जनता को बेवकूफ बना रहे हैं राजनैतिक दल
Updated: October 2, 2012
डॉ. आशीष वशिष्ठ देश का वर्तमान राजनैतिक माहौल और दलों का आचरण देश और जनहित में नहीं है। मंहगाई, खुदरा बाजार में विदेशी निवेश और…
Read moreभारतीय जनता पार्टी चिकित्सा प्रकोष्ठ
Updated: October 2, 2012
भारतीय जनता पार्टी चिकित्सा प्रकोष्ठ का अखिल भारतीय अधिवेषण ३० सितम्बर २०१२,रविवार को दिल्ली के सिरीफोर्ट आडिटोरियम में संपन्न हो गया | एक दिवसीय इस…
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एक सच्चा जनकवि हरीश भादानी
Updated: October 2, 2012
अरुण माहेश्वरी हरीश भादानी की तीसरी पुण्य तिथि के अवसर पर श्रद्धांजलि लेख सचमुच इससे कठिन शायद ही कोई दूसरा काम हो सकता है कि एक…
Read moreविचारों की सान पर गांधी का मूल्यांकन
Updated: October 2, 2012
सिद्धार्थ मिश्र‘स्वतंत्र’ सुबह सवेरे एक गीत ने ‘साथी मुबारक तुम्हे हो जश्न ये जीत का,पर इतना याद रहे एक साथी और भी था’ ने मुझे…
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सीरियल-उन्मादना और स्त्री / सारदा बनर्जी
Updated: October 2, 2012
हाल-फिलहाल यह देखा जा रहा है कि टी.वी. सीरियल के साथ स्त्रियों का गहरा संपर्क बन रहा है। चाहे वह लड़की हो, युवती हो, औरत…
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संवैधानिक संस्थाओं पर हमलावार होती सरकार
Updated: October 2, 2012
डॉ. आशीष वशिष्ठ संवैधानिक संस्थाओं पर कांग्रेस नीत संप्रग सरकार का लगातार हमलावार होना और उसकी कार्यप्रणाली पर उंगली उठाना सरकार की नीति और नीयत…
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“ मिस्टर “ से “ महात्मा “
Updated: September 30, 2012
डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री ” गाँधी ” उपनाम सुनते ही आज की पीढ़ी के लोगों को राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी, राजीव गाँधी, इंदिरा गाँधी ( जिनके…
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वर्तमान पत्रकारिता को बाजारवाद से बचाना होगा
Updated: September 30, 2012
अविनाश वाचस्पति महात्मा गांधी की पत्रकारिता अच्छाई, सच्चाई और अहिंसा की रही है। उसी के जरिए देश को आजाद कराया गया और वो सिर्फ आजाद…
Read moreकविता – छलनी
Updated: October 2, 2012
मोतीलाल बहुत देख चुका शहरों का शोरगुल जीवन के प्रतिरोध । जब द्रष्य की ऊंचाई पर शहर के नक्शे गर्मी की मायूसी सा हमारे…
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कविता-समय
Updated: October 2, 2012
समय का, न आदि है न अंत, भ्रम होता है कभी, जैसे समय रुक गया हो, भ्रम होता है कभी, जैसे समय दौड़ता हो, पर…
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खून के कई रिश्ते खून के ही प्यासे हैं…..
Updated: October 2, 2012
इक़बाल हिंदुस्तानी मुश्किलों में लोगों को खूब आज़माते हैं, जो खरे उतरते हैं दोस्त बन जाते हैं। जैसे छोटे बच्चे हैं कुछ भी जानते…
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जंगल का प्रजातंत्र
Updated: October 2, 2012
बहुत ही सुहावना मौसम था सुबह ही झमाझम बारिस हो चुकी थी और अब गुनगुनी धूप निकल आई थी|जंगल के सभी जानवर खुशी के मारे…
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