
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कीर्ति सुरेश के करियर का दूसरा फेज़
Updated: July 24, 2025
सुभाष शिरढोनकर तमिल, मलयालम और तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री में जाना-माना नाम बन चुकी एक्ट्रेस कीर्ति सुरेश साउथ इंडस्ट्री की फेमस एक्ट्रेस में से हैं। उन्हें लीड…
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सावन, शिव और प्रेम: भावनाओं की त्रिवेणी
Updated: July 24, 2025
सावन का महीना भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में एक विशेष स्थान रखता है। यह वह समय है जब धरती हरी चादर ओढ़ लेती है,…
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वेदों में पर्यावरण के महत्व और प्रकृति सुरक्षा चक्र को हमने ध्वस्त किया !
Updated: July 24, 2025
आत्माराम यादव पीव पृथ्वी को ईश्वर का रूप मानने वाले भारत के मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व मानव जीवन के कल्याणार्थ सृष्टि के…
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सतीसर से कश्मीर
Updated: July 24, 2025
कहते हैं कि मुग़ल बादशाह जहांगीर जब पहली बार कश्मीर पहुंचे तो उनके मुंह से सहसा निकल पड़ा: “गर फिरदौस बर रूए ज़मीन अस्त,हमीं असतो,हमीं असतो,हमीं…
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स्वच्छता एवं नशामुक्ति के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य करते सामाजिक संगठन
Updated: July 24, 2025
इस धरा पर जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव के लिए प्रकृति ने पर्याप्त खाद्य पदार्थ दिए हैं परंतु अति लालच के चलते मानव ने प्रकृति का शोषण करना शुरू कर दिया है। इसमें कोई अब कोई संदेह नहीं रह गया है कि मानव ने अपनी जिंदगी को आसान बनाने के लिए पर्यावरण का अत्यधिक नुक्सान किया है और इसका परिणाम आज उसे ही भुगतना भी पड़ रहा है। कई देशों में तो भयंकर गर्मी में वहां के जंगलों में आग लगने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं जिनसे जान और माल की भारी हानि हो रही है। हम पर्यावरण के सम्बंध में बढ़ चढ़ कर चर्चाएं तो करते हैं परंतु आज हमारे गावों में खेत, प्लाटों में परिवर्तित हो गए हैं। हमारे खेतों पर शोपिंग काम्प्लेक्स एवं माॅल खड़े हो गए हैं जिससे हरियाली लगातार कम होती जा रही है। बीते कुछ वर्षों में कंकरीट की इमारतों में अत्यधिक वृद्धि एवं भूमि प्रयोग में बदलाव के चलते भारत में भी तापमान लगातार बढ़ रहा है। देश के महानगर अर्बन हीट आइलैंड बन रहे हैं। अर्बन हीट आइलैंड वह क्षेत्र होता है जहां अगल-बगल के इलाकों से अधिक तापमान रहता है। कई स्थानों पर अत्यधिक गर्मी के पीछे अपर्याप्त हरियाली, अधिक आबादी, घने बसे घर और इंसानी गतिविधियां जैसे गाडियों और गैजेट से निकलने वाली हीट आदि कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। कार्बन डाईआक्साइड और मेथेन जैसी ग्रीन हाउस गैसों एवं कूड़ा जलाने से भी गर्मी बढ़ती है। राजधानी दिल्ली का उदाहरण हमारे सामने है। जहां चारों दिशाओं में बने डंपिंग यार्डों में आग लगी ही रहती है और लोगों का सांस लेना भी अब दूभर हो रहा है। