राजनीति अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच के विरुद्ध बन रहे नए समीकरण

अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच के विरुद्ध बन रहे नए समीकरण

अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति श्री निकोलस मदुरो को रात्रि के समय में गिरफ्तार कर अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चलाया जाना एवं वेनेजुएला के तेल भंडार पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का कब्जा स्थापित करने का प्रयास करना, अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच को ही दर्शाता है।

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राजनीति महाराष्ट्र में भाजपा के विकास एवं विश्वास की निर्णायक जीत

महाराष्ट्र में भाजपा के विकास एवं विश्वास की निर्णायक जीत

-ललित गर्ग-महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न शहरी निकाय चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा, प्रवृत्ति और भविष्य का संकेत देने वाला एक बड़ा जनादेश…

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धर्म-अध्यात्म अशांति के कोलाहल में शांति का शंखनाद है मौन

अशांति के कोलाहल में शांति का शंखनाद है मौन

मौनी अमावस्या- 18 जनवरी, 2026-ललित गर्ग-मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं है, वह आत्मा की सबसे सघन भाषा है। 18 जनवरी 2026 को आने वाली…

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राजनीति महाराष्ट्र चुनाव ने क्या संदेश दिया है

महाराष्ट्र चुनाव ने क्या संदेश दिया है

राजेश कुमार पासी 2014 के बाद से मोदी की राजनीति देश के सिर पर चढ़कर बोल रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में जब भाजपा बहुमत…

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समाज सुभाष चन्द्र बोस : जिनके नाम से अंग्रेजों के हृदय कांपते थे 

