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आस्तिकवाद और विकासवाद (भौतिकवाद): विज्ञान और चिंतन की कसौटी पर

अखिलेश आर्येन्दु
विकासवाद प्राणी विकास का आधुनिक सिद्धांत है। यह विश्वभर में पढ़ा-पढ़ाया जाता है। अनेक चर्चाएं और शोध इस पर किए जाते हैं और यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि प्राणी विकास का यह सिद्धांत वैज्ञानिक दृष्टि और मानक के अनुसार सत्य है। मैंने विज्ञान में स्नातक करते समय इसे इण्टर मीडिएट और बीएससी की कक्षाओं में पढ़ा था। लेमार्क और डार्विन जैसे अनेक जीव वैज्ञानिकों का सृष्टि विज्ञान का सिद्धांत मैंने पढ़ा था। इसमें ईश्वर की कहीं भूमिका न होने के कारण मैंने विकास के सिद्धांतों को कभी स्वीकार नहीं किया था। साहित्य, दर्शन, संस्कृति और अध्यात्म मेरे जीवन के साथ-साथ रहे हैं। इसलिए यह कभी नहीं स्वीकार कर पाया कि सृष्टि उत्पत्ति और जीवों का विकास धीरे-धीरे अपने आप हुआ, इसमें ईश्वर की कोई भूमिका नहीं है। सत्यार्थप्रकाश, वैदिक सम्पत्ति, वैदिक सम्पदा, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका जैसे अनेक ग्रंथों का प्रणयन करने के कारण आधुनिक विज्ञान का कोई भी सिद्धांत मैंने बिना विचार किए स्वीकार नहीं किया। भारत की नई पीढ़ी सोशल मीडिया और नए विचारों के साथ चलती है, लेकिन धर्म, अध्यात्म, दर्शन और विज्ञान के सम्बंध में वह चिंतन उस तरह नहीं करती, जैसे अन्य विषयों पर करती है। इसलिए विकासवाद के सम्बंध में वह अपने स्कूल व कालेज की पुस्तकों में जो पढ़ती है उसे हूबहू मान लेती है। यही कारण है कि इतिहास और विज्ञान की अमान्य बातें भी बिना चिंतन किए मान लेती है। जबकि उसे प्रत्येक सिद्धांत, सूत्र और नियम पर स्वतंत्र मन से चिंतन करना चाहिए।
आधुनिक विज्ञान और वेद विज्ञान
आधुनिक विज्ञान ने अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं। मानव चन्द्रमा और अन्य ग्रहों -उपग्रहों की सैर कर आया है। अनगिनत आविष्कार हो चुके हैं और हो रहे हैं। मोबाइल, कम्प्यूटर, आधुनिक युद्ध प्राणालियां और शल्य चिकित्सा सहित विज्ञान का प्रत्येक क्षेत्र अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर रहा है। लेकिन कुछ क्षेत्र और सिद्धांत ऐसे हैं जहां नए सिरे से चिंतन करने की आवश्यकता है। और यह क्षेत्र है- जीव विज्ञान का विकासवाद। विकासवाद पूर्णतया विज्ञान मूलक बताया जाता है। आधुनिक विज्ञान का मतलब यूरोपियन साइंस से है। हमें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि आधुनिक विज्ञान का विकास यूरोपियन देशों में हुआ। भारत में जब यूरोपियन विज्ञान का प्रचार-प्रसार हुआ तो उसके साथ उन देशों की भाषाएं और संस्कृतियाँ भी साथ आईं। भारत में पाश्चात्य संस्कृति का अंधाधंुध प्रचार-प्रसार और स्वीकारता का एक कारण यह भी है।
विकासवाद का सिद्धांत डारविन और लेमार्क का माना जाता है। जीव विज्ञान का सृष्टि उत्पत्ति का सिद्धांत विकासवाद का सिद्धांत है। विकासवाद के अनुसार प्राणी अथवा जीवन-तत्त्व का प्रथम आविर्भाव जलों में उद्भिद् के रूप में हुआ। इसके अनुसार जल-मिट्टी-वायु आदि के संयोग से एक प्रकार की सूक्ष्म काई बनी। उसी में पुनः जल-वायु का विलक्षण प्रभाव प्राप्त कर समस्त जलीय तथा धरती के तृण, लता, वृक्ष, गुल्म, ओषधि, वनस्पति तथा विविध वृक्षों आदि का क्रमशः विकास हुआ। कालानन्तर में इसी मूल जीव-बीज से सर्वप्रथम जल में ही एक दूसरी जीवन-शाखा चली। यह जीवन-शाखा एक कोशकीय प्राणी अमीबा कहा गया। फिर द्विकोशकीय प्राणी बनें और विकासक्रम में आगे बहुकोशकीय प्राणियों का विकास जल से थल और जल-थल दोनों पर रहने वाले प्राणियों का हुआ । और धीरे-धीरे विकास होता हुआ जलीय कीट, मछली, मेढक, सर्प, कछुआ, वराह, रीछ, बन्दर, बनमानुष आदि विभिन्न प्राणिस्तरों को पार करता तथा विकास होता हुआ आधुनिक मानव ( हामोसेपियंस) बन गया। इसमें लाखों-करोड़ों वर्ष लग गए।
आधुनिक विकासवाद का सिद्धांत यह भी बताता है कि मनुष्य का विकास चल रहा है और आगे चलकर मनुष्य शारीरिक और मानसिक रूप से अतिविकसित मानव बन जाएगा। लेकिन यह नहीं बताता कि अतिविकसित होने के बाद मनुष्य और कितना विकसित होगा।

विज्ञान का एक नियम है, वह नियम है विज्ञान का कोई भी सिद्धांत या नियम अंतिम नहीं कहा जा सकता है। उसमें हमेशा परिवर्तन की संभावना बनी रहती है। लेकिन आधुनिक विकासवाद का सिद्धांत डारविन ने जो दिया था वह नव डारविनवाद के बाद उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
अब हम विचार करें कि विकासवाद का जो सिद्धांत विज्ञान की पुस्तकों में पढ़ाया जाता है, क्या वह चिंतन, तर्क और विज्ञान के नियम के अनुसार सत्य है? विकासवाद में पृथ्वी की उत्पत्ति हुए 4 अरब वर्ष के लगभग हुए हंै। इसके अनुसार यह प्रारम्भ में अग्नि का जलता हुआ गोला थी। लाखों वर्षों में वर्षा होने से यह ठंठी हुई। वर्षा और भूकम्प के कारण कहीं समुद्र, नदी बन गए और कहीं-कहीं समतल और मरुथल। पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति करोड़ वर्ष पूर्व हुई। हैकल नामक वैज्ञानिक के अनुसार प्राणियों के विकासक्रम में मनुष्य का विकास हुआ। अमीबा से लेकर आधुनिक मनुष्य बनने तक में लगभग बाइस करोड़ वर्ष लगे। डाक्टर गैडी के अनुसार मछली से मनुष्य होने में 53 लाख 75 हजार पीढ़ियाँ बीतीं। इतनी ही पीढ़ियाँ अमीबा से मछली बनने में लगीं। इसके हिसाब से अमीबा से आज तक लगभग एक करोड़ पीढ़ियाँ बीत चुकीं हैं। कोई पीढ़ी एक दिन और कोई सौ वर्ष तक जीवित रहती है। यदि सबका औसत 25 वर्ष मान लें तो इस हिसाब से प्राणियों के प्रादूर्भाव को आज 25 करोड़ वर्ष होते हैं। यह देख चुके हैं कि जीव वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी के निर्माण के करोड़ों वर्षों बाद प्राणियों की उत्पत्ति हुई। इस हिसाब से प्राणियों की उत्पत्ति आज तक 25 करोड़ वर्ष हुए। यह गणना विकासवादियों द्वारा निर्धारित अवधि ( दस करोड़ वर्ष) से आगे निकल गई है। इससे यह पता चलता है कि पृथ्वी और प्राणियों की उत्पत्ति का जो सिद्धांत विश्वभर में प्रचलित है वह तर्क, गणना और नियम के धरातल पर खरा नहीं है।
विज्ञानवेत्तओं ने विकासवाद को सही ठहराने के लिए पथ्वी की आयु का निर्धारण अनुमान के आधार पर किया। इसमें सूर्य ताप, भूताप, समुद्रक्षार, भौगर्भिक प्रकार और रेडियोएक्टिविटी प्रमुख है, जो इस तरह है-
1-सूर्य के पात द्वारा 18 से 20 मिलियन वर्ष ( एक मिलियन का अर्थ है दस लाख)
2- भूताप के द्वारा 20 से 60 मिलियन वर्ष
3-समुद्र जल के द्वारा 100 मिलियन वर्ष
4- भूगर्भ के द्वारा 100 मिलियन वर्ष
5- रेडियोएक्टिविटि के द्वारा 100 मिलियन वर्ष
अब इसमंे किसे अंतिम रूप से स्वीकार किया जाए, यह अभी तक तय नहीं हो पाया है।
प्राणी विकास और विकासवाद
विकासवाद में प्राणियों के विकासक्रम में जो अंग अशक्त हो जाता है वह आगे चलकर कुछ पीढ़ियों में समाप्त हो जाता है। इसके उदाहरण में वे मनुष्य की पूँछ का धीरे-धीरे समाप्त होना बताते हैं। इसी तरह जिस अंग का प्रयोग अधिक किया जाता है वह अंग कुछ पीढ़ियों में सशक्त हो जाता है। एक और नियम विकासवादियों ने प्रस्तुत किया है। इसके अनुसार प्राण रक्षा के लिए जिस क्रिया की आवश्यकता नहीं रहती, उसका अभ्यास नहीं रहता। अभ्यास न रहने से वह अंग अशक्त हो जाता है। भोजन के लिए प्रयत्न, प्राकृतिक संघर्ष और शत्रुओं से रक्षा के लिए प्राणी को अनेक परिवर्तनों में से गुजरना पड़ता है। उनमें से जो स्वयं को परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित कर लेता है वे बच जाते हैं और जो ऐसा नहीं कर पाते वे हमेशा के लिए समाप्त हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से शरीर में धीरे-धीरे परिवर्तन होता रहा और प्राणी विभिन्न योनियों में बँट गया। आधुनिक विकासवाद मानता है कि क्रमिक विकास में उसकी इच्छा तथा उसको पूरा करने के लिए किए गए चिर कालीन अभ्यास के परिणाम स्वरूप होने वाले आकृति परिवर्तन के उदाहरण के रूप में अफ्रीका के मरुदेश में पाए जाने वाले लम्बी गर्दनवाले जिराफ़ का उल्लेख किया जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि जिराफ़ पहले ऐसा नहीं था, जैसा आज देखा जाता है। जिराफ़ ने जब वृक्षों के नीचे वाले पत्ते खा लिए तो ऊपर वाले पत्ते खाने की इच्छा हुई। अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह गर्दन उठा-उठाकर प्रयत्न करने लगा। चिरकाल तक ऐसा करने से उसकी गर्दन लम्बी हो गई।
वैज्ञानिकों के इस मान्यता पर विचार करने से आकृति-परिवर्तन की यह मान्यता युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होती। जिराफ़ की गर्दन इस लिए लम्बी हो गई कि वृक्षों की नीचे वाली पत्तियां समाप्त हो गईं थीं अब उन्हें भोजन के लिए ऊपर की पत्तियों को प्राप्त करना आवश्यक था। लेकिन यदि वृक्षों की

ऊपर की पत्तियों को खाने के लिए जिराफ़ को गर्दन बार-बार उचकाना पड़ता था तो जिराफ़ को गर्दन बढ़ाने की अपेक्षा वृक्षों पर चढ़कर खाने की प्रवृत्ति का विकास उसमें क्यों नहीं हुआ। और बकरी जब नीचे की पत्तियाों को चुग लेती है तब तने पर या टहनियों पर अगले पैर टिकाकर पत्ते चुग लेती है। अनगिनत वर्षों से वह उसी तरह अपना पेट भरती रही है। परन्तु आज तक न उसकी गर्दन बढ़ी, न उसका अगला भाग लम्बा हुआ, और न उसके लिए चारे की कमी हुई। जिराफ़ के सम्बंध में जो मान्यता चली आ रही है उस पर कोई विचार नहीं किया गया, आज तक। जबकि यह मान्यता विज्ञानसंगत है ही नहीं। विचारणीय बात यह है कि जिराफ़ को अपना गर्दन बढ़ाने के बजाय बन्दर की तरह पेड़ पर चढ़ने की प्रवृत्ति का विकास उसमें क्यों नहीं हुआ? इसी तरह मनुष्य लाखों वर्षों से उत्तरी धु्रव तथा ग्रीन लैंड जैसे अतिशाीत प्रधान देशों में बसा हुआ है,किन्तु शीत से बचने की इच्छा तथा आवश्यकता को होतेे हुए भी उसके शरीर पर रीछ जैसे बाल पैदा नहीं हुए। एक उदाहरण और। राजस्थान की मरुभूमि में रहने वाली भेंड़ के बाल जैसे होते हैं वैसे ही हिमालय के शीत प्रधान स्थान पर रहने वाली भेंड़ के होते हैं। जब कि विकासवाद के अनुसार शीत प्रधान स्थान
वाली भेंड़ों के शरीर पर ही बाल उसको शीत से बचाने के लिए होने चाहिए। विकासवाद के अनुसार आत्मरक्षा की भावना के कारण कारण चीतल, नीलगाय आदि अनेक जंगली पशुओं में नर के सींग होते हैं, मादा के नहीं। क्या आत्मरक्षा के लिए सींगों की आवश्यकता नर को ही होती है, मादा को नहीं? एक सामान्य बात पर विचार करना चाहिए। पालतू गाय-भैंस में आत्म रक्षा का खतरा बहुत कम होता है, फिर भी दोनों के बड़ी-बड़ी सींगें होती हैं। विकासवाद को विज्ञान सम्मत मानने वालों से एक बड़ा प्रश्न है। विकासक्रम में अन्तिम-श्रेष्ठतम प्राणी मनुष्य है। तब भी मनुष्य की तुलना में चींटी जैसे छुद्र प्राणी को वर्षा का और कुत्ते जैसे निकृष्ट प्राणी को भूकम्प का पूर्वानुमान कैसे हो जाता है?
विकासवाद के अनुसार सर्वोच्च प्राणी ही संघर्ष के दौरान जीवित रहता है। मनुष्य सर्वोच्च बुद्धिमान प्राणी है। फिर निबुद्धि और कमजोर प्राणी हमेशा के लिए लुप्त क्यों नहीं हो गए? दूसरी बात, एक कोशकीय प्राणी अपने आप उत्पन्न हो गया, लेकिन इस प्रश्न का उत्तर आज तक नहीं विकासवादी दे पाए कि एक कोशकीय प्राणी कैसे पैदा हो गए? यदि एक कोशकीय पैदा हो सकता है तो बंदर फिर मनुष्य अपने आप पैदा क्यों नहीं हो गए? इसे करोड़ों वर्षों में विकास की पटरी से क्यों गुजरना पड़ा? एक-एक कोश मिलकर क्या बहु कोशकीय प्राणी बनें? जीवन अपने आप पैदा होना और विकास होते-होते श्रेष्ठ प्राणी बनने की प्रक्रिया विकासवाद कहलाती है। लेकिन यह विकासवाद यह नहीं समझा पाता कि अमीबा स्वयं क्यों पैदा हुआ? यदि अमीबा स्वयं उत्पन्न हो सकता है तो ब्राह्मांड के सभी प्राणी स्वयं पैदा हो सकते हैं कि नहीं? यदि नही ंतो क्यों? इसमें विकास और आत्मरक्षा के अनुसार अंग का बनना और आवश्यकता न होने पर लुप्त होने की मान्यता का क्या मतलब है?
वेद विज्ञान का सिद्धांत
विकासवाद और ईश्वरवाद दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। विकासवाद जहां मान्यता और अनुमान पर आधारित है वहीं ईश्वरवाद ईश्वर द्धारा रचित सृष्टि के नियमों पर आधारित है। वेद के अनुसार सृष्टि का निर्माण सृष्टिकर्ता परमात्मा के द्वारा हुआ। यह सारा ब्रह्मांड उस परमेश्वर की कृति है। इसमें जड़, चेतन, वनस्पति, ओषधि, कीट-पतंगें, पशु-पक्षी और मनुष्य असंख्य प्राणी और अप्राणी सम्मिलित हैं। सारा ब्रह्मांड नियमों पर आधारित है। तीन सत्ताएं अनादि हैं-जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति। जीवात्मा स्वभावतःः उन्नति नहीं करता। यदि करता होता तो करोड़ों वर्षों में उसके ज्ञान की पराकाष्ठा होती। अनगिनत लोग सर्वज्ञ हो गए होते। किन्तु वास्तविकता यह है कि यदि बच्चों को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए, उसको शिक्षा या ज्ञान देने का कोई उपक्रम न किया जाए तो वे उन्नति के स्थान पर अवनति करेंगे। जंगल में छोड़ा हुआ बालक भेड़ि़ए के संग रहकर भेड़िए के स्वभाव का बना, मनुष्य की तरह न तो वह खाता था और न तो उसकी भाषा ही मनुष्य जैसी बनी। इसका अर्थ हुआ बिना संस्कार, शिक्षा और प्रेरणा दिए कोई भी बच्चा ज्ञानवान नहीं बन सकता है। आधुनिक मानव समाज विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति किया। सुख के साधन और संसाधनों से वह अधिक मालामाल है, लेकिन सद्गुणों और मानवीय व्यवहार में वह आदि मानव से अवनति की ओर गया है।

