नदी की बहती धारा है मोहब्बत सुदूर आकाश का ,एक सितारा है मोहब्बत सागर की गहराई सी है मोहब्बत निर्जन वनों की तन्हाई सी है मोहब्बत ख्वाहिशों की महफिलों का ,ठहरा पल है मोहब्बत शाख पर अरमानों के गुल है मोहब्बत ख्वाहिशों के दरमियां ,एक सवाल है मोहब्बत दर्द का किश्तों में ,आदाब है मोहब्बत लबों से दिल का पैगाम है मोहब्बत शब्द कलम की साज है मोहब्बत भटकी चाह मृग तृष्णा सी है मोहब्बत भावों की मधुर आवाज है मोहब्बत प्यार विश्वास की नींव है मोहब्बत उदास लम्हो को आईना दिखाती है मोहब्बत आंशू का खारापन पी लेती है मोहब्बत टूटती बिखरती सांसों संग जी लेती है मोहब्बत || मोहब्बत है ज़िन्दगी ,मोहब्बत जुबान है मोहब्बत दिलों के प्यार का ,करती मिलान है मोहब्बत लुटाती है रहमो करम वफ़ा मोहब्बत किसी की ,दर्द भरी दास्तान है ‘प्रभात ‘ मोहब्बत प्रतिफल नहीं चाहती कभी मोहब्बत हक़ भी नहीं मांगती कभी मोहब्बत मिटने को रहती है तत्पर मोहब्बत भय को नहीं मानती कभी पर आज सच्ची मोहब्बत दिखती नहीं दिखे स्वार्थ ही नज़रों में भटक रहा है प्यासा बदल भूला शहरी डगरों में पैसों के बाजार में मोहब्बत कथानक हो गई मोहब्बत भूली यादों का आसरा हो गई ||
मनोज ज्वाला भाजपा के हाथों भारत की केन्द्रीय सत्ता से बेदखल हो चुकी कांग्रेस अपनी इस बदहाली के लिए भाजपा के बढते जनाधार से नहीं, बल्कि उसके मातृ-संगठन अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति बढती जनस्वीकार्यता से ज्यादा चिन्तित है । लोकसभा के दो-दो चुनावों में लगातार हुई हार से सहमी कांग्रेस के शीर्ष-नेतृत्व का मानना है कि हार के लिए साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की उसकी नीतियां जरूर जिम्मेवार हैं, किन्तु भाजपा की हुई जीत के लिए तो उसका पितृ-संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का बढता जनाधार ही सबसे बडा कारण रहा है । अभी हाल ही में १७वीं लोकसभा के हुए चुनाव के बाद हार के कारणों की समीक्षा के लिए हुई बैठक में भी कांग्रेस के नेताओं ने इस तथ्य के सत्य पर संज्ञान लेते हुए भाजपा का
मुकाबला करने के लिए संघ जैसा ही अपना एक अराजनीतिक सामाजसेवी संगठन बनाने की आवश्यकता को बडी सिद्दत से महसूस किया । समीक्षा के दौरान हुए विचार-मंथन में शामिल गांधीवादी पूर्व सांसद रामजी भाई और कांग्रेसी विचारक रामलाल राही आदि ने कांग्रेस-नेतृत्व को समझाया कि जिस तरह से महात्मा गांधी के सत्याग्रह व सामाजिक कार्यों का राजनीतिक लाभ कांग्रेस को लम्बे समय तक मिलते रहा, जिसकी वजह से वह अब तक सत्ता में बनी रही ; उसी तरह से डॉ० केशव बलिराम हेड्गेवार द्वारा स्थापित संघ-संगठन के विविध सेवामूलक कार्यों के लाभकारी परिणाम ही भाजपा को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचा दिए । उनने कांग्रेस नेताओं को यह भी स्मरण कराया कि कांग्रेस में कभी ‘सेवादल’ नाम का एक संगठन हुआ करता था, जो संघ का विकल्प बन सकता था; किन्तु कालक्रम से उसके सारे कार्यकर्ता कांग्रेस के नेता बन गए जिससे वह मृतप्राय हो गया, तो अब उसी तर्ज पर संघ जैसा एक कांग्रेसी सामाजिक संगठन बनाने की सख्त जरुरत है । इस दिशा में मांग्रेस-नेतृत्व कैसा व कितना प्रयत्न कर रहा है, सो तो वही जाने ; किन्तु कांग्रेस नेताओं के संघ-सम्बन्धी बयानों और भाजपा की हर नीति-गतिविधि के लिए संघ व उसकी विचारधारा को कोसने से पूरा देश यह तो जान ही गया कि अपने देश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी एक ऐसी शक्ति है, जो कांग्रेस जैसी सत्ताधारी पार्टी को सत्ता से विस्थापित कर सकती है और भाजपा जैसी विपक्षी पार्टी को सत्ता के शीर्ष पर स्थापित कर सकती है । २०१४ में १६वीं लोकसभा के हुए चुनाव के बाद से अब तक भाजपा-मोदी-सरकार के हर कार्य के लिए संघ को जिम्मेवार ठहरा कर कांग्रेस के नेता-नियन्ता लोग संघ का एक तरह से प्रचार ही करते रहे हैं । किन्तु उनका संघ-विरोध हिन्दू-विरोध व राष्ट्र-विरोध का रुख भी लेता रहा, क्योंकि संघ एक राष्ट्रवादी हिन्दू-संगठन जो है । कांग्रेस का यह संघ-विरोध इतना बढता गया कि कश्मीर से धारा ३७० हटाने एवं उस राज्य के पुनर्गठन सम्बन्धी मोदी-सरकार के निर्णय की आलोचना करते हुए कांग्रेसियों ने उसके लिए भी संघ को घसिटते हुए उसे एक मुस्लिम-विरोधी नाजी संगठन के विशेषण से विभूषित कर दिया । कांग्रेस के इस संघ-विरोध से उत्साहित हो कर पाकिस्तान भी कश्मीर-मामले पर भारत सरकार के निर्णय का विरोध करने के अपने अभियान में संघ को शामिल कर लिया । अर्थात देश में संघ-विरोध का जो काम कांग्रेस करती रही थी, दुनिया में वही काम पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान भी करते दिख रहे हैं । अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए अपने एक भाषण में इमरान खान द्वारा संघ के नाम का उल्लेख १० बार किया गया । संघ को हिटलर व मुसोलनी से प्रभावित संगठन बताते हुए इमरान ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उसी संघ के सदस्य हैं, जो मुस्लिमों से घृणा करता है । उन्होंने कहा है कि “संघ ऐसा संगठन है, जो हिंदू नस्ल को ऊपर मानता है तथा मुस्लिमों व ईसाइयों से घृणा करता है । उसका मानना है कि हिंदुओं के शासन का स्वर्णकाल मुस्लिमों की वजह से खत्म हुआ । इसी घृणा की विचारधारा ने महात्मा गांधी की हत्या की । वर्ष २००२ में मोदी ने इसी घृणा की विचारधारा के चलते गुजरात में संघ के गुण्डों को हिंसा फैलाने की इजाजत दी , जिन्होंने मुस्लिमों की हत्या कर दी और सैकड़ों मुस्लिम बेघर हो गए ।” ऐसे निराधार व तथ्यहीन आरोपों के साथ इमरान खान द्वारा संघ का यह उल्लेख युएनओ में भारत को ‘मुस्लिम-विरोधी’ व ‘हिन्दू राष्ट्र’ सिद्ध करने की कोशिश के तौर पर इस तरह से किया गया कि दुनिया संघ और भाजपा को एक ही समझे । ध्यातव्य है कि युएनओ में आज तक किसी भी देश के प्रमुख द्वारा कभी भी संघ का नामोल्लेख नहीं किया गया था । किन्तु इमरान के द्वारा ऐसा किये जाने से यह प्रतीत होता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध भारत सरकार की कर्रवाइयों से उतना भयभीत नहीं है, जितना संघ की विचारधारा से । क्योंकि उसे मालूम है कि भारत की केन्द्रीय सत्ता संघ-संपोषित भाजपा के हाथों में आने के कारण ही भारत-सरकार पाक-पोषित इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध विश्व भर में निर्णायक अभियान चला रही है , जिससे वह बेनकाब होता जा रहा है । अन्यथा कांग्रेस की सरकार से तो उसे कोई परेशानी नहीं थी । ऐसे में, इमरान के उस भाषण को विश्व-विरादरी के लोग अगर गम्भीरता से लेते भी हैं, तो इससे संघ का उसी तरह से भला ही होगा, जिस तरह से भारत में कांग्रेस द्वारा किये जाते रहे संघ-विरोध से संघ का विस्तार होते रहा है । क्योंकि संघ के प्रति वैश्विक विमर्श होने से पूरे विश्व में संघ की उस विचारधारा का विस्तार होगा , जिसके कारण भारत भर में भाजपा के जनाधार का विस्तार होने से नरेन्द्र मोदी की निष्कलंक स्वीकार्यता बढी है और उनके नेतृत्व में भारत आज आतंकवाद के विरुद्ध अब तक का सबसे बडा अभियान चला रखा है । संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने इमरान खान के उस भाषण पर पाकिस्तान की आशा के विपरीत भडकने के बजाय चुटकी लेते हुए कहा है कि “सचमुच ही भारत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक दूसरे के पर्यायवाची हैं । हम भी यही चाहते हैं कि दुनिया के लोग भारत और संघ को एक ही समझें । इमरान खान ने भारत और संघ को एक ही बता कर अच्छा ही किया है , क्योंकि इससे दुनिया में जो-जो देश आतंकवाद से पीड़ित हैं, वे यह अनुभव करने लगे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आतंकवाद का विरोधी संगठन है।” दरअसल अपने देश में इन दिनों जो हाल कांग्रेस का हो चुका है, दुनिया में वही हाल पाकिस्तान का होते जा रहा है । इसका मूल कारण कांग्रेस का हिन्दुत्व-विरोधी होना और पाकिस्तान का हिन्दू-विरोधी होना तो है ही , सबसे बडा कारण तो इस्लामी-जिहादी आतंकवाद के प्रति उन दोनों का नरम होना है । संघ जैसा अपना एक समाजसेवी संगठन कायम करने को इच्छुक कांग्रेस और संघ से ठीक उलट अनेक हिंसक-जिहादी संगठनों के संरक्षक बने पाकिस्तान, इन दोनों के ‘संघ-विरोध’ में मूल तत्व यही है- सत्ता के लिए आतंकवाद का सहयोग । इन दिनों इधर देश में कांग्रेस ने संघ को भाजपाई सरकार का पर्याय बना दिया है, तो उधर दुनिया में पाकिस्तान द्वारा संघ को भारत का पर्याय बनाने की कोशिश की जा रही है । कांग्रेस और पाकिस्तान के इस ‘संघ-विरोध’ का फलितार्थ वास्तव में संघ के लिए अनुकूल ही है, क्योंकि आतंकवाद के विरुद्ध भारत के वैश्विक अभियान के परिप्रेक्ष्य में संघ के प्रति बढता राजनीतिक-बौद्धिक विमर्श कम से कम संघ के लिए तो शुभकारी भी होगा और लाभकारी भी , लोग संघ की विचारधारा के यथार्थ को जानेंगे औए समझेंगे तो सही ।