सुभाष चन्द्र बोस : जिनके नाम से अंग्रेजों के हृदय कांपते थे 

प्रमोद दीक्षित मलय ब्रिटिश शासन सत्ता की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता की मुक्ति के लिए हुए स्वाधीनता समर की बलिवेदी पर वीर सपूतों ने निज जीवन की आहुति दी है। अपने सुवासित जीवन-पुष्पों की माला से भारत माता का कंठ सुशोभित किया है तो रुधिर से भाल पर अभिषेक भी। उन्हीं जननायकों में से एक महानायक बनकर उभरा जिसे विश्व सुभाष चन्द्र बोस के नाम से जानता है। सुभाष का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में प्रतिष्ठित वकील जानकी नाथ बोस एवं प्रभावती के कुल में हुआ था। 1919 में बी.ए. आनर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। विवेकानन्द साहित्य के अध्ययन ने उनको राष्ट्रीय चेतना से समृद्ध किया और चिंतन-मनन करने की सुदृढ जमीन दी। पुत्र को आईसीएस बनाने की पिता की इच्छा का मान रखते हुए सुभाष 1919 में इंगलैण्ड के लिए रवाना हुए और आईसीएस परीक्षा न केवल उत्तीर्ण की बल्कि चौथा स्थान भी हासिल किया किन्तु हृदय में धधक रही देशप्रेम की ज्वाला के कारण अंग्रेजों की चाकरी को स्वीकार न कर भारत माता की सेवा-साधना का कंटकाकीर्ण पथ अंगीकार किया। फलतः सेवा से त्यागपत्र देकर जून 1921 में भारत वापस आकर कांग्रेस में महात्मा गांधी के सुझाव पर सुभाष जी कलकत्ता जाकर देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करने लगे। चितरंजन दास का उस समय बंगाल में बहुत प्रभाव था और आम जन में उनकी छवि एक उत्कृष्ट नेता की थी। दास ने कांग्रेस के अंदर ही ‘स्वराज्य दल’ बनाकर कलकत्ता महापालिका का चुनाव लड़ा और जीत अर्जित कर महापौर बने। तब उन्होंने सुभाष को महापालिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया। यह सुभाष के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत थी। यहां पर सुभाष ने अपनी कार्यशैली और दूरदृष्टि का परिचय देकर काफी नये और महत्वपूर्ण काम किए जिससे उनकी कार्यशैली और राजनीतिक सोच से सभी परिचित हुए और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। साथ ही उनकी गिनती देश के अग्रणी नेताओं में होने लगी। उनके जीवन में समय पालन, लक्ष्य के प्रति समर्पण और अनुशासन का बहुत प्रभाव रहा जिसकी पृष्ठभूमि में विद्यार्थी जीवन में ही टेरीटोरियल आर्मी में रंगरूट के रूप में प्राप्त सैन्य प्रशिक्षण था। 1929 में कांग्रेस के अधिवेशन में सुभाष खाकी सैन्य गणवेश में उपथित होकर अध्यक्ष मोतीलाल नेहरु को सलामी दी। और आगे चलकर यही सैन्य अनुशासन ‘आजाद हिन्द फौज’ के गठन का दृढ आधार भी बना। 1933 से 1936 तक स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप प्रवास के दौरान आपने इटली के नेता मुसोलिनी और आयरलैण्ड के नेता डी. बलेरा से भेंट-विमर्श कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए सहयोग का वचन लिया। इसी दौरान आस्ट्रिया में निजी टाईपिस्ट एमिली शेंकेल की सेवा, समझ और भारत के प्रति उदात्त सोच से प्रभावित हो सुभाष ने उनसे विवाह कर लिया। वह भारत वापस आये। देश में सुभाष की लोकप्रियता उफान पर थी। 1938 में हरिपुरा में आयोजित कांग्रेस के 51वें अधिवेशन में गांधी जी ने सुभाषबाबू को अध्यक्ष मनोनीत किया और सम्मान में 51 बैलों द्वारा इनके रथ को खींचा गया। उस अवसर पर अध्यक्ष के रूप में दिया गया सुभाष का ओजस्वी भाषण दुनिया के प्रमुख भाषणों में शुमार किया जाता है। अध्यक्षीय कार्यकाल में आपने जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में ‘योजना आयोग’ और विख्यात अभियंता विश्वेश्वरैया के नेतृत्व में ‘विज्ञान परिषद’ बनाई।  