भाषा के स्तर पर मनुुष्य अवनति की ओर गया है। वेद विश्व पुस्तकालय की सबसे प्रचीन ग्रंथ माने जाते हैं। वेद की भाषा सबसे अधिक वैज्ञानिक, व्याकरणिक और गूढ़ है। भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार वेद की भाषा जिसे छन्दश कहा जाता है से विश्व की अनेक भाषाओं का विकास हुआ है। इतना ही नहीं वेद में प्रयोग सैकड़ों शब्दों को किसी न किसी अर्थ में दूसरी भाषाओं में प्रयोग हुआ है। एक उदाहरण से हम इसे जान सकते हैं-
संस्कृत ईरानी अंग्रेजी
पितृ पिदर फ़ादर
मातृ मादर मदर
भ्रात मादर मदर
दुहित दुख्तर डाॅटर
भ्रू अब्रू ब्रो
इससे स्पष्ट है कि वेद की भाषा और उसमें निहित ज्ञान दुनिया के सबसे पुराने हैं। भाषा वैज्ञानिक वेदों में उल्लेख संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया-विशेषण तक का गहन विश्लेषण करके यह पाया कि वेदों की भाषा अत्यंत जटिल और वैज्ञानिक है।
वेदों के अनुसार इस सृष्टि की रचना एक महाशक्ति ने की है। यह सृष्टि अनंत काल से ऐसे ही चली आ रही है। सृष्टि का कण-कण नियम से बंधा हुआ है। एक कण जो इलेक्ट्रान-प्रोटान-न्यूट्रान से बना है, सभी अपनी कक्षा में चक्कर लगाते हैं। सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा और दूसरे ग्रन-उपग्रह नियम के मुताबिक ही कार्य
करते हैं। वेद विज्ञान जगत् को एक उद्देश्य वाला मानता है। जैसे मानव जीवन का उद्देश्य-मैंने जन्म क्यों लिया है? हमारे जन्म का कारण क्या है? मैं किसके लिए हूं? और हमारी मृत्यु क्यों होती है? मृत्यु में मौत किसकी होती है? और मानव जीवन का प्रमुख उद्देश्य क्या है? जैसे अनेक प्रश्न मनुष्य को उसकेजन्म लेने के उद्देश्य से जोड़ते हैं।
वेद विज्ञान के अनुसार प्रत्येक तत्त्व और पदार्थ के अपने-अपने गुण, कर्म और स्वभाव हैं। वेद में मंत्रों में सृष्टि की रचना का वर्णन इस प्रकार है-
ओं ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रोऽअर्णवः।
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरोऽअजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्यमिषतो वशी।
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वकमल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।।
इन मंत्रों में कहा गया है ऋत् और सत्य अर्थात् सत्य और सत्य के नियम के साथ प्रलय के इस कल्प में भी सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने अपने सहजभाव से जगत् के रात्रि, दिवस, घटिका( घड़ी) पल और क्षण जैसे पूर्व में थे वैसे ही वस्तु जगत् को रचा है। कारण और कार्य का सम्बंध जैसे है वैसे ही कर्ता और कार्य का सम्बंध भी होना चाहिए। यह जगत् कार्य का परिणाम है, इसका कोई कर्ता यानी बनाने वाला तो होना ही चाहिए। आधुनिक विज्ञानवाद और आस्तिकवाद या ईश्वरवाद में यही अन्तर है। विकासवाद सृष्टि को अपने आप बन जाने की बात करता है, जो असंभव है। बिना किसी कर्ता के कोई कार्य हो ही नहीं सकता। और यह अनंत ब्रह्मांड बिना बनाए कैसे बन सकता है? मंत्र में कहा गया है, यह सम्पूर्ण जगत्, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, वायु सभी उसके ही बनाए हुए है। सामान्यतौर पर देखने पर भी लगता है कि इतनी सुन्दर सृश्टि को बनाने वाला भी कोई न कोई तो होना ही चाहिए। विकासवाद या नास्तिकता दोनों नकारात्मक प्रवृति वाले हैं। सकारात्मक आस्तिकता और ईश्वरवाद है।
हम कह सकते हैं आधुनिक विज्ञान जो धीरे-धीरे किसी महाशक्ति को स्वीकार करने की ओर बढ़ रही है, विकासवाद के सिद्धांत को एक दिन मानने से इनकार कर देगी।

अन्न भोजन संसार का, किसान का रोना है

—विनय कुमार विनायक
किसान लड़ रहे कीमत पाने उस धान के लिए,
जो खलिहान की खखरी, व्यापारी का सोना है!

किसान आज अड़ गए अपने सम्मान के लिए,
अन्न भोजन संसार का, किसान का रोना है!

किसान गुहार कर रहे अपने सामान के लिए,
जिसका मालिक वो, किन्तु भाग्य में खोना है!

किसान कभी लड़ते नहीं स्वगुणगान के लिए,
जिसे देख सुकून मिलता उसे बेभाव डुबोना है!

किसान पहचाने जाते हैं देश की शान के लिए,
उपेक्षित होके भी उसे इस पहचान को ढोना है!

सेठ गोदाम,किसान चाहते मंडी जोगान के लिए,
अन्न किसान का पसीना,बनिए का खिलौना है!

आज शोषक बेताब कृषक की रहनुमाई के लिए,
नेता तलाशते जमीन,किसान को सिर्फ बोना है!

ये किसानों की समस्याओं को सुलझाने के लिए,
जो नेता खड़े हैं उनका लक्ष्य कृषि को डुबोना है!

देश आजाद मगर आजादी नहीं किसान के लिए,
पत्थर बिकते लाखों में, गेहूं को पराली होना है!

कृषक अनटुटवा बेटा जो रोते नहीं दूध के लिए,
ये दस्तूर है चुप बच्चों को दूध नहीं मिलना है!

जंग है ये ‘दूधो नहाओ पूतों फलों’ वाले के लिए,
मलाई औरों के लिए किसानों को छाछ पीना है!
—विनय कुमार विनायक

भारत के वैश्विक संबंधों का नया युग

-ः ललित गर्ग:-

भारत की अहमियत दुनिया समझ रही है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी सरकार के विदेश नीति निर्माताओं ने विभिन्न देशों एवं वैश्विक राजनयिकों के साथ मित्रता के नए सोपान गढ़े, नये स्वस्तिक उकेरे है। भारत आज सलाह लेने नहीं, देने की स्थिति में पहुंचा है। दुनिया की महाशक्तियां भारत की सोच एवं सलाह को महत्व देने लगी है, वैश्विक पटल पर वर्ष 2014 के बाद का समय भारत को शक्ति की नई ऊंचाइयों पर ले जाता दिखाई दे रहा है तो इसका श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। इसी का प्रभाव है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन अगले वर्ष भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। मोदी के शासनकाल में अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों का एक नया युग शुरु हुआ है जिसका लक्ष्य विकास, आर्थिक मजबूती, सैन्य सुरक्षा, राजनीतिक और सामाजिक स्थिति के साथ-साथ मिलकर काम करने की सोच एवं सौहार्द है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ दुनिया में शांति, अमन, अयुद्ध एवं  अहिंसा को बल दे रही है, भारत की ही पहल पर दुनिया में आतंकवाद के विरोध में सशक्त वातावरण बना है।
वर्ष 2014 के बाद जिस तरह से भारत की छवि वैश्विक पटल पर एक तीसरी दुनिया के देश से बदलकर एक तेजी से विकसित होते देश के रूप में बनी है, तो इसमें नरेंद्र मोदी का बड़ा योगदान रहा है। पहली बार सरकार बनाते ही उन्होंने विश्व राजनीति में भारत की छवि मजबूत करने के अनूठे कदम उठाये। वे फ्रांस गए और सामरिक मुद्दों पर भारत व फ्रांस के बीच नए मजबूत संबंधों की नींव रखी। ब्राजील गए तो वहां के लोगों और राष्ट्रपति के साथ ऐसे सहज होकर घुल-मिल गए कि वर्षों से ठंडे पड़े संबंधों ने वहां भी एक नई करवट ली। आज ब्राजील और भारत ऊर्जा से लेकर कई अन्य क्षेत्रों में साथ काम करना प्रारंभ कर चुके हैं। कोविड से जूझते ब्राजील की जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने सहायता की, वहां के राष्ट्रपति ने उसकी भूरि-भूरि सराहना की। मोदी ने ऑस्ट्रेलिया के साथ भी संबंधों में एक नया सकारात्मक अध्याय जोड़ा व अपनी सशक्त तथा मैत्रीपूर्व छवि से ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मॉरिसन के साथ ऐसे सहज संबंध स्थापित किए कि उनका समोसा प्रेम दुनिया में चर्चित हुआ।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और संबंधों में किसी भी राष्ट्र की शक्ति और स्थान उसकी आर्थिक, सैन्य, राजनीतिक और सामाजिक स्थिति के अलावा एक और अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु से निर्धारित होता है, वह है उसके शासक या नेता की सोच, संवेदना एवं स्वभाव से। किसी भी राष्ट्र के साथ संबंध किस दिशा में ले जाने हैं, अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपने राष्ट्र की छवि निर्माण से लेकर कौनसे मुद्दे रखने हैं, द्वि-पक्षीय तथा बहु-पक्षीय संबंधों को कैसी दिशा देनी है, कितनी गति देनी है, यह सब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरगामी सोच से जुड़े हंै। इसी से अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, जापान, आस्ट्रेलिया, कोरिया, न्यूजीलैंड, फ्रांस आदि देशों से भी नरेंद्र मोदी के चलते सकारात्मक एवं ऊर्जावान संबंधों का एक नया युग प्रारंभ हुआ है। सुदूर पूर्व हो या पश्चिम के देश एवं खाड़ी देशों से नरेंद्र मोदी ने भारत के संबंध सशक्त करने के प्रयास किए हैं। आज पूरे विश्व में भारत की सकारात्मक ऊर्जा का असर स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का भारत आना भी एक शुभता का सूचक है। अंग्रेजों ने भारत पर 200 साल तक राज किया था। व्यापार के नाम पर भारत आए अंग्रेजों ने भारत को पराधीन बना दिया। अंग्रेजों के अत्याचारों को याद करते हुए हर भारतीय आज भी सिहर जाता हैं। कभी पूरी दुनिया में अंग्रेजों की हकूमत थी। लगभग सौ देशों पर ब्रिटिश शासन रहा लेकिन समय के साथ-साथ देश स्वतंत्र होते गए। ब्रिटेन सिमटता ही गया अब वह शक्तिशाली नहीं रहा। भारत के साथ उसके संबंध कभी सुधरे तो कभी बिगड़े। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत-ब्रिटेन संबंधों में सकारात्मक बदलाव आए और तब से द्विपक्षीय संबंधों में निरंतर वृद्धि देखी गई है। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता सम्भाली और 2015 में उन्होंने तीन दिवसीय ब्रिटेन का दौरा किया था। इस दौरान सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए रक्षा और अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा संधि पर सहमति व्यक्त की गई थी। ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन पर सहयोग हेतु एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया जो जीवाश्म ईंधन की खपत को कम करने और स्वच्छ ऊर्जा पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए सहयोग सुनिश्चित करने पर केन्द्रित था।
2016 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा ने भारत का दौरा किया था। इन्हीं संबंधों की नयी इबारत लिखने एवं इन्हें और अधिक मजबूती देने के लिये बोरिस जॉनसन भारत आ रहे हैं। जिसे एक नये युग की शुरुआत कहा जा रहा है। ब्रिटेन भारत से व्यापार बढ़ाने का उत्सुक है। ब्रिटेेन के विदेश मंत्री डोमिनिक राव और एस. जयशंकर में मंगलवार को दिल्ली में लम्बी बातचीत हुई। भारत-ब्रिटेन की मजबूत साझेदारी के संबंध में 2030 तक का खाका तैयार किया गया। अफगानिस्तान और हिन्दू प्रशांत क्षेत्र के संबंध में भी चर्चा हुई। दोनों देशों के संबंध नए युग की शुरूआत का प्रतीक है। उम्मीद है कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध बदलती दुनिया में नए आयाम स्थापित करेंगे।
इसी प्रकार अमेरिका से भी नरेंद्र मोदी के चलते सकारात्मक संबंधों का एक नया युग शुरु हुआ। अमेरिका और भारत के कई उद्देश्य एक से होते हुए भी वर्षों से दोनों के बीच संबंधों में वह सहजता कभी नहीं दिखाई पड़ी जिसकी दरकार थी और इसका प्रभाव भारत की बाह्य शक्ति पर पड़ा। हम तमाम कोशिशों के बावजूद रूसी निकटता के कारण अमेरिका के नजदीक नहीं आ पाये। लेकिन नरेद्र मोदी की विदेश नीति, सोच एवं करिश्माई व्यक्तित्व ने न सिर्फ अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत किया, बल्कि रूस के साथ चले आ रहे सशक्त संबंधों पर आंच नहीं पड़ने दी। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। फरवरी में जब राष्ट्रपति ट्रंप भारत आए, पूरे विश्व ने देखा कि किस प्रकार दो मित्रों ने अपने-अपने देशों का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी मित्रता की डोर से संबंधों को एक नई दिशा, एक नई गति दी। इससे निश्चित ही भारत की छवि पर व्यापक सकारात्मक असर पड़ा। अमेरिका के साथ संबंध नये राष्ट्रपति जो बाइडेन के शासनकाल में भी परवान चढ़ेगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न केवल भारत को आर्थिक शक्ति के रूप में दुनिया में प्रतिष्ठापित करने के लिये प्रतिबद्ध है बल्कि भारत की संस्कृति एवं मूल्यों का मान भी विश्व में स्थापित कर रहे हैं, यही कारण है कि महात्मा गांधी की जन्म जयन्ती  विश्व अहिंसा दिवस के रूप में पूरी दुनिया बनाती है, वही विश्व योग दिवस पर समूची दुनिया योग करती है। हिन्दी भाषा को भी दुनिया ने अपनाया है और वह दुनिया की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे स्थान पर आ गयी है। भारत का आयुर्वेद भी कोरोना संकटकाल में दुनिया में चर्चित हुआ है। अब कोई भी भारत-पाकिस्तान संबंधों या कश्मीर मामले में भारत को सलाह देने का दुस्साहस नहीं करता, जबकि यूपीए सरकार के कार्यकाल में कोई भी ऐरा-गैरा देश उठता था और भारत को सलाह देने लगता था कि अपने मदभेदों को चर्चाओं के माध्यम से सुलझाएं। ऐसी सलाह सुनकर हर भारतीय गुस्से से भर जाता था, लेकिन मोदी के कारण इन स्थितियों में बदलाव आया है, अब भारत को शक्तिशाली देश भी सलाह देने की हिम्मत नहीं करते। पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के समक्ष एक कठोर छवि प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट संदेश दिए गये हैं कि भारत की सुरक्षा पर किसी प्रकार का प्रहार सहन नहीं किया जाएगा। सर्जिकल स्ट्राइक के माध्यम से पाकिस्तान जैसे देशों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया गया कि भारत न अब किसी के दबाव में आकर आतंकवाद बर्दाश्त करेगा, न पीछे हटेगा। वैश्विक स्तर पर बेहतर छवि और संबंधों के साथ निश्चित ही हम एक नये युग में, शक्तिशाली राष्ट्र बनने एवं विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने भारत के विश्व-संबंधों का नया अध्याय लिखा है जो निश्चित ही भारत की प्रगति में मील का पत्थर एवं नये अभ्युदय का प्रतीक साबित होगा।