दो दिन पहले आये एक कोर्ट के एक फैसले में दुनिया को पहला ऐसा मामला पता चला जिसमें किसी की मौत का ज़िम्मेदार वायु प्रदूषण था। बात हो रही है नौ साल की एला की, जिसकी मौत के नौ साल बाद लंदन के एक कोर्ट ने वायु प्रदूषण को उसकी मौत का कारण माना। दूसरे शब्दों में कहें तो इसमें अब दो राय नहीं कि प्रदूषण जानलेवा है। और ऐसा नहीं कि समस्या बस वहीँ लंदन की है।
ताज़ा शोध बताते हैं कि भले ही क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीसेस (सीओपीडी) और ब्रोन्कियल अस्थमा भारत में आम बीमारियाँ हैं, लेकिन 1990 के दशक से लेकर अगले 20 साल के दौरान भारत में जीडीपी पर बीमारी के बोझ में सीओपीडी का असर दोगुना हो गया है। तेजी से हो रहे इस बदलाव का मुख्य कारण वातावरणीय तथा आंतरिक वायु प्रदूषण हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हाल में दावा किया था कि वर्ष 2019 के मुकाबले इस साल नवम्बर में दिल्ली की हवा ज्यादा खराब थी। इन कारकों और सांस सम्बन्धी महामारी का संयुक्त रूप से तकाजा है कि जनस्वास्थ्य की सुरक्षा के लिये फौरन नीतिगत ध्यान दिया जाए।
क्लाइमेट ट्रेंड्स ने सीओपीडी और उसके नीतिगत प्रभावों पर किये गये एक ताजा शोध पर चर्चा के लिये शनिवार को एक वेबिनार आयोजित किया। यह शोध स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, नेशनल एनवॉयरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) और दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरणीय विज्ञान विभाग के परस्पर सहयोग से किया गया है।
वेबिनार में नीरी के निदेशक डॉक्टर राकेश कुमार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के वैज्ञानिक और आईसीएमआर के डीडीजी डॉक्टर वी पी सिंह, आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज में प्रोफेसर डॉक्टर सागनिक डे और हिन्दुस्तान टाइम्स की पर्यावरण पत्रकार सुश्री जयश्री नंदी ने हिस्सा लिया। वेबिनार का संचालन क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक सुश्री आरती खोसला ने किया।
वेबिनार में दिल्ली विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज के डायरेक्टर-प्रोफेसर डॉक्टर अरुण शर्मा ने इस शोध का प्रस्तुतिकरण किया। इस शोध का उद्देश्य दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी) पर सीओपीडी के बोझ का आकलन करना, सीओपीडी के स्थानिक महामारी विज्ञान को समझना, दिल्ली के एनसीटी में सीओपीडी के जोखिम वाले कारकों का आकलन करना और दिल्ली के निवासियों के बीच वायु प्रदूषण के लिहाज से व्यक्तिगत जोखिम का अंदाजा लगाना है।
डॉक्टर शर्मा ने शोध की रिपोर्ट के हवाले से कहा कि क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीसेस (सीओपीडी) और ब्रोन्कियल अस्थमा सांस से जुड़ी सबसे आम बीमारियां हैं। वर्ष 2015 में सीओपीडी ने सीओपीडी की वजह से 104.7 मिलियन पुरुष और 69.7 मिलियन महिलाएं प्रभावित हुईं। वहीं, वर्ष 1990 से 2015 तक सीओपीडी के फैलाव में भी 44.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2017 में सीओपीडी की वजह से पूरी दुनिया में 32 लाख लोगों की मौत हुई, और यह मौतों का तीसरा सबसे सामान्य कारण रहा।
भारत में इसके आर्थिक प्रभावों पर गौर करें तो वर्ष 1990 में 28.1 मिलियन मामले थे जो 2016 में 55.3 दर्ज किये गये। ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिसीसेस के अनुमान के मुताबिक वर्ष 1995 में भारत में जहां सीओपीडी की वजह से 5394 मिलियन डॉलर का भार पड़ा। वहीं, वर्ष 2015 में यह लगभग दोगुना होकर 10664 मिलियन डॉलर हो गया।
शोध के मुताबिक पिछले कुछ अर्से में वायु प्रदूषण सबसे उल्लेखनीय जोखिम कारक के तौर पर उभरा है। वायु प्रदूषण सीओपीडी के तीव्र प्रसार के लिये जिम्मेदार है। सीओपीडी का जोखिम पैदा करने वाले कारकों में धूम्रपान को सबसे आम कारक माना गया है। तीन अरब लोग बायोमास ईंधन जलाने से निकलने वाले धुएं के जबकि 1.01 अरब लोग तम्बाकू के धुएं के सम्पर्क में आते हैं। इसके अलावा वातावरणीय वायु प्रदूषण, घरों के अंदर वायु प्रदूषण, फसलों की धूल, खदान से निकलने वाली धूल और सांस सम्बन्धी गम्भीर संक्रमण भी सीओपीडी के प्रमुख जोखिम कारक हैं।
जहां तक इस अध्ययन के औचित्य का सवाल है तो इस बात पर गौर करना होगा कि भारत में जनसंख्या आधारित अध्ययनों की संख्या बहुत कम है और पिछले 10 वर्षों के दौरान ऐसा एक भी अध्ययन सामने नहीं आया। दिल्ली एनसीटी के लिये जनसंख्या आधारित एक भी अध्ययन नहीं किया गया।
डॉक्टर शर्मा ने कहा कि सीओपीडी का सीधा सम्बन्ध वायु प्रदूषण से है। सीओपीडी के 68 प्रतिशत मरीजों के मुताबिक वे ऐसे स्थलों पर काम करते हैं जहां वायु प्रदूषण का स्तर ज्यादा है। इसके अलावा 45 प्रतिशत मरीज ऐसे क्षेत्रों में काम करते हैं, जहां वायु प्रदूषण का स्तर ‘खतरनाक’ की श्रेणी में आता है। इसके अलावा 70 प्रतिशत मरीजों ने बताया कि वे धूल की अधिकता वाले इलाकों में काम करते हैं।
64 प्रतिशत मरीजों ने बताया कि वे धूम्रपान नहीं करते, जबकि धूम्रपान करने वाले मरीजों का प्रतिशत केवल 17.5 है। इससे जाहिर होता है कि लोगों पर अप्रत्यक्ष धूम्रपान का असर कहीं ज्यादा हो रहा है।
नीरी के निदेशक डॉक्टर राकेश कुमार ने वेबिनार में अपने विचार रखते हुए कहा कि यह अध्ययन भारत के नीति नियंताओं के लिये नये पैमाने तैयार करने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि जब हम विभिन्न लोगों से डेटा इकट्ठा करना चाहते हैं तो यह बहुत मुश्किल होता है। हमारे पास अनेक स्रोत है जो अन्य देशों से अलग हैं। दिल्ली को लेकर किये गये अध्ययनों से पता चलता है कि यहां केरोसीन से लेकर कूड़े और गोबर के उपलों तक छह-सात तरीके के ईंधन का इस्तेमाल होता है, जिनसे निकलने वाला प्रदूषण भी अलग-अलग होता है। आमतौर पर बाहरी इलाकों में फैलने वाले प्रदूषण की चिंता की जाती है लेकिन हमें चिंता इस बात की करनी चाहिये कि आउटडोर के साथ इंडोर भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती में भी हैवी मेटल्स होते हैं। डॉक्टर शर्मा के अध्ययन में दिये गये आंकड़े खतरनाक रूप से बढ़े नहीं हैं, लेकिन वे सवाल तो खड़े ही करते हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के वैज्ञानिक और आईसीएमआर के डीडीजी डॉक्टर वी पी सिंह ने कहा कि इस तरह के अध्ययन बेहद महत्वपूर्ण है। इनसे पता लगता है कि प्रदूषणकारी तत्व किस तरह से मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं। दिल्ली में 15-20 साल पहले डीजल बसों और वैन में सीएनजी से संचालन की व्यवस्था की गयी। बाद में पता चला कि सीएनजी से बेंजीन गैस का उत्सर्जन होता है। इस दौरान प्रदूषण के स्तर बहुत तेजी से बढ़े हैं। इस पर ध्यान देना होगा कि हमें विकास की क्या कीमत चुकानी पड़ रही है। यह और भी चिंताजनक है कि छोटे छोटे शहरों में भी प्रदूषण के इंडेक्स दिल्ली से मिलते-जुलते हैं।
सागनिक डे- यह अध्ययन हमें बताता है कि हम प्रदूषण के सम्पर्क के आकलन में पैराडाइम शिफ्ट के दौर से गुजर रहे हैं। हमें सिर्फ एक्सपोजर असेसमेंट करने मात्र के पुराने चलन से निकलना होगा। ऐसी अन्य स्टडीज से चीजें और बेहतर होंगी।
उन्होंने कहा कि आज हमें हाइब्रिड मॉनीटरिंग अप्रोच की जरूरत है। कोई व्यक्ति जो आईटी सेक्टर में काम करता है, जाहिर है कि वह बंद जगह पर ही काम करता होगा। अंदर प्रदूषण का क्या स्तर है उसे नापना बहुत मुश्किल है। हमें 24 घंटे एक्सपोजर के एकीकृत आकलन का तरीका ढूंढना होगा। हमारे पास अंदरूनी प्रदूषण को नापने के साधन बेहद सीमित संख्या में हैं। हमें इस तरह के डेटा गैप को पाटना होगा।