कांग्रेस में सुभाष के बढ़ते प्रभाव और कार्यकर्ताओं पर मजबूत होती पकड़ से कांग्रेस के अन्दर ही कुछ नेताओं का प्रभामंडल कमजोर होने लगा  और वे सुभाष को कमजोर करने की चालें चलने लगें। गांधी जी से भी मतभेद हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि 1939 के त्रिपुरा अधिवेशन में अध्यक्ष के मनोनयन की परम्परा के उलट कांग्रेस को चुनाव करवाना पड़ा। देश और कार्यकर्ताओं की पसंद सुभाष ने गांधी जी के समर्थित प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैया को पराजित कर दिया। जिस पर गांधी जी की टिप्पणी, ‘‘सीतारमैया की हार मेरी हार है,‘‘ से सुभाष बहुत व्यथित हुए क्योंकि उनके मन में गांधी जी के प्रति असीम आदर भाव था। देश जानता है कि विदेश प्रवास के दौरान सुभाष ने ही अपने एक रेडियो भाषण में गांधी जी को सर्वप्रथम ‘राष्ट्रपिता’ कहकर सम्बोधित किया था लेकिन मतभेद शान्त होने की जगह बढ़ता गया। गांधी जी के कहने पर कार्यकारिणी के 15 पदाधिकारियों में से दो को छोड़कर शेष ने त्यागपत्र दे दिया तो दल की एकता और देश की मजबूती के लिए सुभाष ने विवश होकर अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस के अन्दर ही ‘फारवर्ड ब्लॉक’ बनाकर काम करने लगे लेकिन उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया। अंग्रेजी शासन ने उनको घर पर नजरबन्द कर दिया पर सुभाष तो दूसरी ही मिट्टी के बने थे, उन्हें कैद रखना अंग्रेजों के लिए आसान न था। जनवरी 1941 में अपने घर पर नजरबंदी के दौरान ही ब्रिटिश पुलिस और जासूसों को चकमा देकर एक पठान के रूप में सुभाष निकल भागे और पेशावर, काबुल, मास्कों होते हुए जर्मनी पहुंचे। हिटलर एवं जर्मनी के अन्य नेताओं से भेंट कर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग का वचन प्राप्त किया और वहीं ‘आजाद हिन्द रेडियो’ की स्थापना की। वहां से आप जापान पहुंच कर जनरल तोजो से भेंट की और जापानी संसद को सम्बोधित किया। जापान के सहयोग से रासबिहारी बोस के मार्गदर्शन में ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन कर सिपाहियों और नागरिकों का आह्वान किया कि ‘तुम मूझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’। 5 जुलाई, 1943 को सिंगापुर में टाउन हॉल के सामने आजाद हिन्द फौज के वीर सिपाहियों के सम्मुख ओजस्वी भाषण देते हुए ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया था जिसे प्रत्येक सिपाही ने हृदय से स्वीकार कर बर्मा (अब म्यांमार), कोहिमा, इम्फाल के मोर्चे पर अंग्रेजी सेना से मुकाबला कर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। 21 अक्टूबर, 1943 को सुभाष ने आजाद हिन्दुस्तान की अंतरिम सरकार बनाई जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री का दायित्व स्वयं निर्वहन किया। इस आजाद हिन्द सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैण्ड आदि 9 देशों ने मान्यता प्रदान की थी। और जापान सरकार द्वारा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह सुभाषबाबू की उस अस्थायी सरकार को भेंट किए गये थे जिसे सुभाष ने ‘शहीद’ और ‘स्वराज्य’ नाम दे अमर कर दिया। उस अस्थायी सरकार के गठन के 75 वर्ष पूर्ण होने के सुअवसर पर अक्टूबर 2018 में भारत के प्रधानमंत्री मा0 नरेन्द्र मोदी द्वारा लालकिले पर तिरंगा ध्वज फहराकर उसके महत्व को रेखांकित किया गया।  द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद सुभाष आजादी की लड़ाई हेतु आवश्यक संसाधन जुटाने हेतु रूस जाने का निश्चय कर 18 अगस्त, 1945 को हवाई जहाज से निकले किन्तु रास्ते में ही वे लापता हो गये। कहा गया कि उनका हवाई जहाज ताईवान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें सुभष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। हालांकि ताईवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया था कि उस दिन ताईवान के आकाश में कोई विमान दुर्घटना ही नहीं हुई। सुभाष जीवित रहे या विमान दुर्घटना का शिकार हुए, यह सत्य तो काल के गर्भ में है पर कोटि-कोटि भारतीयों के हृदय में वह सदा सर्वदा जीवित रहेंगे। भारत माता के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किया गया अनथक अदम्य प्रयास उन्हें चिरकाल तक अमर रखेगा। नेता जी सुभाषचन्द्र बोस की एक भव्य प्रतिमा राजपथ दिल्ली में लगाई गयी है और उनके जन्मदिवस को पराक्रम दिवस के रूप में 2021 से मनाया जा रहा है। प्रमोद दीक्षित ʺमलयʺ

