स्वाइन फ्लू
Updated: February 27, 2015
अजीब सी दहशत है हर चेहरे में, फिज़ाओं में घुली हवा एक सिहरन पैदा कर रही है। कौन जाने किस सांस के साथ H1N1 वाइरस हमारे फेफड़े में पैवस्त हो जाये। हर ओर शोर है, स्वाइन फ्लू से भयाक्रांत चेहरे हैं। नकाबों से ढकी करुण आंखे हैं। आखिर ये कौन सा वाइरस है? अपने देश का है या दवाई कंपनियों का बताया हुआ वाइरस है? जिसके लिए हज़ार रुपये का टैमीफ्लू इंजेक्शन और सात हज़ार की जाँचें करवानी हैं। डाक्टरों से लेकर लैबोरेटरी केमिस्टों के खिले चेहरे और मेडिकल रेप्रेजेंटटिवों से लेकर दवा कंपनी मालिकों के चेहरों पर गहरी मुस्कान या फिर मीडिया के स्तंभित पत्रकारों के अतिउत्साहित वार्तालाप किस संवेदनहीनता का परिचय दे रहे हैं। सवा अरब की आबादी वाले भारत को महामारी का डर दिखा कर व्यापार साधने वाले विदेशी तत्व शायद ही समझ पाएँ की भारत के इतिहास में कभी कोई महामारी क्यों नहीं पनप पायीं?? टी॰बी॰, प्लेग, मलेरिया, कालरा, चेचक, एड्स, पोलियो आदि भयावह महामारियों का इतिहास स्पष्ट लिखता है कि इनके कारण कई सभ्यताओं ने अपना अस्तित्व खो दिया लेकिन भारत के पारंपरिक विज्ञान के सामने ऐसी असंख्य महामारियों ने आकर स्वयं दम तोड़ दिया। भारत के पारंपरिक चिकित्सा विज्ञान ने कभी भी जीवाणुओं तथा विषाणुओं को अपना दुश्मन समझा ही नहीं। प्रकृति से ली गईं जड़ी बूटियों, मसालों, पत्तों, छालों, जड़ों ने हमें इन विषाणुओं के मध्य रहकर हमारी प्रतिरोधक क्षमताओं को एकल दिशा में जागृत करके प्राकृतिक वातावरण में सबसे सौम्य जलवायु के अनुकूल बनाया। ऐसी अनूठी चिकित्सा व्यवस्था विश्व की किसी भी सभ्यता के इतिहास में कहीं नहीं मिली। दादी के बनाए हुये अदरख और शहद के मिश्रण ने दमा पैदा करने वाले कफ को बाहर निकाला, नानी के तुलसी के पत्ते ने वाइरस जनित रोगों से हमारी रक्षा की तो माँ के हाथों की स्पर्श चिकित्सा से हड्डियों को मजबूती मिली जिन्होने सौ साल की उम्र पूरी करने की ताकत पायी………. कितना अनूठा विज्ञान है इस अदम्य और चिरकालिक सभ्यता के पास जिसको ये चंद मूर्ख पाश्चात्य दवा वैज्ञानिक हेय दृष्टि से देखते हैं, उपहास करते हैं…. कल हेपटाइटिस था, फिर बर्ड फ्लू आया, अब स्वाइन फ्लू आ गया है, आने वाले कल में डेंगू और मलेरिया की नयी नयी किस्में इस नए चिकित्सा विज्ञान को चुनौती देने के लिए कमर कस रही हैं। साल दर साल वाइरस, बैक्टेरिया, प्रोटोज़ोआ, फंगस आदि नए नए डी॰एन॰ए॰ संरचना के साथ अपने अस्तित्व को जीवित रखने की भयंकर कोशिश कर रहे हैं…… कभी सोचा है – क्या होगा इसका अंजाम?????? अनाज को खाने वाले चूहों की संख्या जब बढ़ जाती है तो बिल्ली पालते हैं, बिल्लियों की संख्या बढ्ने पर कुत्ता लाते हैं लेकिन कुत्तों की संख्या अधिक होने पर रेबीज के डर से फिर उन्हे मारना पड़ता है। ऐसे ही सृष्टि में एक एक जीवन और मृत्यु को नियंत्रित करने वाली कड़ी सदैव गतिमान रहती है जिसमे अस्तित्व के संघर्ष और जीवन की परिभाषा छिपी होती है। यह नया चिकित्सा विज्ञान नहीं समझ पा रहा। एक साधारण से फोड़े को सेप्ट्रान की गोली के जरिये दबा कर कैंसर बनाने वाला विज्ञान भला कब तक उस सभ्यता को जीवित रख पाएगा, जिसके पूर्वज उस फोड़े की गांठ को आक के पत्तों से निकाला करते थे………. स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू और इंफ्लुएंज़ा के विविध प्रकार भारतीयों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते यदि हम अपनी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का अनुसरण करें तो। हमारे ग्रंथ बताते हैं कि किसी प्रकार के रोग को उत्पन्न करने के लिए तीन कारक – वात, पित्त और कफ होते हैं। जब इनके मध्य ऋतु परिवर्तन के कारण असंतुलन होता है तो शरीर व्याधियों से ग्रस्त हो जाता है। चूंकि एक विशाल जनसंख्या और उसके द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण अपनी विशालतम स्थिति तक पहुँच चुका है तो इनसे ग्रस्त जीवों की