क्यों जरूरी है नया संसद भवन ?


योगेश कुमार गोयल
संसद की नई इमारत के निर्माण का मामला फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है लेकिन अदालत की अनुमति के बाद पिछले दिनों इसका शिलान्यास किया जा चुका है। इसके निर्माण कार्य पर करीब 971 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसे लेकर कुछ लोगों द्वारा सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि अंग्रेजों के जमाने में बने पुराने भव्य और मजबूत संसद भवन के सही हालत में होने के बावजूद इतनी बड़ी धनराशि खर्च कर नया भवन बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? माना कि नई इमारत के निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च होंगे लेकिन सरकार के हर फैसले में कमियां तलाशते रहना भी सही नहीं है। जायज मुद्दों पर सरकारी नीतियों के विरोध में बुराई नहीं लेकिन संसद की नई इमारत के निर्माण के फैसले का विरोध कितना जायज है, यह भी देखना होगा।
संसद की नई इमारत में दोनों सदनों की सीटों की संख्या को बढ़ाया जाना है ताकि भविष्य में लोकसभा और राज्यसभा में सीटें बढ़ती हैं तो किसी प्रकार की कोई दिक्कत न हो। वर्ष 2026 में नए सिरे से लोकसभा सीटों के परिसीमन का कार्य होना है, जिसके बाद लोकसभा और राज्यसभा की सीटें बढ़ना तय माना जा रहा है। फिलहाल लोकसभा में 545 सांसद हैं और मौजूदा लोकसभा में इतने ही संसद सदस्यों के बैठने की जगह है लेकिन परिसीमन का कार्य होने के बाद सांसदों की संख्या मौजूदा 545 से बढ़कर 700 से ज्यादा हो सकती है। वैसी स्थिति में समझा जा सकता है कि बाकी 150 से ज्यादा सांसद कहां बैंठेंगे। इसी प्रकार राज्यसभा की सीटें भी बढ़ सकती हैं। यही कारण है कि भविष्य की इन जरूरतों को पूरा करने के लिए नए भवन की जरूरत पड़ेगी।
नए भवन का शिलान्यास करते समय प्रधानमंत्री ने भी स्पष्ट किया था कि सांसद कई वर्षों से मांग कर रहे थे कि मौजूदा संसद भवन में उनकी जरूरतों के हिसाब से व्यवस्था नहीं है, न ही संसद भवन में सांसदों के कार्यालय हैं। परेशानी यह है कि मौजूदा संसद भवन परिसर में जगह की कमी के कारण ये तमाम व्यवस्थाएं असंभव हैं। नए संसद भवन में प्रत्येक सांसद को कार्यालय के लिए 40 वर्ग मीटर स्थान उपलब्ध कराया जाएगा। संसद की नई इमारत में राज्यसभा का आकार पहले के मुकाबले बढ़ेगा तथा लोकसभा का आकार भी मौजूदा से तीन गुना ज्यादा होगा।
हालांकि संसद की नई इमारत के निर्माण पर कुछ बिन्दुओं को लेकर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हो रही है लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का कहना है कि संसद का नया भवन बनाने के लिए रेल तथा परिवहन भवन को नहीं तोड़ा जाएगा। उनके मुताबिक नई इमारत बनाने के लिए परिसर के अंदर ही 8822 वर्ग मीटर खाली जगह उपलब्ध है, ऐसे में नया भवन बनाने के लिए बाहर के किसी भवन को गिराए जाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। लोकसभा सचिवालय के मुताबिक संसद की नई इमारत में प्रत्येक सांसद के लिए अलग ऑफिस होगा और हर ऑफिस सभी आधुनिक डिजिटल तकनीकों से लैस होगा। नई संसद में सांसदों के कार्यालयों को पेपरलेस ऑफिस बनाने के लिए नवीनतम डिजिटल इंटरफेस से लैस किया जाएगा और इन दफ्तरों को अंडरग्राउंड टनल से जोड़ा जाएगा। सदन में प्रत्येक बेंच पर दो सदस्य बैठ सकेंगे और हर सीट डिजिटल प्रणाली तथा टचस्क्रीन से सुसज्जित होगी। नए भवन में कॉन्स्टीट्यूशन हॉल, सांसद लॉज, लाइब्रेरी, कमेटी रूम, भोजनालय और पार्किंग की व्यवस्था होगी और भवन में करीब 1400 सांसदों के बैठने की व्यवस्था की जाएगी।
नया भवन सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत मौजूदा संसद भवन के पास ही बनाया जाएगा, जिसके निर्माण के लिए टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को टेंडर मिला है। संसद की नई इमारत का कार्य करीब 22 माह में पूरा होने का अनुमान है। संभावना है कि नवम्बर 2022 से नये भवन में ही लोकसभा तथा राज्यसभा के सत्रों का आयोजन होगा। नया संसद भवन त्रिकोणीय होगा, जिसका निर्माण वैदिक रीति से वास्तु के अनुसार किया जाएगा। वास्तुविदों ने संसद के नए भवन को बनाने के लिए कई देशों की संसद का निरीक्षण कर उनसे प्रेरणा ली। नयी इमारत में रेन हार्वेस्टिंग प्रणाली तथा वाटर रिसाइकलिंग प्रणाली भी होगी। यह वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त होगी और इसमें सौर प्रणाली से ऊर्जा की बचत भी होगी। तमाम सुरक्षा सुविधाओं से लैस त्रिकोणीय आकार की इस भव्य इमारत को भूकम्प रोधी तकनीक से बनाया जाएगा।
64500 वर्गमीटर क्षेत्र में बनने वाले नए संसद भवन में एक बेसमेंट के अलावा तीन फ्लोर होंगे, जिसकी ऊंचाई संसद के मौजूदा भवन के बराबर ही होगी। लोकसभा कक्ष का डिजाइन राष्ट्रीय पक्षी मयूर जैसा होगा जबकि राज्यसभा कक्ष का डिजाइन राष्ट्रीय पुष्प कमल जैसा किया जाएगा। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के अनुसार संसद का नया भवन केवल ईंट-पत्थर का भवन नहीं होगा बल्कि यह देश के एक सौ तीस करोड़ लोगों की आकांक्षाओं का भवन होगा, जिसके निर्माण में आगामी सौ वर्षों से अधिक की जरूरतों पर ध्यान दिया जा रहा है। उनका कहना है कि हमारी संसद लोगों के विश्वास और आकांक्षाओं का प्रतीक है और संसद का नया भवन सभी राज्यों की उत्कृष्ट कला, संस्कृति और विविधताओं से परिपूर्ण होगा, जो लोगों के लिए प्रेरणा का केन्द्र भी होगा।

हिंसक राजनीति के चरम पर पश्चिम बंगाल

प्रमोद भार्गव
पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला, राजनीतिक हिंसा की पराकाष्ठा है। हालांकि बंगाल में चुनावों के पहले ऐसी घटनाएं पहले भी देखने में आती रही हैं। लेकिन पिछले कुछ माह से ये घटनाएं निरंतर घट रही हैं। बावजूद राज्य सरकार इन घटनाओं पर नियंत्रण के कोई ठोस उपाय करने की बजाय आग में घी डालने का काम कर रही है। केंद्र सरकार ने कानून व्यवस्था को लेकर राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को दिल्ली तलब करने की तारीख 14 दिसंबर तय की तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कह दिया कि ‘इन अधिकारियों को भेजना या नहीं भेजना राज्य सरकार के विवके पर निर्भर है। सरकार के फैसले के बिना वे प्रदेश के बाहर कदम नहीं रख सकते हैं।’
इस असंवैधानिक स्थिति पर राज्यपाल जगदीप धनखड़ का कहना है कि ‘भारत के संविधान की रक्षा करना मेरी जिम्मेदारी है। यदि मुख्यमंत्री अपने रास्ते से भटकेंगी तो मेरी भूमिका शुरू हो जाएगी। मुख्यमंत्री को आग से नहीं खेलना चाहिए।’ दरअसल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत ही दोनों अधिकारियों को तलब किया है लेकिन ममता ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर केंद्र से बेवजह टकराव मोल ले लिया है।
पश्चिम बंगाल में यह असहिष्णुता पंचायत, निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में स्थाई चरित्र के रूप में मौजूद रही है। विडंबना यह है कि हिंसा और अराजकता के लिए बदनाम बिहार और उप्र जब इस स्थिति से मुक्त हो रहे हैं, बंगाल और केरल में यह हिंसा बेलगाम होकर सांप्रदायिक रूप में दिखाई दे रही है। चूंकि नए साल की शुरुआत में बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस नजरिए से मुख्य राजनीतिक दलों में जनता के बीच समर्थन जुटाने की होड़ लग गई है। भाजपा अध्यक्ष के काफिले पर हुआ हमला इसी होड़ का परिचायक है। यह हिंसा तब हुई, जब जेपी नड्डा को जेड स्तर की सुरक्षा मिली हुई है। इसे उच्चतम सुरक्षा-कवच के रूप में देखा जाता है। फिर भी इसे भेदने की निंदनीय कोशिशें हुईं तो यह चिंतनीय पहलू है। पूर्व घोषित कार्यक्रम के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था और राज्यस्तरीय गुप्तचर एजेंसियां हमले को नहीं रोक पाई तो यह एक बड़ी चूक है। कुछ समय पहले ही भाजपा विधायक देवेंद्रनाथ की हत्या कर लाश सार्वजनिक स्थल पर टांग दी गई थी। देवेंद्रनाथ पिछले साल ही माकपा से भाजपा में शामिल हुए थे। बंगाल में वामदल अर्से से खूनी हिंसा के पर्याय बने हुए हैं।
बंगाल की राजनीति में विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याएं होती रही हैं। वामदलों के साढ़े तीन दशक चले शासन में राजनीतिक हिंसा की खूनी इबारतें निरंतर लिखी जाती रही थीं। दरअसल वामपंथी विचारधारा विरोधी विचार को तरजीह देने की बजाय उसे जड़ मूल खत्म करने में विश्वास रखती हैं। ममता बनर्जी जब सत्ता पर काबिज हुई थीं, तब उम्मीद जगी थी कि बंगाल में लाल रंग का दिखना अब समाप्त हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे तृणमूल कांग्रेस वामदलों के नए संस्करण में बदलती चली गई। यही कारण रहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व भी बंगाल को रक्त से सींचने की कवायदें पेश आती रही थीं। भाजपा में वामदलों से लेकर कांग्रेस और तृणमूल के नेताओं के जाने का जो सिलसिला चल पड़ा है, वह थम जाए, इसीलिए प्रत्येक चार-छह दिनों में बड़ी राजनैतिक हत्या बंगाल में देखने का सिलसिला बना हुआ है।
हिंसा की इस राजनीतिक संस्कृति की पड़ताल करें तो पता चलता है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का पहला सैनिक विद्रोह इसी बंगाल के कलकत्ता एवं बैरकपुर में हुआ था, जो मंगल पाण्डे की शहादात के बाद 1947 में भारत की आजादी का कारण बना। बंगाल में जब मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी, तब सामाजिक व आर्थिक विषमताओं के विद्रोह स्वरूप नक्सलवाड़ी आंदोलन उपजा। लंबे समय तक चले इस आंदोलन को क्रूरता के साथ कुचला गया। हजारों दोषियों के दमन के साथ कुछ निर्दोष भी मारे गए। इसके बाद कांग्रेस से सत्ता हथियाने के लिए भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में वाममोर्चा आगे आया। इस लड़ाई में भी विकट खूनी संघर्ष सामने आया। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में वामदलों ने कांग्रेस के हाथ से सत्ता छीन ली। लगातार 34 साल तक बंगाल में मार्क्सवादियों का शासन रहा। इस दौरान सियासी हिंसा का दौर चलता रहा। तृणमूल सरकार द्वारा जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1977 से 2007 के कालखंड में 28 हजार राजनेताओं की हत्याएं हुईं।
सर्वहारा और किसान की पैरवी करने वाले वाममोर्चा ने जब सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों की खेती की जमीनें टाटा को दीं तो इस जमीन पर अपने हक के लिए उठ खड़े हुए किसानों के साथ ममता बनर्जी आ खड़ी हुईं। मामता कांग्रेस की पाठशाला में ही पढ़ी थीं। जब कांग्रेस उनके कड़े तेवर झेलने और संघर्ष में साथ देने से बचती दिखी तो उन्होंने कांग्रेस से पल्ला झाड़ा और तृणमूल कांग्रेस को अस्तित्व में लाकर वामदलों से भिड़ गईं। इस दौरान उनपर कई जानलेवा हमले हुए लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। जबकि 2001 से लेकर 2010 तक 256 लोग सियासी हिंसा में मारे गए। यह काल ममता के रचनात्मक संघर्ष का चरम था। इसके बाद 2011 में बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए और ममता ने वाममोर्चा का लाल झंडा उतारकर तृणमूल की विजय पताका फहरा दी। इस साल भी 38 लोग मारे गए। ममता बनर्जी के कार्यकाल में भी राजनीतिक हत्याओं का दौर बरकरार रहा। इस दौर में 58 लोग मौत के घाट उतारे गए।
बंगाल की माटी पर एकाएक उदय हुई भाजपा ने ममता के वजूद को संकट में डाल दिया है। बंगाल में करीब 27 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें 90 फीसदी तृणमूल के खाते में जाते हैं। इसे तृणमूल का पुख्ता वोटबैंक मानते हुए ममता ने अपनी ताकत मोदी व भाजपा विरोधी छवि स्थापित करने में खर्च दी। इसमें मुस्लिमों को भाजपा का डर दिखाने का संदेश भी छिपा था। किंतु इस क्रिया की विपरीत प्रतिक्रया हिंदुओं में स्व-स्फूर्त ध्रुवीकरण के रूप में दिखाई देने लगी। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए, एनआरसी के लागू होने के बाद भाजपा को वजूद के लिए खतरा मानकर चल रहे हैं, नतीजतन बंगाल के चुनाव में हिंसा का उबाल आया हुआ है। इस कारण बंगाल में जो हिंदी भाषी समाज है वह भी भाजपा की तरफ झुका दिखाई दे रहा है। हैरानी इस बात पर भी है कि जिस ममता ने ‘मां, माटी और मानुष एवं परिवर्तन’ का नारा देकर वामपंथियों के कुशासन और अराजकता को चुनौती दी थी वही ममता इसी ढंग की भाजपा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बौखला गई हैं। उनके बौखलाने का एक कारण यह भी है कि 2011-2016 में उनके सत्ता परिवर्तन के नारे के साथ जो वामपंथी और कांग्रेसी कार्यकर्ता आ खड़े हुए थे वे भविष्य की राजनीतिक दिशा भांपकर भाजपा का रुख कर रहे हैं।
2011 के विधानसभा चुनाव में जब बंगाल में हिंसा का नंगा नाच हो रहा था, ममता ने अपने कार्यकताओं को विवेक न खोने की सलाह देते हुए नारा दिया था, ‘बदला नहीं, बदलाव चाहिए।’ लेकिन बदलाव के ऐसे ही कथन अब ममता को असामाजिक व अराजक लग रहे हैं। ममता को हिंसा के परिप्रेक्ष्य में आत्ममंथन की जरूरत है कि बंगाल में ही हिंसा परवान क्यों चढ़ी? जबकि ऐसी हिंसा देश के अन्य किसी भी राज्य में दिखाई नहीं दे रही है। अतएव ममता को लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं को ठेंगा दिखाने से बचना चाहिए।