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राजनीति शांति का मुखौटा, सत्ता की रणनीतिः ट्रंप का वैश्विक विरोधाभास

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-ललित गर्ग- नोबेल शांति पुरस्कार की उत्कट अभिलाषा में डूबे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का व्यक्तित्व और कार्यशैली वैश्विक राजनीति के लिए एक गहरी विडंबना…

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पर्यावरण बर्फ़ और गर्मी के बीच मुक़ाबला तय: जलवायु संकट के साये में 2026 विंटर ओलंपिक

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फ़रवरी 2026 में जब इटली के मिलान और कॉर्टीना द’आम्पेज़ो में विंटर ओलंपिक की शुरुआत होगी, तब खेल सिर्फ एथलीटों के बीच नहीं होगा। मुकाबला…

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राजनीति इतिहास का सबसे लंबा अनुत्तरित प्रश्न नेताजी की मौत

इतिहास का सबसे लंबा अनुत्तरित प्रश्न नेताजी की मौत

नेताजी सुभाष की मृत्यु: आयोग, फाइलें और अधूरा सत्य– योगेश कुमार गोयलभारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत का रहस्य आज…

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राजनीति संगठनात्मक क्षमता की लय को कैसे रखेंगे बरकरार?

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नितिन नवीन को पार्टी की कमान सौंपकर भारतीय जनता पार्टी ने सियासी पटल पर एक नई इबारत लिखी है।

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लेख आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस : आंख मूंद कर भरोसा कहीं मुश्किल में न डाल दे

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस : आंख मूंद कर भरोसा कहीं मुश्किल में न डाल दे

