राजनीति बड़ी जीत है द रेजिस्टेंट फ्रंट का आतंकी संगठन घोषित होना

बड़ी जीत है द रेजिस्टेंट फ्रंट का आतंकी संगठन घोषित होना

-ललित गर्ग- पहलगाम में जब आतंकी हमले में निर्दोषों का रक्त बहा, आहें एवं चीखें गूंजी, जिसने न केवल देश एवं दुनिया को झकझोर दिया…

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लेख मायका

मायका

  – प्रियंका सौरभ तेरहवीं की भीड़ अब छँट चुकी थी। जो रिश्तेदार आए थे, वे अब लौट चुके थे। दीवारों पर अब भी माँ…

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आर्थिकी ऑनलाइन भुगतान के मामले में भारत के यूपीआई ने अमेरिका के वीजा को पीछे छोड़ा

ऑनलाइन भुगतान के मामले में भारत के यूपीआई ने अमेरिका के वीजा को पीछे छोड़ा

हाल ही के समय में भारत, विभिन्न क्षेत्रों में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नित नए रिकार्ड बना रहा है। कुछ क्षेत्रों में तो अब भारत पूरे विश्व का नेतृत्व करता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत ने बैंकिंग व्यवहारों के मामले में तो जैसे क्रांति ही ला दी है। अभी हाल ही में आर्थिक क्षेत्र में बैंकिंग व्यवहारों के मामले में भारत के यूनफाईड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) ने अमेरिका के 67 वर्ष पुराने वीजा एवं मास्टर कार्ड के पेमेंट सिस्टम को प्रतिदिन होने वाले आर्थिक व्यवहारों की संख्या के मामले में वैश्विक स्तर पर पीछे छोड़ दिया है। वैश्विक स्तर पर अब भारत विश्व का सबसे बड़ा रियल टाइम पेमेंट नेटवर्क बन गया है।  भारत में वर्ष 2016 के पहिले ऑनलाइन पेमेंट का मतलब होता था केवल वीजा और मास्टर कार्ड। वीजा और मास्टर कार्ड को चलाने वाली अमेरिका की ये दोनों कंपनिया पूरी दुनिया में ऑनलाइन पेमेंट का एकाधिकार रखती थीं। वीजा की शुरुआत, अमेरिका में वर्ष 1958 में हुई थी और धीमे धीमे यह कंपनी 200 से अधिक देशों में फैल गई और ऑनलाइन भुगतान के मामले में पूरे विश्व पर अपना एकाधिकार जमा लिया। वैश्विक स्तर पर इस कम्पनी को चुनौती देने के उद्देश्य से भारत ने वर्ष 2016 में अपना पेमेंट सिस्टम, यूपीआई के रूप में, विकसित किया और वर्ष 2025 आते आते भारत का यूपीआई सिस्टम आज पूरे विश्व में प्रथम स्थान पर आ गया है। यूपीआई पेमेंट सिस्टम के माध्यम से ओनलाइन बैकिंग व्यवहार चुटकी बजाते ही हो जाते है। आज सब्जी वाले, चाय वाले, सहायता प्राप्त करने वाले नागरिक एवं छोटी छोटी राशि के आर्थिक व्यवहार करने वाले नागरिकों के लिए यूपीआई सिस्टम ने ऑनलाइन बैंकिंग व्यवहार करने को बहुत आसान बना दिया है। आज भारत के यूपीआई सिस्टम के माध्यम से प्रतिदिन 65 करोड़ से अधिक व्यवहार (1800 करोड़ से अधिक व्यवहार प्रति माह) हो रहे हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वीजा कार्ड से माध्यम से प्रतिदिन 63.9 करोड़ व्यवहार हो रहे हैं। इस प्रकार, भारत के यूपीआई ने दैनिक व्यवहारों के मामले में 67 वर्ष पुराने अमेरिका के वीजा को पीछे छोड़ दिया है। भारत में केंद्र सरकार की यह सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक है। भारत अब इस मामले में पूरी दुनिया का लीडर बन गया है। भारत ने यह उपलब्धि केवल 9 वर्षों में ही प्राप्त की है। विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी भारत के यूपीआई सिस्टम की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए कहा है कि यह नई तकनीकी का चमत्कार है एवं यह सिस्टम अत्यधिक प्रभावशाली है। भारत का यूपीआई सिस्टम भारत को वैश्विक बैंकिंग नक्शे पर एक बहुत बड़ी शक्ति बना सकता है।    