किसानों को बरगलाने में लगे विपक्षी दल

प्रमोद भार्गव

तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिलकर यह जता दिया है कि ये दल किसानों को बरगलाने का काम कर रहे हैं। जो राहुल गांधी इन कानूनों को किसान विरोधी बता रहे हैं, वही इन कृषि सुधारों को 2012 में मनमोहन सिंह सरकार के रहते हुए लागू करना चाहते थे। किंतु विपक्ष के प्रबल विरोध के चलते यह संभव नहीं हुआ। जो वामपंथी दल पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और सिंगूर में किसानों की जमीन अधिग्रहण कर सेज और टाटा की नैनो के लिए क्रूर हिंसा पर उतर आए थे, वही आज किसान हितों का ढोंग कर रहे हैं। एनसीपी के नेता शरद पवार वही नेता हैं, जिनके केंद्रीय कृषि मंत्री रहते किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्याएं कीं और महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र आज भी इसी स्थिति से गुजर रहा है। 2019 में ही महाराष्ट्र में 3927 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। महाराष्ट्र में चीनी मिल कभी भी किसान से गन्ना खरीद का पूरा भुगतान नहीं करते हैं। इनमें से ज्यादातर मिल शरद पवार और उनकी ही कंपनियों के हैं।

साफ है, ये दल किसान संगठनों में फूंक मारकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाहते हैं। क्योंकि अब जब केंद्र सरकार ने किसानों के दस मुद्दों पर संशोधन का प्रस्ताव लिखित में दे दिया है, तब आंदोलन के चलते रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाता? वैसे भी संविधान की सातवीं अनुसूची में खेती, भूमि, पानी, शिक्षा, पशुपालन, कृषि-ऋण, राज्य-कर और भू-राजस्व जैसे सभी विषय राज्यों के अधीन हैं, गोया, तीनों नए कानूनों का कोई भी प्रावधान राज्य सरकारों की इच्छा के विपरीत लागू नहीं किए जा सकते हैं। मसलन राज्य इन कानूनों को लागू करने या नहीं लागू करने के लिए स्वतंत्र हैं।

1964 से पहले भारत में किसानों को खाद्य सुरक्षा नहीं मिलती थी। ‘जय किसान, जय जवान’ का नारा देने वाले प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अपने सचिव एलके झा के नेतृत्व में ‘खाद्य अनाज मूल्य नीति समिति’ का गठन किया और किसान हित साधे। दरअसल शास्त्री जी चाहते थे कि किसानों को फसल बेचकर इतनी धनराशि तो मिले की उनकी आजीविका सरलता से सालभर चल जाए। इसी मकसद पूर्ति के लिए 1966 में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया गया। तबसे लेकर अबतक यह व्यवस्था लागू है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 फसलों पर एमएसपी सुनिश्चित किया हुआ है। लेकिन नए कानून में इस प्रावधान की गारंटी खत्म कर दी गई थी। संशोधन प्रस्ताव में इस व्यवस्था को बनाए रखने का लिखित भरोसा सरकार ने दे दिया है। मसलन एमएसपी भविष्य में भी किसानों को मिलती रहेगी। हालांकि 2015 में आई संताकुमार समिति की रिपोर्ट पर गौर करे तो बमुश्किल छह प्रतिशत किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है। बावजूद इस प्रावधान का बने रहना जरूरी है।

किसानों को आशंका थी कि जब वह निजी मंडियों में फसल पहले से ही बेचने को स्वतंत्र थे, तब निजी मंडियों की व्यवस्था किसलिए? किसानों को आशंका थी कि वे निजी मंडियों के मालिकों के जाल में फंसते चले जाएंगे। ये मंडियां कर-मुक्त फसल की खरीद करेंगी, इसलिए सरकारी मंडियां बंद होती चली जाएंगी। यह आशंका उचित है। सरकार ने अब संशोधन प्रस्ताव दिया है कि निजी मंडियों में राज्य सरकारें पंजीयन की व्यवस्था लागू कर सकती है और सेस शुल्क भी लगा सकती है। हालांकि निजी मंडियां अस्तित्व में नहीं होने के बावजूद 65 फीसदी किसान स्थानीय निजी व्यापारियों को ही फसल बेचते हैं। महज 25 प्रतिशत परिवार ही सरकारी मंडियों में फसल बेचते हैं।

इस लिहाज से यह बात समझ से परे है कि आखिर निजी मंडियों की जरूरत ही क्या है। हालांकि अब निजी मंडियों पर भी कर के प्रावधान कर दिए जाने से यह भरोसा पैदा होता है कि निजी मंडियां पनप नहीं पाएंगी। किसानों की जमीन पर उद्योगपतियों का कब्जा संविदा खेती के अनुबंध के बावजूद नहीं होगा। क्योंकि इस कानून में संशोधन किया गया है कि किसान की जमीन पर किसी भी प्रकार का ऋण अथवा मालिकाना हक व्यापारी को नहीं मिल सकता है और न ही किसान की जमीन बंधक रखी जा सकती है। इन प्रावधानों के अलावा राज्य सरकारें किसानों के हित में कानून बनाने के लिए स्वतंत्र रहेंगी। यह प्रावधान तय करता है कि तीनों कानूनों में किसानों के हित ध्यान में रखते हुए बदलाव किए जा सकते हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार अस्तित्व में आने के बाद से ही खेती-किसानी के प्रति चिंतित रही है। इस नजरिए से अपने पहले कार्यकाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी वृद्धि की थी, इसी क्रम में ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण नीति’ लाई गई थी। तब इस योजना को अमल में लाने के लिए अंतरिम बजट में 75,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। इसके तहत दो हेक्टेयर या पांच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हर साल तीन किश्तों में कुल 6000 रुपए देना शुरू किए गए थे। इसके दायरे में 14.5 करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जाहिर है, किसानों की आमदनी दोगुनी करने का यह बेहतर उपाय है। यदि फसल बीमा का समय पर भुगतान, आसान कृषि ऋण और बिजली की उपलब्धता तय कर दी जाती है तो भविष्य में किसान की आमदनी दूनी होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा। ऐसा होता है तो किसान और किसानी से जुड़े मजदूरों का पलायन रुकेगा और खेती 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के रोजगार का जरिया बनी रहेगी। खेती घाटे का सौदा न रहे इस दृष्टि से कृषि उपकरण, खाद, बीज और कीटनाशकों के मूल्य पर नियंत्रण भी जरूरी है।

बीते कुछ समय से पूरे देश में ग्रामों से मांग की कमी दर्ज की गई है। निःसंदेह गांव और कृषि क्षेत्र से जुड़ी जिन योजनाओं की श्रृंखला को जमीन पर उतारने के लिए 14.3 लाख करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया गया है, उसका उपयोग अब सार्थक रूप में होता है तो किसान की आय सही मायनों में 2022 तक दोगुनी हो पाएगी। इस हेतु अभी फसलों का उत्पादन बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की भी जरूरत है। दरअसल बीते कुछ सालों में कृषि निर्यात में सालाना करीब 10 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं कृषि आयात 10 अरब डॉलर से अधिक बढ़ गया है। इस दिशा में यदि नीतिगत उपाय करके संतुलन बिठा लिया जाता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की धुरी बन सकती है। हालांकि अभी भी खेती-किसानी का जीडीपी में योगदान 16 फीसदी है और इससे देश की आबादी के 41 प्रतिशत लोगों को रोजगार मिलता है।

केंद्र सरकार फिलहाल एमएसपी तय करने के तरीके में ‘ए-2’ फॉर्मूला अपनाती है। यानी फसल उपजाने की लागत में केवल बीज, खाद, सिंचाई और परिवार के श्रम का मूल्य जोड़ा जाता है। इसके अनुसार जो लागत बैठती है, उसमें 50 फीसदी धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य तय कर दिया जाता है। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है कि इस उत्पादन लागत में कृषि भूमि का किराया भी जोड़ा जाए। इसके बाद सरकार द्वारा दी जाने वाली 50 प्रतिशत धनराशि जोड़कर समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए। फसल का अंतरराष्ट्रीय भाव तय करने का मानक भी यही है। यदि भविष्य में ये मानक तय कर दिए जाते हैं तो किसानों की खुशहाली बढ़ेगी। एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग ने भी वर्ष 2006 में यही युक्ति सुझाई थी।

सरकार अब खेती-किसानी, डेयरी और मछली पालन से जुड़े लोगों के प्रति उदार दिखाई दे रही है, इससे लगता है कि भविष्य में किसानों को अपनी भूमि का किराया भी मिलने लग जाएगा। इन वृद्धियों से कृषि क्षेत्र की विकास दर में भी वृद्धि होने की उम्मीद बढ़ेगी। वैसे भी यदि देश की सकल घरेलू उत्पाद दर को दहाई अंक में ले जाना है तो कृषि क्षेत्र की विकास दर 4 प्रतिशत होनी चाहिए। खेती उन्नत होगी तो किसान संपन्न होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था समृद्ध होगी। इसका लाभ देश की उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा।

ऋषि दयानन्द ने वेदोद्धार सहित अन्धविश्वास एवं कुरीतियों को दूर किया था

-मनमोहन कुमार आर्य

                प्रकाश करने की आवश्यकता वहां होती है जहां अन्धकार होता है। जहां प्रकाश होता है वहां दीपक जलाने वा प्रकाश करने की आवश्यकता नहीं होती। हम महाभारत काल के उत्तरकालीन समाज पर दृष्टि डालते हैं तो हम देखते हैं कि हमारा समाज अनेक अज्ञान व अविद्यायुक्त मान्यताओं के प्रचलन से ग्रस्त था। यदि इन अविद्यायुक्त अन्धविश्वासों पर दृष्टि डाली जाये तो हमें इसका कारण वेदज्ञान के प्रचार का न होना, मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध तथा अवतार आदि की कल्पना व व्यवहार मुख्य रूप से दृष्टिगोचर होते हैं ईश्वर का वास्तविक स्वरूप हमें चार वेदों व उपनिषद आदि ग्रन्थों से प्राप्त होता है। वेदों का ज्ञान स्वयं सर्वव्यापक, सर्वज्ञ तथा सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर से ही सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को मिला है। वेदों में ईश्वर ने स्वयं अपने स्वरूप का परिचय दिया है। यजुर्वेद के चालीसवें अध्यान में परमात्मा ने स्वयं को अजन्मा, काया से रहित तथा नस-नाड़ी आदि के बन्धनों से रहित बताया है। अतः ईश्वर के मनुष्य के रूप में अवतार लेने व होने का खण्डन स्वयं ईश्वरीय ज्ञान वेदों से होता है। परमात्मा ने इस सृष्टि व ब्रह्माण्ड को बनाया है। ऐसा उसने अपने सच्चिदानन्द, सर्वज्ञ, अनादि, नित्य, निराकार, सर्वव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी स्वरूप से किया है। क्या यह कार्य छोटा कार्य था? यदि परमात्मा निराकारस्वरूप से सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय आदि कार्य कर सकते हैं तो वह निश्चय ही रावण, कंस, दुर्योधन जैसे साधारण शरीरधारी जीवों का प्राणोच्छेद भी कर ही सकते हैं। आज भी प्रतिदिन वह बिना अवतार लिए लाखों वा करोड़ों लोगों व प्राणियों का प्राणोच्छेद करते ही हैं।

                देश देशान्तर में जब कहीं युद्ध आदि होते हैं तो उसमें एक समय में ही सैकड़ों वा हजारों लोग मरते हैं। उन सबका प्राणोच्छेद मृत्यु ईश्वर द्वारा उनकी आत्मा को उनके शरीरों से पृथक करने पर ही होती है। अतः ईश्वर का अवतार लेना वेद सहित तर्क एवं युक्तियों से सिद्ध नहीं होता। ईश्वर विश्व व सृष्टि में जो भी कार्य कर रहा है, वह सब बिना किसी अवतार को धारण किये कर सकता है। अतः अवतार लेने व उसकी मूर्तिपूजा करने का विचार व धारणा सत्य के विपरीत एवं वेदविरुद्ध होने से विश्वास करने योग्य नहीं है। ऋषि दयानन्द को मूर्तिपूजा की निरर्थकता का बोध अपनी आयु के चैदहवें वर्ष में शिवरात्रि के अवसर पर शिवरात्रि की पूजा करते हुए हुआ था। मूर्तिपूजा सर्वव्यापक व सच्चिदानन्द की पूजा नहीं है, यह बात उनके समाधि अवस्था को प्राप्त होने, ईश्वर का साक्षात्कार करने तथा वेदों का सर्वांगरूप में अध्ययन करने पर सत्य सिद्ध हुई थी। इस कारण समाज को अज्ञान व अन्धविश्वासों से हो रहे पतन से निकाल कर मनुष्य की लौकिक एवं पारलौकिक उन्नति करने कराने के लिए उन्होंने मूर्तिपूजा व अवतारवाद का विरोध किया। इसके साथ ही ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के सत्यस्वरूप की उपासना का धारणा व ध्यान की विधि से स्तुति, प्रार्थना व उपासना करते हुए विधान किया जो कि सृष्टि के आरम्भ से न केवल गृहस्थ आदि सामान्य जन अपितु ऋषि, मुनि व महर्षि करते चले आ रहे थे। अति प्राचीन काल में ऋषि पतंजलि ने ईश्वर की उपासना पर विचार कर वेदानुकूल ईश्वर की उपासना का ग्रन्थ ‘‘योग दर्शन रचा था। इसी योगदर्शन प्रदत्त अष्टांग-योग की विधि से उपासना करने से ईश्वर का साक्षात्कार एवं मोक्ष की प्राप्ति उपासक व साधक मनुष्य की आत्मा को होती है।