 ज्ञान चंद पाटनी    आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का हर क्षेत्र में इस्तेमाल किया जा रहा है। चिकित्सा से लेकर कानून ही नहीं, कृषि और कारखानों तक, यह तकनीक बेहद उपयोगी और समय बचाने का साधन साबित हो रही है। साथ ही इसका बिना जांचे—परखे उपयोग करना मुसीबत का कारण भी बन रहा है। ताजा उदाहरण बॉम्बे हाईकोर्ट का है जहां एक वकील ने बिना जांचे एआई से बनी दलीलें दाखिल कीं और इससे नाराज अदालत ने 50,000 रुपए का जुर्माना लगाया। इसी तरह वर्कडे की ताजा ग्लोबल रिपोर्ट बताती है कि सर्वे में शामिल 85 प्रतिशत कर्मचारी मानते हैं कि हर सप्ताह एआई से बचने वाले एक से 7 घंटों में से 40 प्रतिशत समय गलतियां सुधारने में चला जाता है। इसी तरह अमेरिका और चीन के विश्वविद्यालयों के शोध पत्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि एआई ने रिसर्च की गति तो बढ़ाई लेकिन विविधता को नुकसान पहुंचाया है। साफ है कि एआई के फायदे अपार हैं, लेकिन बिना सावधानी के उपयोग से नुकसान भी उतना ही गहरा है। इसलिए संतुलित और सही इस्तेमाल ही इसका सही मार्ग है।   निश्चित ही एआई का उदय 21वीं सदी की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति है। यह डेटा के विशाल समुद्र में डुबकी लगाती है और जरूरी जानकारी निकालती है। इसकी मदद से रिसर्चर तीन गुना अधिक पेपर प्रकाशित कर पा रहे हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में तो एआई डायग्नोसिस की सटीकता बहुत ज्यादा है। एआई तकनीक डॉक्टरों को बीमारियों का जल्द पता लगाने, जांचों का विश्लेषण करने और  उपचार सुझाने में मदद करती है। एआई संचालित टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को शीर्ष अस्पतालों के विशेषज्ञों से जोड़ते हैं जिससे समय और लागत की बचत होती है। साथ ही देखभाल की गुणवत्ता में सुधार होता है। किसानों के लिए एआई एक विश्वसनीय साथी साबित हो रही है। यह तकनीक मौसम की भविष्यवाणी कर सकती है, कीटों के हमलों का पता लगा सकती है और सिंचाई व बुवाई के लिए बेहतर समय तक सुझाने लगी है। शिक्षा के क्षेत्र में भी एआई तकनीक उपयोगी है। एआई न्यायिक कार्य, शासन और लोक सेवा प्रदान करने की प्रक्रिया को नया रूप दे रही है।    जाहिर है कि एआई तेजी से अर्थव्यवस्था को बदलने वाली तकनीक बन चुकी है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15.7 ट्रिलियन  डॉलर जोड़ सकती है। यह अलग बात है कि इस आर्थिक लाभ का 84 प्रतिशत से अधिक हिस्सा उत्तरी अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे विकसित क्षेत्रों को मिलने की संभावना है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए भी यह अवसरों का सागर है। यही वजह है कि देश में एआई तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही यह भी समझना होगा कि उत्साह के साथ सतर्कता जरूरी है।   एआई की चमक के पीछे छिपे खतरे नजरअंदाज नहीं किए जा सकते।  बॉम्बे हाईकोर्ट का मामला इसका जीता-जागता प्रमाण है। हार्ट एंड सोल एंटरटेनमेंट के निदेशक मोहम्मद यासीन ने एआई से तैयार दलीलें दाखिल कीं. इसमें उद्धृत एक फैसला कहीं अस्तित्व में था ही नहीं। जस्टिस एम.एम. साठये ने इसे न्याय प्रक्रिया में बाधा बताया। एआई टूल्स रिसर्च के लिए स्वीकार्य हैं लेकिन सत्यापन करना वकील या पक्षकार की जिम्मेदारी है, वे इससे बच नहीं सकते। यह घटना एआई के हैलुसिनेशन यानी मतिभ्रम जैसे खतरे को उजागर करती है। इस कारण काल्पनिक तथ्य तक गढ़ लिए जाते हैं। भारत में ही नहीं, दुनिया भर में ऐसे मामले सामने आए हैं। गत वर्ष ऑस्ट्रेलिया में एक वकील ने कोर्ट में कुछ मुकदमों का हवाला देते हुए अपने केस को मजबूत करना चाहा लेकिन जब जज ने इन मुकदमों की लिस्ट जांची तो सामने आया कि ऐसे केस तो कभी हुए ही नहीं।  