भारत में यूपीआई की सफलता की नींव दरअसल केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई कई आर्थिक योजनाओं के माध्यम से पड़ी है। समस्त नागरिकों के आधार कार्ड बनाने के पश्चात जब आधार कार्ड को नागरिकों के बैंक खातों से जोड़ा गया और केंद्र सरकार द्वारा देश के गरीब वर्ग की सहायता के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत सहायता राशि को सीधे ही नागरिकों के बैंक खातों में जमा किया जाने लगा तब एक सुदृद्ध पेमेंट सिस्टम की आवश्यकता महसूस हुई और ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम के रूप में यूपीआई का जन्म वर्ष 2016 में हुआ। यूपीआई को आधार कार्ड एवं प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत बैंकों में खोले गए खातों से जोड़ दिया गया। नागरिकों के मोबाइल क्रमांक और आधार कार्ड को बैंक खातों से जोड़कर यूपीआई सिस्टम के माध्यम से आर्थिक एवं लेन-देन व्यवहारों को आसान बना दिया गया। भारत में आज लगभग 80 प्रतिशत युवा एवं बुजुर्ग जनसंख्या का विभिन्न बैकों के खाता खोला जा चुका है। यूपीआई के माध्यम से केवल कुछ ही मिनटों में एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में राशि का अंतरण किया जा सकता है। ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम के रूप में यूपीआई के आने के बाद तो अब भारत के नागरिक एटीएम कार्ड, डेबिट कार्ड एवं क्रेडिट कार्ड को भी भूलने लगे हैं।  भारत से बाहर अन्य देशों में रहने वाले भारतीय मूल के नागरिक भी अपनी बचत को यूपीआई के माध्यम से अपने परिवार के सदस्यों के बैंक खातों में ऑनलाइन राशि का अंतरण चंद मिनटों में कर सकते हैं। पूर्व में, बैंकिंग चेनल के माध्यम से एक देश के बैंक खाते से दूसरे देश के बैंक खाते में राशि का अंतरण करने में 2 से 3 दिन का समय लग जाता था तथा विदेशी बैकों द्वारा इस प्रकार के अंतरण राशि पर खर्च भी वसूला जाता है। अब यूपीआई के माध्यम से कुछ ही मिनटों में राशि एक देश के बैंक खाते से दूसरे देश के बैंक खाते में अंतरित हो जाती है। इससे भारतीय रुपए का अंतरराष्ट्रीयकरण भी हो रहा है। विश्व के अन्य देशों में पढ़ाई के लिए गए छात्रों को अपने खर्च चलाने एवं विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में फीस की राशि यूपीआई सिस्टम से जमा कराने में बहुत आसानी होगी। जिस भी देश में भारतीय मूल में नागरिकों की संख्या अधिक है उन देशों में भारत के यूपीआई सिस्टम को लागू करने के प्रयास किए जा रहे हैं। आज 13,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि इन देशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिकों द्वारा प्रतिवर्ष भारत में भेजी जा रही हैं। वैश्विक स्तर पर भारत के यूपीआई सिस्टम की स्वीकार्यता बढ़ने से अमेरिकी डॉलर पर भारत की निर्भरता भी कम होगी, इससे भारतीय रुपए की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगी और डीडोलराईजेशन की प्रक्रिया तेज होगी।      भारत ने यूपीआई के प्रतिदिन होने वाले व्यवहारों की संख्या के मामले में आज अमेरिका, चीन एवं पूरे यूरोप को पीछे छोड़ दिया है। वर्तमान में भारत के यूपीआई सिस्टम का विश्व के 7 देशों यथा यूनाइटेड अरब अमीरात, फ्रान्स, ओमान, मारीशस, श्रीलंका, भूटान एवं नेपाल में उपयोग हो रहा है। इन देशों में रहने वाले भारतीय मूल के नागरिक यूपीआई के माध्यम से सीधे ही भारत के साथ आर्थिक व्यवहार कर रहे हैं। दक्षिणपूर्वीय देशों यथा मलेशिया, थाइलैंड, फिलिपींस, वियतमान, सिंगापुर, कम्बोडिया, दक्षिण कोरिया, जापान, ताईवान एवं हांगकांग आदि भी भारत के यूपीआई सिस्टम के उपयोग को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम, आस्ट्रेलिया एवं यूरोपीयन देशों ने भी भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में लागू करने की इच्छा जताई है। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस एवं नामीबिया यात्रा के दौरान इन दोनों देशों ने भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में शुरू करने के लिए भारत से निवेदन किया है। पूरे विश्व में अब कई देशों का विश्वास भारत के यूपीआई सिस्टम पर बढ़ रहा है और यदि ये देश भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में लागू कर देते हैं तो इससे भारत में विदेशी निवेश की राशि में भी तेज गति से वृद्धि होने की सम्भावना बढ़ जाएगी।  प्रहलाद सबनानी

