कविता आज की सियासत

आज की सियासत

सियासत में अब शराफत रही कहां है,अच्छे इंसान की जरूरत रही कहां है।अब सियासत में झूठे का बोलबाला है,नेक नेताओ की हिफाजत रही कहां है।।…

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लेख रेत के धोरों में जल की खोज

रेत के धोरों में जल की खोज

दिलीप बीदावतबीकानेर वैसे तो राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में विविध प्रकार के पानी के पारंपरिक जल स्रोतों का निर्माण समुदाय द्वारा किया गया है. क्षेत्र…

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राजनीति नारी का अपमान महाभारत को जन्म देता है

नारी का अपमान महाभारत को जन्म देता है

दिव्य अग्रवाल द्रोपदी हों या नुपुर शर्मा जब एक नारी के अपमान पर समाज मौन धारण कर लेता है तो निश्चित ही महाभारत का वो…

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लेख डरने की जरूरत नहीं कोविड की तरह सावधानी ही है मंकी पाक्स का बचाव

डरने की जरूरत नहीं कोविड की तरह सावधानी ही है मंकी पाक्स का बचाव

लिमटी खरे पर्यावरण के साथ खिलवाड़, नए नए शोध रूपी प्रयोग आदि के चलते मनुष्य अपने जीवन से ही खेलता नजर आ रहा है। कोरोना कोविड…

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राजनीति अटल-आडवाणी के बाद अब राजनाथ-मोदी

अटल-आडवाणी के बाद अब राजनाथ-मोदी

भारतीय राजनीति में वैसे तो तमाम जोड़ियां हिट रही हैं लेकिन कुछ जोड़ियां बेमिसाल साबित हुई हैं। ऐसी ही जोड़ियों में भारतीय जनता पार्टी के…

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टेलिविज़न चैनल डिबेट की आक्रामकता में धुंधलाता सौहार्द

चैनल डिबेट की आक्रामकता में धुंधलाता सौहार्द

-ललित गर्ग – इस्लाम एवं पैगम्बर पर टिप्पणी के बाद देश-विदेश खासकर खाड़ी देशों में घिरी भारतीय जनता पार्टी ने अपने दो प्रवक्ताओं नूपुर शर्मा…

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पर्यावरण पर्यावरण संरक्षण से बचेगा मानव जीवन

पर्यावरण संरक्षण से बचेगा मानव जीवन

विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) पर विशेष-डॉ. सौरभ मालवीयमानव जाति के संरक्षण के लिए पर्यावरण की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। दिन-प्रतिदिन दूषित होते पर्यावरण की…

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राजनीति नरेंद्र मोदी की प्रतीक्षा में उतावला राष्ट्र

नरेंद्र मोदी की प्रतीक्षा में उतावला राष्ट्र

आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष गुजरात के मुख्यमंत्राी नरेंद्र मोदी जबसे बने हैं, तबसे पूरे देश…

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राजनीति भारतीय व्यवस्था में ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग’ का बोलबाला

भारतीय व्यवस्था में ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग’ का बोलबाला