डॉक्टर शर्मा द्वारा पेश किये गये अध्ययन के मुताबिक 30 मिनट के सफर से एक्सपोजर का खतरा होता है। वायु प्रदूषण का मुद्दा सिर्फ इसलिये गम्भीरता से लिया गया क्योंकि इसने सेहत के लिये चुनौती खड़ी की। अभी तक किये गये अध्ययनों में ज्यादातर डेटा वह है जो कहीं और से लिया गया है, मगर किसी स्थान के मुद्दे अलग होते हैं। उनमें कुपोषण भी शामिल है। वायु प्रदूषण सांस सम्बन्धी बीमारियों के साथ-साथ दिल की बीमारियां, मानसिक रोग और समय से पहले ही जन्म समेत तमाम चुनौतियां पेश करता है।
देश में आंदोलनों की इतिहास बहुत ही पुराना है, लेकिन पिछले कुछ सालों आंदोलन करने के ठेके दिए जाने लगे हैं। नर्मदा बचाओ से अन्ना आंदोलन, जेएनयू आंदोलन, सीएए आंदोलन और अब किसान आंदोलन जैसे प्रमुख इन सभी आंदोलनों में कुछ किरदार ऐसे हैं जोकि पिछले 25 सालों से आंदोलनों के काम पर ही टिके हैं। हालांकि किसान आंदोलन में सामने दिखाने वाले चेहरे बेशक कुछ किसान यूनियन के हैं, लेकिन इन यूनियन को चलाने वाले ये वही लोग हैं जोकि देश में ख़ासकर मोदी सरकार के हर फैसले के खिलाफ आंदोलन के नाम पर धरने प्रदर्शन करने का काम करते हैं। ये आंदोलन वाले नेता टुकड़े टुकड़े गैंग से लेकर शाहीन बाग के जरिए रास्ते ब्लॉक कराने मे माहिर माने जाते हैं। वैसे तो ये सब छोटे छोटे आंदोलन करते रहते हैं, लेकिन जैसे ही कोई बड़ा आंदोलन होता है तो उनमें ये सभी लोग एकसाथ आ जाते हैं। किसान आंदोलन में किसानों के हमदर्द के तौर पर काम कर रहे इनमें से एक का भी किसानी से कोई संबंध नहीं रहा है। ज्य़ादातर आंदोलन के नाम पर राजनीति करते रहे हैं। चलिए इन आंदोलन वाले नेताओं के पांच प्रमुख लोगों के बारे में हम आपको बताते हैं।
मेधा पाटकर
एक समय नर्मदा आंदोलन का दूसरा नाम मानी जाने वाली मेधा पाटकर और विकास की किसी भी गतिविधि के खिलाफ मज़दरों का मोर्चा निकालने वाली के तौर पर जाना जाता है। इन्होंने नर्मदा आंदोलन चलाया, जिसमें नर्मदा नदी पर बांध बनने के खिलाफ लोगों को भड़काया गया था। इन्होंने वकील प्रशांत भूषण के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न अदालतों में कई केस लगाए। अब जब नर्मदा प्रोजेक्ट पूरा हो गया है तो मध्यप्रदेश से लेकर गुजरात की एक बड़ी आबादी इस प्रोजेक्ट से लाभ ले रही है। लाखों एकड़ खेती को अब पानी मिलने लगा है। जिन 25-30 हज़ार किसानों के नाम पर ये प्रोजेक्ट रोकने के लिए आंदोलन खड़ा किया गया था। उससे कई गुना यानि लाखों किसानों को इस परियोजना से अपने खेतों के लिए पानी मिला है। इस परियोजना से करीब 1.30 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई शुरू हो सकी। मेधा पाटकर भी इसके बाद से अभी तक सभी आंदोलनों में सक्रिय रही है, सीएए आंदोलन में भी इन्हें देखा गया था। फिलहाल इनका नेशनल अलाइंस फॉर प्यूपल मूवमेंट इस किसान आंदोलन का हिस्सा है।
योगेंद्र यादव
हन्नान मोला, वीएम सिंह और योगेंद्र यादव
हरियाणा के रिवाड़ी जिले के योगेंद्र यादव पहले एक सेफोलॉजिस्ट थे। जोकि टीवी चैनलों पर और अखबारों में चुनाव के गणित समझाते थे। बाद में ये साफ्ट लेफ्ट के सदस्य के तौर पर आंदोलनों का हिस्सा बनने लगे। अन्ना आंदोलन के समय ये और वकील प्रशांत भूषण ने मिलकर आंदोलन को बड़ा बनाने में बड़ी भूमिका निभाई और बाद में आम आदमी पार्टी की स्थापना भी की। लेकिन पार्टी पर अरविंद केजरीवाल ने कब्जा कर लिया और ये फिर इन्होंने नए आंदोलनों के लिए में स्वराज इंडिया नाम का संगठन बनाया जिसने दिल्ली में चुनाव लड़ा और असफल रहा। जेएनयू में जब टुकड़े टुकड़े गैंग भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगा रहा था। तब ये इस गैंग के पक्ष में मीडिया में बयान दे रहे थे। बाद में शाहीन बाग आंदोलन को भी इनकी टीम ने ही चलाया। जिसमें उमर खालिद और शरजील शामिल थे। लेकिन वहां भी ये ही तय करते थे कि मीडिया में आंदोलन को बनाए रखने में आज क्या करना है। इनका और वकील प्रशांत भूषण का काफी करीबी रिश्ता है। ख़ास बात ये है कि मेधा पाटकर का भी वकील प्रशांत भूषण के साथ करीबी रिश्ता है।
अविक साहा
किसान आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभा रहे अविक साहा पेशे से तो वकील रहे हैं, परिवार भी वकीलों का रहा है। लेकिन आंदोलनों से इनका विशेष लगाव है, आंदोलन कैसा भी हो कहीं भी हो। बस अविक बाबू का काम शुरू हो जाता है। योगेंद्र यादव और अविक साहा के बीच ख़ास दोस्ती है। स्वराज इंडिया में महासचिव होने, किसान संघर्ष समंनवय समिति के कार्डिनेटर के साथ साथ अविक का लेफ्ट पार्टियों के साथ ख़ास संबंध हैं। किसी भी आंदोलन के लिए लेफ्ट पार्टियों के कार्यकर्त्ता इनके कहने से जुट जाते हैं। तमिलनाडू में वेदांता अल्मूनियम प्लांट पर आंदोलन में इनका विशेष प्रभाव रहा है। जोकि बाद में बंद हो गया। दरअसल ये संगठन को जोड़ने की भूमिका में हर आंदोलन से जुड़े रहते हैं। सीएए के खिलाफ आंदोलन में भी ये पर्दे के पीछे विशेष रूप से सक्रिय थे। बंगाल में भी ये ख़ासे सक्रिय हैं।
अतुल अंजान
ये भी लेफ्ट पार्टी के बड़े नेता हैं, सीपीआई आई के राष्ट्रीय सचिव भी ऑल इंडिया किसान सभा के महासचिव भी है। दरअसल ऑल इंडिया किसान सभा दो हैं, एक सीपीएम के पास है तो दूसरी सीपीआई के पास। सीपीआई वाली किसान सभा के आंदोलनों को अतुल अंजान देखते हैं। लेकिन दोनों किसी भी सरकार विरोधी आंदोलन में अक्सर एक साथ ही होते हैं। मेधा पाटकर से लेकर अन्ना आंदोलन तक सभी का समर्थन अतुल अंजान और उनके संगठनों ने किया है। सीएए आंदोलन में भी अंजान ने विभिन्न राज्यों में जाकर सीएए के खिलाफ लोगों को सरकार के कानून के खिलाफ सड़कों पर उतरने के लिए कहा था। धारा 370 के हटने पर भी अंजान ने सरकार के खिलाफ बिगुल बजाया था। मोदी सरकार के हर कदम की खिलाफत करने और उसपर लोगों को सड़कों पर निकालने और धरने-प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करने में अक्सर आगे वाली कतार में होते हैं।
हन्नान मौला
अपनी स्कूल के दिनों से ही लेफ्ट पार्टी सीपीआई के सदस्य रहे हन्नान भी आंदोलन विशेषज्ञ है। ये किसानों के होने वाले सभी आंदोलनों का हिस्सा रहते हैं। लेफ्ट पार्टी सीपीआईएम में पोलित ब्यूरो के सदस्य मौला ऑल इंडिया किसान सभा के महासचिव भी हैं। साथ ही ये इस किसान आंदोलन में केंद्रीय कमेटी के सदस्य भी हैं। आठ बार के सांसद रहे मौल भी नर्मदा बचाओ आंदोलन का सक्रिय हिस्सा रहे हैं। इसके बाद वो राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में हुए किसान आंदोलन का भी सक्रिय सदस्य रहे। देश में लेफ्ट समर्थन से जितने भी आंदोलन हुए हैं, उनमें ये अपने ऑल इंडिया किसान सभा के साथ समर्थन के लिए पहुंच जाते हैं। दिल्ली बॉर्डर पर हो रहे आंदोलन में तो ये और इनके संगठन ही बाकी किसान संगठनों को अपने हिसाब से चला रहे हैं। ख़ास बात ये है कि हन्नान मौला का कभी किसानी से संबंध नहीं रहा है।
मशहूर लेखक अंशुमन भगत ने अपने कर्म इच्छा से युवकों के लिए लाई गई एक श्रेष्ठ पुस्तक की रचना की है, जिसमे महत्वपूर्ण शब्दकोश रचनाएं रचि गई है, और ये काफी प्रसिद्ध है सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर, नौजवान अंशुमन भगत ने अपना रास्ता खुद चुना, जबकि आजकल के युवक पीढ़ियां अनेक कर्मो मे व्यस्त है, कई युवक साधारण जीवन की कल्पना कर रहे है, जबकि लेखक अंशुमन ने श्रेष्ठ बनने का निर्णय लिया ताकि समाज में कुछ बेहतर कर सके। अधिकांश इस उम्र के लोगो की जीवन जीने की कल्पना ये नहीं होती, अपनी शक्ति, बुद्धि और कर्म इच्छा से निर्भय अंशुमन भगत ने इस काम को करने का निर्णय लिया है।
अंशुमन भगत ने अपनी राय को परिणाम दिया, अपनी श्रेष्ठता और कठिन परिश्रम से इस काबिल बनाया है, अपने शब्दो को जोड़ कर रोज़मर्रा ज़िन्दगी के परिणाम मे कहीं न कहीं इंसान कठिन परिस्थिति के समय अपनी आलोचनाओं कि कल्पना कर सके ताकि उन शब्दों के ज़रिए उनको राहत हासिल हो और फिर से वे जी उठे।