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कहानी कहाँ लौटती हैं स्त्रियाँ?

कहाँ लौटती हैं स्त्रियाँ?

कामकाजी स्त्रियाँ सिर्फ ऑफिस से नहीं लौटतीं, बल्कि हर रोज़ एक भूमिका से दूसरी में प्रवेश करती हैं—कर्मचारी से माँ, पत्नी, बहू, बेटी तक। यह…

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आर्थिकी डेटा की दलाली और ऋण की रेलमपेल : निजी बैंकों का नया लोकतंत्र

डेटा की दलाली और ऋण की रेलमपेल : निजी बैंकों का नया लोकतंत्र

– प्रियंका सौरभ “नमस्ते महोदय/महोदया, क्या आप व्यक्तिगत ऋण लेना चाहेंगे?” कभी दोपहर की झपकी के बीच, कभी सभा के समय, कभी मंदिर के बाहर,…

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मनोरंजन बदन की नहीं, बुद्धि की बनाओ पहचान बहनों: अश्लीलता की रील संस्कृति पर एक सवाल

बदन की नहीं, बुद्धि की बनाओ पहचान बहनों: अश्लीलता की रील संस्कृति पर एक सवाल

 प्रियंका सौरभ हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ स्क्रीन पर दिखना असल में जीने से ज़्यादा जरूरी हो गया है। जहां ज़िंदगी…

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बच्चों का पन्ना स्कूलों को उड़ाने की धमकियांः सुरक्षा पर मंडराता खतरा

स्कूलों को उड़ाने की धमकियांः सुरक्षा पर मंडराता खतरा

-ललित गर्ग- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के करीब 45 स्कूलों में बम विस्फोट की धमकी बेहद गंभीर और चिंताजनक है। चूंकि ऐसी धमकियां लगातार आ रही…

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राजनीति अखाड़ा न बने संसद

अखाड़ा न बने संसद

संदर्भ-21 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र के विषय मेंप्रमोद भार्गव21 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र को गर्माए रखने के लिए कांग्रेस समेत लगभग…

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राजनीति विपक्ष की लोकतंत्र पर चिंता या सत्तालोभ की राजनीति?

विपक्ष की लोकतंत्र पर चिंता या सत्तालोभ की राजनीति?