संख्या भी अधिक प्रतीत होती है. लेकिन भारत का जैव मण्डल कभी भी इसके वातावरण को जीवन विरोधी नहीं होने देता और जीवन अनुकूलन व्यवस्था को सदैव अक्षुण्ण रखता है। भारतीय चिकित्सा वैज्ञानिक साफ साफ लिख गए हैं कि मौसमी बुखार के आगमन का उल्लास मानना चाहिए क्योंकि यह शरीर को आने वाले मौसम के आघात के प्रति प्रतिरोधक क्षमता दे रहा है. इसी प्रकार जुकाम, पेचीस, उल्टी, फोड़े-फुंसियों के छोटे संसकरणों का चिकित्सा विज्ञान में अति महत्वपूर्ण स्थान था। नयी चिकित्सा प्रणाली, बीमार घोड़ों और बंदरों के शरीर में एंटीबाडीज़ बना कर मानव शरीर में प्रविष्ट कराती है रोग निदान के लिए। लेकिन शरीर किसी भी बाहरी तत्व को अपने भीतर अनिच्छा से ही प्रवेश करने देता है। जबकि इन एंटीबाडीज़ को शरीर खुद ही तैयार कर रहा होता है जो हमारी अस्थियों के संधि स्थल में गांठों के रूप मे प्रकट होते हैं। अब इन भीतरी और बाह्य एंटीबाडीज़ के मध्य भी शरीर के भीतर लड़ाई होती है शरीर इनको धकेलना चाहता है लेकिन निरंतर दवा की खुराक को शरीर में प्रवेश करा कर हम इसकी प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देते हैं जिसका दीर्घकालिक परिणाम स्वयं के लिए घातक साबित होता है। भारतीय ग्रंथो में सबसे प्रमुखता आंवले को दी गयी है, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करने के लिए. किसी भी प्रकार से आंवले को शरीर में समाहित करने से pH संतुलित रहता है और रसायनों के अनुपात को जरूरत के मुताबिक नियंत्रित करता है। गूढ विज्ञान निरंतर कर्म कर रहा है स्वयं मानव के भीतर जो अपनी हर क्रिया में जीवन अनुकूलन का सिद्धान्त समेटे है। कभी ध्यान से देखना जब किसी मनुष्य को चोट लगती है या बीमार पड़ता है तब वह गोल अर्थात सिकुड़ कर लेट जाता है, गहरी व लंबी साँसे लेने लगता है। इससे आशय ये है कि किसी भी हालत में शरीर सबसे पहले हृदय की रक्षा करना चाहता है यानि प्राण की। यदि यह प्राण ऊर्जा सुरक्षित रही तो, जैसा की शरीर को मुड़कर लेटने का आदेश देकर मस्तिष्क अब और भी बचाव के उपायों को करने के लिए इंद्रियों को तत्पर कर सकता है। बहुत गहनता है शरीर के भीतर, जिसको सिर्फ भारतीय चिंतन ही पहचान पाया है। भारतीय संस्कृति के असंख्य शताब्दियों के सतत शोधों के कारण आज विश्व में मौजूद सभी चिकित्सा पद्धतियों का जनक है। चीन की एक्यूप्रेशर का प्राचीनता का भारत की स्पर्श या मालिश की चिकित्सा में है; विप्श्यना के वैभव का अंदाजा बताने को पक्षाघात को ठीक करने में उँगलियों के पोरों से निकलने वाली ऊर्जा, ग्रन्थों में अपना स्थान लिए है; होमियोपैथी की शुरुआत धन्वन्तरी के सत्व शोधन के साथ प्राण ऊर्जा के संतुलन में स्थित है, शल्य चिकित्सा से लेकर मानसिक व्याधियों को दूर करने के तांत्रिक अनुष्ठानों तक से भारतीय पारंपरिक चिकित्सा विज्ञान की विशाल क्षमता का प्रदर्शन होता है। साँप का जहर उतारने के लिए प्रेमचन्द्र की कहानी में पात्र पर घंटों ठंडे पानी के घड़े उड़ेले जाते हैं और उसे सोने नहीं दिया जाता। बड़ा सरल वैज्ञानिक सिद्धान्त है की अवचेतन अवस्था में शरीर की अन्य क्रियाओं के सुप्तावस्था में जाते ही जहर शरीर के अन्य हिस्सों में जाने की बजाय मस्तिष्क में इकट्ठा होकर पूरी तरह गिरफ्त में ले लेगा। मस्तिष्क की क्रियाओं को नियंत्रित करने वाली प्रणाली में पक्षाघात होने से एक बार सोया मानव फिर जाग नहीं पाएगा। न केवल साँप वरन किसी भी प्रकार के जहर को निष्क्रिय करने की हमारे पूर्वजों की अचूक तकनीकी मूर्ख तात्रिकों के फैलाये अंधविश्वास की भेंट चढ़ गयी। …
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यशोदानंदन-११
Updated: February 27, 2015
कंस तो कंस था। वह पाषाण की तरह देवी देवकी की याचना सुनता रहा, पर तनिक भी प्रभावित नहीं हुआ। देवी देवकी ने कन्या…
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पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत !!