                ऋषि दयानन्द ने सत्य का प्रचार मौखिक उपदेशों व्याख्यानों के द्वारा किया। इसके साथ ही उन्होंने अनेक विषयों पर अनेक ग्रन्थों की रचना भी की। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा संस्कार विधि उनकी प्रमुख रचनायें हैं। वेदों का भाष्य उनका सबसे महत्वपूर्ण एवं महान कार्य है। स्वामी दयानन्द के वेदभाष्य से वेद के नाम पर प्रचलित सभी मिथ्या विश्वासों का खण्डन होता है तथा सत्य विश्वासों का प्रकाश होता है। स्वामी दयानन्द का वेदभाष्य इतिहास में अपूर्व है। यह भावी सभी वेदभाष्यकारों के लिये पथप्रदर्शक है। उनके भाष्य से ही विद्वानों को वेदार्थ शैली का ठीक ठीक ज्ञान होता है। वह आदर्श वेदभाष्यकार हैं। इस प्रकार से ऋषि दयानन्द ने देश देशान्तर में प्रचलित अविद्या अन्धविश्वासों को दूर करने का प्रयत्न किया।

                ऋषि दयानन्द ने सभी अन्धविश्वासों का आधार मूर्तिपूजा को माना है। उनके अनुसार ईश्वरीय ज्ञान वेदों में मूर्तिपूजा का विधान कहीं नहीं है और ही यह ईश्वर की उपासना के लिये तर्क एवं युक्ति से पूर्ण है। मूर्तिपूजा वेद विरुद्ध होने तथा इसकी पुष्टि करने के लिये उन्होंने दिनांक 16 नवम्बर, सन् 1869 को काशी के 27 से अधिक शीर्ष पण्डितों से अकेले शास्त्रार्थ किया था। यह शास्त्रार्थ आज भी लेखबद्ध उपलब्ध होता है। इसको लेखबद्ध भी सम्भवतः ऋषि दयानन्द ने स्वयं ही किया है। इसे पढ़कर मूर्तिपूजा पर हुए शास्त्रार्थ में काशी के पण्डितगण किसी वेद मन्त्र, तर्क एवं युक्ति को अपने पक्ष में नहीं दे पाये थे जिससे इसका करना वेद ज्ञान विज्ञान सम्मत सिद्ध होता। ऋषि दयानन्द ने यह भी सूचित किया है कि अट्ठारह पुराण ऋषि वेद व्यास की रचनायें नहीं हैं अपितु इनकी रचना ऋषि वेदव्यास जी मृत्यु के बाद मध्यकाल में की गई है। यह पुराण, प्राचीन पुराण ग्रन्थ न होकर अर्वाचीन ग्रन्थ है। प्राचीन पुराण ग्रन्थों का वास्तविक नाम वेद, ब्राह्मण, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों पर सिद्ध होता है जो महाभारत युद्ध से भी प्राचीन हैं तथा जिनकी रचना प्राचीन वेद के ऋषियों ने वेदों के अर्थों के प्रचार प्रसार के लिये की थी।

                महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश को चौदह समुल्लासों में लिखा है जिसके प्रथम 10 समुल्लासों में वैदिक मान्यताओं सिद्धान्तों पर प्रकाश डालकर उनके सत्य मान्य होने का मण्डन किया गया है। सत्यार्थप्रकाश के उत्तरार्ध के चार समुल्लास अवैदिक मतों की समीक्षा खण्डन में लिखे गये हैं जिनमें मतमतान्तरों में विद्यमान अविद्या अज्ञान युक्त कथनों मान्यताओं की समालोचना की गई है। इस समालोचना से वेदों की महत्ता सिद्ध होती है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ऋषि दयानन्द का चार वेदों के भाष्य की भूमिकास्वरूप लिखा गया अपूर्व व महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में चार वेदों में सब सत्य विद्याओं के होने का दिग्दर्शन कराया गया है। इस ग्रन्थ से यह भी ज्ञात होता है कि वेद केवल यज्ञ आदि करने कराने के ग्रन्थ नहीं है जैसा कि कुछ मध्यकालीन आचार्यों ने समझा था। वेदों में सब सत्य विद्यायें होने से यह मनुष्यों के आचार विचार व धर्म के ग्रन्थ है। ऋषि दयानन्द ने वेदों के ज्ञान व आचरण को ही मनुष्य का परमधर्म बताया है और इसके नित्य प्रति पठन पाठन सहित प्रचार करने की प्रेरणा की है। ऋषि दयानन्द ने वेदों के प्रचार प्रसार द्वारा देश व समाज से अविद्या दूर करने के लिए 10 अप्रैल सन् 1875 को आर्यसमाज नाम से एक संगठन व आन्दोलन की स्थापना की थी। यह आन्दोलन अज्ञान दूर करने तथा ज्ञान व विद्या के प्रचार करने का आन्दोलन है। ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में सभी अन्धविश्वासों व मिथ्या परम्पराओं का खण्डन भी किया था। उन्होंने स्त्री शूद्रों को वेदाध्ययन एवं वेदप्रचार का अधिकार दिया। मूर्तिपूजा के स्थान पर निराकार ईश्वर की पूजा ध्यान करना सिखाया। ऋषि ने दैनिक यज्ञ अग्निहोत्र को सबके लिये करणीय एवं लौकिक एवं पारलौकिक उन्नति का आधार बताया वा सिद्ध किया। ऋषि दयानन्द ने ही सबसे पहले देश की आजादी के लिये प्रेरणा की थी और ऐसा करते हुए स्वदेशीय राज्य को सर्वोपरि उत्तम बताया था। ऋषि दयानन्द के अनुयायियों ने सबसे अधिक क्रान्तिकारी व हिंसा रहित शान्तिपूर्ण आन्दोलनों में भाग लिया। देश से अविद्या दूर करने के लिये आर्यसमाज ने देश में डीएवी स्कूल व कालेज सहित वेद वेदांग के केन्द्र गुरुकुल स्थापित किये। समाज से जन्मना जातिवाद तथा छुआछूत को दूर करने का आन्दोलन किया। बाल विवाह को समाप्त कराया तथा कम आयु की विधवाओं के पुनविर्वाह को स्वीकार किया। ऋषि दयानन्द ने पूर्ण युवावस्था में युवक व युवतियों के विवाह का समर्थन किया और इसके प्रमाण भी वेद व वेदानुकूल ग्रन्थ मनुस्मृति आदि से दिये। ऋषि दयानन्द ने जन्मना जातिवाद को दूर कर उसके स्थान पर गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारिक वैदिक वर्ण व्यवस्था का प्रचार किया। सद्गृहस्थ सहित वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम का सत्यस्वरूप भी देश व समाज के समाने रखा। देश की उन्नति में सर्वाधिक योगदान यदि किसी एक व्यक्ति व संगठन का है तो वह व्यक्ति व संगठन ऋषि दयानन्द व आर्यसमाज ही हैं। ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के महत्व से परिचित होने के लिये देशवासियों को ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश तथा उनका जीवनचरित्र विशेष रूप से पढ़ने चाहिये। ऋषि के अन्य ग्रन्थ पढ़ने से भी मनुष्य की सभी शंकायें व भ्रान्तियां दूर होती हैं। हम अनुमान से कह सकते हैं कि यदि ऋषि दयानन्द वेदों का उद्धार वा वेदों का प्रचार कर अन्धविश्वासों तथा कुरीतियों का खण्डन कर समाज सुधार का कार्य न करते तो देश की वह उन्नति, जो आज हम देख रहे हैं, कदापि न होती। ऋषि दयानन्द ने वेदेां के आधार पर नये समाज व देश का निर्माण करने की नींव रखी थी। जब तक देश देशान्तर से अज्ञान व अविद्या पूरी तरह से दूर नहीं हो जाते, उनका कार्य अधूरा ही रहेगा।

समस्या ‘किसान आन्दोलन’ नहीं ‘काली राजनीति’ है

-ः ललित गर्ग:-

देश में बीस दिनों से किसान आंदोलन चल रहा है, किसान भड़के हुए हैं और आंदोलनरत है तो वहीं इनकी वजह से लाखों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही आंदोलन और बंद की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को भी हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। इन जटिल होती स्थितियों के बीच मुद्दा यह नहीं है कि देश के राजनीतिक दल किन नीतियों का समर्थन करते हैं और किनका विरोध। असली मुद्दा तो यह है कि देश के राजनीतिक दल, देश की जनता के साथ छलावा करके देश के लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान और कानून का मखौल क्यों उड़ाते हैं? इस देश में अधिकांश समस्याओं की जड़ इन राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया ही है, अलोकतांत्रिक गतिविधियां ही हैं, राजनीतिक स्वार्थ ही हैं। इन्हीं राजनीतिक दलों की दोहरी नीतियों के कारण यह किसान आन्दोलन किसान आन्दोलन न होकर एक राजनीतिक आन्दोलन बन गया है।
अब यह केवल तथाकथित विरोधी दल के नेताओं के बलबूते की बात नहीं रही कि वे किसान आन्दोलन जैसी अराजक स्थितियों एवं अलोकतांत्रिक स्थितियों को रोक सके, गिरते मानवीय मूल्यों को थाम सकें, समस्याओं से ग्रस्त सामाजिक व राष्ट्रीय ढांचे को सुधार सकें, तोड़कर नया रास्ता बना सकें। जो भेदभावरहित हो, राजनीतिक स्वार्थों से परे हो, समतामूलक हो, जो एक प्रशस्त मार्ग दें और सही वक्त में सही बात कहें। इसलिए अब वक्त आ गया है कि देश के सभी राजनीतिक दल स्वार्थ एवं वोटों की राजनीति छोड़कर मूल्यों की राजनीति करें, वे यह तय करें कि उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क न हो। अगर आप सत्ता में रहते हुए किसी कानून की वकालत करते हो, सदन में मत के दौरान किसी बिल का खुल कर या मौन समर्थन करते हो तो फिर बाहर सड़क पर विरोध का नाटक क्यों?
किसानों के व्यापक हितों के लिये केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने संसद के दोनों सदनों में इन तीन कृषि कानूनों को पारित किया, जो राष्ट्रपति की सहमति से लागू किए गए। अब विभिन्न राजनीतिक दलों की शह पर इन कानूनों के खिलाफ ये किसान दिल्ली की सीमा पर डटे हुए हैं। इस आंदोलन की शुरुआत एमएसपी अर्थात् न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी की मांग के साथ हुए थी लेकिन सरकार द्वारा बातचीत करने के लिए तैयार हो जाने के बाद अब किसान नेता तीनों कानूनों को ही रद्द करने की मांग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि शायद इन किसान संगठनों या किसान नेताओं को अपने हितों की नहीं, इन राजनीतिक दलों की चिन्ता है। 6 लम्बी बैठकों में सरकार ने लगातार यह साफ कर दिया था कि एमएसपी की व्यवस्था से कोई छेड़-छाड़ नहीं की जाएगी। सरकार ने किसानों की अन्य अनेक मांगों को भी माना है, लेकिन जैसे-जैसे सरकार झुकती गयी, किसान हावी होते गये हैं, क्योंकि वे तथाकथित राजनीतिक दलों के इशारों पर आन्दोलन की दशा और दिशा तय करने में लगे हैं। देश में किसान एक बड़ा वोट बैंक है और कोई भी सरकार अपने पर किसान विरोधी होने का ठप्पा नहीं लगाना चाहेगी। किसान अपने हक की लड़ाई लड़े किसी को एतराज नहीं है, लेकिन प्रमुख राजमार्गों को अवरूद्ध कर देना, देश के सर्वोच्च एवं लोकतांत्रिक तरीकों से चुने गये नायक के लिये अभद्र, अशालीन एवं अराजक भाषा का उपयोग किया जाये, यह कैसा लोकतांत्रिक विरोध का तरीका है? हालांकि यह एक सच्चाई है कि आजादी के बाद से ही देश के किसान ठगे गए हैं। सरकारों की मंशा चाहे जो भी रही हो लेकिन इसी सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत कार्य कर रही व्यवस्था ने हमेशा किसानों के साथ छल ही किया है। इसी छल से मुक्ति के लिये मोदी सरकार ने कुछ साहस दिखाया तो विरोधी राजनीतिक दलों पर वह नागवार गुजरा।
इन विडम्बनापूर्ण एवं विरोधाभासी स्थितियों में विभिन्न दल राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां तो खूब सेक रहे हैं, लेकिन किसानों के हित में कोई राजनीतिक दल सच्चे मन से सामने आया हो, प्रतीत नहीं होता। तभी केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के पुराने स्टैंड को बताते हुए विरोधी दलों के दोहरे एवं विरोधाभासी रवैये को लेकर जमकर निशाना साधा। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस ने खुद अपने 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में कृषि से जुड़े  एपीएमसी एक्ट को समाप्त करने की बात कही थी। कृषि मंत्री के तौर पर पिछली सरकार में एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने लगातार इन सुधारों की वकालत की थी। आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार ने 23 नवंबर 2020 को नए कृषि कानूनों को नोटिफाई करके दिल्ली में लागू कर दिया है। लालू और मुलायम के समर्थन पर टिकी देवगौड़ा, गुजराल और मनमोहन सरकार के दौरान भी आर्थिक सुधार की नीतियों को तेजी से लागू किया गया। लेकिन आज ये सभी दल सिर्फ विरोध करने के नाम पर विरोध करने की खानापूर्ति कर रहे हैं और इसका नुकसान देश की जनता को उठाना पड़ रहा है, देश कमजोर हो रहा है।
आज हम जीवन नहीं, मजबूरियां जी रहे हैं। जीवन की सार्थकता नहीं रही। अच्छे-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी का फर्क नहीं कर पा रहे हैं। मार्गदर्शक यानि नेता शब्द कितना पवित्र व अर्थपूर्ण था पर नेता अभिनेता बन गया। नेतृत्व व्यवसायी बन गया। आज नेता शब्द एक गाली है। जबकि नेता तो पिता का पर्याय था। उसे पिता का किरदार निभाना चाहिए था। पिता केवल वही नहीं होता जो जन्म का हेतु बनता है अपितु वह भी होता है, जो अनुशासन सिखाता है, विकास की राह दिखाता है, गलत को गलत एवं सही को सही कहने के मूल्यों को जीता है, आगे बढ़ने का मार्गदर्शक बनता है और राष्ट्रीयता को पोषित करता है।
देश में लोकतंत्र होने के बावजूद एक साजिश चल रही है कि जैसे भी हो सत्ता को काबिज करने के लिये हर तरीके के जायज-नाजायज हथकंडे अपनाये जा रहे हैं और इसके लिये किसानों को कारगर हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। मोदी को किसानों का विरोधी घोषित करके इसी लक्ष्य को और मजबूत किया जा रहा है। इसी से एक नई किस्म की वाग्मिता पनपी है जो किन्हीं स्वस्थ राजनीतिक मूल्यों पर नहीं बल्कि भटकाव के कल्पित आदर्शों पर आधारित है। जिसमें सभी नायक बनना चाहते हैं, पात्र कोई नहीं। भला ऐसी मानसिकता एवं आन्दोलन की राह किस के हित में होगी?
स्वार्थ के घनघोर बादल छाये हैं, सब अपना बना रहे हैं, सबका कुछ नहीं। और उन्माद की इस प्रक्रिया में आदर्श बनने की पात्रता किसी में नहीं है, इसलिये आदर्श को ही बदल रहे हैं, नये मूल्य गढ़ रहे हैं। नये बनते मूल्य और नये स्वरूप की तथाकथित राजनीति क्रूर, भ्रष्ट, बिखरावमूलक अमानवीय और जहरीले मार्गों पर पहुंच गई है। पर असलियत से परे हम व्यक्तिगत एवं दलगत स्वार्थों के लिए अभी भी प्रतिदिन ‘मिथ’ निर्माण करते रहते हैं। आवश्यकता है केवल थोक के भावों से भाषण न दिये जायें, कथनी और करनी यथार्थ पर आधारित हों। उच्च स्तर पर जो निर्णय लिए जाएं वे देश हित में हों। दृढ़ संकल्प हों। एक अरब तीस करोड़ देशवासियों की मुट्ठी बंधे, विश्वास जगे। चाहे वो किसी बडे़ घोटाले के नाम पर हो, चाहे अनुचित ढंग से संचालित हो रहे किसान आन्दोलन के नाम पर हो। जो अधिकारों और मर्यादाओं की रेखाओं को पार करे, उसे अधिकारांे और मर्यादाओं के सही अर्थ का भान करा देना चाहिए। जंगल में वनचरों ने अपनी लक्ष्मण रेखाएं बना रखी हैं। मनुष्य क्यों नहीं बनाता? क्यों लांघता रहता है अपने झूठे स्वार्थों के लिए इन सीमाओं और मर्यादाओं को?
आज की असली समस्या ‘किसान आन्दोलन’ नहीं बल्कि ‘काली राजनीति’ है। श्मशान पहुंचाने के लिए चार आदमी ही काफी हैं। समस्याओं से जूझते मनुष्यों के आंसुओं को लाखों मिलकर भी नहीं पांेछ सकते, उसके लिये साफ नीतियां और नियत वाला विपक्ष चाहिए और चाहिए इन नीतियों के निर्माताओं एवं उनको क्रियान्वित करने वाले उन्नत चरित्र वाले राजनेता। आवश्यकता है देश में ऊंचे कद वाले नेता हों। सेवा और चरित्र निर्माण के क्षेत्र में श्रेष्ठ पुरुषों की एक शृंखला हो। केवल व्यक्ति ही न उभरे, नीति उभरे, जीवनशैली उभरे। चरित्र की उज्ज्वलता उभरे। हरित क्रांति, श्वेत क्रांति के बाद अब चरित्र क्रांति का दौर हो। वरना मनुष्यत्व और राष्ट्रीयता की अस्मिता बौने होते रहेंगे। महात्मा गांधी के प्रिय भजन की वह पंक्ति- ‘सबको सन्मति दे भगवान’ में फिलहाल थोड़ा परिवर्तन हो- ‘केवल मोदी विरोधियों को सन्मति दे भगवान।’