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो यानी कार्बन उत्सर्जन रहित अर्थव्यवस्था का लक्ष्य तय किया हुआ है। यद्यपि पर्यावरण रक्षा में भारत के प्रयास बहुआयामी रहे हैं लेकिन यह प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक देशवासी प्राकृतिक संसाधनों का अनावश्यक अत्यधिक शोषण करना बंद नहीं करते। शहरों के बढ़ते तापमान की रोकथाम हेतु जरूरी है कि मौसम और वायु प्रवाह का ठीक तरह से नियोजन किया जाए। हरियाली का विस्तार, जल स्रोतों की सुरक्षा, वर्षा जल संचय, वाहनों एवं एयर कंडीशंस की संख्या की कमी से ही हम प्रचंड गर्मी को कम कर सकते हैं। पृथ्वी का तापमान घटेगा तभी मानव सुरक्षित रह पाएगा। उक्त संदर्भ में यह हम सभी भारतीयों के लिए हर्ष का विषय होना चाहिए कि हमारे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन मौजूद हैं जो सदैव ही सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सेवा कार्य करने वाले संगठनों को साथ लेकर, देश पर आने वाली किसी भी विपत्ति में आगे आकर, सेवा कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं। भारत के पर्यावरण में सुधार लाने की दृष्टि से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तो बाकायदा एक नई पर्यावरण गतिविधि को ही प्रारम्भ कर दिया है। जिसके अंतर्गत समाज में विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले संगठनों को साथ लेकर संघ द्वारा देश में प्लास्टिक का उपयोग बिल्कुल नहीं करने का अभियान प्रारम्भ किया गया है और देश में अधिक से अधिक पेड़ लगाने की मुहिम प्रारम्भ की गई है। साथ ही, विभिन्न शहरों को स्वच्छ एवं नशामुक्त बनाने हेतु भी विशेष अभियान प्रारम्भ किए हैं। उदाहरण के तौर पर ग्वालियर को स्वच्छ, नशामुक्त एवं प्लास्टिक मुक्त शहर बनाने का बीड़ा उठाया गया है। इसी संदर्भ में ग्वालियर महानगर में विविध संगठनों के दायित्ववान कार्यकर्ताओं का दो दिवसीय शिविर आयोजित किया गया था। इस शिविर के एक विशेष सत्र में इस बात पर विचार किया गया कि ग्वालियर महानगर को स्वच्छ एवं नशामुक्त बनाया जाना चाहिए। उक्त शिविर के समापन के पश्चात उक्त समस्याओं के हल हेतु विविध संगठनों के दायित्ववान कार्यकर्ताओं की तीन बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में विस्तार से विचार करने के उपरांत यह निर्णय लिया गया कि कुछ चिन्हित कार्यकर्ताओं को विभिन्न मठ, मंदिरों, स्कूलों, संस्थानों आदि में विषय प्रस्तुत करने हेतु भेजा जाए ताकि उक्त समस्याओं के हल में समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। इस संदर्भ में चुने गए 60 कार्यकर्ताओं के लिए एक वक्ता कार्यशाला का आयोजन भी किया गया। इन चिन्हित कार्यकर्ताओं को विभिन संस्थानों में विषय प्रस्तुत करने हेतु भेजा गया था ताकि उक्त समस्याओं के हल करने हेतु समाज को भी साथ में लेकर कार्य को सम्पन्न किया जा सके। साथ ही, ग्वालियर को प्रदूषण मुक्त सुंदर नगर बनाए जाने के अभियान को स्थानीय जनता के बीच ले जाने हेतु, माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर दिनांक 25 दिसम्बर 2024 को, ग्वालियर के चुने हुए 29 चौराहों पर मानव शृंखलाएं बनाई गई थी, लगभग 8,000 नागरिकों ने इस मानव शृंखला में भागीदारी की थी। इसी प्रकार, ग्वालियर को व्यसन मुक्त नगर बनाए जाने के अभियान को स्थानीय जनता के बीच ले जाने हेतु, स्वामी विवेकानंद जी के जन्म दिवस एवं अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के शुभ अवसर पर, दिनांक 12 जनवरी 2025 को एक विशाल मेराथन दौड़ का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम के आयोजन में स्थानीय प्रशासन का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ एवं लगभग 6,000 नागरिकों ने इस मेराथन दौड़ में भाग लिया था। संघ के ग्वालियर विभाग द्वारा ग्वालियर महानगर में अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाने की मुहिम प्रारम्भ की गई। जिसके अंतर्गत ग्वालियर के कई विद्यालयों में वहां के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को साथ लेकर स्वयंसेवकों द्वारा नगर में भारी मात्रा में पौधारोपण किया गया। ग्वालियर की पहाड़ियों पर भी इस मानसून के मौसम के दौरान हजारों की संख्या में नए पौधे रोपे गए हैं। गजराराजा