लेखक अंशुमन भगत ने असान शब्दो का उपयोग करते हुए बस यही कोशिश की है कि दर्शक और पाठक को प्रकृति कि महत्वपूर्णता, सम्पूर्ण मार्ग से बताई है। अंशुमन ने तीन पुस्तकों की रचना की है, जिनमे अमेजॉन पर दो बेस्टसेलिंग पुस्तकें रही हैं अंशुमन ने अपना लिखने का सरल अंदाज़ रखा है ताकि हर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत की पहचान को बड़ी आसानी से जान ले, जो कि किसी न किसी तरह से समाज के लिए उपयोगी और लाभदायक हो।
अंशुमन भगत ने प्रेरणादयक पुस्तको की अधिक रचनाएं की है, जो आज कि युवा पीढ़ी अपनी कठिन परिस्थितियों से ओझल हो, मन्न से परेशान लोगो की सहायता करने के विकल्प से इन की पुस्तके अधिक सहयोग साबित हुई है और लेखक का हमेशा से यही योगदान रहा है। जब मन मे अच्छे विचार पनपते हो तो इंसान शीघ्रता से सफलता की भूमि में अपने कदम बढ़ाता है और उसका परिणाम भी जीत से बढ़कर और कुछ नहीं होता, सफलता ही एक मार्ग है अपनी पहचान की प्रसिद्धता पाने के लिए।
लेखक अंशुमन भगत ने अपने जीवन को इसी प्रकार रखने का परिणाम दिया है और कहा कि अच्छे कर्मो का परिणाम अच्छा ही होता है , अपने व्यक्तिगत जीवन की आलोचनाओं को योग्यता से सम्पूर्ण मार्ग दिखाया। मुझे कंही याद पड़ता है अंशुमन भगत ने अपनी पहली पुस्तक “योर ऑन थॉट” मे लिखा कि “इज्जत सबकी करो पर शुरुआत अपने आप से करो।”, जो एक उद्धरण ही नही बल्कि संदेश भी देती है कि लोग दूसरो की महानता में इतने डूब जाते है कि खुद को भी भूल जाते है, ऐसा न हो, इसी कारण से ये बात बताई गई हैं कि हम अपने आप को पहचाने और उस पहचान को एक नाम दे।
इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) द्वारा एक बार फिर अंतरिक्ष में सफलता का नया इतिहास रचा गया है। भारत द्वारा 17 दिसम्बर को चेन्नई से 120 किलोमीटर दूर श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र के दूसरे लांच पैड से पीएसएलवी-सी50 रॉकेट के जरिये अपना 42वां संचार उपग्रह ‘सीएमएस-01’ सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। इसरो के 320 टन वजनी पीएसएलवी-सी50 रॉकेट ने 20 मिनट की उड़ान के बाद सीएमएस-01 (पूर्व नाम जीसैट-12आर) को उसकी तय कक्षा जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर आर्बिट (जीटीओ) में पहुंचा दिया और अब इस कक्षा में आगे की यात्रा यह उपग्रह स्वयं पूरी करेगा। पीएसएलवी (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान) रॉकेट का यह 52वां मिशन था और पीएसएलवी-एक्सएल रॉकेट (छह स्ट्रेपऑन मोटर से संचालित) की 22वीं सफल उड़ान थी तथा सतीश धवन स्पेस सेंटर से इसरो का यह 77वां लांच मिशन था। इसरो के मुताबिक चार दिनों में सीएमएस-01 अपनी कक्षा के तय स्थान पर तैनात हो जाएगा। सीएमएस-01 को पृथ्वी की कक्षा में 42164 किलोमीटर के सबसे दूरस्थ बिन्दु पर स्थापित किया गया है। इस कक्षा में स्थापित होने पर यह सैटेलाइट अब पृथ्वी के चारों तरफ उसी की गति से घूमेगा और पृथ्वी से देखे जाने पर आकाश में एक जगह खड़े होने का भ्रम देगा। सीएमएस-01 उपग्रह के जरिए सी-बैंड फ्रीक्वेंसी को मजबूती मिलेगी। सीएमएस-01 को मोबाइल फोन से लेकर टीवी तक के सिग्नलों के स्तर को सुधारने के लिए तैयार किया गया है, जो भारत के जमीनी इलाकों के अलावा अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप को भी कवर करने वाले फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम के विस्तारित सी-बैंड में सेवाएं मुहैया करेगा। इस उपग्रह की मदद से देश में टीवी संचार को लेकर नई तकनीक विकसित की जा सकेगी और यह उपग्रह मोबाइल-टीवी सिग्नल को बढ़ाने में काफी मददगार साबित होगा। इसके जरिये टीवी संचार प्रणाली, टीवी से संबंधित संचार प्रणालियों और व्यवस्थाओं को परिष्कृत करने का अवसर मिलेगा। सीएमएस-01 की मदद से टीवी चैनलों की दृश्य गुणवत्ता बेहतर होने के अलावा सरकार को टेली-एजुकेशन, टेली-मेडिसन को आगे बढ़ाने तथा आपदा प्रबंधन के दौरान मदद मिलेगी। यह उपग्रह 11 जुलाई 2011 को लांच किए गए संचार उपग्रह ‘जीसैट-12’ का स्थान लेगा, जो आगामी सात वर्षों तक एक्सटेंडेड सी-बैंड फ्रिक्वेंसी स्पेक्ट्रम में अपनी बेहतर सेवाएं देता रहेगा। जीसैट-12 की मिशन अवधि आठ वर्ष की थी, जो पूरी हो चुकी है। इसरो प्रमुख डा. के सिवन के मुताबिक कोरोना महामारी के दौर में भी इसरो ने कड़ी मेहनत की है और यह पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। दरअसल सीएमएस-01 महामारी के इस दौर में इस साल का देश का दूसरा और अंतिम प्रक्षेपण था। इससे पहले 7 नवम्बर को इसरो ने पीएसएलवी-सी49 के जरिये भू-निगरानी उपग्रह ‘ईओएस-01’ को 9 अन्य विदेशी उपग्रहों के साथ प्रक्षेपित किया था। ‘ईओएस-01’ अर्थ ऑब्जर्वेशन रीसैट उपग्रह की ही एक एडवांस्ड सीरीज है, जो कृषि, वानिकी और आपदा प्रबंधन सहायता में प्रयोग किया जाने वाला पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है। यह एक ऐसा अग्रिम रडार इमेजिंग उपग्रह है, जिसका सिंथैटिक अपरचर रडार बादलों के पार भी दिन-रात तथा हर प्रकार के मौसम में स्पष्टता के साथ देख सकता है और इसमें लगे कैमरों से बेहद स्पष्ट तस्वीरें खींची जा सकती हैं। इसकी इन्हीं विशेषताओं के कारण इस उपग्रह के जरिये न केवल सैन्य निगरानी में मदद मिलेगी बल्कि कृषि, वानिकी, मिट्टी की नमी मापने, भूगर्भ शास्त्र और तटों की निगरानी में भी यह काफी सहायक साबित होगा। कोरोना काल से ठीक पहले इसरो द्वारा 17 जनवरी 2020 को यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी एरियनस्पेस के एरियन-5 रॉकेट के जरिये संचार उपग्रह ‘जीसैट-30’ प्रक्षेपित किया गया था। इसरो द्वारा हाल ही में अपने उपग्रहों के नाम उसके वर्ग के आधार पर रखने का फैसला किया गया था और ‘सीएमएस-01’ पहला ऐसा संचार उपग्रह है, जिसे इसरो ने इस नई उपग्रह नामकरण योजना के तहत कक्षा में स्थापित किया है। इससे पहले इसरो ने अपने भू-निगरानी उपग्रह का नाम ‘ईओएस’ रखा था और अब संचार उपग्रह का नामकरण ‘सीएमएस’ किया गया है। संचार उपग्रह ‘सीएमएस-01’ के सफल प्रक्षेपण के बाद इसरो का अगला प्रक्षेपित किया जाने वाला रॉकेट पीएसएलवी-सी51 होगा, जो फरवरी-मार्च 2021 में लांच किया जाएगा। पीएसएलवी-सी51 का प्राथमिक पेलोड 600-700 किलोग्राम वजनी ब्राजील का उपग्रह होगा। पीएसएलवी-सी51 भारत के पहले स्टार्टअप (पिक्ससेल) निर्मित भू-निगरानी उपग्रह को लेकर अंतरिक्ष में जाएगा। पीएसएलवी-सी51 इसके साथ ‘स्पेसकिड्ज’ टीम के तहत छात्रों द्वारा निर्मित संचार उपग्रह और तीन विश्वविद्यालयों के समूह द्वारा निर्मित एक अन्य उपग्रह को भी लेकर जाएगा। पीएसएलवी इसरो द्वारा संचालित एक ऐसी उन्नत प्रक्षेपण प्रणाली है, जिसे भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा अपने उपग्रहों को अंतरिक्ष की कक्षा में प्रक्षेपित करने के लिए विकसित किया गया है। पीएसएलवी को भारतीयों उपग्रहों के अलावा विदेशी उपग्रहों की लांचिंग के अलावा भी उपयोग किया जाता रहा है। यह एक चार चरण/इंजन वाला ऐसा रॉकेट है, जो ठोस तथा तरल ईंधन द्वारा वैकल्पिक रूप से छह बूस्टर मोटर्स के साथ संचालित किया जाता है और शुरूआती उड़ान के दौरान उच्च गति देने के लिए पहले चरण पर स्ट्रैप होता है। पीएसएलवी छोटे आकार के उपग्रहों को भू-स्थिर कक्षा में भी भेज सकने में सक्षम है और पीएसएलवी की सहायता से अभी तक सत्तर से भी ज्यादा अंतरिक्ष यानों को विभिन्न कक्षाओं में प्रक्षेपित किया जा चुका है। बहरहाल, कोरोना की वजह से प्रभावित हुए अपने मिशनों को पूरा करने में इसरो अब जी-जान से जुटा है। इसरो प्रमुख के सिवन के अनुसार इसरो टीम का शेड्îूल बेहद व्यस्त है क्योंकि इसरो टीम को आने वाले समय में चंद्रयान-3, आदित्य एल-1 उपग्रह, भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान और स्मॉल रॉकेट स्मॉल सेटेलाइट लांच व्हीकल (एसएसएलवी) का प्रक्षेपण करना है।