समस्या का समाधान हां या ना में नहीं, संवाद में

देश में लगभग एक पखवाड़े से जारी किसान आंदोलन भारत के सशक्त लोकतंत्र का बेहतरीन और विपक्ष की ओछी राजनीति का ताज़ा उदाहरण है। क्योंकि आंदोलन के पहले दिन से ही किसानों की मांगों का जिस प्रकार केंद्र में बहुमत वाली सरकार सम्मान कर रही है, उनकी आशंकाओं का समाधान करने का हर सम्भव प्रयास कर रही है वो सराहनीय है। यह बात सही है कि मौजूदा सरकार कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष के पिछले चार पांच सालों के इतिहास को देखते हुए इन कृषि सुधार कानूनों को लाने से पहले ही किसान नेताओं या फिर राज्य सरकारों को विश्वास में ले लेती तो आज पूरा देश इस अराजक स्थिति और अनावश्यक विरोध की राजनीति से बच जाता लेकिन या तो सरकार ने इस मामले में दूर की दृष्टि नहीं रखी या फिर उसने विपक्ष की ताकत को कम आंक लिया। खैर अब वो इस स्थिति में अपना नरम और सकारात्मक रुख का परिचय दे रही है चाहे वो किसानों द्वारा दिल्ली के बुराड़ी मैदान में आंदोलन करने से मना कर देना हो या किसानों द्वारा सरकार से बिना शर्त बात करने की मांग करना हो। चाहे कृषि मंत्री से लेकर गृहमंत्री तक विभिन्न स्तरों पर किसान नेताओं की बैठकों का दौर हो।और या फिर अपने ताज़ा कदम में आखिर किसानों की मांगों को देखते हुए सरकार द्वारा कृषि कानूनों में संशोधनों का प्रस्ताव किसानों के पास भेजना हो। सरकार अपने हर कदम से बातचीत करके किसानों की समस्याओं को दूर करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता, अपनी नीयत और मंशा स्पष्ट कर रही है। वहीं दूसरी तरफ किसान संगठनों का रवैया किसान नेताओं की मंशा और विश्वसनीयता दोनों पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। क्योंकि इन कानूनों के जिन मुद्दों को उठाकर यह किसान आंदोलन खड़ा किया गया है सरकार उन सभी पर संशोधन करने के लिए तैयार है। बावजूद इसके किसान नेता संशोधनों को मानने के बजाए कानून वापस लेने की अपनी मांग पर ही अड़े हैं। तो किसान आंदोलन पर सवाल यहीं से खड़े हो जाते हैं क्योंकि,

  1. 2015 की शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार देश के केवल 6% किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है लेकिन फिर भी किसान एमएसपी की मौजूदा व्यवस्था पर आश्वासन चाहते हैं जो कि सरकार लिख कर देने को तैयार है।
  2. किसानों को डर है कि मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी जबकि यह कटु सत्य है कि मौजूदा मंडी व्यवस्था के अंतर्गत मंडियों में ही किसानों का सर्वाधिक शोषण होता है। वो मंडियों में कम दामों पर अपनी उपज बेचने के लिए आढ़तियों के आगे विवश होते हैं और ये आढ़तिये इन्हीं फसलों को आगे बढ़ी हुई कीमतों पर बेचते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। फिर भी “तथाकथित किसानों” की मांगों को देखते हुए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को यह छूट देने के लिए तैयार है कि वे प्राइवेट मंडियों पर बहु शुल्क लगा सकती हैं।

3.किसानों की आशंकाओं को देखते हुए सरकार कानून में संशोधन करके उन्हें सिविल कोर्ट कचहरी जाने का विकल्प देने को भी तैयार है।

  1. जिस कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून को लेकर भृम फैलाया जा रहा था कि किसानों की जमीनें प्राइवेट कंपनियों द्वारा हड़प ली जाएंगी उसको लेकर भी कानून में स्पष्ठता की जाएगी कि खेती की जमीन या बिल्डिंग गिरवी नहीं रख सकते।
  2. किसानों ने यह मुद्दा उठाया था कि नए कृषि कानूनों में कृषि अनुबंधों के पंजीकरण की व्यवस्था नहीं है तो सरकार ने संशोधन में आश्वासन दिया है कि कंपनी और किसान के बीच कॉन्ट्रैक्ट की 30 दिन के भीतर रजिस्ट्री होगी।

6.किसान बिजली से जुड़े नए कानून लागू करने के खिलाफ थे, सरकार ने संशोधन में आश्वस्त किया है कि बिजली की पुरानी व्यवस्था जारी रहेगी और वो बिजली संशोधन बिल 2020 नहीं लाएगी।

  1. किसानों को आपत्ति थी कि नए कानूनों से वो निजी मंडियों के चुंगल में फंस जाएंगे सरकार ने संशोधित प्रस्ताव में निजी मंडियों के रेजिस्ट्रेशन की व्यवस्था की है ताकि राज्य सरकारें किसानों के हित में फैसले ले सकें।

लेकिन किसान नेताओं द्वारा सरकार के इस संशोधित प्रस्ताव को ठुकराना और संशोधन नहीं केवल कानून वापस लेने की मांग पर अड़ जाना, सरकार के साथ बैठकों में कानून पर बात करने के बजाए (“यस और नो”) हाँ या ना” के प्लेकार्ड लहराना या फिर सरकार द्वारा संशोधन भेजने के बावजूद आंदोलन और तेज करने की घोषणा करना, जिसमें अडानी अंबानी के सामान का बहिष्कार करना, जैसे कदम उठाए जा रहे हैं , इस आंदोलन में किसानों के पीछे छुपे असली चेहरों को बेनकाब कर रहे हैं। क्योंकि इससे पहले भी जब सरकार के साथ 9 तारीख को बैठक प्रस्तावित थी तब किसान संगठनों द्वारा 8 तारीख को भारत बंद का आह्वान,इस बंद को समूचे विपक्षी दलों का समर्थन और राहुल गांधी शरद पवार समेत विपक्षी दलों के एक प्रतिनिधि मंडल का राष्ट्रपति से मिलकर इन कानूनों को रद्द करने की मांग करने, ये सभी बातें अपने आप में इसके पीछे की राजनीति को उजागर कर रही हैं। खास बात यह है कि इस आंदोलन में रहने खाने से जुड़े मूलभूत विषय हो या सरकार से बात करने की रणनीति तैयार करने जैसे गंभीर विषय हों जिस प्रकार की खबरें सामने आ रही हैं या फिर प्रसाद के रूप में काजू किशमिश बांटने जैसे वीडियो सामने आ रहे हैं वो इस आंदोलन को शाहीन बाग़ जैसे आंदोलन के समकक्ष खड़ा कर रहे हैं।आंदोलन स्थल पर रोटी बनाने की मशीनें, हाइवे पर जगह जगह लगी वाशिंग मशीनें, ट्यूब वाटर पम्प का संचालन करने वाली मोबाइल सोलर वैन को मोबाइल फोन चार्ज करने और बैटरी बैंक के रूप में तब्दील करना, बिजली के लिए सोलर पैनल और इन्वर्टर का प्रयोग। अगर हमारे किसानों ने एक हाइवे की सड़क पर अपने दम पर यह इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है तो इसका मतलब यह है कि हमारे किसान हर प्रकार से सक्षम हैं और आधुनिक तकनीक का प्रयोग भी बखूबी जानते हैं तो फिर वे अपने इस हुनर का प्रयोग आंदोलन करने की बजाए खेती और फसल को उन्नत करने में लगाते तो वो खुद भी आगे जाते और देश की तरक्की में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते। लेकिन हमारे देश के किसानों की हकीकत किसी से छुपी नहीं है।देश के 86 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं जो खुद खेती में निवेश भी नहीं कर सकते। किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या के आंकड़े उनकी दयनीय स्थिति बताने के लिए काफी हैं। इसलिए जब इस किसान आंदोलन के जरिए हमारे देश के किसानों की यह विरोधाभासी तस्वीरें सामने आती हैं तो इनसे राजनीति की बू आती है। जब केजरीवाल एक तरफ दिल्ली में इन कृषि कानूनों में से एक को लागू करते हैं और दूसरी तरफ किसानों के बीच जा कर इन कानूनों के विरोध में खड़े हो जाते हैं। या जब राहुल गांधी किसानों से कानून वापस लेने तक पीछे नहीं हटने का आह्वान करते हैं लेकिन अपने चुनावी घोषणा पत्र में इन्हीं कृषि सुधारों को लागू करने का वादा करते हैं। या जब शरद पवार आज इन कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन का समर्थन करते हैं लेकिन खुद कृषि मंत्री रहते हुए राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर इन कृषि सुधारों को लागू करने की वकालत करते हैं।

लेकिन राजनीति से इतर यह बात भी सही है कि सरकार द्वारा लाए इन कृषि सुधार क़ानूनों में छोटे किसानों के मद्देनजर और सुधार की गुंजाइश हो सकती है और किसान संगठनों का मुख्य उद्देश्य इन छोटे किसानों के ही हित की रक्षा करना होता है। इसलिए किसान नेताओं का दायित्व है कि वे विपक्ष के हाथों अपना राजनैतिक इस्तेमाल होने से बचाएं और देश के लोकतंत्र का सम्मान करते हुए सरकार से बातचीत कर आम किसानों के हितों की रक्षा की पहल करें ना कि अड़ियल रुख का परिचय दें। क्योंकि समझने वाली बात यह है कि विपक्ष की इस राजनीति में दांव पर विपक्ष नहीं बल्कि किसानों का भविष्य लगा है।

डॉ नीलम महेंद्र

हुनर हाट में होंगे लोकल से वोकल के रंग

●      श्याम सुंदर भाटिया
पांच लाख से ज्यादा भारतीय दस्तकारों और शिल्पकारों को रोजगार के मौके देने वाले हुनर हाट के दुर्लभ हस्तनिर्मित स्वदेशी सामान का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। यह बात दीगर है, कोरोना की काली छाया के चलते छह महीने हुनर हाट पर भी ग्रहण लगा। रफ्ता-रफ्ता अब केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय की ओर से आयोजित यह हुनर हाट देशभर में स्वदेशी हस्तनिर्मित उत्पादों के रंग फिर से बिखेरने लगे हैं। बकौल केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री श्री मुख्तार अब्बास नकवी-  देश का हर क्षेत्र लकड़ी, ब्रास, बांस, शीशे, कपड़े, कागज़, मिटटी के खिलौने बनाने वाले हुनर के उस्तादों से भरपूर है। इनके इस शानदार स्वदेशी उत्पादन को मौका-मार्किट मुहैया कराने के लिए हुनर हाट बड़ा प्लेटफार्म है। श्री नकवी मानते हैं, हुनर हाट अब स्वदेशी हस्तनिर्मित उत्पादनों का प्रामाणिक ब्रांड बन गया है। यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी इस हुनर हाट के कायल हैं। दिल्ली में इंडिया गेट के पास आयोजित हुनर हाट में प्रधानमंत्री औचक पहुंच कर सभी को अचंभित कर दिया था। करीब 50 मिनट हुनर हाट में रुके प्रधानमंत्री न केवल इन हुनरमंदों से मिले बल्कि लिट्टी-चोखा का स्वाद चखा बल्कि कुल्हड़ की चाय की चुस्की भी ली। हुनर हाट के मेजबान श्री नकवी ने खुद ही प्रधानमंत्री को कुल्हड़ में चाय पेश करके भारतीय संस्कृति का बेमिसाल उदाहरण पेश किया। कहते हैं ना, अतिथि देवो भव…।  प्रधानमंत्री ने हौसला अफजाई के लिए बाक़ायदा लिट्टी-चोखा के 120 और दो कुल्हड़ चाय के लिए 40 रुपए का भुगतान भी किया। फरवरी में आयोजित इस हुनर हाट की थीम कौशल को काम थी। इस दफा हुनर हाट श्री नकवी की सियासी कर्मभूमि रामपुर में लग रहा है, जिसकी तैयारियां मुकम्मल हो चुकी हैं। हुनर हाट में 27 सूबों से हुनर के उस्ताद शिरकत कर रहे हैं। इस 10 दिनी हुनर हाट का शंखनाद 18 दिसंबर को होगा। केंद्रीय सड़क परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री श्री नितिन गडकरी  बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहेंगे। 24वां हुनर हाट लखनऊ के शिल्पग्राम में 23 जनवरी से लगेगा। हुनर हाट के दौरान कोविड-19 की गाइडलाइन्स का सख्ती से पालन किया जाएगा। सोशल डिस्टेंसिंग के संग-संग मास्क सभी के लिए अनिवार्य होगा। यदि भूल-चूक से कोई मास्क लगाकर नहीं आया तो उसे हाट की तरफ से फ्री मास्क उपलब्ध कराया जाएगा। हुनर हाट में जगह-जगह सेनिटाईज़ेशन का पुख्ता बंदोबस्त किया गया है। श्री नकवी अंतिम तैयारियों का जायजा ले चुके हैं।