स्कूल, केआरजी महाविद्यालय एवं गुप्तेश्वर मंदिर की पहाड़ियों को तो पूर्णत: हरा भरा बना दिया गया है। नगर के प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा नगर के विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संगठनों, व्यावसायिक संगठनों, धार्मिक संगठनों, एवं नगर के विभिन्न चौराहों पर नागरिकों को शपथ दिलाई जा रही है कि “मैं ग्वालियर नगर को प्लास्टिक मुक्त बनाने हेतु, आज से प्लास्टिक का उपयोग बिल्कुल नहीं करूंगा”। अभी तक एक लाख से अधिक नागरिकों को यह शपथ दिलाई जा चुकी है। कई स्कूल, कई मंदिर एवं कई महाविद्यालय (लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान – एलएनआईपीई सहित) पोलिथिन मुक्त हो चुके हैं। इसी प्रकार, ट्रिपल आईटीएम प्रबंधन के प्रयास से संस्थान के आसपास दुकानदारों द्वारा मादक पदार्थों के बिक्री करना बंद कर दिया गया है। साथ ही, ग्वालियर महानगर में एक लाख से अधिक नागरिक, नशा नहीं करने का संकल्प ले चुके हैं। विभिन्न मठ, मंदिरों एवं गुरुद्वारों में भंडारों का आयोजन किया जाता है। इन भंडारों में अब प्रसादी को दोनों, पत्तलों में परोसा जाने लगा है एवं प्लास्टिक का उपयोग लगभग बंद कर दिया गया है। साथ ही, इन मंदिरों के आसपास प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा डस्टबिन रखवाये गए हैं, ताकि कचरे को यहां वहां न फैला कर इन डस्टबीन में डाला जा सके। इससे, मठ, मंदिरों एवं गुरुद्वारों के आसपास के इलाके स्वच्छ रहने लगे हैं। ग्वालियर महानगर के जनप्रतिनिधि विभिन्न मैरिज गार्डन में जाकर इनके मालिकों से लगातार चर्चा कर रहे हैं कि इन मैरिज गार्डन में अमानक पॉलीथिन का उपयोग बिलकुल नहीं होना चाहिए। इसका असर यह हुआ है कि अब मैरिज गार्डन में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में प्लास्टिक का उपयोग धीरे धीरे कम होता हुआ दिखाई दे रहा है। नागरिकों को कपड़े से बने थैले भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं, ताकि बाजारों से सामान खरीदते समय इन कपड़े के थैलों का इस्तेमाल किया जा सके और प्लास्टिक के उपयोग को तिलांजलि दी जा सके। प्लास्टिक के उपयोग को खत्म करने के उद्देश्य से गणेशोत्सव के पावन पर्व पर नगर में विभिन्न गणेश पांडालों में बच्चों द्वारा नाटक भी खेले गए। साथ ही, संघ ने अपने स्वयंसेवकों को आग्रह किया है कि संघ द्वारा आयोजित किए जाने वाले किसी भी कार्यक्रम में प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। और, अब संघ के कार्यक्रमों में इस बात का ध्यान रखा जाने लगा है कि प्लास्टिक का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाय। ग्वालियर के नागरिकों, विविध संगठनों, सामाजिक संस्थानों एवं प्रशासन द्वारा लगातार किए गए प्रयासों के चलते ग्वालियर महानगर को स्वच्छ सर्वेक्षण 2024 के अंतर्गत राज्य स्तरीय मिनिस्ट्रीयल अवार्ड के लिए चुना गया है। यह पुरस्कार 17 जुलाई 2025 को दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू द्वारा प्रदान किया जाएगा। इसी प्रकार, सिविल अस्पताल, हजीरा, जिला ग्वालियर को स्थानीय नागरिकों को उच्च स्तर की गुणवत्ता पूर्ण संक्रमण रहित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने हेतु राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, मध्य प्रदेश से प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ है। जब पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन आगे आकर समाज के अन्य संगठनों को साथ लेकर देश के पर्यावरण में सुधार लाने हेतु कार्य प्रारम्भ करेंगे तो भारत के पर्यावरण में निश्चित ही सुधार दृष्टिगोचर होने लगेगा। प्रहलाद सबनानी
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