हमारायहसंसारएकसच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, अनादि, नित्यतथासर्वशक्तिमानसत्तासेबनाहै।ईश्वरमेंअनन्तगुणहैं।उन्हींगुणोंमेंउसकासत्य, चित्तवआनन्दगुणसहितसर्वव्यापकतथासर्वान्र्यामीहोनाभीसम्मिलितहै।अनादिवनित्यहोनेसेवहकालसेपरेहै।उसकाआरम्भवअन्तनहींहै।इसकारणअपनेसृष्टिरचनाकेशाश्वतविज्ञानसेवहअनादित्रिगुणसत्व, रजवतमवालेतत्वप्रकृतिसेअनादिकालसेसृष्टिकीरचनाएवंप्रलयकरताआरहाहै।सृष्टि की रचना का प्रयोजन यह है कि संसार में जीवात्मा नाम की एक अनादि व नित्य सत्ता है। यह जीवात्मा संख्या में अनन्त तथा परिमाण में व्यापक न होकर अणु परिमाण, एकदेशी एवं ससीम सत्तायें हैं। इन जीवात्माओं का ज्ञान मनुष्य योनि में जन्म लेकर अल्पज्ञता को प्राप्त रहता है। सभी जीवात्मायें जन्म व मरण धर्मा हैं। जीवात्माओं का जन्म व मरण उनके अनादि व नित्य होने सहित उनके कर्मों के फलों पर आधारित होता है। सृष्टि प्रवाह से अनादि है। इसका अर्थ है सृष्टि की उत्पत्ति व पालन का क्रम कभी आरम्भ नहीं हुआ है। इस सृष्टि से पूर्व भी परमात्मा ने असंख्य व अनन्त बार इस सृष्टि को बनाया व चलाया है तथा 4.32 अरब वर्षों की अवधि पूर्ण होने पर इसकी प्रलय होती है। प्रलय 4.32 अरब वर्ष की होती है। इसे ब्रह्म रात्रि कहते हैं। इसके बाद पुनः सृष्टि रचना होती है। सृष्टि उत्पत्ति व पालन आदि ईश्वरीय कर्म का आदि व आरम्भ न होने से मनुष्य जन्म का भी आदि व आरम्भ व प्रथम जन्म व अन्तिम जन्म होना नहीं घटता। यह अनादि काल से होता आ रहा है जिसका कारण इसके पूर्वजन्म व पूर्वजन्मों के कर्म हुआ करते हैं। सृष्टि रचना व प्रलय तथा जीवात्माओं के जन्म, मरण व मोक्ष का क्रम अनन्त काल तक इसी प्रकार जारी रहेगा।
जीवात्माकेमनुष्ययोनिमेंपुण्यकर्मअधिकहोनेपरजीवात्माकोमनुष्यजन्ममिलताहैतथापुण्यकर्मकमवपापकर्मअधिकहोनेपरमनुष्येतरपशु, पक्षीआदिनिम्नवनीचयोनियोंमेंजन्मप्राप्तहोताहै।संसारमेंअनादिपदार्थप्रकृतिआदिकाकभीनाशवअभावनहींहोता।इससिद्धान्तकेअनुसारईश्वरवजीवात्मासहितप्रकृतितत्ववसत्ताओंकाअस्तित्वसदाबनारहेगाऔरइसकारणसेप्रकृतिसेसृष्टिकानिर्माणहोकरउसमेंजीवात्माओंकोउनकेकर्मानुसारजन्मसदामिलतेरहेंगे। जीवात्मा की जन्म व मरण की यात्रा मोक्ष प्राप्ति तक चलती है। जीवात्मा की अविद्या दूर होने, शुभ कर्मों की वृद्धि तथा पाप कर्मों का क्षय हो जाने पर जीवात्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। परमात्मा ने मोक्ष की अवधि 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष निर्धारित की हुई है। इतनी अवधि तक जीवात्मायें परमात्मा के आनन्दस्वरूप व सान्निध्य में रहकर सुखों व आनन्द का भोग करते हंै। इसका वर्णन वेदों व वैदिक साहित्य के आधार पर ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के नवम् समुल्लास में विस्तार से किया है। आत्मा व जीवन की उन्नति के इच्छुक सभी जिज्ञासुओं को सम्पूर्ण सत्यार्थप्रकाश व मोक्ष विषयक जानकारी हेतु नवम् समुल्लास अवश्य पढ़ना चाहिये। मोक्ष की अवधि पूर्ण होने पर मोक्ष से लौटकर जीवात्मा का पुनः सृष्टि में मनुष्य योनि में जन्म होता है और वह पुनः कर्म फल बन्धनों में फंस जाता व सुख व दुःखों को प्राप्त होता है। इस प्रकार ईश्वर से निर्मित यह सृष्टि व जगत् कार्य कर रहा है और ईश्वर अपने सत्यस्वरूप, ज्ञान व बल की सामथ्र्य से इस सृष्टि की रचना, पालन व संहार का कार्य अनादि काल से करते आ रहे हैं और भविष्य में भी करते रहेंगे।
जिसईश्वरसेयहसृष्टिबनीहैउसकास्वरूपसच्चिदानन्दस्वरूपअर्थात्सत्य, चेतनतथाआनन्दसेयुक्तहै।ईश्वरकास्वरूपसदासेवाअनादिकालसेऐसाहीहैऔरसदाऐसाहीरहताहै।इसमेंन्यूनाधिकयाह्रासववृद्धिआदिनहींघटतेहैं।ईश्वरसच्चिदानन्दतथासर्वज्ञअर्थात्सबकुछजाननेवालीवापूर्णज्ञानीसत्ताहै।उसेअपनेलियेकिसीभौतिकसुखवपदार्थकीआवश्यकतानहींहै।वहस्वयंमेंसत्य, सुखवआनन्दस्वरूपहै।वहपूर्णकामवाआनन्दसेयुक्ततथासन्तुष्टहै।परमात्मा ने यह सृष्टि जीवों के सुख व कल्याण के लिए रची है। इसे ईश्वर का परोपकार का कर्म व कार्य कह सकते हैं। जिस प्रकार धार्मिक व धनवान मनुष्य धन का दान व परोपकार करते हैं, शक्तिशाली अन्याय पीड़ितों की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार ईश्वर अपने धार्मिक व दयालु स्वभाव से जीवों के सुख व कल्याण के लिये सृष्टि की रचना व पालन आदि करते हैं। सृष्टि की रचना व पालन आदि कार्यों से ईश्वर के आनन्द में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं आती। वह अपने स्वभाविक स्वरूप से बिना किसी विकार, दुःख व तनाव आदि को प्राप्त हुए सृष्टि का संचालन करते हैं। इसी कारण से ईश्वर को सच्चिदानन्दस्वरूप कहा जाता है। जीवात्मा व मनुष्य को ईश्वर के उपकारों का चिन्तन करते हुए ईश्वर के सच्चिदानन्दस्वरूप का ही ध्यान करना होता है जिससे जीवों के सभी क्लेश दूर हो जाते हैं। ईश्वर की उपासना का उद्देश्य व लाभ भी ईश्वर का ध्यान कर शक्तिशाली होना तथा ज्ञान से युक्त तथा दुःख व दुव्र्यसनों से मुक्त होना होता है। अतः सभी मनुष्यों को संसार में विद्यमान ईश्वर की एकमात्र सत्ता को जानना चाहिये और उसकी योग विधि से धारणा व ध्यान द्वारा उपासना कर ईश्वर का साक्षात्कार करने सहित अपने सभी दुःखों, क्लेशों, अज्ञान व निर्बलताओं को दूर करना चाहिये।
ईश्वरकाएकमुख्यगुणउसकासर्वव्यापकहोनाहै।सर्वव्यापककाअर्थहैकिईश्वरइसअखिलब्रह्माण्डमेंसबस्थानोंपरविद्यमानहै।वहजन्म, अवधिवपरिमाणकीदृष्टिसेअनादिवअनन्तहोनेसहितअनन्तआकारवालाहैऔरसर्वत्रएकरस, एकसमान, अखण्डतथासर्वव्यापकहै। सर्वव्यापक होने के कारण ही वह इस विशाल ब्रह्माण्ड की रचना करने में सफल होता है। यदि वह सर्वव्यापक न होता तो इस अनन्त परिमाण से युक्त ब्रह्माण्ड की रचना कदापि सम्भव नहीं होती। इतने विशाल व सामथ्र्यवान परमात्मा की इसी कारण हम स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करते हैं। वह सभी जीवों का समान रूप से उपासनीय है। सभी को वेदों का अध्ययन कर उसको यथार्थ स्वरूप में जानकर उसकी स्तुति व प्रार्थना सहित उपासना नित्य प्रति करनी चाहिये। ईश्वर सर्वान्तर्यामी सत्ता है। सर्वान्तर्यामी का अर्थ है कि वह सबसे सूक्ष्म है और संसार के सभी सूक्ष्म व स्थूल पदार्थों के भीतर व बाहर समान रूप से विद्यमान व व्यापक है। वह हमारी आत्मा के भीतर व बाहर भी विद्यमान व व्यापक है। सर्वान्तर्यामी होने के कारण ही वह जीव के भीतर भी विद्यमान रहता है और उसके विचारों व कर्मों को जितना जीव जानता है उतना व उससे अधिक पूर्णता से परमात्मा भी जानता है। इस ज्ञान के द्वारा ही परमात्मा सभी जीवों के सभी कर्मों का जो उसने प्रकट व अप्रकट रूप में किए होते हैं, दण्ड देता है। कोई जीव अपने शुभ व अशुभ कर्मों का फल सुख व दुःख भोगे बिना बचता नहीं है। इस कारण कि जीव को कभी कोई दुःख न हो और वह सभी प्रकार के दुःखों से मुक्त हो जाये, ईश्वर की भक्ति व उपासना सहित सद्कर्म करना आवश्यक होता है। वैदिक दर्शन की नींव ईश्वर, जीव व प्रकृति के अस्तित्व तथा जीवों के सद् असद् कर्मों सहित उसको सुख व दुःख प्राप्त होने तथा विद्या व पुरुषार्थ से मुक्ति की प्राप्ति होने के सिद्धान्त पर टिकी हुई है। विचार व परीक्षा करने पर यह सिद्धान्त सत्य सिद्ध होते हैं। हमें ईश्वर के सत्यस्वरूप सहित उसके सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वव्यापक तथा सर्वान्तर्यामी स्वरूप को यथार्थरूप में जानना चाहिये और इस ज्ञान को बढ़ाकर ईश्वर की उपासना द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार कर मोक्ष प्राप्ति के प्रयत्न करने चाहिये। यही सभी जीवात्माओं के लिए करणीय एवं प्राप्तव्य हैं।
चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों के सरकारी दमन को लेकर जिस प्रकार की खबरें आती रही हैं उसके दृष्टिगत यह स्पष्ट हो जाता है कि चीन सरकारी स्तर पर मुसलमानों के किसी भी प्रकार के आतंकवादी कदम को पूर्णतया कुचल देने के प्रति कृत संकल्प है । यह भी एक रोचक तथ्य है कि भारत में फारूक अब्दुल्लाह जैसे लोग चाहे चीन के प्रति कितनी ही निकटता का राग क्यों ना अलापें परंतु चीन यदि कभी किसी फारूक अब्दुल्लाह जैसे आतंकवाद समर्थक नेता को अपने प्रति ऐसी भाषा बोलते हुए देख लेगा तो वह उसे भी कुचल डालेगा। जब फारूक अब्दुल्ला जैसे लोग चीन को अपना हमदर्द दिखाने का प्रयास करते हैं तो वह भारत में उन जैसे लोगों को मिली भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे होते हैं, साथ ही ये लोग भारत की एकता और अखंडता के प्रति अपनी निष्ठा का भी प्रदर्शन कर रहे होते हैं।