वकील ने बताया कि यह जानकारी एआई से मिली थी। वकील ने कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगी। जज ने  माफी तो स्वीकार की, लेकिन मामले की जांच भी शुरू कर दी। वकील का मामला विक्टोरियन लीगल सर्विसेज बोर्ड को भेजा गया। बोर्ड ने उसे निजी लॉ प्रैक्टिस करने से रोक दिया  और दो साल तक किसी अनुभवी वकील की निगरानी में काम करने के निर्देश दिए । इस घटना के बाद ऑस्ट्रेलिया के कोर्ट में 20 से ज्यादा ऐसे मामले सामने आए, जहां वकीलों या खुद का कोर्ट में पक्ष रखने वाले लोगों ने एआई का इस्तेमाल करके ऐसे दस्तावेज तैयार किए जिनमें गलत जानकारी थी। जाहिर है वकालत और कानून की दुनिया में एआई का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना चाहिए।   वर्कडे रिपोर्ट में भी एआई के कारण होने वाली फॉल्स सेंस ऑफ प्रोडक्टिविटी’ का भी उल्लेख है। जो समय बचता है, गलतियों सुधारने में उसका 40 प्रतिशत जाया हो जाता है। इसी तरह रिसर्च क्षेत्र में एआई ने गति तो बढ़ाई, लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी। 4.13 करोड़ शोध पत्रों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि एआई तकनीक उपयोगी है पर विषय विविधता 4.63 प्रतिशत घटी है।     गोपनीयता उल्लंघन एआई का बड़ा जोखिम है। कैम्ब्रिज एनालिटिका कांड एक बड़ा डेटा गोपनीयता घोटाला था। असल में ब्रिटिश राजनीतिक परामर्श फर्म कैंब्रिज एनालिटिका ने लाखों फेसबुक उपयोगकर्ताओं के निजी डेटा को उनकी सहमति के बिना राजनीतिक अभियानों के लिए अवैध रूप से एकत्र करके उसका उपयोग किया। इसके बाद डेटा सुरक्षा कानूनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर वैश्विक बहस छिड़ी। फेसबुक पर जुर्माना भी लगा और डेटा सुरक्षा में सुधार के लिए कदम उठाए गए। माना जाता है कि डीपफेक वीडियो ने 2024 के अमेरिकी चुनाव को प्रभावित किया था। साइबर हमलों में भी एआई तकनीक मददगार बन रही है।  जाहिर है विश्वसनीयता का संकट बढ़ रहा है।     एआई से नौकरियों पर संकट की बात भी बहुत जोरशोर से हो रही है। इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि एआई से नौकरीपेशा लोगों पर खतरा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी नौकरियां खत्म हो जाएंगी। विश्व आर्थिक मंच का अनुमान है कि डेटा एंट्री, कॉल सेंटर, सरल कोडिंग सबसे प्रभावित होंगी लेकिन एआई इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट जैसी नई नौकरियों के लिए अवसर सामने आएंगे। ऐसे में एआई के दौर में अपने आपको प्रासंगिक बनाए रखने के लिए खुद को समय के साथ अपग्रेड रखना जरूरी है। यह बात सही है कि एआई बहुत सी चीजें कर सकता है, लेकिन वह इंसान की रचनात्मकता, भावनात्मकता और सोचने-समझने की क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकता है। एआई तकनीक लीडरशिप जैसी भूमिका नहीं निभा सकती। इसलिए एआई से डरने की बजाय  अपनी रचनात्मकता और सोचने-समझने की क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान दें।   तमाम खतरों के बावजूद इस तकनीक से किनारा नहीं किया जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्देश सभी क्षेत्रों के लिए प्रासंगिक है – एआई सहायक है लेकिन वह इंसान की जगह नहीं ले सकती। इसलिए एआई से बचें नहीं, प्रशिक्षण लें और सरकार नियमन तंत्र मजबूत करे। एआई युग में भी मानव विवेक सर्वोपरि रहेगा। तकनीक गति दे सकती है, लेकिन इसे दिशा तो इंसान ही देगा। इसलिए एआई तकनीक के उपयोग में जिम्मेदारी का भाव रहना बहुत जरूरी है। एआई मददगार जरूर है लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भरता घातक साबित होती है। उससे मिली जानकारी पर आंख मूंदकर भरोसा न करें, उसे जांचें, अपने विवेक का इस्तेमाल करें और फिर आगे बढ़ें। ज्ञान चंद पाटनी

