समाज अपनी ही जड़ों से उखड़ते आदिवासी

अपनी ही जड़ों से उखड़ते आदिवासी

 आदिवासियों के नायक बिरसा मुण्डा की जंयती के अवसर पर दिल्ली में देश के दूर दराज के राज्यों से आए आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने…

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आलोचना राम बनाम राम जेठामलानी

राम बनाम राम जेठामलानी

वीरेन्द्र सिंह परिहार देश के ख्याति-लब्ध अधिवक्ता और भाजपा के राज्यसभा सासंद रामजेठामलानी का गत दिनों का यह कथन काफी तूल पकड़ चुका है कि…

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उत्‍पाद समीक्षा सफेद दूध का काला कारोबार

सफेद दूध का काला कारोबार

डॉ. आशीष वशिष्ठ दूध देशभर के आशीर्वाद में पिरोया हुआ शब्द है। रिश्ते में बड़ा आज भी छोटे को आशीष देते समय दूध और पुत्र…

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कविता कविता – उसे चुनना है

कविता – उसे चुनना है

मैं अंतरिक्ष में भटक रहा हूँ पिंजरे में कैद मात्र शून्य की तरह लचीली रेखा भी मेरे साथ घुम रही है मैं आश्वस्त हूँ सभी…

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कविता और क्या चाहिये…

और क्या चाहिये…

राह है ,राही भी है ,मंज़िल भले ही दूर हो, एक पड़ाव चाहिये मुड़कर देखने के लिये।   कला है, ,प्रतिभा है, रचना है,,, ,,…

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राजनीति ‘इस्लामिक द्विराष्ट्रवाद एवं संविधान

‘इस्लामिक द्विराष्ट्रवाद एवं संविधान

जब भारत स्वतन्त्र होने की प्रक्रिया से निकल रहा था तभी भारत के लिए संविधान निर्माण हेतु संविधान सभा का गठन हो गया था। 9…

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गजल Default Post Thumbnail

हाथ पांव अपने हैं दिल दिमाग़ गिरवीं हैं…..

इक़बाल हिंदुस्तानी   कै़द में सता लो तुम पर मिटा नहीं सकते, है सदा ए हक़ मेरी तुम दबा नहीं सकते।   ध्ूाप का मुसाफिर…

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विविधा फांसी के पीछे की स्याह सियासत

फांसी के पीछे की स्याह सियासत

 सिद्धार्थ मिश्र‘स्वतंत्र’ देश की अखंडता पर कुठाराघात करने वाले कसाब को इस दुनिया से रूखसत हुए 48 घंटे से भी ज्यादा हो गये । इसके…

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विविधा आतंकियों की धमकी को हलके में न ले सरकारr

आतंकियों की धमकी को हलके में न ले सरकारr

 सिद्धार्थ शंकर गौतम देश की अस्मिता पर हमला करने वाले दुर्दांत आतंकी आमिर अजमल कसाब को दी गई फांसी पर विश्व भर में मिश्रित प्रतिक्रियाएं…

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राजनीति भारतीय जनतंत्र अपने में अनूठा

भारतीय जनतंत्र अपने में अनूठा

अनिल अनुप भारतीय जनतंत्र शब्दों में बहुत बड़ा कहा जाता है पर गुणत्व में बहुत सी खामियां हैं। यदि जनतंत्र का आशय देशहित को ताक…

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कविता नशा:राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’

नशा:राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’

सड़क किनारे पड़ी थी एक लाश उसके पास कुछ लोग बैठे थे बदहवाश | उनमे चार छोटे बच्चे और उनकी माँ थी , बूढ़े माँ…

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कविता तुम, मेरी देवी-विजय निकोर

तुम, मेरी देवी-विजय निकोर

भोर की अप्रतिम ओस में धुली निर्मल, निष्पाप प्रभात की हँसी-सी खिलखिला उठती, कभी दुपहर की उष्मा ओढ़े फिर पीली शाम-सी सरकती तुम्हारी याद रात…

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