मुस्लिमों के प्रति कठोरता की के प्रदर्शन की चीन से आ रही खबरों की दृष्टि बता भारत के उन मुसलमानों को भी सचेत होना चाहिए जो भारत में रहकर और भारत का खाकर भी आतंकवाद के समर्थन की बात करते हैं या देश में विखंडन की प्रक्रिया को बलवती करने के प्रयासों में अपने आपको सम्मिलित करते हैं। चीन के बारे में अब पता चला है कि सैकड़ों इमाम भी हिरासत में लिए जा चुके हैं। इमामों को हिरासत में लिए जाने से उइगरों के बीच भय व्याप्त है। देश को तोड़ने की घटनाओं में संलिप्त रहने वाले इन मुस्लिमों को चीन में अब वे मरने से भी डर लगने लगा हैं, क्योंकि इस्लामिक तरीके से उन्हें दफनाने वाला भी कोई नहीं है। रेडियो फ्री एशिया के हवाले से न्यूज एजेंसी एएनआई ने यह बात कही है। नॉर्वे में रहने वाले इंटरनेशनल सिटीज़ ऑफ़ रिफ्यूज नेटवर्क (ICORN) के अब्दुवेली अयुप ने बताया कि शिनजियंगा के उइगरों से बातचीत के बाद यह तथ्य सामने आया। इससे पता चला कि करीब 613 इमाम गायब हैं। 2017 से ही करीब 18 लाख उइगरों और अल्य अल्पसंख्यक मुस्लिमों को कैंपों में कैद करके रखा गया है। वाशिंगटन स्थित उइगर मानवाधिकार प्रोजेक्ट (UHRP) द्वारा आयोजित वेबिनार को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। वेबिनार का विषय था: कहॉं हैं इमाम, उइगर धार्मिक हस्तियों को बड़े पैमाने पर हिरासत में रखने के साक्ष्य। अयूप ने बताया कि उन्होंने 2018 में मई से नवंबर के बीच उइगरों से बातचीत की। इससे पता चला कि इमामों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया है। उइगर समुदाय की भाषा में शिक्षा को बढ़ावा देकर सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के लिए लड़ने की वजह से अयुप को 2013-2014 के दौरान महीनों तक कैद में रह कर यातनाएँ झेलनी पड़ी थी। उन्होंने कैंपों में रह चुके 16 कैदियों से भी बातचीत की थी जिन्होंने बताया कि शिनजियांग में उइगरों को हिरासत में लेने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। नीदरलैंड में अब निर्वासित जीवन बिता रहे एक कैदी ने बताया था कि शिनजियांग की राजधानी उरुमकी के कैंपों में तो जाने के लिए इतनी भीड़ है कि लोगों को पंजीकरण करने के बाद इंतजार करना पड़ता है। जब कोई मर जाता है तो दूसरा कैदी अंदर भेजा जाता है। उनकी मस्जिदें ध्वस्त कर दी गई हैं। इमाम गिरफ्तार हो चुके हैं। यहॉं तक कि मौत के बाद इस्लामिक तरीके से दफनाने तक का अधिकार नहीं है। जो लोग भारत में रहकर यह कहते हैं कि आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता उन्हें इस बात से शिक्षा लेनी चाहिए कि चीन अपने यहां आतंकवादियों को उनकी मजहबी रस्म से दफन होने देने का अधिकार भी इसलिए नहीं देता कि आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता । जबकि भारत में आतंकवादी की मौत पर रोने वाले भी बड़ी संख्या में हैं । जो लोग यह कहते हैं कि आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता , वही उसकी मौत पर रंज करते हैं और उसे अपने ढंग से सुपुर्द ए खाक करके यह दिखाते हैं कि आतंकवादी का भी कोई मजहब होता है। लंदन यूनिवर्सिटी की स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ (SOAS) में प्रोफेसर रैशेल हैरिस ने बताया कि उइगर समुदाय के सिर्फ पुरुष इमामों को ही निशाना नहीं बनाया जा रहा है। औरतों को भी नहीं छोड़ा जा रहा है। इस मुद्दे पर कहना था कि ऐसे इमाम जो पुरुष हैं, सिर्फ वही ऐसे धार्मिक चेहरे नहीं हैं जिन्हें उइगर समाज में निशाना बनाया जा रहा है। रैशेल ने कहा, “वह मस्जिदों में सक्रिय नहीं होती हैं स्वाभाविक तौर पर उनकी भूमिका घरों में अहम होती है। लेकिन वह हर ज़रूरी काम काम करती हैं जो पुरुष इमाम करते हैं। वह (महिला इमाम) महिलाओं की मदद करती हैं इसलिए वह महिलाओं के अंतिम संस्कार में भूमिका निभाती हैं। वह बच्चों को कुरान पढ़ाने में मदद करती हैं। इसके अलावा वह सामजिक विवादों को सुलझाने में भी काफी मदद करती हैं।” यदि चीन सरकारी स्तर पर किसी निरपराध को उत्पीड़ित कर रहा है तो उसकी कार्यवाही निंदनीय मानी जा सकती है , परंतु देश विरोधी लोगों के साथ तो केवल कठोरता का ही व्यवहार होना चाहिए। किसी को भी देश के कानून को हाथ में लेने और देश की एकता व अखंडता से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए । इस विषय में भारत की सरकार को भी चीन से शिक्षा लेनी ही चाहिए। देश विरोधी और आतंकवादी गतिविधियों में विश्वास रखने वाले लोग देश के दामाद नहीं बल्कि दुश्मन हैं और उनके साथ दुश्मनों का सा ही व्यवहार होना चाहिए। यदि फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती भी धारा 370 को बहाल करने की आड़ में कोई भी देश विरोधी बयान देते हैं या देश तोड़ने की बातों को हवा देते हुए लोगों को देश के विरोध में आने के लिए उकसाते हैं तो उनके विरुद्ध भी कठोर से कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। ‘देश सर्वप्रथम’ के आधार पर न्याय और नीति की बातें निर्धारित होनी चाहिए। इसके लिए देश के सभी बुद्धिजीवी, न्यायालय व सरकारें संयुक्त प्रयास करें। साम्प्रदायिक आधार पर व्यक्ति व्यक्ति के बीच कोई भेदभाव नहीं हो परंतु यदि सांप्रदायिक आधार पर देश को तोड़ने की बातें की जाएंगी तो उनके प्रति जीरो टॉलरेंस दिखाना हम सबका राष्ट्रीय दायित्व और धर्म होना चाहिए।
राज्य सरकारों द्वारा बिजली दरों पर दी जाने वाली प्रत्यक्ष सब्सिडी में वित्तीय वर्ष 2016 से अब तक 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और वित्तीय वर्ष 2019 में यह बढ़कर 110391 करोड़ रुपये (15 अरब डॉलर) हो गयी है। इससे जाहिर होता है कि बिजली वितरण कम्पनियों (डिस्कॉम्स) में सुधारात्मक कदमों का कोई खास नतीजा नहीं मिला है। ‘अनपैकिंग इंडियाज इलेक्ट्रिसिटी सब्सिडीज’ विषयक एक ताजा रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है।
रिपोर्ट में लगाये गये अनुमान के मुताबिक कुछ उपभोक्ताओं को लागत से भी कम दर पर बिजली देने से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये कुछ उपभोक्ताओं को ऊंची दर पर बिजली उपलब्ध कराने के लिये ‘क्रॉस सब्सिडीज’ के तहत पर वित्तीय वर्ष 2019 में कम से कम 75027 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च किये गये। इससे सब्सिडी पर होने वाला कुल खर्च कम से कम 185418 करोड़ रुपये (25.2 अरब डॉलर) हो गया।
बिजली पर बढ़ती सब्सिडी इस बात की निशानी है कि उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (उदय) के लिहाज से विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) का प्रदर्शन बहुत खराब है। उदय केंद्र सरकार द्वारा संचालित एक बेलआउट योजना है, जिसके तहत वर्ष 2019 में डिस्कॉम्स से अपने वित्तीय प्रदर्शन को सुधारने की अपेक्षा की जाती है।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) और काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरमेंट एंड वॉटर (सीपीडब्ल्यू) के अध्ययन के मुताबिक भारत के 31 में से 25 राज्य उदय योजना के तहत अपनी कुल तकनीकी और वित्तीय हानियों को घटाकर 15% तक लाने में नाकाम रहे हैं। इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2016 से सभी बिजली वितरण कंपनियों का बिक्री राजस्व भी 3% तक गिरा है, जबकि 31 में से 24 राज्यों में वर्ष 2019 में राजस्व का अंतर भी पाया गया। बिजली पर सब्सिडी देने वाले 26 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में से कोई भी बिजली दरों पर सब्सिडी दिए जाने के मामले में नेशनल टैरिफ पॉलिसी के नियमों का पालन नहीं कर सका। विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक दुष्चक्र है। खराब वित्तीय प्रदर्शन के कारण बिजली सब्सिडी पर निर्भरता बढ़ती है और खराब तरीके से सब्सिडी का आकलन किए जाने से वित्तीय व्यवस्था और भी खराब होती है।
काउंसिल ऑन एनर्जी इन्वायरमेंट एंड वॉटर के प्रोग्राम एसोसिएट प्रतीक अग्रवाल ने कहा ‘‘यह एक गंभीर समस्या है। अगर डिस्कॉम अपनी लागतों की वसूली नहीं कर सकते हैं तो भी उपभोक्ताओं को दूसरे रास्तों से इसकी कीमत चुकानी होगी। भारत में हमें बिजली की खराब विश्वसनीयता और गुणवत्ता मिलती है।’’
शोधकर्ताओं ने इन चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए भारत के विभिन्न राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में बिजली सब्सिडी के डिजाइन की पड़ताल की। उन्होंने पाया कि राष्ट्रीय स्तर पर कृषि उपभोक्ताओं को सरकार द्वारा समर्थित बिजली का 75% हिस्सा उपलब्ध कराया जाता है।