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लेख सम्पर्क, सूचना और संचार समझाये विचार

सम्पर्क, सूचना और संचार समझाये विचार

चंद्र मोहन “संपर्क सूचना और संचार” का मतलब है वह जानकारी (जैसे फ़ोन नंबर, ईमेल, पता) और तरीके (जैसे फ़ोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया) जिनका उपयोग…

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कला-संस्कृति प्रकृति, चेतना और आत्म जागरण का उत्सव

प्रकृति, चेतना और आत्म जागरण का उत्सव

बसंत पंचमी विशेष :  डॉ घनश्याम बादल भारतीय परंपरा और श्रीमद् भागवत गीता में  वसंत को ऋतुराज कहा गया है,’ऋतूनां कुसुमाकरः अर्थात् ऋतुओं में मैं वसंत हूँ, जहाँ सृजन, सौंदर्य और चेतना अपने चरम पर होती है। बसंत का सौंदर्य एवं महत्व देखकर ही इसे ऋतुराज की संज्ञा दी गई है। वसंत पंचमी भारतीय जीवन-दर्शन का सजीव प्रतीक है- जहाँ धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही चेतना के विविध रूप हैं।  तिथि मात्र नहीं बसंत   वसंत पंचमी केवल पंचांग में अंकित एक तिथि मात्र नहीं, अपितु भारतीय चेतना का वह क्षण है जब जड़ता के लंबे शीतकाल के बाद जीवन पुनः मुस्कुराने लगता है। यह ऋतु परिवर्तन का संकेत भर नहीं, बल्कि आत्मा, प्रकृति और समाज‌ तीनों के नवजागरण का पर्व है। श्वेत शीत के बाद पीत वसंत का आगमन जैसे कहता है-अब भीतर और बाहर, दोनों ही स्तरों पर ऊर्जा को जगाने एवं सृजन का समय है। धार्मिक और आध्यात्मिक संदर्भ वसंत पंचमी को माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस माना जाता है। सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि चेतना की धारा हैं। वह चेतना जो अज्ञान के तम को चीरकर विवेक का प्रकाश फैलाती है। इसीलिए इस दिन पुस्तकों, वाद्ययंत्रों और लेखन-कार्य का पूजन होता है। या कुन्देन्दु तुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना  श्लोक हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का स्वरूप शुद्ध, शांत और उज्ज्वल होता है, ठीक उसी तरह जैसे वसंत का प्रकाश। आध्यात्मिक दृष्टि से वसंत पंचमी आंतरिक ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। जैसे धरती के भीतर बीज फूटते हैं, वैसे ही साधक के भीतर सुप्त चेतना जागती है। योग और तंत्र परंपरा में इस काल को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ  माना गया है । प्रकृति और विज्ञान का संगम वैज्ञानिक दृष्टि से वसंत पंचमी के आसपास पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में दिनों की अवधि बढ़ने लगती है, सूर्य की किरणें अधिक सीधी और ऊर्जा-समृद्ध हो जाती हैं। इसका प्रभाव सीधे मानव शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है। मौसम विज्ञान के अनुसार भी वसंत ऋतु में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे “प्रसन्नता दायक हार्मोन” का स्तर बढ़ता है अवसाद, जड़ता और आलस्य में कमी आती है। सृजनात्मकता और सीखने की क्षमता तीव्र होती है । इसीलिए प्राचीन भारत में गुरुकुलों में नए अध्ययन सत्र, संगीत-नाट्य अभ्यास और शास्त्रार्थ इसी काल में प्रारंभ होते थे। मनोविज्ञान और आत्मिक चेतना मनोवैज्ञानिक रूप से वसंत पंचमी आशा का पर्व है। शीतकाल मानव मन में एक प्रकार की संकुचनशीलता ले आता है। कम प्रकाश, कम ऊर्जा, अधिक अंतर्मुखता। वसंत इस संकुचन को तोड़ता है। पीला रंग, जो वसंत पंचमी का प्रतीक है, ऊर्जा, ऊष्मा,आशावाद, बौद्धिक स्पष्टता और आत्मविश्वास का रंग माना जाता है।  इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले पकवान (केसरिया खीर, बेसन के लड्डू) परंपरा में शामिल हैं। यह रंग मन को संदेश देता है- संकुचन एवं आलस का समय यानी शीतकाल अब चला गया इसलिए आगे बढ़ो,सीखो और रचो।” भौगोलिक परिवर्तन और जीवन भौगोलिक दृष्टि से वसंत पंचमी कृषि चक्र का महत्वपूर्ण पड़ाव है। रबी की फसलें पकने लगती हैं, सरसों के खेत पीले फूलों से भर जाते हैं। यह दृश्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि अन्न, समृद्धि और जीवन की निरंतरता का संकेत है। उत्तर भारत से लेकर पूर्वी भारत तक लोकजीवन में वसंत का स्वागत गीतों के माध्यम से होता है- फागुन आयो रे, रंग बरसाओ रे, सरसों फूली,धरती बोली,जीवन गुनगुनाओ रे जैसे लोकगीतों में किसान की आशा, प्रकृति से उसका संवाद और जीवन के प्रति उसका उल्लास समाहित होता है। वसंत और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा वसंत पंचमी के साथ ही फाग, होली, रास और प्रेम-उत्सवों की श्रृंखला आरंभ होती है। कालिदास ने ‘ऋतुसंहार’ में वसंत को प्रेम और सृजन की ऋतु कहा है। यह प्रेम केवल दैहिक नहीं, बल्कि आत्मा का प्रकृति से, मनुष्य का मनुष्य से और साधक का ब्रह्म से प्रेम है।  आधुनिक संदर्भ में वसंत पंचमी…

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