-ललित गर्ग- भारतीय लोकतंत्र आज विश्व के सबसे बड़े, जीवंत और जागरूक लोकतंत्रों में गिना जाता है। यह संविधान की मजबूत नींव, संस्थाओं की पारदर्शिता…

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मनोरंजन निरंकुश अभिव्यक्ति से जुड़े सुप्रीम फैसलों का स्वागत हो

निरंकुश अभिव्यक्ति से जुड़े सुप्रीम फैसलों का स्वागत हो

-ललित गर्ग-सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी एवं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एंटी सोशल अभिव्यक्ति की सुनवाई करते हुए समय-समय पर जो कहा, वह जहां…

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राजनीति साधुओं के भेष में मुस्लिम 

साधुओं के भेष में मुस्लिम 

उत्तराखंड राज्य सरकार ने चलाया ढोंगी बाबाओं के विरुद्ध कालनेमि अभियान  इस साधु-जिहाद-तंत्र के पर्दाफाश की जरुरत प्रमोद भार्गव            …

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शख्सियत मंगल पांडे : भारतीय स्वाधीनता संग्राम के “अग्रदूत”

मंगल पांडे : भारतीय स्वाधीनता संग्राम के “अग्रदूत”

स्वाधीनता सेनानी मंगल पांडे की जयंती 19 जुलाई पर विशेष….. प्रदीप कुमार वर्मा “शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले, वतन पर मिटने वालों का यही आखरी निशां होगा…” मां भारती की आन,बान और शान की खातिर मर मिटने तथा उसे गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने वाले शहीदों का अब यही फलसफा बाकी है। आज से करीब दो सौ साल पहले जन्मे महान स्वाधीनता सेनानी मंगल पांडे की आज जयंती है। शहीद मंगल पांडे का नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में एक ऐसे अमर सेनानी के रूप में दर्ज है, जिसने ब्रिटिश फ़ौज में शामिल रहते हुए देशभक्ति का जज्बा बुलंद किया और यूनियन जैक के सामने एक चुनौती पेश की। महान शहीद मंगल पांडे ने ब्रिटिश हुकूमत के निर्देशों को मानने से इनकार कर दिया और सैन्य छावनी में ही कई अंग्रेज अफसर को मौत के घाट उतार दिया। मंगल पांडे के इस कदम से ब्रिटिश सेना भौचक्की रह गई और उन पर मुकदमा चला। इसके बाद उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। लेकिन एक अमर सेनानी और प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत के रूप में मंगल पांडे आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।       गुलामी की वीडियो से मां भारती को आजाद कराने की लड़ाई में भागीदारी करने वाले क्रांतिकारी मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को यूपी के बलिया जिले के नगवा गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता दिवाकर पांडे तथा माता का नाम अभय रानी था। वर्ष 1849 में मंगल पांडे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए और बैरकपुर की सैनिक छावनी में बंगाल नेटिव इन्फैंट्री यानी बीएनआई की 34 वीं रेजीमेंट के पैदल सेना के सिपाही रहे। मंगल पांडे के मन में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्वार्थी एवं भारत विरोधी नीतियों के कारण अंग्रेजी हुकुमत के प्रति पहले ही नफरत थी। उस दौरान ब्रिटिश सेना की बंगाल यूनिट में ‘ पी.-53’ राइफल आई। जिसमें कारतूसों को राइफल में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था। उस जमाने में सैनिकों के बीच ऐसी खबर फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में गाय तथा सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया है। ऐसे में हिन्दू और मुसलमानों में प्रचलित धार्मिक मान्यताओं के चलते दोनों धर्मों के सैनिकों के मन में अंग्रजों के खिलाफ आक्रोश पैदा हो गया।        