प्रतीक अग्रवाल ने कहा ‘‘हालांकि यह किसानों की मदद के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन किसानों को कुल सब्सिडी का बड़ा हिस्सा दिया जाना कोई उदारता नहीं, बल्कि दक्षता के स्तर पर खराबी को जाहिर करता है। ज्यादातर राज्य, खासकर कम आमदनी वाले किसानों को फायदा देने को अपना लक्ष्य नहीं बनाते और ग्रामीण इलाकों में अनमीटर्ड बिजली उपभोग की सामान्य स्थिति का यह मतलब है कि सब्सिडीशुदा उपभोग की कोई अपर लिमिट तय नहीं की गई है।’’
उन्होंने कहा ‘‘उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कुल राजस्व का करीब 1.5 प्रतिशत हिस्सा ही बिलिंग और कलेक्शन पर खर्च किया जाता है। बिल देने जाने वाले कर्मियों पर जबर्दस्त दबाव है। सरकार इन खामियों से निपट नहीं पा रही है। इस पर काफी कुछ निर्भर करता है।’’
प्रतीक ने कहा कि कोविड काल में मांग सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गयी, जिससे डिस्कॉम्स की हालत और खराब हो गयी। इससे उबरने के लिये उन्हें टैरिफ ढांचे पर ध्यान देना होगा। यूपी की मिसाल लें तो वहां फिक्स और वेरियेबल चार्जेस में काफी अंतर है। इसे दूर करने की जरूरत है। सरकार को मूल्य श्रंखला में सततता लानी होगी।
इस रिपोर्ट में घरेलू उपभोक्ताओं को दी जाने वाली सब्सिडी की डिजाइन से संबंधित समस्याओं की भी पहचान की गई है। ज्यादातर राज्यों में घरेलू उपभोक्ताओं को दी जाने वाली सब्सिडी अनकैप्ड है और उपभोग बढ़ने की वजह से डिस्कॉम की वित्तीय व्यवहार्यता पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि सब्सिडी में पारदर्शिता के स्तर पर और भी सुधार की गुंजाइश है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने सब्सिडी डाटा को स्पष्ट रूप से जाहिर करते हैं।
रिपोर्ट में ऊर्जा मंत्रालय, राज्य सरकारों, डिस्कॉम्स, राज्य तथा केन्द्र के बिजली नियामक आयोगों तथा नियामकों के फोरम को डेटा रिपोर्टिंग को बेहतर बनाने और नीति निर्धारकों की मदद के लिये मिलकर काम करने की सिफारिश की गयी है। इसके अलावा रिपोर्ट में डेटा रिपोर्टिंग का एकसमान प्रारूप तैयार किये जाने, उपभोक्ताओं के बिजली के बिल और सब्सिडी वितरण में विलम्ब पर लगने वाले शुल्क में पारदर्शिता सुनिश्चित करने, नियामक आदेशों और डेटा रिपोर्ट्स को समयबद्ध ढंग से जारी होना सुनिश्चित और बेहतर सब्सिडी टारगेटिंग के लिये सब्सिडी वितरण से सम्बन्धित डेटा में सुधार लाने की संस्तुतियां भी गयी हैं।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट की कंसलटेंट अंजलि विश्वमोहनन ने कहा ‘‘सब्सिडी के आवंटन की सूचनाओं को जाहिर करने कि कोई समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण ज्यादातर मामलों में केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं की प्रभावशीलता का अंदाजा लगाना नामुमकिन होता है।’’
विशेषज्ञों का मानना है कि हालात और खराब होंगे, क्योंकि बिजली वितरण कंपनियां कोविड-19 के कारण हुए अतिरिक्त नुकसान से निपटने की जुगत में लगी हैं।
अंजलि ने कहा ‘‘बिजली दरों में बढ़ोत्तरी और वित्तीय बेलआउट विकल्प, दोनों ही सीमित हैं, क्योंकि उपभोक्ता और सरकार कोविड-19 के खिलाफ जारी लड़ाई के कारण नकदी की कमी से जूझ रहे हैं।’’
रिपोर्ट में कुछ ऐसी पद्धतियों की पहचान की गई है जिन्हें पूरे भारत में अपनाया जा सकता है। सब्सिडी देने वालों में से कोई भी परिपूर्ण नहीं है लेकिन अनेक उदाहरण भी हैं। पंजाब अपने यहां दी जाने वाली बिजली सब्सिडी की सूचना देने तथा सब्सिडी देने में विलंब के कारण लगने वाले जुर्माने को लेकर खासी पारदर्शिता दिखाता है। वहीं, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश ने अपने-अपने यहां प्रत्यक्ष सब्सिडी पर कुल निर्भरता में कमी हासिल की है।
विशेषज्ञों ने इस बात की पुरजोर वकालत की है कि बिजली सब्सिडी का बेहतर तरीके से लक्ष्य तय किया जाना चाहिए और यह समस्या समाधान का एक हिस्सा होना चाहिए। बेहतर लक्ष्य तय किए जाने से कुल खर्च में कटौती की जा सकती है। अधिक आय वाले उपभोक्ताओं के लाभों में कटौती करके तथा कम आमदनी वाले उपभोक्ताओं को मिलने वाली सब्सिडी बरकरार रखने या फिर उन्हें प्राप्त लाभों को और बढ़ा करके भी हालात को बेहतर किया जा सकता है। हालांकि डाटा से पता चलता है कि अनेक राज्यों ने अभी तक इस उपाय को नहीं अपनाया है। पिछले साल 24 में से 12 राज्यों ने अपने-अपने यहां बिजली सब्सिडी में इजाफा किया है।
आईआईएसडी में एनर्जी विशेषज्ञ श्रुति शर्मा ने कहा ‘‘सबसे पहले तो सब्सिडी देने में पारदर्शिता को बढ़ाना चाहिए और सब्सिडी संबंधी सूचनाओं को साझा करने की समुचित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। बिजली दर तथा सब्सिडी डिजाइन से संबंधित प्रभावी नीति बनाए जाने के लिए सब्सिडी आवंटन को लेकर स्पष्टता बेहद जरूरी है।’’
श्रुति ने कहा ‘‘सभी को बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सब्सिडी की अहम भूमिका है लेकिन अगर उनकी दिशा सही नहीं हो, तो बिजली वितरण कंपनियों को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। आखिरकार इसका असर सभी उपभोक्ताओं को मिलने वाली बिजली की विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर पड़ता है। देश में बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय हालत में सुधार के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।’’
मगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा – देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है…? मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये। चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।
उसने मुस्कुराते हुऐ कहा – राजन् सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है। सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधानमंत्री आचार्य चाणक्य चुप रहे। सम्राट ने उससे पुछा – आप चुप क्यों हो ? आपका इस बारे में क्या मत है? चाणक्य ने कहा – यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है, एकदम गलत है, मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूँगा। रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था। चाणक्य ने द्वार खटखटाया। सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा? प्रधानमंत्री ने कहा – संध्या को महाराज एकाएक बीमार हो गए है। उनकी हालत नाजुक है राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते है। आप महाराज के विश्वासपात्र सामन्त है। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूँ। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहे, ले सकते है। कहे तो लाख स्वर्ण मुद्राऐं दे सकता हूँ। यह सुनते ही सामन्त के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राऐं किस काम की? उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजोरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राऐं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें। मुद्राऐं लेकर प्रधानमंत्री बारी बारी सभी सामन्तों, सेनाधिकारीयों के द्वार पर पहुँचे और सभी से राजा के लिऐ हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सभी ने अपने बचाव के लिऐ प्रधानमंत्री को दस हजार, एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख तक स्वर्ण मुद्राऐं दे दी। इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुँच गए और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्राऐं रख दी! सम्राट ने पूछा – यह सब क्या है….? यह मुद्राऐं किसलिए है ? प्रधानमंत्री चाणक्य ने सारा हाल सुनाया और बोले – दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशि इक्क_ी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला। अपनी जान बचाने के लिऐ सामन्तों ने ये मुद्राऐं दी है। राजन अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है? जीवन अमूल्य है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को प्यारी होती है! हर किसी को स्वेछा से जीने का अधिकार ! प्राणी मात्र की रक्षा हमारा धर्म है!