वर्तमान समय भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए मंथन का दौर है? इस मंथन से क्या निकलेगा यह तो वक्त ही बतायेगा, किंतु उम्मीद की जा रही है कि आने वाला समय पूरी दुनिया के लिए अच्छा ही होगा। मंथन का दौर किसी एक क्षेत्रा में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्रा में चल रहा है। इस मंथन में नकारात्मक शक्तियों का क्षय एवं सकारात्मक श्ािक्तयों का पुनः उत्थान एक तरह से निश्चित माना जा रहा है। आज जिस तरह पूरी दुनिया में तमाम तरह की अप्राकृतिक एवं असामयिक घटनाएं देखने एवं सुनने को मिल रही हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि मंथन का दौर चल रहा है। मंथन में अमृत एवं विष दोनों का निकलना स्वाभाविक है किंतु भगवान भोलेनाथ की तरह समाज में आज ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो ‘विष’ का पान स्वयं करें और ‘अमृत’ समाज कल्याण के लिए छोड़ दें। पूरी दुनिया के साथ यदि भारत की बात की जाये तो यह पूर्ण रूप से एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र है। प्रजातंत्रा का वास्तविक अर्थ है प्रजा यानी आम जनता का राज्य किंतु आज यह निहायत ही विचारणीय प्रश्न है कि क्या वास्तव में देश में आम जनता का ही शासन है या प्रजातंत्रा के नाम पर प्रजा यानी आम जनता के साथ छल हो रहा है। यह बात आम जनता की भी समझ में नहीं आ रही है कि देश तो प्रजातांत्रिक है, किंतु प्रजा के हाथ कुछ लग नहीं रहा है। ‘आम जनता’ के नाम पर ‘खास’ लोगों का पोषण हो रहा है। भारतीय शासन-प्रशासन प्रणाली या व्यवस्था इस प्रकार की बन चुकी है कि इस व्यवस्था में ‘कोई खा-खाकर परेशान है तो कोई खाने बिना मर रहा है।’ आखिर इस प्रकार की व्यवस्था को एक आदर्श व्यवस्व्था कैसे कहा जा सकता है? आखिर ऐसा हो भी क्यों न? क्योंकि व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए जो आवश्यक अंग हैं, उनमें आपसी समन्वय एवं एकता की कमी है। संविधान में हमारी व्यवस्था को संचालित करने के लिए कार्यपालिका, न्याय पालिका एवं विधायिका की विधिवत व्यवस्था की गई है और यह तय किया गया है कि किसके क्या काम, क्या कर्तव्य एवं क्या अधिकार हैं? कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका के अतिरिक्त एक मीडिया भी है, जिसे व्यवस्था के अंतर्गत चौथे स्तंभ के रूप में माना जाता है। व्यवस्था के ये चारों स्तंभ एक दूसरे के पूरक एवं सहायक हैं। यदि इनमें से कोई एक भी स्तंभ अपनी जिम्मेदारियों से विमुख हो जाये तो पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जायेगी। वैसे तो सभी अंगों का अपना एक विशेष महत्व है, किंतु विधायिका एक ऐसा स्तंभ है जिसे देश में विधान यानी नियम-कानून बनाने का अधिकार है। इस सतंभ को सीधे-सीधे जन-प्रतिनिधियों का माना जा सकता है। ये जनप्रतिनिधि प्रत्यक्ष रूप से सरकार चलाते हैं। इन्हीं के नेतृत्व में देश के लिए नीतियां एवं कार्यक्रम बनाये जाते हैं। जन प्रतिनिधियों की देख-रेख में इन्हीं नीतियों एवं कार्यक्रमों को सुचारु रूप से संचालित करने की जिम्मेदारी कार्यपालिका की होती है। कार्यपालिका का सीधा-सा अर्थ ब्यूरोक्रेसी या पूरी की पूरी नौकरशाही से है। इस व्यवस्था को सीधे-सीधे इस भाषा में भी समझा जा सकता है कि जिन लोगों को जनता की सेवा करने की जिम्मेदारी दी गई है, चाहे वह किसी भी रूप में हों,…

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कविता मोहनजोदड़ो की नारियां जो साड़ी सिंदूर पहनती थी वही आर्या सीता सावित्री व हिन्दू भार्या पहनती

मोहनजोदड़ो की नारियां जो साड़ी सिंदूर पहनती थी वही आर्या सीता सावित्री व हिन्दू भार्या पहनती

—विनय कुमार विनायकतुम दस हजार साल की पुरानी भारतीय सभ्यताव संस्कृति की बात किस मुंह से करते?दस हजार साल की धर्म संस्कृति सभ्यता की बातवही…

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राजनीति भारत के अनाज पर दुनिया की निगाहें

भारत के अनाज पर दुनिया की निगाहें

प्रमोद भार्गव                एक समय वह था, जब यूरोप को ‘रोटी की टोकरी‘ की संज्ञा प्राप्त थी। स्वयं भारत ने आजादी के बाद लंबे समय तक आस्ट्रेलिया से गेहूं आयात…

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राजनीति मोहन भागवत की बोध-दृष्टि में ज्ञानवापी

मोहन भागवत की बोध-दृष्टि में ज्ञानवापी

-ललित गर्ग – किसी भी देश की माटी को प्रणम्य बनाने, राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने एवं कालखंड को अमरता प्रदान करने में राष्ट्रनायकों की…

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