फिर आई वह 9 फरवरी 1857 की तारीख, जब यह कारतूस पैदल सेना को बांटा गया। तब मंगल पांडेय ने उसे न लेने को लेकर विद्रोह के अपने इरादे जता दिए। इस बात से गुस्साए अंग्रेजी अफसर द्वारा मंगल पांडे से उनके हथियार छीन लेने और वर्दी उतरवाने का आदेश दिया, जिसे मानने से मंगल पांडे ने इनकार कर दिया। आज़ादी की खातिर मर-मिटने का जज्बा दिल में लिए मंगल पांडे ने रायफल छीनने आगे बढ़ रहे अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन पर आक्रमण किया तथा उसे मौत के घाट उतार दिया। यही नहीं उनके रास्ते में आए दूसरे एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बॉग को भी मौत के घाट उतार दिया। और इस तरह मंगल पांडे ने ब्रिटिश सेना की बैरकपुर छावनी में 29 मार्च 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया। यही वजह है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम की गाथा लिखने वाले इतिहासकार मंगल पांडे को आजादी की लड़ाई का “अगदूत” मानते हैं। भारतीय इतिहास में इस घटना को ‘1857 का गदर’ नाम दिया गया है।             इस घटना के बाद मंगल पांडे को अंग्रेजी सेना के सिपाहियों ने गिरफ्तार किया। उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाया और फांसी की सजा सुना दी गई। कोर्ट के फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी दी जानी थी। अंग्रेजी हुकूमत को इस बात का अंदेशा था कि मंगल पांडे को फांसी की सजा दिए जाने वाले दिन कोई बड़ा विद्रोह और जनता में आक्रोश हो सकता है। इस बात को भांपते हुए अंग्रेजों द्वारा 10 दिन पूर्व ही यानि 8 अप्रैल सन 1857 को ही मंगल पांडे को फांसी दे दी गई। इस घटना ने भारतीय सैनिकों में असंतोष को और बढ़ाया और मेरठ में 10 मई 1857 को विद्रोह की चिंगारी भड़की, जिससे पूरे उत्तर भारत में विद्रोह फैल गया। मंगल पांडे का बलिदान और विद्रोह ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी और देशवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने के लिए प्रेरित किया। ब्रिटिश सेवा में माया सिपाही होने के बावजूद उन्होंने देशभक्ति की खातिर यूनियन जैक को ललकारा था।        अमर शहीद मंगल पांडे ने भारत में ब्रिटिश उपनिवेश को उखाड़ फेंकने का आगाज कर दिया था। मंगल पांडे द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिंगारी बुझी नहीं। करीब एक महीने बाद ही 10 मई सन 1857 को मेरठ की छावनी में कोतवाल धनसिंह गुर्जर के नेतृत्व में बगावत हो गयी। मेरठ में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला। इसके बाद विद्रोही सैनिक दिल्ली की ओर बढ़े और बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित किया। इसके बाद लखनऊ में भीषण संघर्ष हुआ, जहां भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश रेजीडेंसी पर हमला किया।  इस दौरान बेगम हज़रत महल और अन्य नेताओं ने विद्रोह का नेतृत्व किया। मेरठ और लखनऊ के बाद विद्रोह की आज कानपुर तक आ पहुंची ,जहां नाना साहेब ने कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किया और ब्रिटिश सैनिकों पर हमला किया। यह विद्रोह अत्यधिक हिंसक था और  इसमें कई ब्रिटिश नागरिक भी मारे गए। महान स्वाधीनता सेनानी रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में विद्रोह का नेतृत्व किया।             इसके बाद आजादी की लड़ाई का दायरा पूरे बुंदेलखंड तक पहुंच गया।  इस विद्रोह को कुचलना के लिए अंग्रेजी सेना ने झांसी पर हमला कर दिया जहां रानी लक्ष्मीबाई ने बहादुरी से ब्रिटिश सेना का सामना किया और अंततः लड़ते हुए शहीद हो गईं। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान देश के कई हिस्सों में हुए इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है। देश की आजादी के लिए क्रांति की ज्वाला को प्रज्वलित करने वाले मां भारती के इस वीर सपूत मंगल पांडे की आज जयंती है। भारत में पांडे को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद किया जाता है। अमर शहीद मंगल पांडे की स्मृति में बैरकपुर में उनके नाम पर एक पार्क है। यही नहीं वर्ष 1984 में भारत सरकार द्वारा उनकी छवि वाला एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2005 में मंगल पांडे के जीवन और उनकी शहादत पर आधारित फिल्म मंगल पांडे :…

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