Updated: February 27, 2015
-एनजीओ गैंग की शातिराना हरकत बयाँ करती ग्राउंड जीरो रिपोर्ट करीब तीन हफ्ते पहले की बात है जब दिल्ली की चुनावी सरगर्मी के बीच एक…
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यशोदानंदन-१०
Updated: February 27, 2015
मेघ, दामिनी और चन्द्रमा – तीनों ने जगत्पिता के एक साथ दर्शन किए। अतृप्ति बढ़ती गई। तीनों पूर्ण वेग से आकाश में प्रकट होने…
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प्राथमिक सेवाओं को आधुनिक बनाने वाला रेल बजट
Updated: February 27, 2015
सत्यव्रत त्रिपाठी रेल को देश के विकास की रीढ़ कहा जाता है। रेलवे लगभग 14 लाख कर्मचारियों के साथ दुनिया में सबसे ज़्यादा रोज़गार देने…
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विनाशकारी आतंक की योजना और शिक्षित युवा वर्ग
Updated: February 27, 2015
आतंकवाद भारत की ही नही अपितु आज विश्व की एक बड़ी समस्या बन चुका है। सही अर्थों में मानव समाज की यह बुराई मानव के…
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मैया मोरी , मैं नहीं संसद जायौ!
Updated: February 26, 2015
हांतो रसिको! आज आपको ससंद पुराण कीआगे की कथा सुनाता हूं। संसद पुराण अनंत है। इसकी कथाएं अनंत हैं। मेरी इतनी हिम्मत कहां जो इन…
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आसान है गोपनीय दस्तावेजों का चुराना ??
Updated: February 26, 2015
प्रमोद भार्गव चोरी पकड़ने के तमाम तकनीकी व प्रौद्योगिकी प्रंबंधों के बावजूद सरकारी गोपनीय दस्तावेज कितनी आसानी से चुराकर बेचे जा सकते हैं,इसका ताजा उदाहरण…
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क्या आम आदमी की पहुंच में रहेगी रेल ?
Updated: February 26, 2015
प्रमोद भार्गव भारतीय रेल विश्व का सबसे बड़ा व्यावसायिक प्रतिष्ठान है,लेकिन इस ढांचे को किसी भी स्तर पर विश्वस्तरीय नहीं माना जाता। गोया इसकी सरंचना…
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अण्णा हजारे : राजनैतिक बन्दूक के खाली कारतूस से ज्यादा कुछ नहीं
Updated: February 26, 2015
आर्थिक उदारीकरण और बाजारीकरण की नयी नीतियों के प्रारम्भिक दौर में भी जब नरसिम्हाराव और मनमोहनसिंह की जुगलबंदी ने देश और दुनिया के पूँजीपतियों -कार्पोरेट घरानों…
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हंगामा है क्यूं बरपा : भूमि आधिग्रहण बिल
Updated: February 25, 2015
अमित राजपूत पिछली मनमोहन सरकार काजिसे संशोधित करने पर बीते दिनों से संसद से सड़क तक हंगामा मचा हुआ है, आख़िर इसकी असल वजह है…
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टेरेसा की असलियत पर बखेड़ा क्यों?
Updated: February 25, 2015
प्रवीण दुबे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मदर टेरेसा की सेवा के पीछे के मुख्य उद्देश्य को उजागर क्या किया कुछ…
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