हुनर हाट लोकल के लिए वोकल के संकल्प के साथ देश के दस्तकारों और शिल्पकारों के स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत मिशन को बेहद मजबूती  दे रहा है। श्री नकवी मानते हैं, दस्तकारों का शानदार स्वदेशी उत्पाद ही हुनर हाट की लोकल शान और ग्लोबल पहचान है। देश के हर क्षेत्र में देशी उत्पादन की बहुत पुरानी और पुश्तैनी परंपरा रही है, वह लुप्त हो रही थी। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करने के आह्वान ने भारत के स्वदेशी उद्योग में नई जान डाल दी है। सच्चाई यह है, हुनर हाट प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया, स्टैंड अप इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया के संकल्प को साकार करने में मील का पत्थर साबित हो रहा है। सच्चाई यह है, क्षेत्र लकड़ी, ब्रास, बांस, शीशे, कपडे, कागज़, मिट्टी के मनमोहक उत्पाद बनाने वाले हुनर के उस्तादों के लिए हुनर हाट वरदान बन गया है। ये हुनर के हाट न केवल दुर्लभ हस्तनिर्मित सामान लोकप्रिय हुए हैं, बल्कि विभिन्न राज्यों के पारंपरिक और लजीज व्यंजनों का लोग लुत्फ़ लेते हैं। इसके संग-संग पारंपरिक नृत्य, संगीत, लोकगीत, कव्वाली और कल्चर प्रोग्राम भी आकर्षण के मुख्य केंद्र होते हैं। हुनर हाट में प्रदर्शित सामान को ऑनलाइन खरीदने की भी सुविधा दी जा रही है। यह हुनर हाट ई-प्लेटफॉर्म और वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर भी है। https://hunarhaat.org पर भी कारीगरों के उत्पाद प्रदर्शनी और बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।

अब तक 22 में से सर्वाधिक 9 हुनर हाट दिल्ली, मुंबई में 3 के अलावा लखनऊ, प्रयागराज, जयपुर, अहमदाबाद, इंदौर, रांची, हैदराबाद, पुड्डुचेरी में एक-एक हुनर हाट लग चुके हैं। रामपुर के बाद लखनऊ, जयपुर, चंडीगढ़, इंदौर, मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, रांची, कोटा, सूरत, कोच्चि में भी हुनर हाट लगाने की योजना है।  प्रधानमंत्री के अलावा उपराष्ट्रपति श्री वैंकया नायडू, लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला, रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह, रेलमंत्री श्री पीयूष गोयल, कानून मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद, सुचना एवं प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावेड़कर, कपड़ा मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी, यूपी के सीएम श्री योगी आदित्य नाथ, महाराष्ट्र के राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी, महाराष्ट्र के पूर्व सीएम श्री देवेन्द्र फडणवीस, पुड्डुचेरी की उपराज्यपाल श्रीमती किरण बेदी, मुख्यमंत्री श्री नारायण स्वामी सरीखी हस्तियां इन हुनर प्रदर्शनियों में समय-समय पर अपनी गरिमाई उपस्तिथि दर्ज करा चुकी हैं। मन की बात कार्यक्रम में तो प्रधानमंत्री श्री मोदी ने हुनर हाट के स्वदेशी उत्पादनों और दस्तकारों के काम की सराहना करते हुए कहा था, मैंने दिल्ली के हुनर हाट में एक छोटी सी जगह में, हमारे देश की विशालता, संस्कृति, परम्पराओं, खानपान और जज्बातों की विविधताओं के दर्शन किए। समूचे भारत की कला और संस्कृति की झलक, वाकई अनोखी ही थी और इनके पीछे, शिल्पकारों की साधना, लगन और अपने हुनर के प्रति प्रेम की कहानियाँ भी बहुत ही प्रेरणादायक होती हैं। पीएम श्री मोदी ने कहा था, हुनर हाट कला के प्रदर्शन के लिए एक मंच तो है ही, साथ-ही-साथ, यह लोगों के सपनों को भी पंख दे रहा है। एक जगह है जहां इस देश की विविधता को अनदेखा करना असंभव ही है। शिल्पकला तो है ही, साथ-साथ हमारे खान-पान की विविधता भी है। वहां एक ही लाइन में इडली-डोसा, छोले-भटूरे, दाल-बाटी, खमन-खांडवी, ना जाने क्या-क्या था. मैंने, खुद भी वहां बिहार के स्वादिष्ट लिट्टी-चोखे का आनन्द लिया, भरपूर आनंद लिया।  भारत के हर हिस्से में ऐसे मेले, प्रदर्शिनियों का आयोजन होता रहता है। भारत को जानने के लिए, भारत को अनुभव के लिए, जब भी मौका मिले, जरुर जाना चाहिए, ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ को जी-भर जीने का यह अवसर बन जाता है। आप ना सिर्फ देश की कला और संस्कृति से जुड़ेंगे, बल्कि आप देश के मेहनती कारीगरों की, विशेषकर, महिलाओं की समृद्धि में भी अपना योगदान दे सकेंगे।

श्री नकवी ने बताया, कोरोना के चलते देशव्यापी लॉकडाउन में मिले समय का सदुपयोग कर दस्तकारों और कारीगरों ने बड़ी तादाद में अपने हस्तनिर्मित दुर्लभ स्वदेशी सामग्री को तैयार किया है, जिसे ये दस्तकार हुनर हाट में लाएंगे। उन्होंने यह भी बताया, विभिन्न निर्यात कौंसिल्स दस्तकारों और शिल्पकारों के स्वदेशी उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय मार्किट मुहैया कराने हेतु रुचि दिखा रही हैं, जिससे इन दस्तकारों, शिल्पकारों के स्वदेशी उत्पादों को बड़े पैमाने पर अंतर्राष्ट्रीय मार्किट मिल सकेगा। उन्होंने आगे कहा, हुनर हाट में सोशल डिस्टेंसिंग, साफ-सफाई, सेनिटाईज़ेशन, मास्क आदि की विशेष व्यवस्था कर दी गई है। साथ ही जान भी जहान भी पवेलियन होगा, जहां लोगों को पैनिक नहीं प्रीकॉशन की थीम पर जागरूकता पैदा करने वाली जानकारी भी दी जाएगी। उम्मीद है, रामपुर के हुनर हाट से इन सैकड़ों शिल्पकारों की उम्मीदों और पंख मिलेंगे।    

बंगाल में रक्तरंजित होती सियासत

अरविंद जयतिलक
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और राज्य के अन्य शीर्ष नेताओं के काफिले पर पथराव और सुनियोजित हमला कुलमिलाकर राज्य में ध्वस्त हो चुकी कानून-व्यवस्था और बदतर हो चुकी सत्ता मशीनरी की दारुण स्थिति को ही रेखांकित करता है। उपर से दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ममता बनर्जी और उनकी सरकार राज्य प्रशासन की चूक स्वीकारने और अपने उदंड कार्यकर्ताओं पर लगाम कसने के बजाए उल्टे इस घटना के लिए भारतीय जनता पार्टी की ही साजिश करार दे रही हंै। जिस अंदाज में ममता बनर्जी ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के लिए कटु और अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया है वह राज्य की उदार संस्कृति, मूल्य, परंपरा और विचारों के आदान-प्रदान का अपमान है। उनकी इस अमर्यादित भाषा से तो यहीं ध्वनित होता है कि वह विधानसभा चुनाव से पहले राज्य के सियासी माहौल को विषाक्त और रक्तरंजित बना देना चाहती हैं। शायद यहीं कारण है कि वह अपने कार्यकर्ताओं के अराजक कृत्यों पर लगाम कसने के बजाए उल्टे उनका बचाव कर उन्हें प्रोत्साहित कर रही हैं। यह उचित नहीं है। इससे लोकतंत्र की नींव कमजोर और लहूलुहान होती है। लोकमंगल और जनमत की भावना को ठेस पहुंचती है। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है जब ममता सरकार के दौरान भाजपा के शीर्ष नेताओं के काफिले और रोड शो पर पथराव और हमला हुआ हो। याद होगा 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जब बंगाल में रोड शो कर रहे थे तब भी उनके काफिले पर पत्थरबाजी हुई थी। तब भी ममता सरकार ने अपनी राज्य मशीनरी का बचाव करते हुए इसे भाजपा की साजिश करार दिया था। याद होगा उस समय घाटल सीट से भाजपा उम्मीदवार और पूर्व आइपीएस अधिकारी भारती घोष पर भी तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने जानलेवा हमला बोला था। लेकिन तमाशा कहा जाएगा कि ममता सरकार ने एक भी कार्यकर्ता के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। गौर करें तो पिछले कुछ वर्षों में राज्य में भाजपा के एक सैकड़ा से अधिक कार्यकर्ता मारे जा चुके हंै। राज्य में कानून व्यवस्था किस कदर बिगड़ चुकी है इसी से समझा जा सकता है कि उत्तरी दिनाजपुर की आरक्षित सीट हेमताबाद से भाजपा विधायक देबेंद्र नाथ रे की हत्या कर उनके शव को फंदे से लटका दिया गया। ममता सरकार द्वारा अपराधियों की धरपकड़ करने के बजाए इसे खुदकुशी करार दे दिया गया। बंगाल के मौजूदा सियासी अराजक हालात को देखते हुए तो अब ऐसा लगने लगा है मानों सत्ताधारी तृणमूल कांगे्रस ने अपने कार्यकर्ताओं को चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जाने की छूट दे दी है। अन्यथा क्या मजाल की सत्ता मशीनरी सतर्क रहे और विपक्षी दलों के काफिले पर हमला हो। देश के अन्य राज्यों में भी चुनाव होते हैं। लेकिन कहीं कहीं भी इस तरह की अराजकता और विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने का दृश्य देखने को नहीं मिलता। लेकिन बंगाल की बात करें तो यहां जब भी चुनाव आते हैं हिंसक माहौल निर्मित होना प्रारंभ हो जाता है। 2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आयी तो लगा कि शायद यहां शांति और भाईचारे के बीज प्रस्फुटित होंगे। ममता ने वादा भी किया कि वे एक नई किस्म की राजनीति की शुरुआत करेंगी। लेकिन यह भ्रम शीध्र टूट गया। तृणमूल सरकार ने वामदलों की तर्ज पर तुष्टीकरण की नीति अपनाते हुए अपने कार्यकर्ताओं को हिंसक कृत्यों के लिए उकसाना शुरु कर दिया। हद तो तब हो गयी जब हिंसक कार्यकर्ताओं को पुलिस और प्रशासन का भी संरक्षण मिलने लगा। पिछले कुछ वर्षों में विरोधी दलों के सैकड़ों नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या इसका जीता जागता सबूत है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि हत्यारें सलाखों से बाहर हैं और जनता भयभीत है। बंगाल के नागरिकों की मानें तो विधि-शासन में तृणमूल कांग्रेस का हस्तक्षेप ही राजनीतिक और चुनावी हिंसा के लिए जिम्मेदार है। लोगों का कहना है कि तृणमूल कार्यकर्ताओं के मन में कानून को लेकर तनिक भी भय नहीं है। सच कहें तो इस स्थिति ने ही तृणमूल कांगे्रस और वामपंथ के फर्क को मिटा दिया है। जिस वामपंथ का सिद्धांत रहा कि सत्ता बंदूक की नली से होकर गुजरती है, उस सिद्धांत पर अमल करते हुए ममता बनर्जी की सरकार ने भी सत्ता को बंदूक की नली से गुजार रही हैं। शायद ममता बनर्जी और उनकी पार्टी 2021 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में अपनी संभावित हार को भांप गयी है। दरअसल उनका यह डर अनायास नहीं है। गौर करें तो 2019 के आमचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को अपार जनसमर्थन मिला। वह राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटों पर कब्जा करने में कामयाब रही। इतना ही उसने 40 फीसदी वोट भी हासिल कर 121 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त भी बनायी। संभवतः इससे डरी-सहमी तृणमूल कांग्रेस इस निष्कर्ष पर है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो फिर 2021 में उसके हाथ से सत्ता का सरकना तय है। दूसरी ओर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी ममता सरकार घिरी हुई है। जिस तरह ममता बनर्जी और उनकी सरकार ने शारदा चिटफंड घोटाले की जांच में सीबीआइ का सहयोग करने के बजाए भ्रष्टाचारियों के पक्ष में खड़ी हुई उससे जनता के बीच यहीं संदेश गया कि वह भ्रष्टाचारियों को बचा रही हैं। देखा भी गया कि ममता सरकार के इशारे पर कोलकाता पुलिस ने सीबीआइ अधिकारियों के साथ बदसलूकी की और उन्हें थाने पर बिठाया। याद होगा तब ममता सरकार ने कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ तक नहीं होने दी। भला एक राज्य में कानून-व्यवस्था की दृष्टि से इससे अधिक असहज स्थिति क्या हो सकती है। इस घटना से देश और राज्य की जनता अच्छी तरह समझ चुकी है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस अपना उत्तरदायित्व निभाने के बजाए तृणमूल कांग्रेस के काॅडर के रुप में काम कर रही है। ममता बनर्जी के डर की एक वजह यह भी है कि उनकी पार्टी में अंदरुनी कलह चरम पर पहुंच चुका है। पार्टी के शीर्ष और कद्दावर नेताओं का ममता बनर्जी से मोहभंग हो रहा है। अब तक दर्जनों नेता इस्तीफा दे चुके हैं और कहा जा रहा है कि चुनाव आते-आते कई और विधायकों और मंत्रियों का इस्तीफा हो सकता है। ममता के लिए चिंता की बात यह है कि इस्तीफा दे रहे मंत्री-विधायक भाजपा की शरण में जा रहे हंै। इस नाते भी ममता बनर्जी बौखलाई हुई हैं। देखें तो आज की तारीख में बंगाल की सियासी भूमि भाजपा के लिए अनुकूल और उर्वर बन रही है। समाज के सभी वर्गों में उसका जनाधार बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं अन्य शीर्ष नेताओं ने अपनी रैलियों और रोड शो के जरिए भाजपा के पक्ष में सकारात्मक माहौल निर्मित कर दिया है। संभवतः इसी चिढ़ की वजह से ममता बनर्जी मर्यादा की सारी हदें पार कर रही हैं। देखा भी गया कि लोकसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने किस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तल्ख टिप्पणियां की। उन्होंने कभी प्रधानमंत्री को मिट्टी-कंकड़ से बनी मिठाई खिलाने की बात कही तो कभी उन्हें थप्पड़ लगाने की हुंकार भरी। हद तो तब हो गयी है जब उन्होंने संवैधानिक पदों पर आसीन राज्यपाल पर भी फब्तियां कसने से नहीं चूकी। याद होगा उन्होंने राज्य के उत्तरी चैबीस परगना में फेसबुक से फैले तनाव के लिए जिम्मेदार गुनाहगारों पर कार्रवाई करने के बजाए राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा था कि टेलीफोन पर बातचीत के दौरान राज्यपाल उनसे ऐसे बर्ताव कर रहे थे मानों वे भाजपा के ब्लाॅक प्रमुख हों। उनके एक अन्य नेता डेरेक ओ ब्रायन ने तो यहां तक कह डाला कि पश्चिम बंगाल में राजभवन आरएसएस के शाखा के रुप में तब्दील हो चुका है। गौर करें तो इस तरह की भाषा और आरोपों के जरिए ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के नेता अपनी तो फजीहत करा रहे हैं साथ ही लोकतंत्र की गरिमा को भी धूल-धुसरित कर रहे हैं। इस तरह का दृश्य यहीं रेखांकित करता है कि राज्य में एक निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार नहीं बल्कि एक तानाशाह की सरकार है।