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निधन के बाद अब उनके संस्मरण का अंतिम हिस्सा प्रकाशित होने वाला है, जिससे कांग्रेस आलाकमान को झटका लग सकता है। जिसका असर प्रकाशन पूर्व ही परिवार में लगभग विवाद-सा खड़ा हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार हुई और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग की सरकार सत्ता में आई थी। प्रणब मुखर्जी ने पार्टी की इस हार के लिए सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने इस ओर भी इंगित किया है कि पार्टी में ये चर्चा थी कि वो मनमोहन से बेहतर प्रधानमंत्री साबित होते।
वैसे कांग्रेस ने अपने पतन की पटकथा की रुपरेखा प्रणव मुख़र्जी को प्रधानमंत्री न बनाकर, दूसरे राष्ट्रपति बनाकर उसे अंतिम रूप दे दिया था। अब उनके अंतिम संस्मरण में यह भी सम्भावना व्यक्त की जा रही कि कहीं पुस्तक में उनकी की जा रही जासूसी का तो जिक्र नहीं है। गौर करने की बात यह कि उनकी जासूसी किये जाने पर हुए विवाद पर यह कहा गया था कि “किसी ने चिनगाम खा कर दीवारों पर फेंक दी थी।”
लेकिन पुस्तक को लेकर प्रणव परिवार में घमासान शुरू हो गया है।संस्मरण को प्रकाशित करने को लेकर भाई-बहन में विरोधाभास की स्थिति हो गई है। दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने उनके संस्मरण ‘The Presidential Memoirs’ के प्रकाशन को लेकर आपत्ति जताई है और इस पर कुछ वक्त के लिए रोक लगाने की माँग की है। दिसंबर 15, 2020 को उन्होंने पब्लिकेशन हाउस को टैग कर एक साथ कई ट्वीट करके इस किताब को पहले पढ़ने का आग्रह किया और फिर ही इसे प्रकाशित किए जाने की माँग की।
अभिजीत ने कहा कि जारी किए गए अंश ‘मोटिवेटिड’ थे और पूर्व राष्ट्रपति ने इनके लिए मंजूरी नहीं दी होगी। उन्होंने पब्लिकेशन ग्रुप रूपा बुक्स से इस किताब के प्रकाशन को रोकने के लिए कहा है। उन्होंने अपने ट्वीट में माँग की है कि चूँकि वो संस्मरण के लेखक (प्रणब मुखर्जी) के पुत्र हैं, ऐसे में इसे प्रकाशित किए जाने से पहले वो एक बार किताब की सामग्री को देखना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वो चाहते हैं कि किताब को प्रकाशित करने के लिए उनकी लिखित अनुमति ली जाए।
उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “मैं, ‘The Presidential Memoirs’ के लेखक का पुत्र, आपसे आग्रह करता हूँ कि संस्मरण का प्रकाशन रोक दिया जाए, और उन हिस्सों का भी, जो पहले ही चुनिंदा मीडिया प्लेटफॉर्मों पर मेरी लिखित अनुमति के बिना घूम रहे हैं। चूँकि मेरे पिता अब नहीं रहे हैं, तो मैं उनका पुत्र होने के नाते पुस्तक के प्रकाशन से पहले उसकी फाइनल प्रति की सामग्री को पढ़ना चाहता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि यदि मेरे पिता जीवित होते, तो उन्होंने भी यही किया होता।”
वहीं शर्मिष्ठा ने अपने भाई की बात पर आपत्ति जताते हुए कहा, “मैं, ‘The Presidential Memoirs’ के लेखक की पुत्री अपने भाई अभिजीत मुखर्जी से आग्रह करती हूँ कि वो हमारे पिता द्वारा लिखी गई आखिरी किताब के प्रकाशन में बेवजह की बाधा उत्पन्न न करें। उन्होंने बीमार पड़ने से पहले पांडुलिपि को पूरा कर लिया था।”
शर्मिष्ठा ने आगे लिखा, “अंतिम ड्राफ्ट में मेरे पिता के हाथ से लिखे नोट्स और टिप्पणियाँ हैं, जिनका सख्ती से पालन किया गया है। उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार उनके खुद के हैं और किसी को भी किसी सस्ते प्रचार के लिए प्रकाशित होने से रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह हमारे दिवंगत पिता के लिए सबसे बड़ा नुकसान होगा।”
प्रणब मुखर्जी के संस्मरणों की यह किताब जनवरी, 2021 में प्रकाशित हो रही है। उनकी किताब के कुछ अंश पिछले हफ्ते जारी किए गए थे, जिसमें सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह की क्षमता पर सवाल उठाए जाने का जिक्र था। इसे लेकर एक बार फिर सोनिया की क्षमता और मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर हमले शुरू हो गए थे। हालाँकि, कांग्रेस ने इन अंशों पर बिना किताब पढ़े कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया था, लेकिन अब उनके बेटे अभिजीत मुखर्जी ने किताब को प्रकाशित किए जाने से पहले पढ़ने की माँग की है।
प्रणब मुखर्जी ने अपने संस्मरण में लिखा है, “कांग्रेस के कुछ सदस्यों की सोच थी कि अगर 2004 में मैं प्रधानमंत्री बना होता तो 2014 में पार्टी को जो पराजय देखनी पड़ी, उसे टाला जा सकता था। यद्यपि मैं इस सोच से इत्तेफाक नहीं रखता। लेकिन, मैं ये ज़रूर मानता हूँ कि 2012 में मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद कांग्रेस पार्टी के आलाकमान ने राजनीतिक फोकस खो दिया।” दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति ने अपनी पुस्तक ‘The Presidential Years’ में ये बातें लिखी हैं।
प्रणब मुखर्जी ने खुलासा किया है कि जहाँ एक तरफ सोनिया गाँधी पार्टी के मामलों को सँभालने में अक्षम रही थीं, वहीं सदन से डॉक्टर मनमोहन सिंह की लगातार अनुपस्थिति ने सांसदों के साथ उनके व्यक्तिगत संपर्कों को ख़त्म कर दिया। ‘भारत रत्न’ प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में बतौर राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के क्रियाकलापों के बारे में जानकारी दी है। उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में 3 साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के साथ भी काम किया था।
उन्होंने लिखा है कि शासन करने का नैतिक अधिकार प्रधानमंत्री में ही निहित है। बकौल प्रणब मुखर्जी, देश की सम्पूर्ण स्थिति एक तरह से प्रधानमंत्री और उनके प्रशासन के क्रियाकलापों का ही प्रतिबिम्ब है। उन्होंने पाया कि डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में गठबंधन को बचाने में ही तल्लीन रहे, जिसका दुष्प्रभाव उनकी सरकार पर भी पड़ा। कांग्रेस के कई अन्य नेता भी मनमोहन सिंह को यूपीए काल में कांग्रेस के प्रति लोगों की नाराजगी के लिए जिम्मेदार ठहरा चुके हैं।
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने के तरीकों पर प्रकाश डालते हुए प्रणब मुखर्जी ने लिखा है, “ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में एकतंत्रीय शासन व्यवस्था को अपना लिया। सरकार, न्यायपालिका और विधायिका के बीच कटु संबंधों को देखते हुए ऐसा ही प्रतीत होता है। अब समय ही बताएगा कि उनके दूसरे कार्यकाल में ऐसे मामलों पर सरकार बेहतर समझ और सहमति के साथ काम करती है या नहीं।”
उन्होंने बताया है कि सोनिया गाँधी ने जून 2, 2012 को उन्हें बताया था कि वो राष्ट्रपति के पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार हैं। लेकिन, उन्होंने ये भी याद दिलाया था कि यूपीए सरकार में उनका जो किरदार रहा है, उसे भी नहीं भूला जाना चाहिए। यूपीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में मुखर्जी से एक वैकल्पिक नाम भी माँगा गया था। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि इस बैठक के बाद अस्पष्ट तौर पर उन्हें ये ही लगा था कि शायद सोनिया गाँधी इस पद के लिए मनमोहन सिंह के नाम पर विचार करें।
उन्होंने सोचा कि अगर ऐसा होता है तो शायद उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में प्रोन्नत किया जा सकता है। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि उन्हें ऐसी चर्चा सुनने को मिली थी कि कौशाम्बी की पहाड़ियों पर छुट्टियाँ मनाते समय सोनिया गाँधी ने इस पर विचार-विमर्श भी किया था। मनमोहन सिंह भी मान चुके हैं कि मुखर्जी उनसे बेहतर प्रधानमंत्री होते, लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि वो जानते थे कि उनके पास कोई च्वाइस नहीं है।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का अगस्त 31, 2020 को देहांत हो गया था। भारत रत्न प्रणब मुखर्जी ने 2018 में संघ के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। ‘संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय’ नामक यह कार्यक्रम 7 जून 2018 को नागपुर के संघ मुख्यालय में हुआ था। प्रणब मुखर्जी के इस फैसले ने कॉन्ग्रेस को भी असहज कर दिया था। उन्होंने RSS के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को भारत माँ का महान बेटा भी बताया था।