देवयज्ञ अग्निहोत्र करने से मनुष्य पाप से मुक्त व सुखों से युक्त होते हैं

-मनमोहन कुमार आर्य
मनुष्य चेतन प्राणी है। चेतन होने के कारण इसे सुख व दुख की अनुभूति होती है। सभी मनुष्य सुख चाहते हैं, दुःख प्राप्त करना कोई मनुष्य नहीं चाहता। ऐसा होने पर भी अनेक कारणों से हमें सुख व दुःख दोनों ही प्राप्त होते हैं। मनुष्य को सुख प्राप्त करने के लिये प्रयत्न व पुरुषार्थ करना पड़ता है। यदि प्रयत्न बुद्धिपूर्वक होते हैं तो उनसे सुख मिलने की सम्भावना होती है। कई बार मनुष्य के द्वारा सुख की इच्छा से किये गये कर्मों के कारण भी दुःख मिल जाया करते हैं। ऐसा प्रायः सभी मनुष्यों का अनुभव होता है। मनुष्य यह चाहता है कि उसे किसी अन्य मनुष्य या प्राणी से दुःख प्राप्त न हो। ऐसा ही सभी अन्य मनुष्य एवं प्राणी भी चाहते हैं। परन्तु ऐसा देखने में आता है कि मनुष्य से कुछ ऐसे कार्य हो जाते हैं जिनसे अकारण दूसरे प्राणियों को दुःख मिलता है। मनुष्य के वह कर्म जो चाहे अनचाहें दूसरों के दुःखों का कारण बनते हैं, उससे कर्ता को पाप लगता है। विधान है कि मनुष्य को ज्ञानपूर्वक कर्म करने चाहिये और प्रयत्न करना चाहिये कि किसी प्राणी को अकारण उनसे दुःख न हो। अतः मनुष्य को प्रत्येक कर्म करते हुए इस प्रेरणा को ध्यान में रखना चाहिये। मनुष्य के कुछ ऐसे भी कर्म होते हैं जिनसे मनुष्य के न चाहते हुए भी अन्य प्राणियों को दुःख व कष्ट पहुंचता है। यदि हम सड़क पर चल रहे हैं तो चींटी आदि प्राणी हमारे पैरों से कुचल जाते हैं। हम भोजन पकाते हैं, इसकी अग्नि से वायु के कुछ प्राणियों को भी कष्ट हुआ करता है। हमारे रसोई, वस्त्र धोने तथा मल मूत्र आदि की दुर्गन्ध एवं अन्य अनेक कार्यों से भी वायु व जल आदि में प्रदुषण होता है जिसका परिणाम प्राणियों को दुःख पहुंचाता है। हम अपने कार्यों से अन्य प्राणियों को अनचाहें में होने वाले दुःखों व उन पापों से कैसे मुक्त हो सकते हैं, इसका एक वैदिक विधान देवयज्ञ अग्निहोत्र का प्रतिदिन प्रातः व सायं करना होता है। महाभारत युद्ध के बाद शायद सबसे पहले ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के द्वारा हमारा ध्यान इस ओर दिलाया है। उनके यज्ञ करने के समर्थन में अनेक तर्क एवं युक्तियां प्रस्तुत की हैं। विचार करने पर उनकी बातें सत्य सिद्ध होती है। आईये, हम यहां कुछ का अवलोकन करते हैं।

ऋषि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश ग्रंथ में लिखते हैं कि देवयज्ञ वह होता है कि जो अग्निहोत्र और विद्वानों के संग से सेवा आदि के द्वारा होता है। अग्निहोत्र सायं प्रातः दो ही काल में करना होता है। दो ही रात दिन की सन्धि वेला होती हैं, अन्य नहीं। यज्ञ से पूर्व सन्ध्या करते हुए न्यून से न्यून एक घण्टा ईश्वर का ध्यान अवश्य करें। जैसे समाधिस्थ होकर योगी लोग परमात्मा का ध्यान करते हैं वैसे ही सन्ध्योपासन किया करें। सन्ध्या से इतर सूर्योदय के पश्चात् और सूर्यास्त के पूर्व अग्निहोत्र करने का भी समय है। अग्निहोत्र के लिए एक किसी धातु वा मिट्टी की ऊपर 12 वा 16 अंगुल चैकोर, उतनी ही गहिरी और नीचे 3 वा 4 अंगुल परिमाण से वेदी इस प्रकार बनावे अर्थात् ऊपर जितनी चैड़ी हो उसकी चतुर्थांश नीचे चैड़ी रहे। उसमें चन्दन पलाश वा आम्रादि के श्रेष्ठ काष्ठों के टुकड़े उसी वेदी के परिमाण से बड़े छोटे करके उस में रक्खे, उसके मध्य में अग्नि रखके पुनः, उस पर समिधा अर्थात् पूर्वोक्त इन्धन रख दें। इस लेख के पश्चात ऋषि ने सत्यार्थप्रकाश में यज्ञीय पात्रों का सचित्र उल्लेख किया है जिसे सत्यार्थप्रकाश में देखा जा सकता है। इसके बाद ऋषि लिखते हैं कि यज्ञ करने से पूर्व उचित मात्रा में घी को अच्छे प्रकार देख लेवे, फिर मन्त्र से होम करें। अग्निहोत्र करते हुए यज्ञ में बोले जाने वाले सभी मंत्रों को बोलकर एक-एक आहुति देवें। ऋषि दयानन्द लिखते है कि ‘स्वाहा’ शब्द का अर्थ यह है कि जैसा ज्ञान आत्मा में हो वैसा ही जीभ से बोले, विपरीत नहीं। जैसे परमेश्वर ने सब प्राणियों के सुख के अर्थ इस सब जगत् के पदार्थ रचे हैं वैसे मनुष्यों को भी परोपकार करना चाहिये। 

ऋषि ने एक प्रश्न उपस्थित किया है कि होम करने से क्या उपकार वा लाभ होता है? इसका उत्तर यह दिया है कि सब लोग जानते हैं कि दुर्गन्धयुक्त वायु और जल से रोग, रोग से प्राणियों को दुःख और सुगन्धित वायु तथा जल से आरोग्य और रोग के नष्ट होने से सुख प्राप्त होता है। ऋषि दयानन्द जी ने यह भी बताया है कि चन्दनादि घिस के किसी को लगावें वा घृतादि खाने को देवें तो वह उपकार नहीं होता जो कि अग्निहोत्र करने से होता है। वह इस बात का भी खण्डन करते हैं कि अग्नि मे डाल के घृत आदि पदार्थों को व्यर्थ नष्ट करना बुद्धिमानों का काम नहीं है। ऋषि दयानन्द आगे कहते हैं कि जो मनुष्य पदार्थ विद्या जानता है वह कभी मिथ्या बातों में विश्वास नहीं करता। किसी द्रव्य का अभाव कभी नहीं होता। जहां होम होता है वहां से दूर देश में स्थित मुनष्यों की नासिका से सुगन्ध का ग्रहण होता है वैसे दुर्गन्ध का भी होता है। इतने ही से समझ लो कि अग्नि में डाला हुआ पदार्थ सूक्ष्म हो कर फैल कर वायु के साथ दूर देश में जाकर दुर्गन्ध की निवृत्ति करता है। इस क्रम में ऋषि दयानन्द जी ने एक अन्य प्रश्न यह किया है कि जब ऐसा ही है तो केशर, कस्तूरी, सुगन्धित पुष्प और इत्र आदि के घर में रखने से सुगन्धित वायु होकर सुखकारक होगा। इसका उत्तर देते हुए वह कहते हैं कि इन पदार्थों को रखने से इनकी सुगन्ध में वह सामथ्र्य नहीं होता है कि गृहस्थ वायु को बाहर निकाल कर शुद्ध वायु को प्रवेश करा सके। क्योंकि उस में भेदक शक्ति नहीं होती है। और अग्नि ही का सामर्थ्य होता है कि उस गृहस्थ वायु और दुर्गन्धयुक्त पदार्थों को छिन्न-भिन्न और हल्का करके बाहर निकाल कर पवित्र वायु को गृहस्थ वा घर में प्रवेश करा देता है। ऋषि दयानन्द अग्निहोत्र देवयज्ञ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए यह भी बताते हैं कि यज्ञ के मन्त्रों में वह व्याख्यान होते हैं कि जिससे होम करने में लाभ विदित हो जायें और मन्त्रों की आवृत्ति होने से कण्ठस्थ रहें। यज्ञ करने से वेद पुस्तकों का पठन-पाठन और रक्षा भी होवे। 

यज्ञ करने विषयक एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात यह है कि जो गृहस्थ मनुष्य यज्ञ नहीं करता उसको यज्ञ के न करने से पाप होता है। यह बात बहुत से लोगों को समझ में नहीं आती। अतः ऋषि दयाननद जी ने सत्यार्थप्रकाश में इस बात को भी तर्क एवं युक्ति देकर समझाया है। उन्होंने प्रश्न दिया है कि क्या इस होम करने के विना पाप होता है? इसका उत्तर उन्होंने यह दिया है कि हां। क्योंकि जिस मनुष्य के शरीर से जितना दुर्गन्ध उत्पन्न हो के वायु और जल को बिगाड़ कर रोगोत्पत्ति का निमित्त होने से प्राणियों को दुःख प्राप्त कराता है, उतना ही पाप उस अग्निहोत्र न करने वाले मनुष्य को होता है। इसलिये उस पाप के निवारणार्थ उतना सुगन्ध या उससे अधिक सुगन्ध वायु और जल में फैलाना चाहिये। वह आगे लिखते हैं कि घृत आदि खिलाने पिलाने से उसी एक व्यक्ति को सुख विशेष होता है जो उसे खाता है। जितना घृत और सुगन्धादि पदार्थ एक मनुष्य खाता है उतने द्रव्य के होम करने से लाखों मनुष्यों का उपकार होता है। जो मनुष्य लोग घृतादि उत्तम पदार्थ न खावें तो उन के शरीर और आत्मा के बल की उन्नति न हो सके, इस से अच्छे पदार्थ खिलाना पिलाना भी चाहिये परन्तु उससे होम करना अधिक उचित है इसलिये होम का करना अत्यावश्यक है। 

यज्ञ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी होता है कि प्रत्येक मनुष्य कितनी आहुति करे और एक एक आहुति का कितना परिमाण होता है, इसका उत्तर देते हुए ऋषि ने बताया है कि प्रत्येक मनुष्य को सोलह-सोलह आहुति और छः-छः माशे की घृतादि एक-एक आहुति का परिमाण न्यून से न्यून होना चाहिये। (एक माशा 0.97 ग्राम के बराबर होता है। इस प्रकार 6 माशे लगभग 6 ग्राम के बराबर होते हैं।) और जो इससे अधिक करें तो बहुत अच्छा है। इसीलिये आर्यवर शिरोमणि महाशय ऋषि, महर्षि, राजे, महाराजे लोग बहुत सा होम करते और कराते थे। जब तक इस होम करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावत्र्त देश रोगों से रहित और सुखों से पूरित था, अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाये। 

अग्निहोत्र देवयज्ञ करने से वायुमण्डल में सुगन्ध का प्रसार होता है जिससे रोगों की निवृत्ति व सभी प्राणियों को सुख होता है। जो मनुष्य यज्ञ करते हैं उससे उन्हें पुण्य लाभ होता है। जो मनुष्य यज्ञ नहीं करते उनको यज्ञ न करने से उन पुण्यों का लाभ नहीं होता। मनुष्य यदि यज्ञ नहीं करते तो उनके कार्यों से जो अनचाहें पशु व प्राणियों को कष्ट आदि होते हैं, उनका निवारण व समाधान नहीं होता। यज्ञ करने से हम अनचाहे हुए पापों के दोषों का सुधार करते हैं जिससे हमें दुःखों की प्राप्ति न होकर यज्ञ से जो लाभ दूसरे प्राणियों को पहुंचाते हैं, उसके परिणामस्वरूप सुख प्राप्त होते हैं। अतः सब प्राणियों को देवयज्ञ अवश्य करना चाहिये। परमात्मा ने वेदों में यज्ञ करने की आज्ञा सभी मनुष्यों को दी है। यदि हम यज्ञ नहीं करते तो परमात्मा की आज्ञा का उल्लंघन करने से भी हम पापी होते हैं। यज्ञ को करने से मनुष्य को भौतिक एवं पारलौकिक जीवन में सुख लाभ होता है। यह एक ज्ञान व विज्ञान से युक्त कार्य है। इसका सेवन सभी शिक्षित व अशिक्षित मुख्यतः ज्ञानियों को अवश्य ही करना चाहिये। जो मनुष्य यज्ञ नहीं करेंगे वह पापी होने से दुःख भोगेंगे ओर जो करेंगे वह इस जीवन व पारलौकिक जीवन में भी सुखों को भोगेंगे। मुक्ति वा मोक्ष की प्राप्ति में भी यज्ञीय कर्म सहायक होते हैं। देवयज्ञ करने से हम अपने पूर्वज ऋषियों की आज्ञाओं का पालन करने वाले बनते हैं। ऋषियों ने पंच महायज्ञों का विधान किया है। इसके अन्तर्गत ईश्वरोपासना सन्ध्या एवं देवयज्ञ अग्निहोत्र सम्मिलित हैं। अतः सभी को अग्निहोत्र देवयज्ञ अवश्य ही करना चाहिये। वेदों में बताया गया है कि यज्ञ करने से मनुष्य की सभी उचित कामनायें भी पूर्ण वा सिद्ध होती है। उनकी सर्वांगीण उन्नति होती है। ईश्वर यज्ञ करने वाले मनुष्यों के सब मनोरथ सिद्ध करते हैं। अतः यज्ञ करना मनुष्य का ऐसा कर्तव्य है जिससे उसे दृश्य व अदृश्य अनेक प्रकार के लाभ होते हैं। सभी यज्ञ करें इसी भावना से यह लेख लिखा है।